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Wednesday, June 22, 2011

ये अमीरही महिलायें

इस समय रात के करीब दस सवा दस बजे हैं। मुंबई के एक पॉश इलाके के क्लब
हाउस के पास ऑफिस के काम से आया हूँ। कुछ सॉफ्टवेयर आदि का झंझटी काम चल
रहा है। फिलहाल डाउनलोड आने में समय लग रहा है। समय बिताने के लिये बाहर
पीपल के पेड़ के नीचे बैठा हूँ। हवा के साथ कुछ बरसाती बुंदा बांदी भी हो
रही है।

उधर क्लब हाउस से ढेर सारी मोटी मोटी महिलायें कसरत करके निकल रही
हैं। ज्यादातर विवाहित ही लग रही हैं। दस बजे शायद क्लब हाउस बंद हो जाता
है। एक एक कर सभी जाकर अपनी महंगी गाड़ियों में बैठ फुर्र से निकलती जा
रही हैं।

कुछ एक दो बतियाये जा रही हैं.......दैट वन बर्न्स मोर देन हंड्रेड
कैलरी.....दैट्स नाईस वन......एस्कलेटर......डम्बल्स.....टां......फा....फूँ.......या.....पता नहीं क्या क्या जिम वाली मशीनों का नाम लिये जा रही हैं। मैं केवल सुन भर पा रहा हूँ, समझ तो आने से रहा।
सोच रहा हूँ कि ये लोग जो रात के दस बजे तक वर्कआउट करके जा रही हैं तो जरूर इनके घर पर नौकरानी वगैरह होगी तभी इतना फुरसत में यहां कसरत कर रही
हैं। पता नहीं अपने बच्चों को कब वक्त देती होंगी, पति को कितना वक्त देती होंगी, घर में इनके सास, ससुर कोई न होगा जिसकी देखभाल आदि की इन्हें चिंता हो।
तभी तो ज्यादातर शाम से दस तक यहीं क्लब हाउस में समय बिताय रही हैं ये मुटल्लियाँ।

सोच रहा हूँ कि यदि यही वर्कआउट, यही कसरत का समय कुछ कम कर घर में
खाना आदि बनातीं तो हो सकता है कुछ न कुछ काया खुद ब खुद कंट्रोल में आ
जाती :) क्लब हाउस मेम्बरी के लाखो रूपये बचते, पति बच्चों को समय देतीं
सो अलग।

एक वो जा रही है.......मर्सिडीज् में बैठकर.....और मैं इधर पीपल के पेड़
तले बने चबूतरे पर अंदर हो रहे डाउनलोड को अगोर रहा हूँ.......गुलज़ार कुछ सुनाओ यार.......यहां तो गिलहरी नहीं है..... न चाँद ही है......हाँ कुछ बादल हैं...... रह रह कर टपकने लगते हैं......कुछ खुद से.....कुछ पीपल के पत्तों से.....।

- सतीश पंचम
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25 comments:

anitakumar said...

:)सही कहा, आज कल जीवन शैली सब गड़बड़ाई हुई है।

rashmi ravija said...

हो सकता है ..वे औरतें नौकरी करती हों...और ऑफिस से घर आने के बाद जिम जाती हों. क्यूंकि
अगर वे गृहणी होतीं तो रात के दस बजे जिम नहीं जातीं.
बेशक....उनके यहाँ नौकरानियां होंगी...बच्चों को तो नौकरी वाली महिलाएँ मैनेज कर लेती हैं कि उनकी कैसे देखभाल करनी है...हम-आप चाहे कितने ही नुक्स निकालें...वे नौकरी का फैसला मजबूरी में करें या शौक से....बच्चों के ऊपर अपने हिसाब से ध्यान रखती हैं.

"सोच रहा हूँ कि यदि यही वर्कआउट, यही कसरत का समय कुछ कम कर घर में
खाना आदि बनातीं तो हो सकता है कुछ न कुछ काया खुद ब खुद कंट्रोल में आ
जाती :) क्लब हाउस मेम्बरी के लाखो रूपये बचते, पति बच्चों को समय देतीं
सो अलग।"

आजकल इतनी सुविधाएं हैं कि खाना बनाने से कोई वर्क-आउट नहीं होता :)
और क्या पता मेम्बरशिप के पैसे वे अपनी तनख्वाह से भरती हों :).

