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Monday, June 27, 2011

ई माजरा का है 'बे' ?

      पिछले दिनों ऑफिस जाते समय रास्ते में एक जगह नज़र टिक गई। दीवार पर ब.स.पा. का ईश्तहार हाथी के चित्र के साथ नीले रंग में लिखा था -


वोट की ईज्जत कैसी हो
बहू-बेटियों जैसी हो

      पढ़ते ही नारा कुछ अलग सा लगा। अमूमन इस तरह के नारे मुंबई की राजनीतिक फ़िजा में नहीं दिखते। चूँकि मायावती की रैली होनी थी सो राजनीतिक प्रचार आदि के चक्कर में यह सब लिखा गया होगा। लेकिन नारे का अर्थ बड़ा रोचक है कि जिसका यदि विश्लेषण किया जाय तो बड़ा मौजूं पहलू सामने आता है। मसलन, जिस तरह नारे में लिखा है कि अपने वोट को अपनी बहू-बेटी की तरह अपनी ही जाति बिरादरी में देना चाहिये, किसी और जाति में नहीं, तो इसका एक ही अर्थ निकलता है कि जिस तरह अपनी जात बिरादरी वालों के यहां ही बेटी ब्याही जाती हैं, और सजातीय बहू ही लाई जाती है, उसी तरह अपनी जात बिरादरी वालों को ही अपना वोट दें, किसी और को नहीं।

        अब चूँकि मायावती अपनी जातिवादी राजनीति को खुलकर अभिव्यक्त करती हैं, छुपाती नहीं तो जाहिर है उनके नारे भी उसी अंदाज में ओपन होंगे। उसी तरह अपने वोट बैंक को झलकाते दिखेंगे। लेकिन यहां देखने वाली जो बात है वह यही कि किस खास अंदाज में चुनाव जैसी चीज को सामाजिक रीत-रिवाज जैसे चलन से जोड़ कर उसे प्रस्तुत किया गया है, वरना तो अब तक केवल बहिन जी और भाई साहब लोग हाथ जोड़कर ही वोट मांगते नजर आते थे। इस तरह वोट को बहू-बेटी मानकर उसे अपने जात बिरादरी में ही देने जैसी जातिवादी अपील, चुनाव आयोग को ठेंगे पर रखने का एक जरिया भी हो सकता है।

       बहरहाल वो मायावती हैं, बहिनजी हैं। जो भाई साहब लोग थे उन्होंने भी कहाँ कुछ कमी की है। मुलायम, कल्याण, अमर आदि भाई साहबों ने भी जाति को लेकर काफी खेला-खाया हैं। कल्याण सिंह लोध राजनीति को लेकर खुलकर खेले, तो अमर सिंह क्षत्रिय राजनीति को लेकर तो मुलायम अपनी यादव और मुस्लिम के जोर पर प्रधानमंत्री तक बनने का सपना बुन चुके हैं। ये अलग बात है कि महाशय फिलहाल हाशिये पर चल रहे हैं।

         खैर, जातिवादी राजनीति, कब-कहाँ क्या गुल खिलाये कौन जानता है। उधर जगह-जगह मायावती मूर्तियाँ लगवा रही हैं लेकिन गाँव गाँव में लगी आँबेडकर की मूर्तियों की ओर उनका कोई ध्यान नहीं जा रहा। पिछली बार जब गाँव गया था तो एक तस्वीर लेते समय एक रेती-ईंट ढोने वाले ट्रेक्टर का ड्राईवर पास आ गया। मेरे हाथ में कैमरा देख पूछने लगा कि - क्या मैं पत्रकार हूँ ?

