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Friday, July 1, 2011

खेल खिलाड़ी

     यहां पर जो तस्वीरें हैं वो मेरे गाँव के पोखर की है।





















       पांच साल पहले कभी इस पोखर में मछली पाली जाती थी। बच्चे इस पोखर में खूब उछल कूद करते थे। भरी दुपहरीया नहाते, खेलते, एक दूसरे पर पानी उछालते थे।


      समय बदला और सरकारी योजना आई - नरेगा। जिसके तहत इस पोखर को तालाब बनाने का उपक्रम हुआ। तालाब बना भी। बड़ा वाला तालाब। लेकिन बनाने वालों की इंजिनियरी में दोष था या भाग्य का....कि उस तालाब में फिर कभी पानी न जमा हो सका।

         लेकिन बच्चे ? वे अब भी वहां वैसे ही खेलते हैं। फर्क यही है कि पहले उसमें तरी लेते हुए तैरते थे, बुडुक्की मारते थे, अब वहां क्रिकेट खेलते हैं। उन्हें खेलने से मतलब, चाहे नरेगा हो या फरेगा...उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि योजना में किसने कितने रूपये बनाये, किसने कितना अंदर किया। उनका काम है खेलना और खेलते जाना । कुछ कुछ उस उपर वाले की तरह जिसके बारे में कहा जाता है कि वह भी तरह तरह के खेल खेलता है, उसे खेलने में आनंद आता है। उसे बाकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कहां क्या हुआ...... उसे खेलने से मतलब।

  बच्चों को भी उपर वाले की तरह ही खेल से मतलब हैं, तब भी खेलते थे जब इसमें तरी थी और अब भी खेलते हैं जब उसमें सूखा है।


शायद किसी ने सच ही कहा है - बच्चे, ईश्वर का रूप होते हैं :)

- सतीश पंचम

13 comments:

shilpa mehta said...

बच्चे ईश्वर का रूप होते हैं - और कुछ बड़े - ईश्वर से चोरी करने में भी नहीं झिझकते ...चाहे उनका खेल का मैदान हो - या कि उनके स्कूल का मिड डे मील ... :(

Patali-The-Village said...

सही कहा| बच्चे भगवान का ही रूप होते हैं|

ajit gupta said...

वाह रे नरेगा? तालाब को ही पी गए!

Arvind Mishra said...

नरेगा ..अब मनरेगा..यही आम दृश्य अब पूर्वांचल के हर जिले के गाँव गिरांव का है --कैचमेंट एरिया का ध्यान रखे बिना ही तालाबों के बंधों पर मिट्टी डाल दी गयी -नतीजा उनका जुगराफिया ही बिगड़ गया ..बच्चे तो हर हालत में गुअजारा कर ही लेते हैं मौज मस्ती के साथ ...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

दोनों ही खेल रहे हैं... ये बच्चे तो रणजी क्रिकेट खेल रहे हैं... मगर वे देश में पोखर को तालाब बनाने का टेस्ट मैच खेले जा रहे हैं.

अरुण चन्द्र रॉय said...

सतीश जी हमारे यहाँ एक कहानी प्रसिद्ध है... एक अफसर आये और कहा कि यहाँ तालाब खुदेगा..... पैसा आया... समय बीता ... तालाब नहीं खुदी.... कुछ साल बाद चेकिंग हुई... अफरा तफरी मच गई... तालाब कहाँ गया... अफसर को अपने पहले अफसर को बचाना था... सो .... रिपोर्ट बनी कि तालाब गाँव के लिए ठीक नहीं है... तालाब को भरवाने के लिए फिर योजना बनी पैसा आया.... आपके गाँव का यह चित्र पूरे देश का चित्र है....

डॉ. मनोज मिश्र said...

भाई जी नरेगा से जीतनें पोखरों को तालाब बनाने का उपक्रम हुआ उस तालाब में फिर कभी पानी न जमा हो सका,यह यथार्थ है.

प्रवीण पाण्डेय said...

विकास पानी बन उड़ गया।

anshumala said...

का बात करते है आप को कोई तैरता नहीं दिखा रहा है !! देखिये मनरेगा की नदी में पैसा बह रहा है और गरीब को छोड़ सब उसमे तैर ही तो रहे है |

Rahul Singh said...

बस आपके गांव में स्विमिंग पूल बनने की देर है.

अरुण राजनाथ / अरुण कुमार said...

agar kaha jaye to ek tarah ls narega ab ho gaya hai marega.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

@मनरेगा की नदी में पैसा बह रहा है और गरीब को छोड़ सब उसमे तैर ही तो रहे है

वाह, क्या बात कही है।

बच्चे हर स्थिति में खुश रहना जानते हैं। चित्र अच्छे लगे।

kapil said...

Satush ji , ye humare tumare gaon ki tasvir hi nhi ye poore desh ki hakikat hai .....

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