सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, July 10, 2011

मित्रायन

     हाल ही में अपने एक सहपाठी के भवन निर्माण से संबंधित भूमिपूजन कार्यक्रम में शामिल हुआ। एक अलग ही अनुभव रहा इस भूमिपूजन में शामिल होना। दरअसल पिछले काफी समय से मेरा यह मित्र निर्माण क्षेत्र में हाथ आजमाना चाहता था। कई बार हम लोग साथ-साथ प्लॉट देखने गये, कहीं जमीन का रेट जेब से बाहर था तो कहीं जमीन का टाईटल ही क्लियर नहीं था। कभी सब कुछ ठीक होने पर स्टेशन से दूरी आड़े आती तो कभी कुछ और झंझट दिखाई देता। न जाने कितनी बार हम लोग किराया भाड़ा खर्च कर यूं ही हाथ झुलाते घर आए। इस बीच कई साल बीत गये। मित्र की चाहत के चलते रह-रहकर एकाध बार हम लोग यूं ही टहलते हुए कोई साइट देख आते।

       काफी जद्दोजहद के बाद आखिर में मित्र ने मुंबई से कुछ दूर पनवेल इलाके में सिडको से प्लॉट खरीद लिया। सौ स्कवेयर मीटर का प्लॉट करीबन इकतालीस लाख का पड़ा। उसी प्लॉट के भूमिपूजन के सिलसिले में कॉलेज के मित्रगण जुटे थे। यहां कॉलेज के मित्रगण से तात्पर्य हम तीन सहपाठीयों से है जो पिछले सतरह अठारह सालों से अब तक एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, आपस में कुशल-क्षेम पूछते है, किसी काम पड़ जाने पर आपस में सलाह मशविरा करते हैं, एक दूसरे की राय लेते हैं। इस घनिष्ठता की वजह संभवत: हम सभी मित्रों का एक ही पृष्ठभूमि का होना, एक ही मु्म्बईया परिवेश में लगातार सालों तक बने रहना भी हो। सतरह अठारह साल पहले कोई फेसबुक-ट्वीटर तो था नहीं, बस फोन फान के जरिये आपसी कुशल क्षेम होती, धौल-धप्पा चलता रहता था।

         खैर, इधर साथ-साथ हम लोग जब प्लॉट पर पहुँचे तो देखा पिछले काफी दिनों से हुई बारिश के चलते प्लॉट के गड्ढों में पानी जमा हो गया है। पूजा करने के लिये थोड़ी सी सूखी जमीन दिखी। वहीं पर हम लोगों ने पूजा पाठ के सारे सामानों को रखना शुरू किया। साथ में आये पंडितजी बताते जा रहे थे कि कहां क्या रखा जाय.... रोली-अच्छत-दुर्वा-हल्दी सब कुछ बाकायदा पैकेट खोल कर साथ लाये थाल में रखा जाने लगा। चार-पाँच इंटे जोड़कर हवन हेतु प्लेटफॉर्म का भी निर्माण किया गया। जरूरत पड़ी आम के पत्तो की। पूजा सामग्री में वह न आया था। गाँव एरिया था, नजदीक ही किसी आम का पेड़ होने की संभावना थी। थोड़ा सा नजर उठाकर देखते ही पास ही एक आम का पेड़ दिख गया। आम्र पल्लवों की प्रॉब्लम सॉल्व। झट से चंद पत्ते डंठल सहित हाजिर। कलश तैयार।

