सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, June 5, 2011

रामदेव प्रकरण.........यानि कि ..... 'ट्रेजेडी ऑफ एरर्स'

       एक आम इंसान के तौर पर मुझे रामदेव के गिरफ्तार होने, उनके आंदोलन के सरकारी तंत्र द्वारा कुचल दिये जाने का थोड़ा बहुत दुख जरूर हो रहा है लेकिन इतना नहीं जितना कि चारों ओर बताया जा रहा है कि यह देश के साथ धोखा है, ये आम जनता के साथ, आम इंसान के साथ किया गया विश्वासघात है...bla bla bla. फिलहाल जो कुछ रामदेव प्रकरण को लेकर हुआ, जो कुछ अभी हो रहा है वह सब यदि भीड़ तंत्र से अलग रहकर देखा जाय, सोचा जाय तो यह और कुछ नहीं, बल्कि किसी की निजी महत्वाकांक्षा, किसी का सरकारी दम्भ, किसी की मौका परस्ती, किसी के बदला लेने के नीयत आदि का मिला जुला एक कोलाज भर है जो कि लोकतंत्र के नाम पर इतिहास की कलुषित दीवारों पर पोस्टर के रूप में अब चिपक सा गया है।

        सबसे पहले यदि बाबा रामदेव को ही लें तो उनके बारे में जो कुछ अब तक जाना है, समझा है वह यही कि एक योग साधक हैं जिन्हें कि अपने योग क्षेत्र को बढ़ाने, फैलाने, उसे सबके बीच ले जाने की बड़ी इच्छा है। उनकी इस इच्छा में कोई बुराई भी नहीं है, होना भी चाहिये, सब को योग का लाभ मिले, सब लोग आयुर्वेद की ओर बढ़ें इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। लेकिन मुश्किल तब खड़ी होती है जब यही योग कार्पोरेट स्टाईल से लोगों के बीच परोसा जाता है। कार्पोरेट स्टाईल से सारा कुछ मैनेज किया जाता है। एक बार यदि यह मान भी लूं कि कार्पोरेट स्टाईल आज की मजबूरी है, एक तरह का साधन मात्र है तो भी यह तो कहीं से उचित नहीं लगता कि जन-जन के बीच योग ले जाने का दम भरते-भरते उसे उसी जन से दूर कर दिया जाय यह कहते हुए कि योग शिविर में आगे की रो में बैठोगे तो इतनी फीस देनी होगी, थोड़ा पीछे बैठोगे तो कम फीस देनी होगी, और पीछे बैठे तो और कम।

     यानि, यदि आपके पास पैसे हैं तो, दे दो पांच हजार रूपये हमारे नज़दीक बैठने के, ले लो पहली रो का टिकट । यदि नहीं हैं तो थोड़ा दूर बैठो, काहे को यहां जमघट लगा रहे हो। अब ये तो कोई भी समझ सकता है कि जो आम इंसान अपनी हाड़ तोड़ मेहनत करके, पाई पाई जोड़ कर महीने के दस-पन्दरह हजार कमाता है, वह किसी भी हालत में सिर्फ इसलिये पांच हजार तो खर्च नहीं करेगा कि आगे बैठने को मिले। यह तो वही लोग कर पाएंगे जिनके पास महीने की आठ- दस लाख की इन्कम होगी। और जहां तक मैं समझता हूँ ये महीने के चार-पांच लाख कमाने वाले लोग जन-जन की श्रेणी में कत्तई नहीं माने जाएंगे, क्योंकि जन-जन की कैपेसिटी कुछ अलग है। भला सोचिये कि जिस 'जन-जन' की बात की जाती है वह जब गैस के रेट बढ़ने के साथ हलकान हो जाता है, प्याज के रेट तेज होने पर प्याज खाना छोड़ देता है, वह भला क्या सोचकर योग शिविर के आगे के रो में बैठने के लिये पैसे देगा।

     खैर, बाबा रामदेव का उद्देश्य अच्छा जरूर है लेकिन उसके 'साईड-फाल्स' कुछ जम नहीं रहे। यदा-कदा उनका बड़बोलापन झलक ही जाता है। संभवत: मीडिया भी उनके इसी बड़बोलेपन का लाभ उठाकर मुरब्बा-अचार की तरह बतौर ऐडीशनल न्यूज परोसने की आदी हो चुकी है।

     अब सवाल यह उठता है कि इस पूरे मामले में तब सरकार की भूमिका क्या है ? क्या सरकार ने जो किया वह ठीक किया ?

