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Saturday, June 25, 2011

ठाड़े रहियो 'पाकीज़ा'........

      अक्सर कहीं आते जाते सफर में मैं गानें सुनता हूँ। कभी FM वाले तो कभी अपने मोबाइल की मेमरी कार्ड वाले कुछ सुमधुर गीतों का आनंद लेता हूँ । मेमरी कार्ड वाले गानों को तभी सुनता हूं जब FM चैनलों पर RJ के चपड़ चपड़ से जी उब जाता है। कम्बख्त क्या कहते हैं खुद उन्हें भी न पता लगता होगा, कभी कभी इतना ज्यादा पका देते हैं कि सिर दर्द होने लगता है।

      खैर, अभी हाल ही में नौशाद द्वारा संगीतबद्ध गानों की सीडी लिया और उन गीतों को मेमरी कार्ड में ट्रांसफर भी कर दिया। जब मैं इन गानों को सुन रहा था कि तभी पाकीज़ा के गाने कुछ अलग सुनाई पड़े। ध्यान देने पर पता चला कि इस सीडी में कुछ ऐसे गानें हैं जिन्हें गुलाम मुहम्मद और नौशाद द्वारा शास्त्रीय संगीत का इस्तेमाल करते हुए संगीतबद्ध किया गया था और ये गाने पूरी फिल्म में बैकग्राउण्ड में चलाये गये थे। उन्हें फुल फ्लेज्ड अलग से पाकीज़ा फिल्म में नहीं दिखाया गया या दिखाया भी गया तो बहुत थोड़े से समय के लिये। बहुत संभव है फिल्म में विभिन्न रागों पर आधारित शास्त्रीय गीतों को केवल माहौल रचने के उद्देश्य से रखा गया हों। बहरहाल ऑडियो सीडी में ये गाने पूरी तरह से अपनी मूल समयावधि के साथ सुने जा सकते हैं।

ऐसा ही एक गीत था मज़रूह सुल्तानपुरी का लिखा, परवीन सुल्ताना का स्वरबद्ध किया,  जिसे संगीतबद्ध किया था नौशाद ने .....

कौन गैयली गयो श्याम
बता री सखी....
मोहे राम हो...
कौन गैयली गयो श्याम

     इस गीत के छंद बेहद छोटे हैं लेकिन सुनने में अच्छे लगते हैं। एक और गीत जिसे मज़रूह ने लिखा है और बैकग्राउण्ड में चल रहा था,  बोल थे –

नज़र का वार था...दिल की तड़पन जा लगी
चली थी बर्छ किसी पर...किसी को आन लगी

नज़रीया की मारी....मरी मोरी गुईयाँ
कोई जरा जाके बइद बोला दो
आके धरे मोरे नारी.....
हाय राम
नजरीया की मारी मरी मोरी गुईयाँ


     इन गीतों में जो खास बात लगी वह थी अवधी-भोजपुरी के शब्दों गुइयाँ, बइद आदि का बेहतरीन इस्तेमाल।

कुछ और गीत थे जैसे कि यह गीत जिसे गाया था वाणी जयराम ने....

मोरा साजन सौतन घर जाये
अब मैं कैसे कहूँ
जब मैं पूछूँ....कछुओ न बोले
झूठी कसमें खाये
अब मैं कैसे कहूँ

मोरा साजन......