          इधर आसमान में बादल भी घिरने लगे थे। चूंकि इष्ट मित्र और परिवार के लोग ही जुटे थे सो ज्यादा तामझाम भी नहीं किया गया था। जो थे सो हमीं लोग तो थे। रह- रहकर चिंता भी हो रही थी कि यार कहीं बादल बरसने न लगें। इस बीच पंडित जी ने पूजा शुरू की। मित्र के पिताजी पूजा हेतु पंडित जी के बगल में बैठे। हम लोग पास खड़े होकर कभी पूजा देखते, कभी बादल तो कभी फोन कॉल्स अटेंड करते। इस बीच अगरबत्ती की भीनी भीनी सुगन्ध खुले वातावरण में फैलने लगी, और अच्छा लगने लगा। रह रहकर शंख की ध्वनि होती, जयकारा लगता। और तभी बादल भी जैसे इस पूजा में शामिल होने के लिये एक दूसरे को ढकेलते-मेल्हते आ गये। बिजली की गड़गड़ाहट के साथ वो झमक के बारिश हुई कि क्या बताउं। अगरबत्तीयां बुझ गई, हल्दी-अच्छत सब भीग उठे, पूजा सामग्री, मिठाई आदि सब तर बतर। हम लोगों के पास छाते थे लेकिन वे इस तेज बारिश में बेकार साबित हो रहे थे। वैसे भी छतरी केवल मामूली बारिश में ही साथ दे सकती है। हवा के साथ तेज बारिश हो तो भीगना तय है। पूजास्थल पर वही हो रहा था। तेज हवा के साथ तेज बारिश ने सबको भिगोना शुरू किया। पंडित जी और मित्र के पिताजी को एक एक छाता दे दिया गया कि आप लोग बैठे रहिये छाता पकड़े, हम लोग छाता खोले तेज बारिश का आनंद लेते हैं। करीब दस मिनट तक झमाझम बारिश हुई। थोड़ी देर बाद बादल छंटे तो फिर आगे का कार्यक्रम शुरू किया गया। घी, गुड़ आदि के मिश्रण से बने हवन सामग्री को प्रज्वलित किया गया। मन्त्रोच्चार हुआ, पाठ चला, आरती ली गई और होते होते आधे अगले घंटे में पूजा पाठ सम्पन्न हो गया।

       लौटानी में मित्र ने बताया कि सिडको के ये प्लॉट किसी किसान से लिये गये हैं। वहां से हमें सिडको के जरिये खरीदना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में शेतकरी संघटना, किसान, सिडको आदि से काफी कुछ कानूनी प्रक्रियाओं के पूरा करने के बाद, सारी क्लियरेंस मिलने के बाद करीबन 41 लाख में यह सौ स्कवेयर मीटर का प्लॉट पड़ा। इसमें FSI आदि जोड़-जाड़कर कुल आठ फ्लैट बनाने की इजाजत मिली है। मैं मित्र की इस सफलता पर मन ही मन मुग्ध हो रहा था क्योंकि मित्र की इच्छा के चलते हम सहपाठियों ने साथ-साथ काफी प्लॉट्स देखे थे और इतने वर्षों बाद उसके सपनों को साकार रूप लेते देखना अच्छा लग रहा था। रास्ते में मित्र ने एक और प्लॉट की ओर इशारा करते बताया कि इसके बारे में भी कागजी कार्यवाही चल रही है। जल्द ही ये भी अपनी मुट्ठी में होगा।

     मैंने उस प्लॉट्स के आसपास देखा तो जितने घर थे सबके आगे गाड़ियां खड़ी दिखीं। कहीं इनोवा कहीं स्कॉर्पियो तो कहीं पजेरो। सब एक से एक। गाँवखेड़ा होकर ऐसी गाड़ियां घरों के आगे खड़ी देखना थोडा सा कौतुहल जगा गया। साथ ही कुछ घरों की खिड़कियों में एयर कंडीशन भी दिखे। अमूमन गाँवों में एयर कंडीशन नहीं दिखते, लेकिन यहां थे। मित्र से पूछ पछोर करने पर पता चला कि सिडको की ओर से किसानों की जमीनें ली जाती हैं और उसके बदले में मोटी रकम दी जाती है। जिससे सारे गाँव वाले अब करोड़पति बन उठे हैं। उन्हें मोटी रकम के अलावा पुनर्वास के लिये भी सरकारी उपाय किये गये हैं। कुछ यही सब दिल्ली के आसपास के गाँवों से संबंधित एक रिपोर्ट में भी देखा था जिसमें कि कुछ किसानों की नवधनाढ्यता को दर्शाया गया था कि कैसे हर घर के बाहर गाड़ियां खड़ी दिखती हैं, कैसे वहां के लोग अचानक अमीर हो गये हैं और उन तमाम सुविधाओं को भोग रहे हैं जो अब तक केवल शहरी मानी जाती थीं।


