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Sunday, June 19, 2011

जलेबी बाई........नत्था.....मीना कुमारी.......ऐ दिग्गिया........... द कोलाज़

( कोलाज में कुछ शब्द अश्लील हैं......वयस्कों के लिये है......और अश्लीलता भी कौन सी....आजकल तो यही शब्द लेकर फिल्मी गाने बन रहे हैं... अन्धे बहरे सेंसर बोर्ड की कुरसियां ऐसे ही नहीं टूटान पर हैं......खैर, उम्मीद है पोस्ट झेल लेंगे : )


रफ़्ता रफ़्ता आँख जिससे लड़ी है......आँख जिससे लड़ी है वो तो बाप से भी बड़ी है......धुत् रे......महबूबा को बाप से बड़ा बता रहा है........बड़ा अहमक इंसान है........फादर्स डे पर इसको ग्रीटिंग कार्ड भेजना चाहिये........वैसे ये नया गाना भी खूब चला है........बाप को गाने में लाकर इसपेसल अंदाज में कहता है साबुन की शकल में बेटा दिखलाया.....बताया......झाग...फाग.... औ अंत में कहता है भाग भोसड़ी के......भई नैका जमाना है.......बाप बेटा जब साथ बइठ के रम औ बीयर ढार सकते हैं तो बाकी सब अंट घंट भी बोल सकते हैं......इसमें काहे का अचरज........बाकि महमूद अपने जमाना में बोल ही चुके हैं बाप बड़ा न भईया......सबसे बड़ा रूपईय्या.........अब तो ससुरा डालरौ चल गया है......

ऐ संगीतज्ञ भोसड़ी जी........आप संगीत बना रहे हैं कि संगीत की माई बहिन
एक कर रहे हैं..........उहौ फादर डे के मउके पर......अए तनिक धीरे धीरे
सपतक आने दिजिए फिर अदबदा के बजाईये........मन करे तो ओ आला बजाईये
जिसमें वहीदा रहमान गाई है पान खाये सईंया हमार........लेकिन तुमसे काहे
बजेगा तुम ठहरे भोसड़ीया घराने के वस्ताद .....


ए सिपाही जी............वो मीनाकुमारी का आप काहे दुपट्टा खिंचे थे पाकीजा फिलिम
में..........गा रही थी इन्ही लोगों ने ले लिन्हा दुपट्टा मेरा......हमरी न मानो सिपहीया से पूछो जिसने बजरीया में छीना दुपट्टा
मेरा.......बताओ......ये कोई अच्छी बात है.........वहीं बजजवा भी था जिसने अशरफी गज के रेट से मीना कुमारी को दुपट्टा दिया था.......औ वहीं रंगरेज था जिसने दुपट्टा रंग दिया.......माने जो कोई था सब अपना अपना काम किये लेकिन तुम पुलिस सिपाही लोगों को काम मिला तो वही दुपट्टा खींचने का ......धुत् .......तभी यहां यू पी में पुलिस बदनाम है....लाईसेंसी भच्छक ......

ए दिगबिजै.......सुनिये तो.......दिगबिजय जी......ताक नहीं रहे......अरे हमरौ सुनिये दिगबिजै जी.......अबहियो नहीं ताक रहे......अच्छा रहो.......ए दिगिया भोसड़ी के.........देखो लक्क से ताकने लगे ......इज्जत देने से लोग धियाने नहीं देते.....तनिक टैट हो जाओ तो लखने लगेंगे.........मुदा हम कहे आज फादर डे है......कुछ कच्छ मच्छ बनेगा कि वइसे ही झूरे झार फादर डे मनाईयेगा........नहीं तो हम आपके फादर के नाम पर थोड़ौ मोरगा खस्सी काटने कह रहे हैं........हम तो उस गाडफादर की बात कर रहे हैं जिसके दम पर तुम छींक पोंक रहे हो........अरे एक दिन ओही के नाम पर सिन्नी बांटो.........लाई चना बांट दो तो भी पुन्न मिलेगा.........क्या कहा भारतीय संसकरीत में बिसवास करने वाले हो......ई सब फादर डे उदर डे नहीं मनाते.........अच्छा तो भोसड़ी के मैं पूछता हूँ
वो जो गाना आजकल चल रहा है भाग भाग भोसड़ी के तो वह भारतीय संसकीरत का हिस्सा है या ऐसे ही जोगीरा गा रहा है.......हांय नहीं मालूम......तब तुमको क्या मालूम यार.......जाओ हम तुमसे नहीं बोलते।

