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Thursday, July 7, 2011

आमंत्रण वाली सामाजिकता

   बुद्धि की मंदता बहुधा सामाजिक अनुदारता के रूप में प्रकट होती है – मुंशी प्रेमचन्द


             यदि प्रेमचन्द जी के उपर्युक्त कथन को वर्तमान फेसबुकीया, ऑरकुट, ट्वीटरीया परिप्रेक्ष्य में जस का तस पढ़ा जाय तो इसमें कुछ विसंगतियां नज़र आनी स्वाभाविक हैं। पहले सामाजिकता का आधार प्रत्यक्ष सम्पर्क में आने वाले लोगों तक सीमित था, उनसे बात व्यवहार के दौरान बाकी सारी लोक-व्यवहार, सांसारिक प्रथा-कुप्रथा सरीखी बातें सामने आती थीं । लोग उन बातों के आलोक में ही अपने निर्णय, अपने सम्बन्धों को निर्धारित-पल्लवित करते थे। समय के साथ उस तरह की सामाजिकता में थोड़ा बहुत बदलना-बिछलना होता रहता था।

            किंतु, वर्तमान फेसबुकिया माहौल, आभासी सामाजिकता के दौर में पहले के मानिंद सामाजिकता को निर्धारित-पोषित नहीं किया जा सकता। यहां मित्र बनाने का बाकायदा आमंत्रण आता है, फॉलोअर बनने न बनने की कवायद निपटानी पड़ती है। यदि आपको इस प्रकार की मित्रता में कोई परेशानी होती दिखे तो उस ग्रुप या सर्कल को आप छोड़ने हेतु स्वतंत्रता भी मिलती हैं। यहां देखने में यह आता है कि अन्जाने, अनचीन्हें लोगों से भी मित्रता का आमन्त्रण आता है। यह आमन्त्रण बहुधा किसी डेटाबेस से उठाकर पूर्व में किये गये किसी कमेंट या थ्रेडिंग से जुड़कर मशीनी ढंग से रैन्डम सजेशन के जरिये मिलता है। जाहिर है, इस तरह के आमन्त्रण आभासी सामाजिकता के दृश्यपटल पर हमें असमंजस में डालने के लिये पर्याप्त हैं। हम या तो ऐसे आमन्त्रणों को अस्वीकार कर सकते हैं या कसमसाहट के बीच स्वीकार कर लेते हैं कि आगे देखा जायगा, जुड़ जाते हैं, क्या फ़र्क पड़ता है।

             लेकिन बात इतनी आसान भी नहीं है। आप अपने ब्लॉग पर लिखते हैं, उसे बाकी साइटों पर सबस्क्रिप्शन के जरिये 'फीडहरी' पहुँचाते हैं, कोई पढ़ता है, कोई नहीं पढ़ता, किसी को अच्छा लगता है तो किसी को खराब भी लगता है। ऐसे में किसी बंदे के लिखे को पढ़ते रहा जाय और इस बीच कहीं से उसी शख्स द्वारा आमंत्रण भेजा जाय कि फलां साइट से जुड़ें तो मन में यह सवाल आना स्वाभाविक है कि यार ये और किससे जुड़ने के लिये कहा जा रहा है ? वैसे ही इतने सारे साइटों से जुड़े हैं, तमाम अकाउंट्स - पासवर्ड पहले ही हमें भंवर में डाले हैं तिस पर और एक अकाउंट....और एक लॉगिन....। इस मैक्सिकन घुड़दौड़ का कोई अंत भी होगा या ऐसे ही अंतहीन जुड़ना-उखड़ना चलता रहेगा। कहीं तो कोई लिमिट होगी कि बस्......इससे ज्यादा साइटों से हम नहीं जुड़ सकते.....इससे ज्यादा अकाउंट और पासवर्ड हम नहीं मैनेज कर सकते। सोशलीकरण जाये तेल लेने।

फिर,

   प्रेमचन्द जी की उस उक्ति का क्या.....जिसमें कि उन्होंने बुद्धि की मंदता को सामाजिकता से जोड़कर दर्शाया है ? तब तो हर आमन्त्रण, हर फॉलोअप का अ-स्वीकृतिकरण असामाजिकता के दायरे में आ जायगा, बुद्धि की मंदता से जोड़कर देखा जायगा ।