      ‘नहीं’ - कहने पर, उसने एक कश बीड़ी का लगाया और बोला – ई गोंसईंया काटिन मूरतीयन त जिउ रोग कई नाये हइन।

( इन मूर्तियों ने तो जी रोग कर दिया है, ‘गोसईंया काटिन’ का अर्थ मुझे भी नहीं पता)

       पूछने पर कि आखिर बात क्या है, तो कहने लगा गाँव में जहां-जहां मूर्ति लगाये हैं सब सड़क के ऐसे ऐसे मोड़ पर लगे हैं कि वहां गाड़ी बैक करने में बहुत सोचना पड़ता है। जरा सा कुछ धक्का धुक्की लग गया तो हुआ बवाल। आस पास के लौन्डे-लपाड़ी जमा हो जाते हैं और लगेंगे परेसान करने मूरती ‘डय-मिज’ के नाम पर। किसी मजबूत घर बालू-इंटा जा रहा होता है तो छोड़ देते हैं न बेमतलब टाईम पास करते हैं। उसके इस तरह से ‘डय-मिज’ कहने पर मुस्कान थिर गई लेकिन साथ ही इस ड्राईवर की मुश्किल देख कुछ अजीब भी लगा।

          कहां, तो एसी कमरों में बैठकर पत्रकार महोदय लोग पॉलिटीकल स्ट्रैटजी बनाते हैं, किसी चौक आदि पर माया की मूर्ति लग जाने पर बवाल काटती रिपोर्टें फड़फड़ाते हैं लेकिन गाँव गाँव में लगी मूर्तियों के चलते होने वाली छोटी-छोटी मुश्किलों पर कोई ध्यान नहीं देते। एक तरह से अच्छा ही है कि वो इन मूर्तियों को लेकर कोई रपट नहीं बनाते न पता चले कि कहीं मूर्ति को कुछ गाड़ी बैक करते धक्का वगैरह लग गया और पत्रकार लोग न्यूज फ्लैश कर दें कि अरे वो हो गया जो अब तक न हुआ। फिर झेलो रेल रोको और सड़क जाम।

             इधर एक और चीज देख रहा हूँ आजकल कि यू.पी. से रिलेटेड खबरें कुछ ज्यादा ही टीवी पर दिख रही हैं। तमाम बलात्कार आदि से संबंधित खबरें कुछ यों फ्लैश हो रही हैं कि जैसे पत्रकार लोग कैमरा लेकर वहीं खड़े हैं, इधर बलात्कार हुआ नहीं कि खबर फ्लैश – यू.पी. में एक और बलात्कार। सारे बलात्कारी क्या यू.पी. में ही पहुँच गये हैं ? पता नहीं क्यों मुझे इस तरह से खबरें लगातार यू.पी. से ही फ्लैश करने को लेकर कहीं से कुछ आशंका सी हो रही है कि क्या पता ये किसी सोची समझी रणनीति का हिस्सा न हो। पता नहीं ये अपराध अब बढ़े हैं या पहले से होते रहे हैं। लेकिन दिखाये अब जा रहे हैं। असल बात क्या है ये तो वो महाशय लोग ही जानें लेकिन जिस अंदाज में यू. पी. की खबरें बाढ़ की तरह फ्लैश हो रही हैं वो दूसरे राज्यों में जा बसे उसके बाशिंदों के प्रति कोई अच्छी छवि नहीं बना रहे। वैसे ही हिंदी-पट्टी के पत्रकारों की बहुलता की वजह से हिंदी-पट्टी की अच्छी खासी बदनाम इमेज है। कुछ ऐसी कि मानों बाकी राज्य शांत हैं, सब जगह राम-राज्य है, केवल हिंदी-पट्टी में ही सब गड़बड़ी होती है। इसमें मायावती के बदनाम प्रशासनिक तंत्र, धनलोलुप इमेज कोढ़ में और भी खाज उत्पन्न करता है। इसी बदनाम इमेज के चलते चिदंबरम जैसे लोगों के मुँह खुलते हैं कि नॉर्थन बेल्ट यदि न होता तो साउथ बहुत ज्यादा विकसित होता।

             खैर, मायावती और काँग्रेस के बीच आगामी चुनावों को लेकर भले ही आपसी घमासान मचा हो, डेली बेसिस पर हो रही घटनाओं को लेकर  पॉलिटिकल माइलेज लेने की होड़ लगी हो, लेकिन फिलहाल उसके साइड इफेक्ट कुछ अच्छे नहीं लग रहे हैं। पत्रकार लोग पत्रकार-पत्रकार खेल रहे हैं, नेता लोग नेता-नेती खेल रहे हैं, बाबा लोग बाबा-बाबी खेल रहे हैं और जनता खड़े खड़ान सोच रही है -
 ई सब का होय रहा है 'बे' ?