ये सब इसलिए कह रही हूँ क्यूंकि...मेरे घर के पास ही एक जिम है और वहाँ प्राइवेट ऑफिस में काम करनेवाली महिलाएँ रात में ही जाती हैं {मुंबई के लिए शाम :)}...क्यूंकि इसके पहले उन्हें समय नहीं मिलता...सुबह आठ-साढ़े आठ में वे घर छोड़ देती हैं.

सतीश पंचम said...

रश्मि जी,

ऑफिस गोअर की चमक कुछ और होती है...... हाउसवाईफ्स की चमक कुछ और :)


जो भी वहां दिख रहीं थी उनमें से कुछ जरूर ऑफिस गोअर्स होंगी, लेकिन ज्यादातर तो सेठानियाँ ही दिख रहीं :)

डा० अमर कुमार said...

.खाने और पचाने के बीच का टाइमपास ...
जितना बड़ा ज़िम.. उतना ऊँचा स्टेटस !
यह उनकी तफ़रीह का मामला है !

Gyandutt Pandey said...

भगवान जल्दी वजन कम कर दें और वे बच्चों का होमवर्क देख पायें!

Rahul Singh said...

कवायद अपनी-अपनी. शायद किसी महिला ने आपके लिए सोचा हो- यह बन्‍दा यहां क्‍या कर रहा है, पीपल पेड़ के नीचे बैठा, बूंदा-बांदी में, लगता है कोई काम-काज नहीं है इसे, हमें देखो, रात के दस बज गए, अभी तक फुरसत नहीं हो पाई है.

प्रवीण पाण्डेय said...

घर का काम करने लगें तो न जाने कितना वजन झटक जाता है।

Arvind Mishra said...

आपको ये मानवता पर बोझ नहीं लगतीं ?

ajit gupta said...

पहले मोटे सेठ हुआ करते थे अब मोटी सेठानियां भी होने लगी हैं। क्‍या करें, मोटापा तो दुनियाभर की समस्‍या है। पतले लोग यूँ ही जलते है उनसे। कभी मोटे बनकर देखो, तब पता लगेगा कि उनका जीवन क्‍या है? कभी मोटे सेठों पर भी अपनी कलम चलाना। बेचारी हम औरतों के ही क्‍यों पीछे पड़ जाते हो? मोटे हैं तो क्‍या हुआ, खाते पीते घर के तो दिखायी देते हैं। खा-पीकर लजाते तो नहीं हैं? बुरा मत मानना मैंने तो ऐसे ही लिख दिया है क्‍योंकि अक्‍सर पतले लोग बहुत जल्‍दी जल-भुन जाते हैं।

सतीश पंचम said...

अजीत जी,

मोटे लोगों पर जहां तक कलम चलाने की बात है, अपन लिखने की सोचेंगे जरूर, लेकिन जिस दिन दुबारा किसी पीपल, गुलमोहर या अमलतास के नीचे ऐसा ही कोई साक्षात्कार हो तो :)

सतीश पंचम said...

ये उपर पता नहीं कैसे मेरी टिप्पणी डबल्स में जा रही है। फिलहाल करेक्ट करके यह रही :)

अरविंद जी,

जहां तक मानवता पर बोझ की बात है, थोड़ा बहुत हम सभी लोग हैं। मसलन, आदमी को पीछे बैठाकर रिक्शा खींचना भी उसी मानवता पर बोझ की श्रेणी में माना जायगा। कुली द्वारा अपना भारी भरकम सामान ढोवाना भी कुछ वैसा ही है। यह अलग बात है कि हम इसे व्यवसाय का नाम देकर बगलिया जाते हैं। फिर ये महिलायें तो अपना ही बोझ ढोने में हलकान हैं :)

हाँ इन्हें इस तरह विलासिता और आरामतलबी के बीच पसीना बहाने के पैसे खर्च करते देखना एक तरह का अजीब सा जुगुप्सा या वितृष्णा जैसा कुछ भाव जरूर मन में उत्पन्न करता है।

ऐनीवे, उनके पैसे हैं.....उनका शरीर है.....उनका समय है...... हम तो केवल इन परिस्थितियों का थोड़ा बहुत अनालिसिस ही कर सकते हैं। ज्यादा महान चिंतायें इन पर क्यूं खर्च की जांय :)

Udan Tashtari said...