    ये सारे गीत थोड़े थोड़े अंश में फिल्म में सुनाई पड़ रहे थे। लेकिन बहुत अच्छे लग रहे थे। इसके अलावा जो गीत अपने पूरे रूप में छायांकित किये गये थे वह तो बेजोड़ हैं ही। एक गीत जिसकी शुरूवात मृदंग की थाप से शुरू होती है बहुत अलग सा लगा। जहाँ तक मुझे लगता है कि मृदंग का हिन्दी फिल्मों में ज्यादातर इस्तेमाल ऐसे वक्त पर किया गया है जब किन्हीं के बीच मुकाबले जैसी स्थिति हो। मसलन, चित्रलेखा फिल्म में भी जब चित्रलेखा और एक अन्य नर्तकी के बीच मुकाबला शुरू हुआ तो सीधे मृदंग की थाप से शुरूवात की गई। यहाँ भी वही बात थी। मीना कुमारी को अपने प्रेमी की भावनाओं के साथ साथ अपने भीतर उमड़ते विचारों से संघर्ष करना था, जिसे कि नौशाद ने बखूबी मृदंग की थाप के साथ पेश किया। इस गीत के बोल लिखे थे कैफ़ भोपाली ने और स्वर प्रदान किया था लता मंगेशकर ने -

आज हम अपनी दुवाओं का असर देखेंगे
तीरे नज़र देखेंगे, जख्मे जिगर देखेंगे

प्यार करना दिल-ए-बेताब बुरा होता है
सुनते आये हैं कि ये ख्वाब बुरा होता है
आज इस ख्वाब की ताबीर मगर देखेंगे
तीरे नज़र देखेंगे, जख्मे जिगर देखेंगे


    इस फिल्म के अन्य गीतों के साथ मज़रूह सुल्तानपुरी का लिखा एक और गीत था – ठाड़े रहियो बाँके यार......जिसे गाया था लता मंगेशकर ने,  बोल  थे -

ठाड़े रहियो ओ बाँके यार रे
मैं तो कर आऊँ सोला सिंगार रे
जागे न कोई....नैना हैं छौंड़ी
बोले छमाछम पायल निगोड़ी

निगोड़ी
अजी धीरे से खोलूँगी द्वार रे
सइयाँ धीरे से
हाँ हाँ चुपके से
अजी हौले से....
खोलूंगी द्वार रे


सइयां धीरे से खोलूंगी द्वार रे
ठाड़े रहियो ओ बाँके यार रे

     इस गीत की खूबी यह लगी कि जिस अंदाज में शब्दों को पिरोते समय थोड़ा थोड़ा अंतरा दिया गया वह गीत को बहुत खूबसूरत बना गया। विशेषत जब गाने के बजते बजते ‘निगोड़ी’ शब्द पर जब गीत रूक गया और उसके तुरंत बाद लता के स्वर में कहा गया – अजी धीरे से खोलूंगी द्वार रे......

     फिल्म का अगला गीत बहुप्रचलित है जिसे आप सब ने कई बार सुना होगा। जी हाँ, वही दुपट्टा गीत जिसे बचपन से लेकर अब तक न जाने कितनी बार राह चलते, टीवी पर, नाई की दुकान पर सुन चुका हूँ जिसके बोल लिखे हैं मज़रूह सुल्तानपुरी ने।

 लिखते  हैं –

इन्हीं लोगों ने ले लिन्हा दुपट्टा मेरा


हमरी न मानो बजजवा से पूछो
जिसने अशरफ़ी गज दिन्हा दुपट्टा मेरा
इन्हीं लोगों ने ले लिन्हा दुपट्टा मेरा

   आगे और लोगों से भी गीत में पूछ पछोर हुई जिसमें कि एक रंगरेज को शामिल करते हुए कहा गया -

हमरी न मानों रंगरेजवा से पूछो
जिसने गुलाबी रंग दीन्हा दुपट्टा मेरा

और जब रंगरेज की भी गवाही काम न आई तो अंत में कहा गया .....
हमरी न मानो सिपहिया से पूछो
जिसने बजरीया में छीना दुपट्टा मेरा

     बता दूँ कि यह वही बोल थे जिनकी आड़ में मैंने पिछले दिनों यू.पी.पुलिस द्वारा बढ़ती आपराधिक घटनाओं को लेकर अपनी एक पोस्ट में तंज कसा था कि जिसका जो काम था, सब ने किया....बजाजे को कपड़ा बेचना था तो उसने अशर्फी गज़ कपड़ा दिया, रंगरेज को कपड़ा रंगना था तो उसने गुलाबी रंग कपड़ा रंगा लेकिन सिपाही का ये कौन सा काम था कि बीच बाजार दुपट्टा खेंच लिया।