- सतीश पंचम

23 comments:

Rahul Singh said...

पब्लिक सब जानती है.

वर्षा said...

यूपी ही सबसे बड़ा राजनीतिक अड्डा है।

डॉ. मनोज मिश्र said...

@तो कहने लगा गाँव में जहां-जहां मूर्ति लगाये हैं सब सड़क के ऐसे ऐसे मोड़ पर लगे हैं कि वहां गाड़ी बैक करने में बहुत सोचना पड़ता है। जरा सा कुछ धक्का धुक्की लग गया तो हुआ बवाल। आस पास के लौन्डे-लपाड़ी जमा हो जाते हैं और लगेंगे परेसान करने मूरती ‘डय-मिज’ के नाम पर। किसी मजबूत घर बालू-इंटा जा रहा होता है तो छोड़ देते हैं न बेमतलब टाईम पास करते हैं। उसके इस तरह से ‘डय-मिज’ कहने पर मुस्कान थिर गई लेकिन साथ ही इस ड्राईवर की मुश्किल देख कुछ अजीब भी लगा। ...
असली आनंद तो इसी में है बाकी सब --जय राम जी की.

rashmi ravija said...

ये तो सही कहा...इन हिंदी चैनलों ने उत्तर-भारत की छवि ऐसी खराब कर दी है कि लोगो को लगता है...वो जगह रहने लायक रही ही नहीं....उसपर से ये नेता लोग...जिनकी शक्ल देखते ही हंसी और खीझ एक साथ आए ..उनके जुमले कौन सुने..

shekhar suman said...

पता नहीं कैसे, ये ब्लॉग आज तक अछूता रहा....कोई बात नहीं ..फोलो कर लिया अब पढ़ते रहेंगे...हाँ कमेन्ट करने में हम थोडा कच्चे हैं....:))

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

ई सब तो इलेक्सन मैनेजमेण्ट का हिस्सा है... कोई कह जाता है कि जुर्म यहाँ कम है और कभी बस क़त्ल, बलात्कार, जमीन कब्जाना, जिन्दा जलाना.. सब बायस्कोप का खेला है..जौन सब रील फिट किया है ऊहै देखाया जाता है!!

डा० अमर कुमार said...

.माजरा ई है भाय के, जईसे आजुकाल्ह मतारी-बहिनन की अईसी तईसी होय रही है,
वइसहिं जनता के कपार में वोट-खेला के टैम वोटन की अईसी तईसी देखे के बदा है ।
वईसे हिन्दी पट्टी में ढेर मरदानगी सवार हुये वाली बात सच्ची है ।
मुला आजु बड़ा ज़ुलुम पोस्ट लिखला हौ, मालिक !

सतीश पंचम said...

जाकिर जी,

लगता है आपने टिप्पणी बक्से के उपर लिखी बातों पर ध्यान नहीं दिया है जिसमें स्पष्ट लिखा है कि अपनी टिप्पणियों में विषय से इतर कोई अन्य लिंक न दें।

उचित होगा कि अगली बार से अपनी टिप्पणियां करते समय इन बातों का ख्याल रखें।

प्रवीण पाण्डेय said...

मन के पाथरों का प्रदर्शन।

ajit gupta said...

यू पी की घटनाएं ही अभी मीडिया में छायी हुई हैं, इस बात का जिक्र मैं भी दो-तीन दिन से कर रही हूँ। मुझे लगता है कि अभी यूपी में ही चुनाव आने वाले हैं और कांग्रेस कोई कोर कसर नहीं छोडना चाहती मायावती को सिंहासन से उतारने में। इसलिए सारी फोर्स बस वहीं लगा रखी है।

Deepak Saini said...

