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Thursday, June 16, 2011

कटहल गाथा

    पिछले कुछ दिनों से मुंबई में झमाझम बारिश हो रही है और साथ ही जगह जगह पके कटहलों के ढेर भी लगे दिख रहे हैं। यूँ भी पके कटहल ज्यादातर बरसात के दौरान ही बाजार में आते हैं। रोज ही इन कटहलों को देखता, उनकी ओर आकर्षित होता लेकिन फिर न जाने क्या बात होती कि बिना लिये ही कतरा कर निकल जाता।

      लेकिन आज शाम कुछ यूँ हुआ कि बारीश के बीच जब ऑफिस से घर आ रहा था तब
यूँ ही श्रीमती जी को फोन किया तो पता चला वह भी मार्केट में ही सब्जी लेने आई हैं। सीधे मार्केट पहुँचा। खरीददारी के दौरान पके कटहलों पर नज़र पड़ी, मन ललचा और खरीद लिया। अब समस्या आई कि उसे घर कैसे ले जाया जाय। बारिश के वक्त जहां एक हाथ में छाता, दूसरे में सब्जी की थैली और पीठ पर एक अढ़ईया का लैपटाप था ऐसे में कटहल कैसे ले जाया जाय। उधर श्रीमती जी के भी एक हाथ में सब्जी की थैली और दूजे हाथ में छाता था।

    तय किया कि घर पहुँचकर लैपटॉप को पहले सुरक्षित रख दूँ उसके बाद ही लौटकर कटहल ले जाउँ। मन ही मन झुँझलाया कि नाहक मुसीबत मोल ली, लेकिन अब ले लिया तो ले लिया।
घर पहुँच कर नाश्ता करते टीवी देख रहा था कि तभी श्रीमती जी ने कहा - कटहल खरीदना तो महंगा पड़ गया।

क्यो ? क्या हुआ ?

मेरे एक पैर की पायल कहीं रास्ते में ही गिर गई है।

    ये तो वाकई कटहल खरीदना महंगा पड़ गया। चांदी की एक पायल मतलब हजार रूपये  भी पकड़ो तो नब्बे रूपये का कटहल जोड़-जाड़कर तकरीबन ग्यारह सौ रूपये का पड़ा। अब वापस मिलने से रहा। वैसे ग्यारह सौ का कटहल मजईत रकम है। किसी पूजा-पाठ या दान दक्षिणा के न्योछावर-नेग की तरह का।

    उधर श्रीमती जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं इधर मुझे हंसी आ रही थी। यह देख श्रीमती जी झुंझलाते हुए बोलीं - एक तो संझा के समय लछमी जी के आने के टाईम धन का नुकसान हो गया और आपको हंसी आ रही है। लछमी जी के आने का टाईम ? रोचक टाईमिंग है। खैर, लछमी जी को आना होगा तो फिर आ जायेंगी, अभी तो चलूँ , वहां गियारह सौ वाला कटहल अगोर रहा है।
भुनभुनाते हुए श्रीमती जी किचन में गईं, जरूर मन ही मन सोच रही होंगी कि काहे आज बाजार गईं। वैसे भी महिलायें गहनों से कुछ अधिक लगाव रखती हैं।

  मन में था कि इस बारिश में कौन जाय, कल ले आउं कटहल, भागा थोड़े जा रहा है, किंतु कुछ पायल की व्यग्रता, कुछ अहमक मन,  थोड़ी देर में चाय वाय पीकर फिर छाता उठाये चल पड़ा। साथ में एक प्लास्टिक की छोटी बोरी भी ले लिया कि उसी में लपेटकर लाउंगा वरना कटहल का दूध कपड़े खराब कर देगा। जाते जाते श्रीमती जी ने याद दिलाया कि रास्ते में देखते जाईयेगा क्या पता किसी की नजर न पड़ी हो।
 
   मैं मन ही मन श्रीमती जी के इस घनघोर आशावाद पर मुस्करा पड़ा, छेड़ते हुए कहा - हाँ, दुनिया के सारे चोर चाईं आज हड़ताल पर जो हैं, पायल वैसे ही  पड़ी होगी। श्रीमती जी को मैंने जाते-जाते टहोका तो जरूर लेकिन मन ही मन इस फेर में भी रहा कि क्या पता सचमुच ही पायल पर किसी की नजर न पड़ी हो और वह मिल जाय।