      पनवेल के किसानों की इन गाड़ियों को देख जहां तक मैं समझता हूं इन्हें किसी कंपनी में कांट्रेक्ट पर उठा दिया जाता होगा और बदले में किसान महीने में कुछ आमदनी भी कर लेते होंगे। यहां एक दो कारों के पीछे वह चेतावनी वाली प्रति भी दिखी – If You find rush driving by driver, kindly contact ……. इससे पता चलता है कि यहां की गाड़ियां क्रांट्रेक्ट पर दी जाती हैं। अच्छा है, एक तरह से अचानक मिली मोटी रकम का सदुपयोग ही कर रहे हैं किसान परिवार।


         उधर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि – किसानों के लिये उनकी जमीन क्या होती है यह किसान लोग ही जानते हैं। सुप्रीम कोर्ट की बात अपनी जगह सही है। लेकिन अब खेती किसानी पहले जैसी नहीं रही। जो लोग फिलहाल खेती से जुड़े हैं वह भी अपने बच्चों को शिक्षित कर कहीं नौकरी में देखना चाहते हैं, यह एक तल्ख सच्चाई है। छोटे और मझोले किसान बहुधा अपने बच्चों को खेती से जुड़े रहने की सलाह नहीं देंते क्योंकि यहां आमद के नाम पर एक किस्म की प्रच्छन्न बेरोजगारी सी चलती है। प्रच्छन्न बेरोजगारी से तात्पर्य जब परिवार के ढेर सारे सदस्य और कोई काम न होने पर खेती में जुटे रहते हैं तो वहां एक तरह की छुपी बेरोजगारी होती है। ज्यादातर छोटे किसानों की खेती-बाड़ी इसी प्रच्छन्न बेरोजगारी के आलोक में घिसट घिसट कर चल रही है। लोग खेती के काम में तो जुटे हैं लेकिन उनकी आमदनी नहीं हो रही। हां, जो बड़े किसान हैं वो जरूर अपने बच्चों को इस किसानी क्षेत्र से जोड़े रखना चाहेंगे क्योंकि उनकी आमद लाखों-करोड़ों के टर्नओवरों में होती है।

        उधर देख रहा हूं कि नोयडा में विकास के नाम पर तमाम जगह जमीने कब्जाई जा रही हैं। तमाम तरह के अधिग्रहण चल रहे हैं। किसानों को मुआवजे के जरिये जमीन की कीमत अदा की जा रही है। जो नहीं शामिल हो रहे उनसे जोर जबरजस्ती का रूख भी अख्तियार किया जा रहा है। ऐसे में भकुआया सा किसान समझ नहीं पा रहा था कि क्या किया जाय, कहां जाय, किससे कहे। सो उसने नियति के आगे हार मानते मुआवजा लेना शुरू कर दिया, जमीनों से हटना शुरू कर दिया। जिसकी परिणति दिखी तमाम किसानों के यहां आई नवधनाढ्यता के रूप में। किसानों ने भी चाहा कि वह क्यों भला अपनी सारी जिन्दगी होम करते रहें। उनके बच्चे भी अच्छी शिक्षा ग्रहण करें, अच्छे से अच्छे कपड़े पहनें, उनके पास भी वो तमाम सुख सुविधायें हों जो औरों के पास हैं। उधर बिल्डरों ने इसे अपने लिये मौका बनाया और औने पौने दामों में जमीनों का मुआवजा देकर जान छुड़ाना शुरू किया और यहीं बात फंस गई।

        सरकारें शांति व्यवस्था के नाम पर बल प्रयोग करता दिखें तो बिल्डर इस शांति व्यवस्था के ताम झाम को अपने लिये सुविधा छत्र के रूप में देखें। नतीजा, दोनों पक्षों में टकराहट, और ऐसे में राहुल गांधी अपनी राजनीतिक जमीन तलाशें न तो क्या करें। पब्लिक भी है, मुद्दा भी है और चुनाव भी। सो कुल मिलाकर बात उचित मुआवजे की रकम को लेकर टिकी है। बिल्डर अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं, किसान अपने सपनों को और शहर अपने सपनों को। शहर यदि गाँवों को लील रहे हैं तो गाँव खुद भी शहर की इस लिलाहट में कहीं न कहीं स्वेच्छा से भागीदार बन रहे हैं, हां कहीं खुशी से तो कहीं जोर जबरजस्ती से। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट अपनी जगह सही है, किसान अपनी जगह और बिल्डर अपनी जगह। गलत है तो केवल ‘नीयत’ जिसके तहत विकास के नाम पर किसानों को कम से कम मुआवजा देकर टरकाया जाता है और बदले में अच्छा खासा मुनाफा कमाया जाता है।

