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Saturday, June 4, 2011

कबूतरायन v / s पड़ोसन की 'चिक-चिक'

      इस वक्त बाहर बड़ी जोर की बारिश हो रही है। इतनी, कि बौछार से बचने के लिये गैलरी की खिड़कियां बन्द रखनी पड़ रही हैं। उसी बन्द खिड़की के पास गलियारे में कबूतरों के कुछ जोड़े भी रह रहे हैं, कुछ ने अंडे भी दिये हैं। श्रीमती जी अक्सर इन बेचारे कबूतरों को कोसती हैं कि यहां रहने से कबूतर गंदगी करते हैं, इन्हें यहां से हटा देना चाहिये। कभी कभी तो इनकी उधम इतनी ज्यादा हो जाती है कि सूखने के लिये डाले गये कपड़े तक नीचे गिरा देते हैं। पिछले दिनों रस्सी पर डाले गये श्रीमती जी की साड़ी गिरा दिये। पांच मंजिल नीचे भेजकर बच्चों से मंगवाना पड़ा। तंग आकर श्रीमती जी ने कबूतरों के गैलरी में छिपने वाले ठिकानों को ढंक दिया, तोप-ताप दिया ताकि उनके टिकने का ठिकाना ही न रहे। लेकिन न जाने कबूतरों को मेरी गैलरी से क्या मोहब्बत है वहीं आकर बैठते हैं।


        इधर मेरी दक्षिण भारतीय पड़ोसन अक्सर शिकायत करतीं हैं कि आपकी गैलरी में ढेर सारे कबूतर आते हैं, उनके वजह से गंदगी होती है। एक दिन एक कबूतर का बच्चा न जाने कैसे मेरी गैलरी से पड़ोसन की गैलरी में चला गया। उस बच्चे के माता पिता उपर बैठे टुकुर टुकुर ताक रहे थे। उधर कबूतर के बच्चे को देख पड़ोसन ने शिकायत की कि अब देखिये आप लोगों के यहां से कबूतर मेरे यहां शिफ्ट हो रहे हैं। इन्हें हटा दिजिए। पड़ोसिन की बात सुनकर श्रीमती जी तुनक गईं। एक तो इन कबूतरों से हम पहले ही परेशान हैं उपर से पड़ोसिन के नखरे। साँझ के समय श्रीमती जी उलाहना देते मुझसे कहने लगीं कि पड़ोसन तो यूँ कह रही है जैसे कि कबूतर न हुए, हमारे पाले गुंडे हों। इन्हें हमने पाला है क्या ....... और फिर कबूतर ही तो हैं, कोई चील-गिद्ध तो नहीं। उस वक्त तो श्रीमती जी ने पड़ोसन से कुछ न कहा।

      अभी उस घटना को हुए कुछ दिन बीते होंगे कि एक दिन देखा पड़ोसिन कबूतरों को दाना खिला रही है। अपनी गैलरी में उन्हें परचा रही है। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। कहां तो यह पड़ोसन कबूतरों से बिदक रही थी और कहाँ अब उन्हें चुग्गा डाल रही है। मैंने श्रीमती जी से पूछा – यह क्या मामला है। थोड़ी देर तो श्रीमती जी मन्द मन्द मुस्काती रहीं और फिर धीरे से भेद खोला कि पड़ोसन एक बार फिर से पूछ रही थी कि आप लोग कबूतर क्यों नहीं हटा देते।

- तो ? ........ तुमने क्या कहा ?

-  कहती क्या  ? …..मैंने उसे बातों ही बातों में बताया  कि – 'हमारे यहाँ तो ऐसा' बोलते हैं कि जिसके यहां कबूतर खुद ब खुद आकर अपना परिवार बसाते हैं, अंडे देते हैं, उसके यहां पैसे ज्यादा आते हैं, नौकरी व्यापार में बरक्कत होती है। इसलिये देखा नहीं, जितने मारवाड़ी हैं सब के इलाके में एक न एक कबूतरखाना दिखता है जहां कि कबूतरों को दाना डाला जाता है। इसलिये कबूतरों का घर कभी उजाड़ना नहीं चाहिये।  पाप लगता है। पैसे का रास्ता बंद हो जाता है। ऐसा 'हमारे यहाँ' बोलते हैं।

- फिर ?

- फिर क्या.....उस वक्त तो वह सुनकर रह गई। अगले दिन मैंने वही देखा जो आप ने आज देखा। वैसे भी कबूतर हमारे हटाने से रहे, उन्हें कितना चाहा कि यहां से हटा दूं लेकिन हटते नहीं। तिस पर पड़ोसन की बातें सुनने से तो अच्छा है कि उसे भी कबूतरों की ज़हमत उठाने दिया जाय। कुछ वह भी पुण्य कमाये, कुछ उसका भी बैंक बैलेंस बढ़े।

