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Sunday, June 12, 2011

एनडीटीवी के रवीश कुमार की रिपोर्टिंग v / s मदिर-मीडिया फैसले

कभी मैंने कबीर जी की साखी पढ़ी थी जिसमें वह कहते हैं कि

सांचै कोइ न पतीयई, झूठे जग पतिपाय।
गली-गली गो रस फिरे, मदिरा बैठ बिकाय।।

जिसका भावार्थ है कि लोग सच के महत्व को नहीं मानते, अब ध्यान नहीं देते, उन्हें झूठ पर ही पूरा भरोसा है, इतना कि, लोग तो झूठ बैठे बैठे खरीदने को तैयार हैं। यह कुछ वैसा ही है जैसे कि गो रस यानि दूध और दही को बिकने के लिये गली गली घूमना पड़ता है लेकिन मदिरा बैठ-बैठे बिक जाती है, उसे बेचने के लिये गली गली नहीं घूमना पड़ता।

मुझे कबीर की कही यह साखी आज फिर याद आई जब सुना कि एनडीटीवी ने अपने
गली गली घूमने वाले पत्रकार रवीश कुमार की रिपोर्ट को बंद करने का फैसला
किया है, वही जमीनी रिपोर्टें जिनमें कि आम आदमी के जीवन से जुड़ी ऐसी
सच्चाईयां झलकती थीं जिन्हें अंगरेजी का पत्रकार दिखाने में अपनी तौहीनी समझता है। नरेगा के नाम पर दबंगों की नामावली वाला रजिस्टर हो या गरीबी रेखा से नीचे नाम प्रविष्टी की पेचिदगी, या फिर किसी सीवर में धंसते शहर की सच्चाई, हर एंगल रवीश की रिपोर्ट से बखूबी दिख रहा था, उघेड़कर दिखलाया जा रहा था कि देखो कैसे दो रूपये में बिस्कुट से रिक्शावाला पेट भरता है,
कैसे एक ही थाली में दो जिलों के मजदूर पेट बंटाते हैं, (हाथ तो खैर
बंटा ही रहे हैं)।

न जाने क्या वजह रही एनडीटीवी द्वारा रवीश की रिपोर्टें बंद करने की
जबकि इसी के सहयोगी चैनल एनडीटीवी गुड टाईम्स से अब भी ठाट से मदिरायन
वाले, महंगे महंगे होटलों में शैपेन, स्कॉच का आनंद लेते महंगे कपड़ों से
सजे धजे सांघवी के शो, थापर के शो दिखाये जाने में कोई मुश्किल नहीं
होती। वही शो, जिनमें एलीट क्लास के बनावटी हाव भाव को जमकर परोसा जाता है। हर बात में बनावटी शिष्टाचार को कीमती क्रॉकरी सेटों और रंगीन परदों
की ओट में दिखाया जाता है कि देखो अमीर तबके ऐसे रहते हैं, ऐसे खाते पीते
हैं। शायद रवीश से यह गलती हो गई कि उन्होने क्रॉकरी सेट और रंगीन परदे,
रंगीन सज धज दिखाने की बजाय उन कपड़ों को बनाने वालों पर अपना फोकस कर दिया। दिखा दिया कि देखो जो कपड़े आप इन अमीरों को पहने हुए देख रहे हैं,
जो परदे लहरा रहे हैं, उनको बनाने वाले कैसी तंगहाली में जीते हैं, कैसे अपने फेफड़ों में जहरीले रसायनों के बेल बूटे सजाते जा रहे हैं, और कैसे इन कपड़ों को रंगीन करने में अपनी ही ज़िंदगी से बदरंग होते जा रहे हैं।

खैर, यह व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा का दौर है, टी आर पी की मार काट का
दौर है, डिप्लोमेटिक फैसलों का दौर है। ऐसे में रवीश की रिपोर्ट किस
डिप्लोमेटिक आंच की भेंट चढ़ गई ये तो एनडीटीवी के लोग ही बेहतर जानते
होंगे, लेकिन इतना जरूर है कि रवीश की रिपोर्ट बंद करने के फैसले से
एनडीटीवी ने अपनी बची खुची विश्वसनीयता को और भी गहरे धकेल दिया है। और भी गहरे इसलिये, क्योंकि पहले ही नीरा राडिया से कनेक्शन का साया उसे अविश्वसनीयता के गर्त में धकेल चुका है। ऐसे में जमीनी सच्चाई से रूबरू
कराते रवीश की रिपोर्ट को खोने का मतलब है कि एनडीटीवी की उल्टी गिनती और भी तेजी से गिनी जा रही है,
रवीश जैसे जमीनी हकीकत को बंया करते शख्स के कार्यक्रम को बंद करने
के फैसले के प्रति मेरी कड़ी आपत्ति है ।

- सतीश पंचम

स्थान - मुंबई

समय - रात के ग्यारह - दस्स।

(Nokia c- 3 से लिखने के कारण शब्द गद्य की पटरी छोड़ कहीं कहीं पद्य की पगडंडी पकड़ते दिख रहे हैं। उम्मीद है आप लोग पगडंडी झेल लेंगे :)

9 comments:

Kajal Kumar said...

