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Monday, July 4, 2011

नेचर कॉलिंग.......


           हालिया गर्मियों की छुट्टियों में, अप्रैल की इक सुहानी सुबह जब हाथ में कैमरा लिये मैं अपने घर के आस पास की प्राकृतिक छटा को कैद कर रहा था कि, तभी एक मोर खेतों में विचरते दिखा....अभी उसे अपने कैमरे की जद में ले ही रहा था कि दूसरा भी आ गया.....फिर तीसरा...चौथा....देखते देखते मोरों का पूरा कुनबा वहां जुट गया।

        मोरों के इस कुनबे को पिछले साल भी छुट्टियों में देखा था, तब मुर्गीयों की मानिंद ये छोटे छोटे बच्चे जैसों थे। प्रकृति के इस नज़ारे को फिर से देखना मेरे लिये अलग ही अनुभव रहा।

 पेश है वही तस्वीरें......

























       

18 comments:

Deepak Saini said...

सच है सुबह सुबह अपने खेत में काम करने के साथ साथ प्रकर्ति के सुन्दर द्रश्यों का मज़ा ही कुछ और है
सुन्दर फोटो है

shilpa mehta said...

आप बहुत लकी हैं - कि ऐसी फ़ोटोज़ क्लिक करने के मौके मिलते हैं आपको - सबको नहीं देखने मिलता यह सब | और हम लोग भी बहुत लकी हैं - जो आपके फोटोस देखने का मौका मिलता है हमें ... बहुत अच्छे कलेक्शन होते हैं | वैसे - बचपन उज्जैन नामक शहर में गुज़ारा हैं मैंने - और मोर खूब देखे हैं वहां - बहुत अच्छे लगते हैं ... |

डॉ. मनोज मिश्र said...

खूब मुरैला हैं उधर,अब हम लोंगों की और भी आ गये है,पहले नही थे.

सञ्जय झा said...

bahut sundar.....

tapesh chauhan said...

गाँव के ये सजीव चित्र, सीधे गाँव में ही ले जाते है...मन को बड़ी खुसी होती है जब गाँव की कोई बटिया (पगडण्डी) चित्रों में देखने को मिलती है......

नीरज गोस्वामी said...

खूबसूरत चित्र...आज के शहर में मोर देखना ही एक उपलब्धि है...ये खुशनुमा मंज़र सिर्फ गाँव में ही मिल सकते हैं...
नीरज

अरुण राजनाथ / अरुण कुमार said...
This comment has been removed by the author.
अरुण राजनाथ / अरुण कुमार said...

dil nachne laga mor dekh ke, idhar barsaat ki aamad-aamad bhi hai.

Arvind Mishra said...

मोर और उसका हरम -खूब फोटो खीचे हैं ..
नेचर कालिंग से मैं कुछ घबराया की कहीं लोटा लेकर किसी को बैठे तो नहीं हीच लिए :)

anshumala said...

मोर तो एक ठो ही दिख रहा है बाकि तो मोरनी लग रही है , कही बाकियों ने नया हेयर कट तो नहीं लिया है | पर ये शीर्षक तो कुछ और ही आभास दिला रहा था !!!!

shama said...

Aapne to mujhe mere gaanv pahuncha diya! Kitnee hee smritiyan ujagar ho gayeen!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वाह, गाँव की मयूरी सुबह!

आशीष श्रीवास्तव said...

नेचर कालिंग से मैं कुछ घबराया की कहीं लोटा लेकर किसी को बैठे तो नहीं हीच लिए :)

अरविंद जी की इस टिप्पणी से पूरी सहमति

देवेन्द्र पाण्डेय said...

यहां...सारनाथ में मोर-मोरनी के झुंड खूब दिखते हैं। इन्हें देखकर हम मस्त होते हैं मगर आस पास के किसान त्रस्त। सब्जियों के बीज-फूल खा जाते हैं।
..अच्छी फोटोग्राफी।

प्रवीण पाण्डेय said...

अहा, मनमोहिनी तस्वीरें।

प्रतीक माहेश्वरी said...

जब कोटा में था तो बहुत मोर दिखते थे ऐसे.. सुबह-सुबह आनंद आ गया होगा चित्र खींच कर..
एक दफा मैं भी गया था कॉलेज में सुबह-सुबह चित्र खींचने... बहुत अच्छा लगा था..

परवरिश पर आपके विचारों का इंतज़ार है..
आभार

अनूप शुक्ल said...

चकाचक है जी। मोर तो हमारे यहां रोज आते हैं, टहलते हैं चले जाते हैं। :)

सतीश पंचम said...

अनूप जी,

वो टहलते हुए यह देखने आते होंगे कि देखें कहीं चिट्ठाचर्चा शुरू तो नहीं हुआ, चालू न देखकर लौट जाते होंगे :)

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