फैशन का तो तनिको ज्ञान नहीं है जी आपको...आजकल एक वर्ग विशेष में वर्क आऊट भी फैशन की श्रेणी में ज्यादा है ...शेप वगैरह तो अपने आप हो ही जायेगा.

रंजना said...

भाई जी , बला न्योतने का ज्यदा ही मूड है क्या ????

कहाँ जान डाल रहे हैं...भूल गए नारी स्वातंत्र युग जोरों से चल रहा है...

Abhishek Ojha said...

:)

Neeraj Rohilla said...

Thou shall not judge.

anshumala said...

सतीश जी

अब जैसा की रंजना जी ने ऊपर आप को कह ही दिया है की बला को न्योत दिया है तो अब तो हम जैसी मोटल्लियो ( मै तो माध्यम वर्ग से हूँ किन्तु कई सहेलिया रईस घरो से है जिनके जीवन को काफी करीब से देखती हूँ ) की बात तो आप को झेलनी ही पड़ेगी | क्या करू सुबह बच्चो को स्कुल भेजने से शुरू हुआ काम रात तक जारी रहता है बिच में यदि कुछ समय मिलता है तो उस समय में हम जैसे कसरत नहीं कर सकते क्योकि कसरत के साथ सकून भी होना जरुरी है इधर कसरत करेंगे तो उधर सारा ध्यान घर के दुसरे कामो को लिस्ट बनाने में लगा होगा फिर लगेगा की अभी कसरत करने बैठ गए और थक गए तो ये काम कौन करेगा रात सबसे बेहतर समय होता है बच्चो को पति के पास छोड़ कर सरे काम निपटा कर आप बिना किसी टेंशन के रह सकते है | फिर कसरत करना सिर्फ शारीर फिट रखना नहीं होता है बल्कि दिन के कुछ शांत, काम के ध्यान के बैगैर अपने लिए निकला गया कुछ समय होता है जो बड़ी मुश्किल से बाल बच्चो वाली महिलाओ को मिलता है घर में चाहे कितने भी नौकर चाकर हो पर घर के हर मेंबर की जरूरतों का ख्याल हमें ही रखना होता है शारीरिक रूप से भले कई दूसरी महिलाओ के मुकाबले हमें काम काम करना पड़ता है किन्तु मानसिक रूप से जिम्मेदारियों के रूप में हम कही ज्यादा व्यस्त और थकने वाला काम करते है ( मानसिक कामो से कितनी थकन होती है वो आप बखूबी जानते होंगे ) बाहर वाले भले इस खुशफहमी में जीते रहे की इतने नौकर है करना क्या है हम जैसे को , फिर आप को बताऊ चुकी आप मुंबई से है तो जानते होंगे की यहाँ के गुजराती मारवाड़ी रईस अपने लिए नाक पोछने के लिए भी नौकर रख ले किन्तु घर का खाना तो घर की महिलाए ही बनायेंगी का नियम मान कर चलते है उस पर से बड़े बड़े परिवार जहा चार चार घंटे में सिर्फ एक समय का नास्ता बनता है | मेरे जैसी एकल परिवार वालो को तो फिर भी समय मिला जाये पर जिनके साथ सास ससुर आदि है तो उनको तो बस मरने की फुरसत नहीं होती है | किसी क्लब हॉउस की मेम्बरशिप हमारे लिए नहीं ली जाती है वो सब अमीर पतियों के लिए उनके रुतबे की निशानी के तौर पर ली जाती है हम तो वहा भरे जा रहे पैसे को वसूलने भर जाते है और खुद को मेंटेन रखना जरुरी भी है जब ४० के पास पहुंचता पति राखी से लेकर मल्लिका को और घर की नौकरानी को भी घुरना शुरू कर दे तब इन मोटल्लियो को ध्यान आता है की उन्हें खुद को और मेंटेन रखना जरुरी है | ऐसा नहीं है की हम सब इसके पैसे नहीं भर सकते है बड़ी काबलियत है हम में की कम से कम हम अपना खर्च तो निकाल ही सकते है किन्तु हम नहीं कर पाते और एक समय के बाद अपने कैरियर की तिलांजलि इसीलिए दे देते है की हमरे बच्चे अच्छे से खाये उनका स्कुल का होमवर्क पूरा हो | ये बात जरा अपने ध्यान से निकाल दे की अमीर घरो की महिलाओ को कोई चिंता नहीं होती कोई काम नहीं होता घर परिवार बच्चो की कोई चिंता नहीं होती | फर्क इतना होता है की वो दूसरी कम पढ़ी लिखी या माध्यम वर्ग की आम महिलाओ के मुकाबले ज्यादा जागरुक होती है विवाह के बाद अपने अस्तित्व को ख़त्म नहीं मान लेती है मेरा परिवार ही मेरा जीवन है के नियम पर नहीं चलती परिवार के साथ वो अपने लिए भी समय निकालती है पति बच्चे मेरा परिवार को सूरज मान उसके ही चक्कर लगाने में अपना जीवन नहीं लगा देती है अपना जीवन भी जीती है | और रही बात घर का काम कर दुबले होने की तो ये बेतुकी बात भी अपने दिमाग से निकल दीजिये यदि ऐसा होता तो मिडिल क्लास और निम्न वर्ग की कोई भी महिला मोटी नहीं होती सबके सब करीना मल्लिका का फिगर लिए घूम रही होती |