एलीट क्लास के चैनल पर रवीश की रिपोर्टों का क्या काम. इस तरह की रिपोर्टों से चैनल का कोई उल्लू भी तो सीधा नहीं होता... रवीश रिपोर्टर नहीं एक रचनाकार हैं, जो वह बुनते हैं दूसरों के लिए स्वप्न में भी संभव नहीं.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

इत्तेफाक़ से आपकी पोस्ट पढने के कुछ घंटे पहले ही गलती से घूमते-घूमते रवीश के ब्लॉग की एक पोस्ट पर पहुँच गया था और पढकर सोच रहा था कि किस किस्म का पत्रकार अपने ही देश के बारे में इतना अज्ञानी और जातिवादी व पूर्वाग्रही हो सकता है। अच्छा हुआ कि आज ही आपकी पोस्ट से पता लगा कि वे रिक्शेवालों द्वारा बिस्कुट से पेट भरने वाली खोजी रिपोर्टिंग करते हैं।

सांचै कोइ न पतीयई, झूठे जग पतिपाय।
गली-गली गो रस फिरे, मदिरा बैठ बिकाय।।

संत कबीर की साखी पसन्द आयी।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

गोवा किसका- परशुराम, लोहिया या शोभराज का से:

गोवा गया था। दक्षिण गोवा में बिग फूट नाम का एक सरकारी संग्रहालय है। यहां पर परशुराम की प्रतिमा लगी है। प्रवेश द्वार पर ही। नज़र पड़ते ही गाइड से पूछा कि भई धनुर्धर कौन हैं? जवाब मिला परशुराम। गोवा के संस्थापक। सह्याद्री के पहाड़ों में तप करते वक्त परशुराम ने तीर चला दिया। अरब सागर में तीर गिरते ही सागर का पानी पीछे हट गया और यहां धरती निकल आई। इसी भूखंड पर गोवा बसा है। मेरी आंखे खुली रह गईं। परशुराम ने तीर क्यों चलाई? क्या उनके निशाने पर कोई आदिम अरब था या यवन था? पता नहीं। फिर परशुराम को लेकर ब्राह्मण उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में ही क्यों सक्रिय हैं? काश यहां परशुराम ने तीर चला दिया होता तो बिहार और उत्तर प्रदेश के बाढ़ग्रस्त भूखंड पर गोवा जैसा रमणिक स्थल बन जाता। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह प्रतिमा एक चिंगारी के रूप में यहां रखी गई है जो आने वाले किसी समय में भड़केगी। जब यह मांग होगी कि गोवा के फर्नांडिस, रोड्रिग्स और डिसूजा अपना नाम बदल कर शर्मा, पांडेय और मिश्रा रख लें। ख़ैर आशंका में अभी से क्यों मरें। बात इतनी सी है कि बड़ी हैरानी हुई।

संजय @ मो सम कौन ? said...

हमने तो एक पोस्ट पढ़ी थी रवीश जी की, जिसमें एक मेट्रो कर्मी की पहनी हुई टी शर्ट (उस पर लिखे) का मजाक उड़ाया गया था, जबकि उसी मेट्रो में उससे बेहूदा स्लोगन लिखे टीशर्ट पहने लड़के लड़कियां मैंने देख रखे हैं। अपने को तो उस टी-शर्ट वाले का कसूर यही दिखा था कि वो गरीब था, और पत्रकार साहब उसी टाईप के जमीन से जुड़े लगे जैसे कि लालू यादव जी।

Arvind Mishra said...

रवीश जी से मेरी बतकही हुआ करती थी विज्ञान के विषयों पर ..लबे समय से सिलसिला बंद है ..
किसी कार्यक्रम को बंद करने के अन्य अपरिहार्य कारण हो सकते हैं !

प्रवीण पाण्डेय said...

सी3 तो जबरजस्त साहित्य सृजन में लगा है। क्या परोसना है, वावर्ची स्वयं ही निर्धारित करने लगे हैं।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

क्या परोसना है, वावर्ची स्वयं ही निर्धारित करने लगे हैं!
...प्रवीण जी का इस पोस्ट पर यह कटाक्ष अच्छा लगा।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

aapki aapatti ke saath meri apatti bhi darz ho....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आज रवीश का "दिल्ली के देवता" देखा ऑनलाइन और आपकी भावना समझ में आयी। प्रोग्राम पसन्द आया और फिर आभार व्यक्त करने के लिये यह पोस्ट दोबारा पढी।

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