      कामना करता हूँ कि विकास की इस वैतरणी में सभी किसानों को उचित मुआवजा मिले, सभी को अपने सपनों को साकार करने का मौका मिले, सभी लोग खुशहाल रहें। लेकिन वह कामना कैसी जो पूरी हो जाय :)

      फिलहाल तो मेरे मित्र की बरसों की इच्छा पूरी हो रही है। भूमिपूजन से पहले ही तीन फ्लोर बुक हो चुके थे, आगे भी ऐसे ही होने की उम्मीद है। आज अमरनाथ यात्रा के लिये वह मित्र प्रस्थान भी कर रहा है। इच्छा तो मेरी भी थी जाने की लेकिन वक्त पर मैंने रजिस्ट्रेशन आदि नहीं करवाया था, सो अपन फिर कभी जायेंगे......कभी मतलब....फिर कभी  :)


-  सतीश पंचम

13 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

विकास की इस वैतरणी में सभी किसानों को उचित मुआवजा मिले, सभी को अपने सपनों को साकार करने का मौका मिले, सभी लोग खुशहाल रहें।

यही हो जाये तो झगडा किस बात का। आपके मित्र को शुभकामनायें! मौसम का हाल रोचक रहा।

डा० अमर कुमार said...




नीति और नियत दोनों में ही खोट है, मित्र !
सरकारें दलाल की हैसियत अख़्तियार कर चुकी है,
जनकल्याण योजनाओं की अपेक्षा उसकी रूचि अब धन-कमाओ योजनाओं में अधिक रहती है ।
दूसरी ओर ज़मीन के भुगतान की देख-रेख किसी सक्षम अधिकारी के हाथ होनी चाहिये, असलियत यह है कि इन किसानों की युवा पीढ़ी अकर्मण्य और आवारा हो जा रही है... पुरखों की अर्जित सम्पत्ति को वह खाओ, उड़ाओ में उड़ा देते हैं... पूर्वी उत्तर प्रदेश से सटे दिल्ली में धन-माफ़ियायों का वर्चस्व बढ़ता ही जा रहा है, यौन अपराध और एक दूसरे की प्रतिस्पर्धा में बढ़ते अपराधों के पीछे कोई खास वज़ह नहीं है, केवल यह कि दीन दुनिया की चिन्ता से मुक्त वह अपनी ऊर्ज़ा कहाँ लगायें.... ?
होना यह चाहिये कि भुगतान की 75 प्रतिशत राशि समयबद्ध बाँडों के जरिये किया जाये । इस प्रकार राष्ट्रीय बचत के साथ साथ किसानों को रहन सहन की सीमाओं में रहने का लाभ भी मिलता । इस प्रकार क्रय-विक्रय अधिकतम अँडे की लालच में मुर्गी को हलाल होते हुये देखने जैसी बात हुई !

सतीश पंचम said...

अमर जी,

आपकी बात से मेरी पूर्ण सहमति है। नीति और नीयत दोनों मे गड़बड़ी है। अचानक आई दौलत यदि सही ढंग से इन्वेस्ट न हो तो उसके फुर्र होते देर नहीं लगती।

वैसे यहां के किसानों के लिये निश्चित आय का जरिया यदि सरकार ने नहीं किया तो किसानों ने खुद से एक पिछले दरवाजे से रास्ता खोज लिया है। और वह रास्ता यह है कि जो कोई बिल्डर जमीन खरीदेगा उसे एक तय सप्लायर ये ही सीमेंट, रेती, सलिया आदि खरीदना होगा। ये कोई लिखित में नहीं है किंतु ऐसा ही करने को बाध्य किया जाता है।

अब इसे बरजोरी कहा जाय, समझदारी या कमीशनबाजी, सच्चाई यही है।

सतीश पंचम said...

और हां, इन तय सप्लायरों से केवल थोड़े समय ( जब तक निर्माण चल रहा हो केवल तभी तक) थोड़ी बहुत आमद किसानों को कमीशन के रूप में मिलती है, बाद में तो उनके पास वाला पैसा है ही ( यदि उड़ान फुंक-फांक के बाद बचा हो तो). और यहीं जरूरत दिखती है कि किसानों को तय समय के निश्चित आय वाले बॉण्डों की।

अरुण चन्द्र रॉय said...