      नहीं, सरकार के इस हरकत को ठीक तो किसी भी तरह से नहीं मानूंगा लेकिन इस सब कुटिलता को अपनाने के अलावा सरकार के पास रास्ता भी तो कुछ नहीं बचा था। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि बाबा रामदेव का आंदोलन प्रत्यक्ष रूप से भले ही भ्रष्टाचार और काले धन को लेकर किया गया आंदोलन था लेकिन कहीं न कहीं छुपे तौर पर इस आंदोलन के लिये सरकार विरोधी राजनीतिक दलों का समर्थन अवश्य था जो कि इस रामलीला मैदान पर हुए प्रकरण के बाद अब धीरे धीरे सामने आ रहे हैं। ऐसा लगता है कि सरकार को इसकी भनक थी और वह अपने राजनीतिक विरोधियों को पटखनी देना चाहती थी, उन्हें इस तरह के आंदोलनों के जरिये लाभान्वित होते नहीं देखना चाहती थी। ऐसे में सरकार को जो कुछ भी राजनीतिक कुटिलताएं अपनानी पड़ीं उसने अपनाया। कपिल सिब्बल, प्रणव मुखर्जी , सुबोधकांत सहाय आदि के जरिये पहले जाल बिछाया, मान मनौवल किया, एक लिखित पत्र भी हासिल कर लिया जिसे कि बाद में ट्रम्प कार्ड के रूप में इस्तेमाल किया जाय और किया भी। पत्र का भेद खोलते ही एकाएक बाबा रामदेव कटघरे में आ गये। फिर जब लगा कि फिलहाल मौका अच्छा है, मामला लंबा खिंचने से कल को कहीं परिस्थितियां फिर पहले जैसी न हो जांय, कहीं अन्ना हजारे भी न आ जांय , यह सोच कर ही साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाते हुए रात में ही पूरे आंदोलन को मटियामेट कर दिया गया।

     और अब देखिये कि कैसे सबको मौका मिल गया। एक एक कर राजनीतिक दल सामने भी आने लगे। भाजपाईयों को देखा कि वे गाँधी जी के नाम पर सत्याग्रह की रट लगा रहे हैं, चौबीस घंटों का आलाप ले रहे हैं। उधर मायावती को भी मौका मिल गया। कह दिया कि जो कुछ हुआ वो बर्बर था, भयानक था। यह कहते हुए शायद वह भट्टा पारसौल का बदला मूल-सूद सहित वापस भी कर रहीं थीं । उधर हाशिये पर चले गये कुछ नेता भी कैमरों पर दिखने लगे हैं। मुलायम सिंह को देख रहा था कि बमक रहे थे, मानों ये ही हैं जो सबसे ज्यादा व्यथित हैं। लालू यादव को देखा वो अलग तान छेड़े हुए थे। जबकि काले धन को लेकर यदि कल को कुछ 'कानून-ओनून' बन जाय, कुछ हल्की फुल्की कार्यवाही भी हो उठे तो यही नेता सबसे पहले अंदर होंगे जो कि अभी बढ़ चढ़ कर बोल रहे हैं। तब यही नेता मुँह छिपाते फिरेंगे। अभी तो इन्हें पता है। मौका मिला है तो चौका मारो....क्या पता कल को सेलेक्शन हो ही जाय किसी चुनावी बयार में। फिर जो नेता अपने चेले चपाटों के जन्मदिन पर, उनके मरनी करनी पर, अक्सर फ्लैक्स वाले बैनरों पर हार्दिक शुभेच्छा देने का मौका नहीं चूकते वह भला इस मौके को कैसे जाने देंते। फिर तो कैमरा भी है, मौका भी है, दस्तूर भी।

