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Friday, June 24, 2011

फ्रायडे फ़ीवर v / s छुट्टी की उलझन

अक्सर देखा गया है कि विकेंड के समय ऑफ़िस से छुट्टी लेने में काफी जद्दोजहद का सामना करना पड़ता है। यह जद्दोजहद तकनीकी कम और मानसिक ज्यादा होती है। उन कंपनियों में जहां पर कि वर्किंग डेज् के बाद हफ्ते में दो दिन की शनिवार-रविवार वाली छुट्टी होती है, अक्सर शुक्रवार के दिन छुट्टी लेना असमंजस खड़ा करता है और जहाँ केवल रविवार वाली छुट्टी होती है वहां शनिवार या सोमवार के दिन छुट्टी लेने में असमंजस का भाव बना रहता है।

इस असमंजस की वजह भी है। छुट्टियों के साथ वाले दिन किसी काम से छुट्टी लेने पर आशंका लगी रहती है कि बॉस क्या सोचेगा.......कलीग्स क्या सोचेंगे ? भले ही आप को वाकई कोई काम पड़ जाय या आप सचमुच ही बीमार पड़ जांय लेकिन एक बार यह भाव आता ही है कि कहीं लोग यूं ही छुट्टी मारना न समझ लें कि महाशय ऑफिशियल छुट्टी के साथ साथ एक अतिरिक्त छुट्टी का आनंद लेना चाहते हैं।

इस सोच के पीछे जहां कुछ पूर्व में हुए अनुभव होते हैं तो कहीं सिनियर की किसी सोच औ नजरिये की भी भूमिका रहती है। एक तरह का मानसिक 'टग ऑफ वार' चलता है कि छुट्टी के साथ छुट्टी लूँ या नहीं :)

वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जब चाहे बेधड़क छुट्टी लेते हैं। उन्हें यदि बीमार पड़ने के नाम पर छुट्टी लेनी हो तो एक दिन पहले से सूरत मुर्दही हो जाती है, रह रह कर खाँसी उठने लगती है। कुछ के बारे में तो यह आशंका ही लगी रहती है कि बंदे ने फोन पर खांसा मतलब कल वो छुट्टी करेगा :)

खैर, लोगों की अपनी अपनी सोच। लेकिन इस चक्कर में मारे जाते हैं असल जरूरतमंद। इधर पिछले कुछ दिनों से अपन की भागदौड़ कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। देर रात तक कस्टमर आदि से रूबरू होना, कभी फलाना जगह तो कभी ढेकाना और कुछ नहीं भी हो तो पीपल का पेड़ तो है ही जिसके नीचे बूँदा-बाँदी झेलते रात दस दस बजे तक बैठकी जमाना :) नतीजतन बीमार पड़ना ही था। और बीमार पड़ा भी कब, आज ठीक शुक्रवार के दिन जिस दिन छुट्टी लेने का मतलब है खुद ही आशंकाओं को न्यौतना :)

सुबह तबीयत कुछ नासाज़ दिखी तो श्रीमती जी ने कहा - जी अच्छा न हो तो रह जाईये..... छुट्टी कर दिजिये। मन ने कहा पहले ......डाक्टर के पास हो आऊँ , क्या पता उसकी दवा गोली ज्यादा अच्छी निकले और वहीं से सीधे ऑफिस निकल लूँ, और छुट्टी की जरूरत ही न पड़े। लेकिन फिर शंका हुई कि क्या पता ऑफिस जाने पर जबर काम पड़ जाय क्लाईंट्स के साथ फील्ड में जान पड़ जाय, तो और मुसीबत। बॉस को sms कर छुट्टी मारने का मतलब है कि एक नई सोच को जन्म देना,,,,,,,और सब बातों के लिये जुबान खुलती है लेकिन इतना बीमार हूँ कि फोन पर बोलने की बजाय उंगलियों से टीप भर पा रहा हूँ......अशक्तता जो न कराये :)

नतीजा - sms के जरिये अपने ऑफिस में इत्तला दे दिया कि साहब नहीं आ रहे हैं........किसी पीपल के पेड़ के नीचे रात दस बजे नम हवा में बैठे थे......जूड़ी धै लिया है।
:)

बाकी आप जानिये कि जो बंदा बीमार है वो इतना सारा मोबाईल पर लिख कैसे पा रहा है :)


- सतीश पंचम


स्थान - मेरे फेमिली डॉक्टर का क्लिनिक।

समय - डॉक्टर के केबिन में अपना नंबर आने जैसा :(

Note: डाक्टर साहब के यहां अपनी बारी का इंतजार करते करते लाईव पोस्ट........