बहन जी राज तो हम देख ही रहे है और क्या क्या झेल रहे है वो तो बस हमें ही पता है

Poorviya said...

iee sab padhal likhal logan ka rajneeti ba .......

kul kaam bahut soch samajh ke karal len...

jai baba banaras.....

नीरज गोस्वामी said...

भईयां ईस देश में जो हो जाय कम है ससुरा...

नीरज

Arvind Mishra said...

"जिस तरह अपनी जात बिरादरी वालों के यहां ही बेटी ब्याही जाती हैं, और सजातीय बहू ही लाई जाती है, उसी तरह अपनी जात बिरादरी वालों को ही अपना वोट दें, किसी और को नहीं। "
यह विश्लेषण बहुत सटीक है और सही कहा निर्वाचन आयोग की आँख में धुल झोकने के लिए ही है !

anshumala said...

नारे का मतलब ये हो सकता है सोचा न था | और बाकि तो जिस राज्य में चुनाव होता है वह की खबरों और हर चीज पर सभी की कुछ ज्यादा ही नजरे इनायत होती ही | और वहा हो रहे महिलाओ के खिलाफ खासकर दलित महिलाओ के खिलाफ अपराध का कारण कानून व्यवस्था से ज्यादा समाज की सोच का है जहा दलित और वो भी महिला तो समझिये की --- - - - - -

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

क्या नज़र है महाराज! इतनी सामान्य सी दो लाइनों में इतना बडा धोखा छिपा था? लम्बे भाषणों में तो प्रलय ही हो जाती होगी।

Udan Tashtari said...

ई सब का होय रहा है 'बे' ?

anitakumar said...

मुझे नारे का मतलब आप की पोस्ट पढ़ने के बाद समझ आया, वर्ना नारा पढ़ते ही लगा शायद मायावती के किसी दुश्मन ने लिखा होगा कि जैसे (खबरों के अनुसार) यू पी में लड़कियों का बुरा हाल है वैसा ही आप के वोट का होगा अगर मायावती को दिया तो…:)शायद मीडिया में आ रही यू पी की दिल दहलाने वाली खबरें मुझ पर कुछ ज्यादा ही छाप छोड़ रही हैं।

रूप said...

bahute badhiya !

Mahendra said...

गोसईंया का अर्थ hota hai maalik,(parentes) yaani murti ko bithane wala uski dekhbhaal karne wala aur KAATIN ka matlab kaatna .

सतीश पंचम said...

बहुत बहुत शुक्रिया महेन्द्र जी.

दरअसल ऐसी बहुत सी चीजें हैं देशज अंदाज में जिन्हे कि सुनते कई बार हैं लेकिन अर्थ पता नहीं चल पाता ।

वाणी गीत said...

जनता कभी इनको -कभी उनको देखते गर्दन के दर्द से बेहाल है ...

shilpa mehta said...

अब किया क्या जाए , कोई जाती के नाम पर तो कोई धर्म के - कोई अभी तक इंदिरा गांधी के नाम पर वोट मांगता है | आपको आश्चर्य होगा - इंदिरा जी को गए अरसा बीत गया लेकिन - यहाँ पिछली बार इलेक्शन के समय सोनिया गाँधी जी भाषण के लिए आई थीं - तब हमारे यहाँ "नानी" महलाने वाली एक बूढी स्त्री काम के लिए अपनी नातिन के साथ आती थी - तो उसने कहा था कि - इंदिरा गांधी आई हैं - उन्होंने ही पच्चीस साल पहले हम गरीब विधवाओं को पेंशन दिलाई - तो मैं इंदिरा गांधी को ही वोट दूँगी !!!! (( जिस तरह बचपन में पढ़ा था ना कि "फेंटम" = वेताल - जंगल के लोग कई पीढियां गुजरने पर भी उसे एक ही व्यक्ति मानते हैं -- वैसे ही ))

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