        दिग्विजय सिंह जो कि लादेन के लिये 'लादेन जी' कह कर संबोधित करते हैं वही बाबा रामदेव के लिये 'ठग' शब्द का इस्तेमाल करते हैं। कपिल सिब्बल, जो कि वकील भी हैं अपनी पूरी वकालत एक पत्र के जरिये झोंकते मिले। उनके बारे में तो बाबा रामदेव का यह कहना है कि - कपिल सिब्बल बहुत कुटिल हैं, शातिर हैं...अब उनसे वे बात नहीं करेंगे। लेकिन शायद बाबा रामदेव जाने अनजाने में ही कपिल सिब्बल के लिये खूबियों का तमगा दे बैठे। अरे बाबाजी, यही तो वो खूबियां हैं जो आज के जमाने में, राजनीति की पैंतरेबाजियों में बेहद जरूरी हैं। इसी के दम पर तो राजनीति चलती है। सरकार चलती है। कुटिल होना, शातिर होना यदि अवगुण हैं तो यह आपका नज़रिया होगा, किंतु जिस जमाने में डिप्लोमैटिक होना, कुछ न कुछ नकारात्मक अवगुण लिये होना एक तरह की उपलब्धि मानी जाय, उसे बयां कर आपने अनजाने में ही कपिल सिब्बल का कद आम शातिरों से कुछ उपर उठा दिया है। यकीं मानिये, आपके इन उदगारों से कपिल सिब्बल खुश ही हुए होंगे, चिंतित बिल्कुल नहीं। क्योंकि चिंतित होना राजनीति के 'क्लासिकल युग' में चलता था, आज-कल के 'कारपोरेट युग' में नहीं। हो सकता है आपके इन्हीं बताये गुणों को सर्टिफिकेट मान सरकार कपिल सिब्बल को और भी ज्यादा संवेदनशील जिम्मेदारियां देने की ओर अग्रसर हो जाय।

      खैर, अभी इस प्रकरण पर बहुत कुछ लिखा जाना है, कई लेख लिखे जाएंगे, कई तरह के मत-मतांतर व्यक्त किये जायेंगे, किंतु जो ये बार बार कहा जा रहा है कि लोकतंत्र पर धब्बा, लोकतंत्र कलुषित तो मेरा मानना है कि क्या आज ही यह लोकतंत्र कलुषित हुआ है ? क्या आज ही यह लोकतंत्र इतना ज्यादा आहत हुआ है ? नरसिम्हा राव का संसद प्रकरण, अजित-जोगी, दिलीप सिंह जूदेव के रिश्वती टेप, करगिल के दौरान खरीदे गये महंगे ताबूत, बोफोर्स कांड, यू.पी. विधानसभा में हुई जूतमपैजार क्या इन सबके दौरान लोकतंत्र कलुषित नहीं हुआ था ? या आज ही 'स्पेशली कलुषित' हुआ है ?


       दरअसल लोकतंत्र के कलुषित होने की बजाय यह दिन लोकतंत्र के बनते बिगड़ते अनेक 'मौकों' में से ये भी एक 'मौका' है जिसे हर कोई अपने-अपने हिसाब से भुना रहा है। सरकार इसे अपने विरोधियों को दी गई पटखनी के तौर पर देख रही है तो विपक्ष इसे सरकार को घेरे में लेने का अच्छा मौका जान रहा है। जो कोई हाशिये पर पड़ा है वह इसे लाइमलाईट में आने का अच्छा अवसर जान रहा है। ऐसे में बाबा रामदेव का योग इन सभी को सहयोग ही तो दे रहा है। लेकिन इस प्रकरण को यदि एक शब्द में अभिव्यक्त किया जाय तो शेक्सपियर के नाटक कॉमेडी ऑफ एरर्स की तर्ज पर मैं ट्रेजेडी ऑफ एरर्स कहना पसंद करूंगा जिसमें हर ओर से लोकतंत्र के नाम 'पॉलिटिकल एरर मैटेरियल'  ट्रैजेडी दर  ट्रैजेडी पेश किये जा रहे हैं।


     - सतीश पंचम


28 comments:

Arvind Mishra said...

पूरे मामले का आपने आद्योपांत अच्छा विश्लेषण किया है -
मगर यह साफ़ साफ़ कहे जाने की जरुरत है कि रात में सोते समय निहत्थी और लाचार जनता पर
नपुंसक आक्रोश दिखाना कतई उचित नहीं है -
जरा बताईये अगर बाबा उन्हें जस का तस करने के लिहाज से बुलाता तो क्या हुआ होता ?

दीपक बाबा said...

@ यदि भीड़ तंत्र से अलग रहकर देखा जाय, सोचा जाय तो यह और कुछ नहीं, बल्कि किसी की निजी महत्वाकांक्षा, किसी का सरकारी दम्भ, किसी की मौका परस्ती, किसी के बदला लेने के नीयत आदि का मिला जुला एक कोलाज भर है

यदि बाबा में कुछ महत्वाकांक्षा जागी है तो बुरा क्या है ....... जब मधु कोड़ा और देवगौड़ा जैसे और कुर्सी पर बैठ सकते है तो बाबा क्यों नहीं. ठीक है बोलते कुछ ज्यादा है और मेरे ख्याल से कुछ भोले हैं.... तभी इन कुटिल कल्कामी के चक्कर में पड़ गए. अन्ना की बात और थी..... अंदर ही अंदर ..... की गेम खेल रहे थे... पर बाबा खुले मैदान में हैं.