अपनी बात कहने के लिए टिपण्णी की है ताकि आप के साथ ही दूसरो की कुछ गलत फहमिया दूर हो जाये यदि टिप्पणी में कोई बात बुरी लगी हो तो क्षमा क

anshumala said...

"क्षमा क" को " क्षमा करे" पढ़े |

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

अपनी बात को सविस्तार समझाने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया। दरअसल मेरा मंतव्य पूरी तरह से महिलाओं द्वारा अपने को फिट रखने वाले क्रियाकलापों के विरूद्ध नहीं है। यह अच्छी बात है कि महिलायें इस मामले में जागरूक हैं, लेकिन मुश्किल तब खड़ी होती है जब फिटनेस के नाम पर लाखों रूपयों की मेम्बरी सिर्फ इसलिये ली जाय कि रूतबा बढे, फैशनेबल में शुमार किया जाय, स्टेटस में निखार हो।

मेरी जानकारी में कुछ महिलायें हैं जिन्हें पिछले कई सालों से क्लब जाते देखा हैं, वर्क आऊट करती हैं, ऑफिस में जब देखो तब कैलरीस और न जाने किस किस बात पर .....टू मच ऑयली ........ जैसे जुमले भी उछालती हैं लेकिन वेट कम करने की कौन कहे उल्टे वेट पुट ऑन करते जा रही हैं।

जिस डाक्टर से वेट कम करने के लिये कन्सल्ट करती हैं बहुत संभव है कि उसे अपनी काबलियत पर भी शक होने लगा हो कि इतने समय से महंगी कंसल्टेंसी के बावजूद ये महिलायें पतली क्यों नहीं हो रही :) या फिर हो सकता है वो खुश भी हो, कि इसी बहाने इन धन्ना सेठानियों से नियत समय पर बराबर रूपये एंठ पा रहा है। वैसे भी महंगे कंसल्टेंट से अपना नाम जोड़ना भी आजकल एक स्टेटस सिंबल है। इस स्टेटस सिंबल की वजह से बाकी महिलाओं को इन्फिरियरिटी कॉम्पलेक्स आये तो उनकी बला से, वह क्यों भला उनकी चिंता में फोकट में दुबली हों आखिर दुबले होने के पैसे लगते हैं :)

रही बात गुजराती मारवाडियों के यहां खाना घर की महिलाओं द्वारा ही बनाने के चलन से तो बता दूँ कि बदलते समय के साथ इस चलन पर भी मार पड़ी है। मेरी एक गुज्जू वेंडर हैं । तीन साल पहले इन मोहतरमा का विवाह हुआ, अपने पति के यहां रहती हैं लेकिन दोपहर का भोजन अब भी उनके मायके से आता है क्योंकि वहां खाना बनाने के लिये नौकरानी है- जबकि ससुराल में केवल पति ही एक प्राणी है। बाकी लोग गाँव में या और कही रहते हैं। ऐसे में रोज सुबह का खाना कौन बनाये। मायके से नौकरानी का बना खाना आता ही है। छुट्टी वाले दिन येल्लो चिली, जगेड्स, पापा जॉन्स जैसे फूडी आउटलेट्स तो हैं ही। ऐसे में वेट पुट-ऑन होये तो होये , दुन्नू परानी कमा तो रहे हैं न, ज्यादा वजन बढ जायगा तो फिर डॉक्टर गोडबोले किस मर्ज की दवा हैं। गोड गोड बोलकर दवा तो दे ही देंगे :)

रचना said...