ऐ बे .......चार गो देग औ दू गो कंडाल करीना टेन्ट हाउस से मंगवा लेना......कब किसका अन्डोलन सुरू हो जाय कुछ पता नहीं........ अरे हम अन्डोलन नहीं करेंगे बै.....बाबा ओबा लोग अन्डोलन करेंगे........देखा नहीं जो असल बाबा थे वो पीपली लाईव के होरी के तरह गुमनाम रहे औ अंत में प्राण छोड़ दिये जबकि पूरा मिडिया नत्था टाईप के कैरेक्टर को घेरे
रहा.......नत्था क्या कर रहा है.....सो रहा है....जाग रहा है..... खांस रहा है.....खंखार रहा है सब पीपली लाईव जईसन साच्छात परसारण था .......आखिर होता भी काहे नहीं....घोसणा जो किया था नत्था ने .......लेकिन असल जवान तो है अन्ना हजारे.........जवान कहते है कि जो
पारिवारिक लोग हैं वो सीधे हमारे से नहीं जुड़ेंगे.......उन पर बच्चों की......परिवार की जिम्मेदारी है.....अईसे लोग केवल हमारा समर्थन करें वही बहुत है.......उतने में ही सरकार दबाव में आ जायेगी.....लेकिन वो तो परिवार वाले जिम्मेदारी वाले लोग हैं........अन्ना कहते हैं....बवजूद इसके ये साठ सत्तर वाले बूढ़े लोग तो हमारे साथ मंच पर लड़ सकते हैं.....खाना जेल में भी दो टाईम मिलता है.......घर में खाने से अच्छा उधर खाओ.........

बाकि कौन बेटा चाहेगा कि बाप जेल जाय..... फादर डे .........चाचा डे.......फूफा......मउसा......ताया डे......सब मोहमाया वाले डे हैं रे बांगड़ु.........अरे वो फिर सहदेव का लड़का गाना लगा दिया डेली बेली वाला.......कहो उससे बंद करे.....बहू बेटियों का घर है.........अरे क्या
हुआ.............अरे उससे कहो बहुत अच्छा लगता है भोसड़ी के जइसन गीत तो
एक ठो पुराना वाला के साथ नया जलेबी बाई गाना जोड़ लो जिसमें मुन्नी सीला
के अंत में ठेकवन लगाते हुए कहियो......भाग भोसड़ी- आँधी आई ........सेसंर वाले अन्धे पूछें तो कह देना अमरीकन आन्ही पानी से इन्सपायर्ड गीत है .........जलेबी बाई के सम्मान में......तुम्हारा गाना पास हो जायेगा औ जो
न पास हो तो एक ठो पी आई एल दायर करना जैसा डेली बेली वाले हिरो ने किया
.......... अदालत सेंसर बोर्ड औ फिलान्थरापी.......इन सब को अपने हिसाब
से कैसे हैंडल किया जाता है वह सब फिल्लम वालन से पूछो........ परचार
सिंह ढिढोरचा की पब्लिसिटी एजेंसी झुल्ल मारे.........बाकिर तो जलेबी बाई
जी गुड आफटर नून.........आप लगे रहिये.........पूरा देस आपके साथ है.....मुन्नी सीला तो हईये हैं.........इहां बैठिये...... ए बे टेबल साफ कर.......पानी ला......अच्छे से साफ कर नहीं तो तेरे बाप के पास वापस भेज दूंगा........पइसा कटेगा सो अलग.......वइसे भी आज फादर्स डे है........