      खैर, आगे बढ़ते हैं.....एक अन्य लोकप्रिय गीत चलते चलते की ओर जिसके शब्द  कैफ़ी आज़मी ने दिये हैं और अपने आप में तबले की थाप और  घुँघरूओं की खनक के जरिये बखूबी उभर कर चलते-चलते  कहते हैं -

शबे इन्तजार भी आखिर
कभी होगी मुख्तसर भी
ये चिराग़ बुझ रहे हैं
मेरे साथ जलते जलते


यूँ ही कोई मिल गया था
सरे राह चलते चलते

      मेरी राय है कि यदि फिल्म न भी देखी जाय तो कोई बात नहीं, लेकिन पाकीज़ा के गानों की सीडी जरूर सुननी चाहिये जिनके गीतों को लिखा है मज़रूह सुल्तानपुरी, कैफ़ी आज़मी जैसे गीतकारों ने और संगीत से नवाज़ा है नौशाद और गुलाम मुहम्मद जैसे आला दर्जे के संगीतकारों ने। इसके संगीत का ही असर है कि 1971 में जब प्राण को फिल्मफेयर अवार्ड दिया गया तो उन्होंने यह कर कर उसे लेने से इन्कार कर दिया कि इस पर पाकीज़ा के गुलाम मुहम्मद का हक है।

      फिल्म का छायांकन बहुत खूबसूरत है  विशेषत: - मौसम है आशिकाना....गाने के समय बेहद खूबसूरत दृश्य कैमरे में कैद किये गये हैं।

        एक दूसरी बात जो नज़र आई थी फिल्म में वो ये कि मीना कुमारी अपनी बीमारी की चलते ज्यादातर बिस्तर पर ही लेटे लेटे नज़र आई हैं और उसी हिसाब से फिल्म शूट भी की गई है। बहुत संभव है फिल्म की सुस्त रफ्तार में कमाल अमरोही और मीना कुमारी के बीच हुई अनबन का भी असर रहा हो क्योंकि कई जगह मीना कुमारी का चेहरा बहुत फीका सा लगा तो कहीं तरो ताजा भी रहा। उल्लेखनीय है कि लगभग चौदह साल में बनी इस फिल्म के रिलिज़ होने के हफ्ते भर बाद मीना कुमारी की मृत्यु हो गई थी लेकिन जाते जाते उन्होंने एक यादगार फिल्म दे दी।

- सतीश पंचम


Update :-

30 comments:

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

बढ़िया पोस्ट. हमारे यहां पाक़ीज़ा का 33RPM रेकॉर्ड है जिसमें ये सारे गीत हैं.

Udan Tashtari said...

इस फिल्म और इसके गानों के हम दीवाने रहे हैं...यह सीडी वाले दो गीत नहीं सुने हैं पूरे रुप में...अच्छी पोस्ट.

डा० अमर कुमार said...

.तुमरी पोस्ट ने लई लीना करेजा मेरा...
हमरी न मानो तो जिगरवा से पूछो... जिगरवा से पूछो
जिगरवा से पूछो... जिगरवा से पूछो
हो.. जिगरवा से पूछो..
ट्राक्क ट्राक्क ट्राक्क
जिसके समझाये न समुझे ये करेजा मेरा

Kajal Kumar said...

...पोस्ट के एक वाक्या पर चिंतन

"जब FM चैनलों पर RJ के चपड़ चपड़ से जी उब जाता है"

...बस अब कुछ और कहने को बचा ही क्या है

प्रवीण पाण्डेय said...

आपने सब कुछ ही सुना दिया। एफ की चपड़ चपड़ हमें भी बहुत नहीं सुहाती है।

Vivek Rastogi said...