पति को अच्छी लगे और लगती रहे ये भी एक कारण हो सकता हैं वरना बहुत से पति दूसरी औरतो को देखने में !! मशगूल रहते हैं और औरत विषय पर अनालिसिस!! करने के लिये ओब्सेर्वेशन!! नितांत जरुरी हैं .

anshumala said...

सतीश जी

मोटापा ऐसी चीज है जो आती तो बड़ी आसानी से है पर जाती नहीं है | शुरू में तो अपने बढ़ते वजन का पता ही नहीं चलता है जब तक आप को दुसरे टोकते है आप उसका उपचार करना शुरू करते है तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है | कई बार जिम और खाने पर कंट्रोल करने के बाद भी कम नहीं होता है फिर ये सब करना आसन भी नहीं होता खाने पर कंट्रोल करना काफी मुश्किल काम है और और इसे हमेशा करते रहना तो और भी मुश्किल काम है | जब मोटापा पारिवारिक कारण से होतो फिर तो काम करना आम व्यक्ति के लिए बिलकुल ही नामुमकिन सरीखे हो जाता है हा जब तक वो आप के प्रोफेशन पर असर न डालने लगे जैसे करीना ने किया या बाकि कई भारी बदन की अभिनेत्रियों को करना पड़ता है | रही बात महंगे कल्ब हॉउस की मेम्बरशिप तो भाई ये तो व्यक्ति अपने हैसियत शौक खास जगह ही जाने की जरुरत पर निर्भर है जैसे हमें आप को सन्डे के दिन बच्चो के बाहर ले जा कर ४-५ सौ रु खर्च करने में कोई गुरेज नहीं होता है किसी छोटे मोटे ब्रांड के हजार बारह सौ के कपडे से या मोबाईल लैपटॉप जैसे महंगा गैजेट से फर्क नहीं पड़ता पर गांव में किसी को यही बहुत बड़ी फिजूल खर्ची और बेमतलब का दिखावा नजर आता है जरुरत से ज्यादा दिखता है | ये तो हर वुँती की अपनी जगह और परिस्थितियों पर निर्भर है |

सतीश पंचम said...
This comment has been removed by the author.
रचना said...

kamaal haen satish ji ek halki phulki post par ek halke phulkae kament ko jis mae exclamation sign yaani !!! bhi lagae us par aapka itna rusht honae smajh nahin aaya

a Latin word meaning exclamation or expression of joy.

सतीश पंचम said...

रचना जी,

जानकर अच्छा लगा कि आपकी टिप्पणी का मंतव्य क्या था। दरअसल एक झटके से उस टिप्पणी को पढ़ने पर वही गलतफहमी होगी जैसा कि मुझे हुआ।

खैर, यदि आपको मेरे कमेंट से ठेस पहुंची तो क्षमा प्रार्थी हूं। फिलहाल मैं अपना कमेंट हटा रहा हूँ।

मीनाक्षी said...

अजितदी की टिप्पणी को मेरा कहा समझा जाए :)वैसे सतीषजी आपने एक पल भी नहीं सोचा कि कोई मेरे जैसा हाइपोथायरेड का मारा भी होगा..वैसे अपने घर के पीछे ही जिम है मुफ्त का लेकिन खुली हवा में सैर करने का मज़ा ही अलग है...सैर और घर का काम करने के बाद भी वज़न कम न हो तो रोना क्यों..चार दिन की ज़िन्दगी है...हँसते हँसाते मस्त रहते हैं....

नीरज गोस्वामी said...

तिल का ताड़ कैसे बनता है ये देखना हो तो ऊपर की सारी टिप्पणियां पढ़ें...:-)
नीरज

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