      खैर, अपनी बात कहूँ तो बहुत अनमने होकर मैं उन तमाम सोशल साइटों जैसे फेसबुक, ट्वीटर आदि से जुड़ तो जाता हूँ , लेकिन इन सोशल साइटों के सामाजिकता हेतु जिस गर्मजोशी, जिस समर्पण की जरूरत होती है वह मैं अपनी ओर से नहीं दे पाता। एक अर्थ में आलस्य भाव प्रबल रहता है या कदाचित अनिच्छा कहना ज्यादा ठीक होगा। वैसे भी किसी सर्कल से जुड़ने के कारणों में जब केवल जिज्ञासा या एक तरह की देखादेखी वाला भाव प्रबल हो तो वहां अनिच्छा और आलस्य आना स्वाभाविक है। फिर समर्पण तो बहूत दूर की बात है। फेसबुक पर महीने में कभी कभार ही जा पाता हूँ, ट्वीटर पर केवल अकाउंट खोला है, पासवर्ड क्या है याद नहीं, जानने की इच्छा भी नहीं। ऑरकुट पर लॉगिन हुए ढाई-तीन साल हो गये। लिकंडिन से भी कुछ ऐसा ही नाता है। तमाम बाकी साइटों के आमन्त्रण आते रहते हैं लेकिन इच्छा ही नहीं होती जुड़ने की।

         सोचता हूँ प्रेमचन्द जी के समय यदि ट्वीटर, फेसबुक, ब्लॉग आदि होता तो वे जरूर अपनी उस उक्ति को मोडिफाय करते। तब शायद गोदान का गोबर अपने ट्वीट में लिखता - आज होली पर घर जाने का मन है, मालिक छुट्टी नहीं दे रहा। बहुत अनसोशल है :)

   'पूस की रात' में खेत की रखवाली करता अलाव के आगे बैठा हलकू ट्वीट करता - आज बहुत ठंड है, ये पछुआ रांड़ जीने नहीं दे रही।

     उधर फेसबुक प्रोफाइल पर घीसू और माधव आलू भूंज कर खाने के साथ-साथ कैंपेन में कफ़न के बहाने अपनी शराब के लिये जुगाड़ भी कर रहे होते :)

   और तब मजबूरन प्रेमचन्द जी अपनी उक्ति में  बदलाव के साथ संभवत: कहते  - बुद्धि की मंदता बहुधा 'सामाजिक अति-उदारिता' के रूप में प्रकट होती है  :)


 - सतीश पंचम

9 comments:

सञ्जय झा said...

badalte parivesh me samajikta ke mayne badlte rahenge............

.......

shilpa mehta said...

हे भगवान - प्रेमचंद भी कन्फ्यूज़ हो जायेंगे इतने पासवर्ड वगैरहों से तो - आप लिखते रहिये - हम पढ़ते रहेंगे |अब क्या है ना कि - कई बार कम्प्युटराय्ज्ड ऑटोमेटिक इनविटेशन भी आते हैं |
जैसे एक बार आपके ब्लॉग पर टिप्पणी की - तो मुझे भी आया था कही से - "सतीश पंचम हेज़ इनवाय्टेड ......" कुछ हफ्ते पहले - जो आय एम् श्योर आपने नहीं भेजा था | तो इन को नज़रंदाज़ करना ही बेहतर है | जिसके नाम से आमंत्रण आता है - वह भी नहीं जानता इस बारे में अधिकतर ... |

Poorviya said...

sab kuch aaise hi chalta hai......



yahi hamari duniya hamara samaj hai.

jai baba banaras.....

प्रवीण पाण्डेय said...

सच कहा, न बदलते तो सोचते बहुत।

डॉ. मनोज मिश्र said...

@ ट्वीटर, फेसबुक, ब्लॉग ..
चिंता नही----प्रेमचंद jee का दौर होता तो ये सब कहाँ होते.....

Kajal Kumar said...

:)

अरुण चन्द्र रॉय said...

अब यही सामाजिकता है... आगे और बदलेगा...

संजय @ मो सम कौन ? said...

नई नई क्रिश्चानी गॉड-गॉड पुकारे(ऐसे प्रयोग करने से साम्प्रदायिकता को खतरा थोड़ा कम लग रहा है) की तर्ज पर हमने भी ओरकुट, फ़ेसबुक, ट्विटर, डिवशेयर, ई-स्निप याने कि जहाँ किवाड़ खुले देखे, वहाँ एंट्री मार ली थी। जल्दी ही पता चल गया कि ’not made for each other' हैं। जीमेल और ब्लॉग बहुत हैं अपने जैसों के लिये, सामान उतना ही हो कि carry करने में आसानी हो। बाकी जिनकी जितनी क्षमता, जिस दिन अपनी कैपेसिटी बढ़ गई हम भी ’तेरी महफ़िल में अपनी किस्मत आजमाके हम भी देखेंगे।’
हमारे नामराशि से सहमत हैं हम।

रंजना said...

हा हा हा हा....एकदम सही कहा...

आज प्रेमचंद जी होते तो यह एक वाक्य ही क्या ,क्या क्या बदल दिए होते,क्या क्या कह रहे होते,बस अंदाजा लगाइए...

मित्र बनाओ स्लोगन....सोशल नेटवर्किंग फंडा मेरे भी गले सहज रूप में नहीं उतरता ....आजतक फेस बुक,लिंक डेन इत्यादि इत्यादि से इसी कारण न जुड़ पायी हूँ...

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