@ दे दो पांच हजार रूपये हमारे नज़दीक बैठने के, ले लो पहली रो का टिकट ।
भाई जिन लोगों अंधा कमा रखा है - उन्ही से तो पैसा ले रहे हैं - बाकि रहा गरीब तबका - उनको तो कोई ऐसी बिमारी ही नहीं है की बाबा के योगासन में जायें.

@मीडिया = मुरब्बा-अचार
भाई इन लोगों को तो कुछ खट्टा मीठा चाहिए ही चाहिए.. दूकान २४ घंटे चलानी है न.

@सरकार की भूमिका
वो तो दुनिया ने देख ली....... पहले बहलाव फुसलाव .... फिर दुनिया के आगे नंगा कर दो. उसके बाद बल प्रयोग द्वारा उधेड़ दो....

इन लोगों को बहुत अनुभव है .....राजकाज का और कमीनागिरी का....... नए से नए लोग आकार इस मंडली में जुड़ते चले जाते हैं और ये मण्डली मज़बूत होती चली जा रही है.....

उसके बाद आप जैसे बुद्धिजीवी लोग आकार 'न्याय' पूर्वक रिपोर्ट पेश करते हैं........ :) आपने इस महान देश में विदेशों से महान लोकतंत्र को इम्पोर्ट किया .... और इसी के द्वारा एक अधिकार दिया गया अपनी बात कहने का ..... हाँ लाठियां खाने का अधिकार स्वत: ही मिल गया .

जय राम जी की..

दीपक बाबा said...

@नरसिम्हा राव का संसद प्रकरण, अजित-जोगी, दिलीप सिंह जूदेव के रिश्वती टेप, करगिल के दौरान खरीदे गये महंगे ताबूत, बोफोर्स कांड, यू.पी. विधानसभा में हुई जूतमपैजार क्या इन सबके दौरान लोकतंत्र कलुषित नहीं हुआ था ? या आज ही 'स्पेशली कलुषित' हुआ है ?


इन सब की पड़ताल करेंगे तो यही राज काल वाली पार्टी की कलाई खुलती नज़र आएगी ..... हाँ १ = १०० का रेशो ध्यान में रखना.

दीपक बाबा said...

डॉ साहिब, नपुंसक आक्रोश दिखाना कतई उचित नहीं है -

वाकई हम जैसे नपुंसक लोगों को आक्रोश दिखाने का कोई अधिकार नहीं हैं

सतीश पंचम said...

@ यदि बाबा में कुछ महत्वाकांक्षा जागी है तो बुरा क्या है .......

@ इन सब की पड़ताल करेंगे तो यही राज काल वाली पार्टी की कलाई खुलती नज़र आएगी ..... हाँ १ = १०० का रेशो ध्यान में रखना.

.....etc

दीपक जी,

इन तमाम बातों को देख कर ही मैंने इसे एक तरह का कोलाज़ कहा है। यहां पक्ष और प्रतिपक्ष हर कोई आकंठ सना हुआ है, कोई किसी से कम नहीं है :)

दीपक बाबा said...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…
प्रॉब्लम वही पुरानी है, सबसे बुरा स्वीकार्य है परंतु कुछ अच्छा हो तो फिर सीधा भगवान ही होना चाहिये।



क्या शर्मा जी की टीप कहीं न कहीं सार्थक (वास्तविक धरातल पर) नहीं लगती

VICHAAR SHOONYA said...

सतीश जी, आपका विस्तृत विश्लेषण अच्छा लगा. लोग बाग़ कह रहे हैं की बाबा आर एस एस के हाथों में खेल रहे थे पर जब से बाबा का लोकपाल बिल की हद से प्रधानमंत्री को हटाने वाला बयां आया तबसे मुझे लगाने लगा था की बाबा रामदेव कांग्रेस के हाथों में खेल रहे हैं. बाबा को शुरू से पता था की उनकी मांगों पर तुरंत कोई फैसला नहीं हो सकता इसलिए उन्होंने कांग्रेस के साथ मिलकर सारा ड्रामा पहले से ही फिक्स कर लिया था. आम जनता को आमरण अनशन का न्योता दिया और खुद दो दिन में सारा खेल समेटने की तैयारी कर रखी थी परन्तु जब उनका खेल कपिल सिब्बल ने उजागर कर दिया तो बाबा फंस गए. उनकी राजनीती की समझ अभी बहुत कच्ची है. इन कुटिल राजनीतिज्ञों से तो कोई सच्चा सीधा सरल इन्सान ही जूझ सकता है जिसकी कथनी और करनी में कोई फर्क न हो न की बाबा रामदेव जैसा तमाशेबाज.