18 comments:

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

naukri me aisa hi hota hai bhaai.

ajit gupta said...

ऑफिस का काम छूट जाए लेकिन पोस्‍ट नहीं छूटती। बॉस का ईमेल दीजिए, जरा फारवर्ड कर दूं आपकी पोस्‍ट। चालिए आराम करिए वैसे भी पीपल के पेड के नीचे बैठना अच्‍छा नहीं है।

anshumala said...

हा हा हा हा

ये तो होना ही था कल ही आप को चेतावनी मिल गई थी की आप ने बला को न्योत दिया है उस पर से रात दस बजे पीपल के पेड़ के निचे बैठ कर महिलाओ को घुरना उसके बारे में खास कर उसके मोटापे के बारे में कुछ भी सोचना , सब इस हालत के ही लक्षण थे जरुर उनमे से ही किसी की आँख आप की सेहत पर लग गई होगी अब कीजिये अपनी सेहत की बढाई और उनके मोटापे की बुराई अब आप घर पर बैठिये वो तो आज भी जिम जायेंगी |

डा० अमर कुमार said...

.पिपरा के गाछ तरे बईठ मोटल्ली सबको ताड़ोगे तो..
जड़ईया बोखार नै धरेगा तऽ इन्दर महाराज फूल बरसायेंगे ?
छुटी लेने एतना लजाते काहे हैं , जी, आफिस जाके प्रान थोड़े नु देंगे ?

डा० अमर कुमार said...


बाबू साहेब तनिका ई बताइये तो के रतिया के बेला पीपरवा के निच्चे जाने का कउन बोला था....
जाके पहिले ब्रह्मराछस उतवाइये, डाक्टर के फेरा में मत पड़िये ।

सतीश पंचम said...

@ पीपल के पेड़ तले रात बैठना अच्छी बात नहीं.....

@ पीपल तले मुटल्लीयों को घूरना अच्छी बात नहीं

@ अमर जी ......

-----------

आप लोग मौज लिजिये.....खूब मौज लिजिये........लेकिन जब रात दस बजे घर में होने की बजाय मैं बाहर बैठा डउनलोड अगोर रहा था और ये मुटल्लियां वहां मेरे सामने अपनी गाड़ी में अपने अपने घर चली जा रहीं थी तो आप लोग क्या उमीद करते हैं मैं उनके कसीदे पढ़ता.........जो देखा वो लिखा अब चाहे बरम राछस हों या कोई और....पेड़ के नीचे तो अपन वैसे ही बइठेंगे :)

लेकिन आज जाकर उपर वाले से ए के हंगल इस्टाईल में जरूर पूछूँगा कि ऐसे दो चार पेड़ आस पास में और क्यों नहीं दिये......

दिये होते तो कम से कम ये दिन तो न देखना पड़ता :)

कि पीपल के पेड़ तले न बैठना....बरम राछस......आदि आदि :)

नीरज गोस्वामी said...

अब देर रात नमी के मौसम में पेड़ के नीचे बैठेंगे तो ये सब कुछ तो होगा ही...आप तो बिंदास छुट्टी लीजिये...सोचने वालों की सोच को थोड़े ही पकड़ा जा सकता है...आप तो अमर प्रेम का ये गीत सुर में या बेसुरे हो कर गाइए " कुछ तो लोग कहेंगे..." और लम्बी तान के सो जाइए..
नीरज

singhSDM said...

मजेदार पोस्ट! आनंद आया पढ कर

rashmi ravija said...

लीजिये इतने नाजुक हैं आप....ओह्ह...जिम वगैरह जाइए..स्टेमिना बनाइये...इम्युनिटी लाइए :)

मनोज कुमार said...

@ Note: डाक्टर साहब के यहां अपनी बारी का इंतजार करते
इंतज़ार ज़्यादा लंबा नहीं था ..!
** हर चीज़ में एक गुड होता है जी, जैसे ये छुट्टी लेने का कारण वीकेंड में आया .. लीव डेज़ में ठीक भी होजाएगा। अगर मंडे को ...?

Gyandutt Pandey said...

पीपल के पेड़ पर चुरईल रहती है। उसी का असर है शर्तिया! :)

रंजना said...

बुजुर्ग कहते थे...नौकरी- न करी !!!