   हांलाकि यह उम्मीद एक पर्सेंट से ज्यादा की नहीं थी लेकिन उम्मीद तो उम्मीद होती है। किसी बात की थोड़ी सी भी उम्मीद इंसान के व्यवहार में कुछ न कुछ चौकन्नापन और तनिक सा व्यवहार में बदलाव जरूर लाता है । वही मेरे साथ रास्ते भर हो रहा था। जा तो रहा था कटहल लेने लेकिन ध्यान पायल पर था। रह रहकर सड़क पर नीचे की ओर ताकते चल रहा था। छतरी के वजह से सड़क पर नीचे देखने में सहायता भी मिल रही थी वरना कोई परिचित देखता तो जरूर
पूछता कि इतना सिर झुकाये काहे चल रहे हो।

   इधर कटहल की दुकान नजदीक आते जा रही थी और पायल मिलने की उम्मीद क्षीण होती जा रही थी। होते होते वह कटहल की दुकान भी आ गई लेकिन पायल नहीं मिली। अब क्या हो। कटहल लो और लौटो। वही किया, लेकिन कटहल मुझे उम्मीद से कुछ ज्यादा ही भारी लगा। उसे हाथ में लटका कर लाना संभव न था। हाथ बदल बदल कर लाने के बावजूद थोड़ी ही देर में कटहल जमीन छूते हुए लेथराने लगता। उपर से दूजे हाथ में छतरी भी पकड़नी थी। थक कर मैंने छोटे वाले प्लास्टिक की बोरी में लिपटे कटहल को मुगदर की तरह कंधे पर रख लिया और कटहल का डंठल पकड़ने के काम आया। कुछ यूँ लग रहा था जैसे हनुमान जी की तरह गदा लेकर चल रहा हूँ। कंधे पर कटहल रख लेने से हाथों को काफी राहत मिली, लेकिन इस तरह कंधे पर कटहल लेकर चलना मुझे अजीब लग रहा था। यहां एक बात मैंने नोटिस की है कि पढ़े लिखे लोगों के द्वारा सामान आदि उठाने के तरीके में और कम पढ़े लिखे लोगों द्वारा सामान उठाने के तरीके में अंतर होता है। जो तनिक पढ़े लिखे होते हैं वह कभी भी सामान उठाकर अपने कंधों पर या सिर पर नहीं रखते, संभवत इसके पीछे हल्की सी शर्म और मजदूरों सरीखा न दिखने की मानसिकता काम कर रही हो, जबकि मजदूर वर्ग इस तरह की बाध्यता में नहीं जीता। वह अपने सामान को उठाकर उसे अपने शरीर पर सुविधानुसार रख कर ढोता है, उसे किसी किस्म की हिचक नहीं होती, शर्म नहीं लगती।

   खैर, मैंने छतरी की आड़ का लाभ उठाया और हनुमान जी के गदा की तरह कंधे पर कटहल ले वापस लौटने लगा। अबकी फिर पायल की बात जेहन में आई और रह रह कर सड़क के रास्तों पर नजर मार लेता। अपने इस अजब रूप पर मुझे मन ही मन जहां एक ओर हंसी आ ही रही थी तो साथ ही कुछ गाने भी याद आ रहे थे जिनमें कोई प्रेमिका अपने प्रेमी से बाला ढूँढवा रही होती है तो कहीं बरेली-गाजीपुर में झुमका-कंगना गिरा रही है। संभव है कईयों ने ढूँढा भी हों, लेकिन मुझे नहीं लगता कभी किसी हीरो ने भारी बारीश में कटहल ढोते हुए झुमका, बाला औ कंगन-पायल ढूँढा हो :)

   खैर, पायल न मिलना न मिला। गुम तो गुम। किंतु कालीदास यदि मेरी यह दशा देखते तो जरूर एक और मेघदूतम् की रचना करते जिसमें काले मेघों की गर्जन तर्जन के बीच बंदा कांधे पर कटहल रख नायिका के पायल ढूँढता है। कितना सुंदर और विलक्षण दृश्य होता। लोग कालीदास की मेधा का लोहा मानते सो अलग। किंतु हाय रे टाईमिंग।

    कालीदास जी, You, ve missed the classic opportunity :) Please come  to Mumbai. You may find some more stuffs like ग्यारह सौ रूपये का कटहल OR  मुंबईया ढुँढ-ढाँढ :)
- सतीश पंचम

14 comments:

ajit gupta said...