वैसे एक बात बता दूँ की इस कांग्रेसी सर्कार में कुछ आत्मघाती तत्त्व जरुर है जो हमेशा गलत निर्णय लेते हैं. जिस वक्त अन्ना हजारे जी का आन्दोलन चल रहा था तो इन लोगों ने लिखित आश्वाशन देने में देरी की जिससे अन्ना का कद और ऐसे आमरण अनशनों के प्रति लोगों में क्रेज बढ़ गया. जो काम इन्होने चार पञ्च दिनों में किया उसे एक दो दिन में ही कर डालते तो शायद इस बार भी अनशन का ड्रामा नहीं होता. इस बार इन्हीं तत्वों ने निर्णय लेने में जल्दबाजी दिखाई और बाबा को अंगुली कटाए बिना ही शहीद हो जाने का मौका दे दिया. अगर प्रशाशन एक दो दिनों का इंतजार करता और बाबा के लिखित अशवाशन को भुनाता तो बाबा जी के आमरण अनशन का नाटक तो बुरी तरह से विफल हो जाता. पता नहीं ये लोग सही समय पर सही निर्णय क्यों नहीं ले पाते. ये बात एकदम सही है की विनाश काले विपरीत बुद्धि. कांग्रेश का शासन अब विनाश की ओर है.



@ दीपक बाबा जी, स्मार्ट इंडियन अनुराग जी की बात के विषय में कहीं एक कहावत पढ़ी थी उसका जिक्र करना चाहूँगा की अनजाने भगवान से जाना पहचान शैतान भला होता है.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

कल की पूरी घटना के जरिये आपने सभी की नग्नता को अपनी दृष्टी से देखा है।
सभी नंगे दूसरों की नग्नता पर यह जानते हुए भी हंस रहे हैं कि वे भी नंगे हैं। इसे कहते हैं नंगई। असल मुद्दा जहां का तहां खड़ा है।
..फिर बेतलवा डाल पर।

Rahul Singh said...

आदर्श या बेहतर स्थितियां के लिए कल्‍पना हो, विचार या प्रयास, स्‍वागतेय होना चाहिए. हां, यह मिस काल और एसएमएस से संभव करने का विचार निरर्थक होगा.

मनोज कुमार said...

बाबा में इतना ही गुनाह है कि वो संन्यासी के साथ साथ राष्ट्रवादी भी हैं।
पर वे जो आधी रात को नींद में सोये थे उन्होंने क्या गुनाह किया था?
और लोकतंत्र के सर पर डंडा जयप्रकाश नारायण के बाद कल, या कहिए आज ही दुबारा चला है, वह भी नींद में सो रहे लोगों पर।
मीडिया अगर न होता तो हम भी सोते ही होते, कम से कम अपनी आंखों से अब देख तो पा रहे हैं कि क्या-क्या हुआ? अब भी सोते रहें, तो यह हमारा च्वायस है।

प्रवीण शाह said...

.
.
.
लेकिन इस प्रकरण को यदि एक शब्द में अभिव्यक्त किया जाय तो शेक्सपियर के नाटक कॉमेडी ऑफ एरर्स की तर्ज पर मैं 'ट्रेजेडी ऑफ एरर्स' कहना पसंद करूंगा

मैं भी, पर 'शब्द' यहाँ तीन हैं ;)



...

सतीश पंचम said...

@ 'शब्द' यहाँ तीन हैं ;)

------------

लो .... एक और एरर :)

मतलब पोस्ट अपने आप में परिपूर्ण है :)

दीपक बाबा said...

@विचार शुन्यजी कोई बात नहीं अब इन लोगों से सामना होगा तो राजनीति भी सीख जायेंगे......

राजनीती की समझ अभी बहुत कच्ची : तभी फंस गए न इन कुटिल नेताओं में जो पहले तो पलके बिछा कर आगवानी करती है फिर लाठी डंडे बरसाती है.