बोले तो एकदम झक्कास, टकाटक पोस्ट

ajit gupta said...

आज तो समा बांध दिया। पाकीजा के गीतों का तो कहना ही क्‍या है? बहुत ही दिलकश हैं। आभार आपका, जो आपने सबसे रूबरू करा दिया।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वाह क्या बात है। अपन भी सुनते रहे हैं। FM वालों की बात पर भी सहमत हूँ।

Rahul Singh said...

यादें ताजा, गीत, संगीत, संवाद और फिल्‍मांकन, हर लिहाज से लाजवाब और खूबसूरत फिल्‍म.

मनोज कुमार said...

फिर से वो फ़साना याद आ गया, जब यह जुमला आम था कहना, पांव जमीन पर मत रखो मैले हो जाएंगे।

Arvind Mishra said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति !
सुधारें: कौन गली गयो श्याम

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सतीश जी!

कर्णप्रिय गीतों का कोमल विश्लेषण... मीना कुमारी की जगह इस फिल्म के लॉन्ग शॉत में साधना खोटे को इस्तेमाल किया था और डबिंग में आवाज़ भी उन्हीं की थी.. उम्र और शराब के असर ने मीना जी को तोड़ रखा था और उसपर कमाल अमरोहवी के शोषण ने भी..
प्राण साहब का वाक़या भी आपने याद दिला दिलाया! अब न वो साज़ रहे (सारंगी, तबला, मृदंग और हारमोनियम), न साज़िन्दे, न संगीतकार!! मोहित हूँ इस पोस्ट पर!!

Arvind Mishra said...

*गैयली=गली

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

अभी मैने फिर वही गीत सुना और जो ध्वनि सुनाई पड़ी वह किसी 'गैल' शब्द की ओर इशारा करते हैं। नेट पर सर्च करने पर जगन्नाथदास 'रत्नाकर' की एक रचना कविताकोष में दिखी जिसमें गोकुल की गैल पंक्तियां हैं। बहुत संभव है यह गैल शब्द गली को ही संबोधित हो और उसे ही ब्रज या अवधी शैली मे 'गैयली' या 'गेल' उच्चारित किया गया हो।

बहरहाल उसे ऐसे ही रहने देता हूँ क्योंकि मोबाईल पर एडिट करने से पंक्तियां आगे पीछे होने का चांस है। और नेट अभी लैपटाप पर इस्तेमाल नहीं कर रहा।

ध्यान दिलाने के लिये शुक्रिया।

anitakumar said...

पाकीजा के गीतों के हम भी दिवाने हैं लेकिन ये सी डी में जो बैक ग्रांउड में चलने वाले गीतों का जिक्र है वो हमने भी नहीं सुने हुए। अब सी डी ही लेना पड़ेगा…:)

Arvind Mishra said...

@प्रभा अत्रे का गाया यह सुनिए --
http://www.youtube.com/watch?v=m_bM30RDUuc

आपने तो सारा रस भंग कर दिया -आपत्ति !

एक श्रोता का इससे क्या लेना देना की आप किस डिवायिस से पोस्ट कर रहे हैं

सतीश पंचम said...

@ एक श्रोता का इससे क्या लेना कि आप किस डिवाईस से पोस्ट कर रहे हैं।

अरविंद जी,

मोबाईल इस्तेमाल के चलते मैंने अपनी मजबूरी जताई थी कि मैं यह शब्द पोस्ट में क्यों नहीं बदल रहा। दरअसल मेरे मोबाईल की शब्दांकन सीमा 5000 है और इस पोस्ट में जो शब्दांकन हैं वो पैराग्राफ, कॉमा....वामा मिलाकर 5000 की सीमा से बाहर जा रहा है। इसलिये पोस्ट को लैपटॉप से पोस्ट करना पड़ा। फिलहाल लैपटाप पर नेट उपलब्ध नहीं है और मोबाईल से बदलाव करना भी चाहूँ तो 5000 शब्दांकन से ज्यादा के चलते बदलाव नहीं होगा या होता भी है तो लाईनें आगे पीछे हो जांयगी। बस इतनी सी बात थी और आप लगे कथन्ना पढ़ने कि श्रोता को क्या फर्क पड़ता है कि आप किस डिवाइस से पोस्ट कर रहे हैं.........