       पूरी बात जानते ही मैं ठठाकर हंस पड़ा। कबूतरों की वज़ह से धन दौलत आती है, बरक्कत होती है.....हद है। फिलहाल मेरे पास कितनी धन दौलत आ रही है ये तो मैं ही जानता हूँ लेकिन श्रीमती जी ने जिस अंदाज में बहाना गढ़ते हुए पड़ोसन से होने वाली चिख-चिख से जान छुड़ाई वह मुझे थोड़ा रोचक लगा । अब कबूतर लोग रहे चाहे जांय, कम से कम टंटा तो न होगा। लेकिन इस पूरे मामले में जो एक और चीज जो मुझे दिलचस्प लगी वह थी 'हमारे यहाँ तो ऐसा'-  नामक जुमला। यह 'हमारे यहाँ तो ऐसा' नामक जुमला न जाने कब से चला आ रहा है लेकिन है बड़ा मौजूं।  देखा गया है कि जब कभी दो विभिन्न प्रांतों के लोग आपस में किसी विषय पर भिन्नता पाते हैं तो अक्सर उनमें से एक जब भी कुछ जस्टिफाई करना चाहेगा तो बातों बातों में 'हमारे यहाँ तो ऐसा' होता है कहकर अपनी बात रखेगा तिस पर सुनने वाला यह मानकर चलेगा कि जब फलां प्रांत वाला बंदा ऐसा कह रहा है तो जरूर उनके यहां ऐसा होता होगा। इसके आगे बात ही 'खलास'

   खैर,  पाप और पुण्य जब मिलेगा तब मिलेगा.... मेरी धर्मभीरू पड़ोसन का बैंक बैलेंस जब बढ़ेगा तब बढ़ेगा...... अभी तो अपना बैंक बैलेंस चेक कर लूँ....क्या पता....कहीं बढ़ न गया हो।


- सतीश पंचम

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 चलते चलते

 मेरे ब्लॉग Thoughts of a Lens से यह रही ताजा तस्वीर




अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के वक्त जगह जगह ढेर सारे बैनर बड़ी हसरतों से लगाये गये थे.....India Against Corruption, Second Freedom struggle, India Awakened....bla bla bla.


   दिन बीते और उन बैनरों पर फिर से लद गये वही पुराने कोफ्त बढ़ाते हार्दिक शुभकामना वाले संदेसे।

      बाबा रामदेव को लेकर दिग्विजय सिंह ऐसे ही हवा में नहीं बोल रहे हैं फूँ...फाँ....। उस शख्स को पता है कि चाहे बाबा रामदेव हों या अन्ना हजारे...... दो चार महीनों में ही सभी की परिणति इस India Against corruption वाले 'हसरती बैनर' सरीखी होनी है..... नेता जमात पहले की तरह ही पुराने वाले अन्ना हजारे की तस्वीरों के उपर ही अपने को स्थापित करेंगे...... 'हार्दिक शुभ-कामनाएँ' निर्बाध रूप से बांटते रहेंगे और जनता ऐंवे ही करप्शन मिटने की 'शुभ-फ़हमी' पाले रहेगी।

http://lensthinker.blogspot.com/

21 comments:

shilpa mehta said...

क्या बढ़िया आईडिया निकला है आपकी पत्नी जी ने - कि झगडा भी ना हुआ , कबूतरों का घर भी ना उजड़ा - और पड़ोसन भी खुश !! इसे कहते हैं "हमारी ओर " की समझदारी !!

संजय @ मो सम कौन ? said...

'हमारे यहाँ तो ऐसा' आईडिया नहीं लातीं बीबियाँ:)

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

bada dhaansu idea tha ...:)

Gyandutt Pandey said...

हमारे यहाँ तो ऐसा बोलते हैं कि जहां लोग आते हैं, टिप्पणी करते हैं वहां बरक्कत होती है! :)

प्रवीण पाण्डेय said...

क्या कबूतर गुण्डे के रूप में पाले जा सकते हैं?

Kajal Kumar said...

'हमारे यहाँ तो ऐसा' बोलते हैं ....
आइडिया अच्छा है इस तरह के चलते फिरते मनीप्लांट बांटने का :)

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अमेरिका में कबूतर नापसन्द करने वाले लोग अपने घर के आसपास काठ के उल्लू लगाते हैं और उससे डरकर कबूतर उनके घर के पास नहीं फ़टकते। वैसे मेरे अभावुक कुकवि हृदय को ऐसा लगता है कि इन आलसी, सुस्त और मुफ्तखोर कबूतरों ने अधिकांश नगरों पर कब्ज़ा कर के अन्य पक्षियों को निकाल बाहर करने का षडयंत्र सा रचा हुआ है।

संगीता पुरी said...

वाह ..

बहुत खूब !!

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी पोस्ट।

Arvind Mishra said...

राप्चिक(इस शब्द के सर्जक आप ही है न ) ..पोस्ट ..
मगर कबूतरायन शब्द पर इतराज है इससे मुझे वात्स्यायन की याद आ गयी
कहीं सुखमय दाम्पत्य में भी तो इनकी कोई भूमिका नहीं है ..
इसलिए कह रहा हूँ कि मेरे पैत्रिक आवास के मेरे बेद रूम के छज्जे पर जैसे सदियों से कबूतरों का कब्ज़ा है !