सतीश जी सारे दृश्‍य की कल्‍पना करके मम्‍बइया जिन्‍दगी पर हँसी आ रही है। हम जैसे छोटे लोग छोटे शहरों में रहते हैं और दुकान तक गाड़ी को घुसाते हैं और घर तक आते हैं। बड़े शहरों के बड़े कटहल? वाह क्‍या व्‍यंग्‍य बना है?

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मस्त है।
वैसे वहाँ एक और शख्स के होने की संभावना थी जो दूसरी पायल ढूँढ रहा था! आपको देख कर भाग गया!

सञ्जय झा said...

bahut sundar pancham da.....

jai ho.

Poorviya said...

उम्मीद तो उम्मीद होती है। किसी बात की थोड़ी सी भी उम्मीद इंसान के व्यवहार में कुछ न कुछ चौकन्नापन और तनिक सा व्यवहार में बदलाव जरूर लाता है ।umeed par duniya kayam hai...

bahut sunde kathal katha ....

jai baba banaras.....

Arvind Mishra said...

पानी पायल पनस और पिया -मजेदार!
कितने किलो था ? सस्ता लग रहा है !

anshumala said...

बिलकुल सही कहा मुंबई में कटहल इतना आसन नहीं है और यदि मात्र में थोड़ा लेना हो तो दुनिया जहान का झिक झिक करते है उस पर से घर में उसे छिलने की कोई व्यवस्था नहीं है तो उसी से छिलवाना भी पड़ता है ऐसे में वो जिस कटहल को तौल कर दे आप को लेना मजबूरी होता है जिसमे से ज्यादातर तो कुछ पके होते है | वैसे मुंबई में कटहल का कोवा भी इस मौसम में खूब बिकते है सब्जी बाजार जाइये तो इस समय पूरा बाजार कटहल के कोए की महक से भरा रहता है | और हा चांदी का भाव देखा है कितना है वो कटहल अभी आप को और मंहगा पड़ेगा जब श्रीमती जी अपने लिए दूसरी पायल लेने के लिए बाजार जाएँगी |

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत बढ़िया लिखा है सर!
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कल 17/06/2011 को आपकी कोई पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है.
आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत है .

धन्यवाद!
नयी-पुरानी हलचल

शोभा said...

आपकी कथा पढ़ कर श्री जैनेन्द्र कुमार की 'पायल' कहानी याद आ गई

Rahul Singh said...

चलिए, कटहल तो घर आया, टारगेट एचीव्‍ड.

प्रवीण पाण्डेय said...

कटहल के व्यापार में पायल गिरी रे, कोई बात नहीं, नयी खरीदवा दीजिये।

Abhishek Ojha said...

"काले मेघों की गर्जन तर्जन के बीच बंदा कांधे पर कटहल रख नायिका के पायल ढूँढता है" :)

prerna argal said...

bahut intresting katha.aapki shrimatiji ko gaana tha kathal ko chodo piya dhoondo-doondho re saajanaa mori 1000/ki payal.badiya romantic gana ban jaata.payal goom hone ka gam bhi kam ho jaata.achche lekh ke liye badhaai.




please visit my blog.thanks.

anitakumar said...

अरररर…॥पके कटहल के लिए पायल? महंगा सौदा रहा

rashmi ravija said...

वाह वाह क्या दृश्य रहा होगा....किसी को मोबाइल पकड़ा एक तस्वीर भी खिंचवा लेते...' 'विवाहोपरांत प्रेम ' का अनुपम उदहारण होता...अमर हो जाती वो तस्वीर...कंधे पर कटहल...लादे ...घनघोर बारिश में छाता संभाले पायल ढूंढता एक प्रेमी .

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