- सतीश पंचम

(जाने कौन सी रीत है जो प्राकृतिक, भावनात्मक जुड़ाव जैसी बातों पर भी एक डे मनवाती है)

12 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

कोलाज़ झन्नाट है, दुबारा पढ़़े कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया।

डा० अमर कुमार said...

मरदे, ढेर खौंखिया के लतियाया है ।
आऽऽ सूनिये तऽ एगो मज़ेदार बात.. ढेर किजीयेगा तऽ साला सब बोलेगा कि ई सब गाना पब्लिकिया के पसँद है... अब बताइये भला छिनरो का कोनो चलित्तर होता है ?

संजय @ मो सम कौन ? said...

.इज्जत देने से लोग धियाने नहीं देते..

ऐ गुरू, हमारा कमेंट ले लो जल्दी से:)

Arvind Mishra said...

का करियेगा सतीश भाई ई जो अपनी पब्लिकवा हैं न ससुरी वही ई सब चाहती है.....

सतीश पंचम said...

जहां तक मैं समझता हूँ ये फादर डे, मदर डे आदि जैसे चोंचले विदेशियों के लिये अच्छे लगते हैं, भारतीयों के लिये नहीं। वहां जिस रफ्तार से तलाक आदि की घटनायें होती हैं उस हिसाब से ज्यादातर मामलों में जैविक पिता और माता का पारिवारिक सदस्य के रूप में बदली हो जाना लाजिमी है। ऐसे में जैविक रिश्तों को सम्मान देने की प्रवृत्ति के तौर पर वह अमेरीकन मनायें तो एक हद तक उनकी मजबूरी समझी जा सकती है। लेकिन ये भारतीय क्यों पगलाये हुए हैं जो अभी से अपने माता-पिता के लिये दूरी सुनिश्चित कर रहे हैं।

फिलहाल तो यही लगता है कि यदि आज मुंशी प्रेमचंद फिर से कफ़न कहानी लिखते तो जरूर शराबखोर बाप बेटों घीसू-माधव के लिये फादर डे मनाने का प्रसंग रखते क्योंकि तब माधव अपने पिता घीसू के लिये फादर डे के नाम पर चंदा वसूलने का मौका न छोड़ता।

anshumala said...

हे प्रभु ! इ का है ???

शायद इसको ही कहते है सामने वाली की जबान में ही सामने वाले को समझाना पर जब हम भी उसी की जबान बोलने लगेंगे तो फिर उसको मना कैसे करेंगे की मत बोलो |

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

मैं भी इस तरह के लैंग्वेज के इस्तेमाल कि विरूद्ध हूं, लेकिन जब मामला कुछ टेढ़ा हो तो थोड़ा बहूत ट्रैक चेंज करना ही पड़ता है। हल्के फुल्के ढंग से कहने पर या शब्दों की जगह स्टार ( * ) लगाने से भी बात बन सकती थी लेकिन फिर पोस्ट कृत्रिमता के साये में आ जाती।
फिलहाल 'काशी का अस्सी' वाली स्टाईल ही बेहतर लगी, सो जस का तस लिख दिया हूं।

Amrita Tanmay said...

टनाटन..न .न ..न .. पोस्ट

Amrita Tanmay said...

पंचम जी आपने बिलकुल सही कहा.सीधी-सरल भाषा आजकल भारतीय संस्कृति के समान हो गयी है..fathersday के इस युग में

Gaurav Srivastava said...

सतीश जी , क्या कहा जाय इन लोगो को . इन लोगो ने पब्लिक डिमांड का बहुत ही अच्छा बहाना दूंढ लिया है . पब्लिक डिमांड के नाम पर कुछ भी बकवास करते रहेंगे . यह लोग यूथ के नाम पर ऍम टी वी रोडी , या फिर यू टी वी बिंदास पर पता नहीं क्या बकवास दिखाते रहते हैं . समझ में नहीं आता , यूथ बनने के लिए लगातार गाली देना , पहली प्राथमिकता है .

tapesh chauhan said...

अच्छी पोस्ट है...बहुत बढ़िया.

tapesh chauhan said...

ऐसे ही टांग खींचते रहिये..........
धनंयवाद...

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