बात केवल किसान की नहीं है.. बात खेत... खेती ... आत्मनिर्भरता की है...देश में माहौल कृषि के अनुकूल नहीं है... कोई किसान नहीं चाहता इस से जुड़े रहना जबके कारपोरेट जगत पूरी तैयारी में है... भला क्यों ! उनके लिए जमीं तैयार हो रही है कृषि मंत्रालय में...अमेरिका में... आप देखिएगा पांच साल बाद....

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

भोपाल जैसे शहर में होंडा सीआरवी दिखना मुश्किल है पर पिछले दिनों मैंने वहां एक चमचमाती गाडी देखी. पूछने पर पता चला किसी किसान ने एक करोड़ में ज़मीन बेची है. एक करोड़ में से लगभग बीस लाख तो उसने इस गाडी में ही झोंक दिए! और करता कुछ है नहीं!
जेब में पैसे आते ही ये रिश्तेदारों और दोस्तों की 'मदद' करने लगते हैं. महंगी शराब पीते हैं और शादी-ब्याह में अपनी हैसियत का दिखावा करते हैं. कुछ ही महीनों में ऐसे किसान सड़क पर आ जाते हैं. इनमें बहुत कम ही ऐसे समझदार हैं जो अपने पैसे को घटाते नहीं बल्कि बढाते हैं!

Kajal Kumar said...

Rat Race...

BLOGPRAHARI said...

मान्यवर !!
ब्लॉगप्रहरी हिंदी ब्लॉगजगत के लिए एक अभूतपूर्व तोहफा है. आपकी सक्रिय भागीदारी से हिंदी ब्लॉगजगत और समस्त हिंदी नेटिजन्स को एक साझा मंच मिल सकेगा. हम आपसे समर्थन और सहयोग की अपेक्षा करते हैं.
http://blogprahari.com

Arvind Mishra said...

यह शिलान्यास कथा पढी ,आशान्वित हूँ कि उदघाटन कथा भी ससमय पढने को मेलेगी -बाकी तो सब राजनीति है उस पर क्या बोलना !

डॉ. मनोज मिश्र said...

किसानों की पीड़ा के अपने अलग-अलग रंग हैं-कही कुछ तो कही कुछ.

प्रवीण पाण्डेय said...

भूमि का महत्व है और माँग भी। बेच देने से बहुत पैसा मिलता है, नवधनाढ्यता बड़ी घातक है, दिल्ली साक्षी है।

वाणी गीत said...

कुछ समय पहले राजस्थान में भी यही हाल हुआ ...जमीनों की बिक्री बॉर्डर तक जा पहुंची ...अख़बारों से कोर्ट तक बात पहुंची तब जाकर जमीन का बिकना रुका ...
फटेहाल गरीब किसान अचानक करोडपति हो गए और महँगी गाड़ियाँ , बच्चों को अच्छी शिक्षा, रहन- सहन मे बदलाव ...उस समय तो किसे अच्छा नहीं लगा होगा ...मगर कृषि योग्य भूमि की लगातार कमी हमें कहाँ पहुंचाएगी , ये सोचने की बात है ...
एक गरीब उम्रदराज कुंवारा अचानक मिली दौलत से इतना उत्साहित हुआ कि शादी कराने वाले बिचोलिये को दो करोड़ का ऑफर दे दिया! अनकमाये बिना मेहनत के धन का उपयोग इस तरह भी होता है !

रंजना said...

बहुत चिंतित करती है स्थिति....
कुछ और नहीं कर सकते तभी लोग किसानी के लिए निकलते हैं...
आज भी अधिकांशतः खेती मौसम आधारित है...
नरेगा जैसे अभियानों ने खेत में काम करने वाले मजदूरों को यहाँ से सीधे अलग कर दिया है...
छोटे मझोले किसान कार एसी और बच्चों के लिए अच्छे स्कूल की हसरत की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते...
और इन सब के बीच जब किसान दूसरा विकल्प पाता है तो जोर दोनों तरफ से यह होता है कि नफा अधिकाधिक उसकी जेब में पहुंचे....
प्रशासन यह स्थति स्थायी रखना चाहेगी,ताकि इसी के सहारे राजनीती की गुंजाइश रहे...

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.