बाकी तो जो गैल और गली वाली बात है तो अब उस पर शास्त्रार्थ करना अपने बस की बात नहीं। क्योंकि न तो मैं कोई बहुत बड़ा संस्कृतविद् हूँ और ना ही कोई भाषाशास्त्री। मुझे जैसा गीत सुनाई पड़ा जैसे भाव उत्पन्न हुए वह मैंने आम श्रोता के तौर पर अभिव्यक्त किया है बस।
------------

वैसे शास्त्रार्थ वाली बात से विवेकी राय जी का एक लेख जरूर याद आता है जिसमें वह विभिन्न विषयों के शिक्षकों के बारात में शामिल होने के बारे में लिखते हैं कि बारात में बोलता आदमी जरूरी है वरना मजा नहीं आता। बारात में शामिल गणित, अंग्रेजी, हिंदी आदि विषय वालों के बारे में उन्होंने जो लिखा सो लिखा लेकिन संस्कृत के विद्वानों के बारे में बताते हुए वे विशेष लिखते हैं कि संस्कृत के विद्वानों को तो जैसे शास्त्रार्थ करने की धुन सी चढ़ी रहती है.....हर बात में शास्त्रार्थ :)

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

दुबारा लौटा तो देखा कि यहाँ सतीश जी और पण्डित अरविन्द मिश्र के मध्य एक शब्द को लेकर मतभेद खड़ा हो गया है.. मैं न तो बीचबचाव करने आया हूँ, न पाण्डित्य बघारने.. गीत के विषय में ऐसी ही एक बड़ी अच्छी (?) परम्परा चल पड़ी थी/है.. बेग़म अख़्तर गाते वक़्त "न" का उच्चारण "ल" करती थीं..कई शास्त्रीय गायक भी ऐसा करते रहे हैं.. मज़ा तब आया जब "महान" ग़ज़ल गायक पंकज उधास सीधा सीधा "न" को "ल" गाने लगे.. इश्क "इल्सान" की ज़रूरत है.. जबकि क्लासिकल गाने वालों में यह स्वाभाविक लगता था...
लिहाज़ा सतीश जी ने जो "गेयली" लिखा है वो "पाकीज़ा" के सन्दर्भ में सही है, क्योंकि वैसे ही गाया गया है.. पण्डित जी अपनी जगह सही हैं क्योंकि यह गीत दूसरे गायक को गाते सुना है और वो "गली" ही गाते हैं..ख़ैर ये तो बस मेरे "कान" की प्रतिक्रिया थी "गान" के प्रति, "ज्ञान" की प्रतिक्रिया देने का सामर्थ्य नहीं!!

सतीश पंचम said...

सलील जी,

"गली" या "गेयली" जैसे शब्द उच्चारण के बारे में वस्तुस्थिति स्पष्ट करने हेतु आपका बहुत बहुत आभार।

Arvind Mishra said...

@भैया ,सलिल जी की भी टिप्पणी पढ़ ली ...
अब कोई श को ल बोले और सीधी सपाट गली को गैयेलो कह दे तो मुझ जैसे परम्परावादी का खून
खौलना स्वाभाविक है ..... :) मगर आपका खून क्यों खौल रहा है :) ?
आपकी यह आदत है कि आप अपनी गलती नहीं मानते ...
अगर मान गए होते तो बात वहीं रुक जाती ...
गलती स्वीकारने से मनुष्य कोई छोटा नहीं हो जाता और नहीं उसके पांडित्य पर कोई लांछन ही लगता है ....
मुझे तो यह ताज्जुब हो रहा है कि इतनी सुन्दर सी ठुमरी में आप गैयेलो का क्या मतलब आज तक लगाते रहे और भाव विभोर होते रहे ... :)
खैर यह भी मजेदार रहा !