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

'राप्चिक' शब्द का सर्जक मैं नहीं हूँ ...... दरअसल 'राप्चिक' एक मराठी भाषी शब्द है। इसे हिंदी ब्लॉगिंग में मैंने केवल इस्तेमाल भर किया है :)

सतीश पंचम said...

@ संजय जी,

'हमारे यहाँ तो ऐसा' आईडिया नहीं लातीं बीबियाँ:)
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संभवत इसका कारण मेरी पड़ोसन जैसी आपके यहां नहीं होना है। शांति काल में ऐसे आईडिया संभवत: न आए :)

ऐसा माना जाता है कि नवीन आईडिया अक्सर शांतिकाल में नहीं, बल्कि सुगबुगाहट या परिवर्तन काल में ही उत्पन्न होते हैं :)

भगवान ऐसी पड़ोसन सब को दे :)

सतीश पंचम said...

@ ज्ञान जी,

हमारे यहाँ तो ऐसा बोलते हैं कि जहां लोग आते हैं, टिप्पणी करते हैं वहां बरक्कत होती है! :)
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सही :)

वैसे, ऐसा बोलते तो मैंने भी 'सुना' है लेकिन 'देखा' ये है कि इसी ब्लॉगिंग में टिप्पणियों की मोह माया के चलते कई लोगों ने अपने 'सहज लेखन' का गला भी घोंट दिया है :)

सतीश पंचम said...

प्रवीण जी,

कबूतरों को गुण्डों के रूप में पाला तो नहीं जा सकता लेकिन उनके द्वारा उधम मचाते हुए कपड़े गंदे करना, कपड़ों को नीचे गिरा देना देख उन्हें माइक्रो गुण्डा तो कहा ही जा सकता है :)

सतीश पंचम said...

अनुराग जी,

ये तो बड़ा रोचक आईडिया बताया आपने की काठ के उल्लू रखना चाहिये। लेकिन भारत की इस आर्थिक राजधानी मुंबई में जहां बड़े बड़े धन कुबेर हैं लक्ष्मीपति हैं उस शहर के जीते जागते उल्लूओं से जब ये कबूतर नहीं डरे तो काठ के उल्लू से डर जायें.... इसमें शंका है :)

दीपक बाबा said...

'हमारे यहाँ तो ऐसा' ही होता है............ कसम से इस बार फिर आपने 'हमारे यहाँ' की कहानी लिख दी, कई बार सोचता हूँ की इस दुनिया कितना कुछ (९०%) मिलता जुलता है......... चाहे बोम्बे हो या दिल्ली ... राजस्थान हो या पूर्वांचल

दीपक बाबा said...

@आदरणीय ज्ञानदत जी;

ठेकेदार लगा हुआ है (मकान बनाने का) कहता है हमारे यहाँ (राजस्थान में) घर में मिस्त्री का हलवाई का लगना शुभ माना जाता है... हलवाई बैठा है - पता नहीं कितने लोग जीमेंगे.... और टिपण्णी का आना तो मानो शगुन का लिफाफा हुआ (हमारे यहाँ) ........... :)

वाणी गीत said...

सोच रही हूँ पानी व्यर्थ बहाने वालों को भी " हमारे यहाँ " कह कर रोका जा सकता है क्या ...
बढ़िया है आईडिया ...
रोचक !

rashmi ravija said...

अनुराग जी की टिप्पणी...देख खुश हो ही रही थी कि ये तरकीब शायद काम आ जाए कि आपकी टिप्पणी ने निराश कर दिया..."मुंबई के कबूतर काठ के उल्लू से क्या डरेंगे :(

इतना आतंक है हमारे यहाँ कबूतरों का कि पिछले दो साल से जाली लगवाना टाल रही हूँ...अब लगता है...लगवाना ही पड़ेगा...इसलिए भी कि आस-पास वालों ने लगवा लिए हैं...और कबूतरों की पूरी कॉलोनी हमारे यहाँ बस गयी है.

anshumala said...

मै तो नहीं भगाती हमारी बिटिया को तो बड़े प्यारे लगते है पर बिटिया रानी की ख़ुशी से चिल्लाते ही भाग जाते है एक बार एक खली गमले में अंडे भी दे दिया था पर वापस ही नहीं आये | पर होता ये है की बेचार जैसे ही घोसला बनाते है मैंने कई बार देखा है दो दिन बाद ही कौवे आ कर न जाने क्यों उनके घोसले तोड़ देते है दोनों में जम कर लड़ाई होती है शायद कौवों को भी आदमियों वाली आदत लग गई है दूसरो का घर उजड़ने की | हमारे यहाँ तो ऐसा होता है खुद मै भी कई बात ये जूमला प्रयोग कर चुकी हूँ |

सतीश पंचम said...

पता नहीं कहां कहां से चले आते हैं स्पैमिये। कबूतरों से घर गंदा होने से बचाया जा सकता है, इन स्पैमियों, अंड़बंगियों. अश्लिलहटों से बचना मुश्किल :-(

महाशय का कमेंट डिलीट कर दिया हूँ। उम्मीद है, कमेंटबाजी से बाज आयेंगे।


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