पर अब ऑप्शन कहाँ यदि "न-करी" तो...?????

प्रवीण पाण्डेय said...

हमें भी वीकेण्ड में बहुत घरेलू कार्य रहते हैं, हाँ वही कर रहे हैं अभी।

संजय @ मो सम कौन ? said...

पिछले दो तीन दिन से ’छुट्टी’ पर आधारित पोस्ट लिखने की सोच रहा था, आज दोपहर में रूम पर आया तो आपकी पोस्ट देखी।
ज्यादा सीरियस मत लिया कीजिये ऐसी बातों को, आपकी छवि कैसी है, ये बात बहुत मैटर करती है। कमेंट लंबा हो जायेगा, लेकिन लिखता हूँ। आज से चार साल पहले हमारे बैंक का आई.पी.ओ. आना था और स्टाफ़ कम होने के कारण मानसिक रूप से सभी अधिक काम करने के लिये तैयार हो रहे थे, कमर कसे थे। ऐन पहले दिन किसी एक्स्ट्रीम कारण से मुझे छुट्टी रहना पड़ा। बॉस से बहुत अनबन चल रही थी, बल्कि मेरी तरफ़ से ही ज्यादा। मैंने बिना कारण बताये एक दिन की छुट्टी का SMS कर दिया(बोलचाल लगभग बंद थी)। जवाब आया ’नेवर माईंड।’ चांस ऐसा बना कि लगातार चार या पांच दिन मुझे छुट्टी करनी पड़ी, रोज एक एक दिन की कहता था। उधर से जवाब आया कि निश्चिंत होकर उधर अपने कर्तव्य निभाओ। मैं आई.पी.ओ. के सबसे आखिरी दिन पहुँचा, सिर्फ़ मेरी एप्लिकेशन लेने के लिये उन्होंने काम वाईंड अप नहीं होने दिया था। बिना किसी सवाल जवाब के मेरी एप्लीकेशन ली और स्पेशल मैसेंजर भेजकर एप्लीकेशंस का बंडल भिजवाया। इस सबके बाद छुट्टी की वजह के बारे में बात हुई। मालूम चला कि साथी लोगों ने बॉस के बहुत कान भी भरे कि जानबूझकर ऐसा किया है(ये स्वाभाविक है) लेकिन बॉस ने ऐसी बात होने से इंकार कर दिया बल्कि मेरे बारे में जो कहा, वो कहूँगा तो अपने मुँह मियाँ मिट्ठू वाली बात होगी। उनसे लड़ाई आखिर तक चलती रही, लेकिन वो उसी दिन से मुझसे जीत चुके थे। ऐसा नहीं कि बॉस लोगों को सिर्फ़ खुशामदी लोग ही चाहिये होते हैं, काम करने वालों की कदर भी होती है, इसलिये बिन्दास होकर शुक्रवार या सोमवार को जरूरत पड़ने पर अवकाश लिया करें।
स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
देख लो आप कित्ता सीरियस कमेंट किया है आज:)
ये जो सब आपको पीपल के पेड़ के नीचे बैठने से मना कर रहे हैं, इनसे पूछिये तो, "जब किस्मत में पीपल का पेड ही लिखा है तो क्या ऊपर बैठा जायेगा? पारिजात वृक्ष सबके नसीब में कहाँ होता है? हम आप तो मौका मिलने पर पीपल के नीचे बैठकर ही देखे जायेंगे:)

Arvind Mishra said...

ब्लागिंग के लिए तबीयत ठीक है और उधर एसे म्म एस भेजा रहा है बीमारी का ..
यह भी खूब रही .... :)

VICHAAR SHOONYA said...

SMS के जरिये छुट्टी मागने का विचार मेरे लिए तो एकदम नया है.

संतोष त्रिवेदी said...

आपकी इस पोस्ट का 'पेमेंट' तो डागदर बाबू को मिलना चाहिए! वैसे छुट्टी हमेशा आकर्षित करती है.बच्चे स्कूल में छुट्टी की घंटी सुनते ही बेकाबू हो जाते हैं तो अपन को घर से ड्यूटी जाने में आफत सी आती है मगर श्रीमती जी ठेले रहती हैं कि का करोगे,फालतू में छुट्टी करके ?

Kajal Kumar said...

उस मानसिकता का कोई इलाज नहीं जो यह माने बैठे हैं कि किसी के न आने या चले जाने से दुनिया ही चलना बंद कर देगी...

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