Arvind Mishra said...

@सलिल जी ,
वैसे गली और गैयेलो दोनों का अर्थबोध गली ही है या अलग अलग कुछ ! ?
bataayen tanik ?

सतीश पंचम said...

कमाल है अरविंद जी,

सलिल जी की टिप्पणी के बाद भी आप अभी भी उसी गली में अटके हैं :)

लगता है आपको मूल ठुमरी जो पाकीज़ा में बैकग्राउण्ड में चल रही थी सुनानी ही पड़ेगी तब जाकर आप मानेंगे :)
नेट पर खोज कर कोशिश करूंगा कि आपको जरूर सुनवाउं न हो सके तो जो मेरे पास है उसे ही अपलोड कर देता हूँ, हां थोड़ा समय जरूर लगेगा सो देरी अपेक्षित है।
और ये गलती मान लेने की बात क्या है......जबरिया गलती मानी जाय :)

इतना तो मैं भी जानता हूँ कि गलती मान लेने से कोई बड़ा या छोटा नहीं हो जाता लेकिन क्या बिना बात के ही जबरिया गलती ??

Amrita Tanmay said...

Achchhi lagi post,hamari pidhi ke baad kaun kisi yadgar cinema par sundar post likhega.fir aaj ki pidhi padhegi bhi.sundar post

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

लिजिए यू-ट्यूब से सीधे उठाकर उस गीत को पोस्ट में अपडेट कर दे रहा हूँ :)

अब इसे आप 'गैल' मानिये या 'गली' या फिर 'गेयली' ...जो है सो यही है जिसे कि पाकीज़ा में बैकग्राउण्ड म्यूजिक के तौर पर माहौल रचने हेतु बजाया गया था।

बहुत संभव है कि बैकग्राउण्ड में बजने के कारण इसका कहीं विडियो भी नहीं है, केवल एक तस्वीर के साथ किसी सुधीजन ने इसे अपलोड कर दिया था सो वहीं से साभार पोस्ट में अपडेट कर रहा हूँ ।

सतीश पंचम said...

और हां, जहां तक भाव विभोर होने की बात है तो बता दूं कि अपन ऐसे ही गीतों पर भावविभोर होते हैं, कभी दिगंबर को 'मसाने' में होली खेलता सुनकर तो कभी मिर्जापुर की कजरी/कजली में काँटा-कील सुनकर.....ये ऐसे गीत हैं जहां भाषा की शुद्धता से ज्यादा मन के भावों को खिलंदड़े अंदाज से बोला बतियाया जाता है। अब किसी भाषाई शुद्धतावादी का इन पारम्परिक गीतों को सुन खून खौलने या औटने लगे तो कोई क्या कर सकता है :(

सञ्जय झा said...

aapki aur apni soch ka taksaal ek sa
hi lagta firk bas brand aur local hone bhar ka hai...........

jai ho.........

डा० अमर कुमार said...

.कौन गैली गयो.. श्याम
लाहौर घराने की यह दुर्लभ ठुमरी सुनवाने का आभार..
इसके साथ मुफ़्त में यू-ट्यूब का लिंक भी मिला.. वह भी इसी आभार से चुकता समझा जाये ।
वाकई बेहतरीन !

Arvind Mishra said...

लिखा गली ही जाएगा महराज गैयेली नहीं ..बस इत्ती सी बात है...
इस वीडियो के लिए कोटिशः आभार !

सतीश पंचम said...

:)

वाणी गीत said...

राजस्थानी में गली या रास्ते को गेल/गैल कहा जाता है...कहीं यही प्रयुक्त हुआ हो गाने में ?

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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