सुबह से तो टीवी देखा नहीं, पर अब आकर देख रहा हूँ तो ये महसूस कर रहा हूँ कि और कौन सी उंगली कटानी शेष रह गयी है शहादत के लिए ........ क्या सत्ता पक्ष के किसी छोरे (छुटभैया नेता) ने या फिर राजघराने के सदस्य ने लाठियों का सामना किया है. नहीं किया न - वो मात्र राज करने के लिए अवतरित हुए हैं.... और जब विपक्ष में भी होते हैं तो कमरे में बैठ कर शतरंजी चाल से सरकारें गिराते हैं ........ उनको मुद्दों से क्या मलतब ... जमीनी स्तर पर काम करने वाले कुछ लोग ही होते हैं... कहाँ है वो युवराज - जो विपक्ष की सरकार में किसानो की हालत पर मगर्मच्ची आंसू बहते नज़र आते है : आज कहाँ हैं ?

Markand Dave said...

हम को तो आदरणीय श्रीदिग्विजयसिंहजी का भाषण सुनकर परम आनंद प्राप्त हो रहा है..!! ये तो राजु श्रीवास्तव के भी महागुरु लग रहे हैं..!! भट्टा परसौल पर राहुल बाबा के आंदोलन का दिग्गीराजा द्वारा समर्थन और भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी कुछ कहे तो उस पर बेतुके तर्क?

ऐसे ही दूसरे महान कॉमेडियन श्रीलालूजी कहते हैं, बाबा को योग करना चाहिए न कि, राजनीति..!!

मैं पुराने अख़बार पलट रहा हूँ,शायद कहीं से मुझे लालू जी अपनी धर्म पत्नी राबरीजी को यह कहते दिख जाए कि, बिहार की मुख्यमंत्री बनना तेरा काम नहीं है,अपना चूल्हा सँभाल वही तेरी असली जगह और काम है?

सचमुच अभी ऐसा माहौल है कि, रामलीला के मैदान में किसी नौटंकी के दौरान, बाबा नाम का कोई चोर उचक्का, उसके एक लाख संगी साथी, उनकी पत्नी और उनके चेर बच्चों के साथ पकड़ा गया हो और , जिसे मौका मिले वह उसे पीट ने में अपना हाथ साफ़ कर रहा हो..!!

जो नेता भीड़ को इकट्ठा करके अपनी बातें मनवा ने के विरूद्ध अपनी बयानबाज़ी कर रहे हैं, उन्हों ने, राजकीय जीवन के दौरान, कभी अपने समर्थकों की भीड़ जा तो जुटाई होगी, ना कभी रैलियाँ निकाली होगी, ना कभी धर-ना-प्रदर्शन किए होंगे..!! सच्चे हठ योगी तो, सो-ये हुए भूखे महिलाएं और बच्चों पर आँसू गैस के गोले दाग़ने वाले हैं..!!

अब सारी सयानी जनता को इनकी ही योगशिबिर ऍटेन्ड करना चाहिए, कम से कम मार खाने से बच जाएं..!!


मेरा भारत महान..!!

मार्कण्ड दवे।

Markand Dave said...

टिप्पणी में हमने भी तीन ऍरर की है?

अब सुधार के साथ..!!

हम को तो आदरणीय श्रीदिग्विजयसिंहजी का भाषण सुनकर परम आनंद प्राप्त हो रहा है..!! ये तो राजु श्रीवास्तव के भी महागुरु लग रहे हैं..!! भट्टा परसौल पर राहुल बाबा के आंदोलन का दिग्गीराजा द्वारा समर्थन और भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी कुछ कहे तो उस पर बेतुके तर्क?

ऐसे ही दूसरे महान कॉमेडियन श्रीलालूजी कहते हैं, बाबा को योग करना चाहिए न कि, राजनीति..!!

मैं पुराने अख़बार पलट रहा हूँ,शायद कहीं से मुझे लालू जी अपनी धर्म पत्नी राबरीजी को यह कहते दिख जाए कि, बिहार की मुख्यमंत्री बनना तेरा काम नहीं है,अपना चूल्हा सँभाल वही तेरी असली जगह और काम है?

सचमुच अभी ऐसा माहौल है कि, रामलीला के मैदान में किसी नौटंकी के दौरान, बाबा नाम का कोई चोर उचक्का, उसके एक लाख संगी साथी, उनकी पत्नी और उनके चोर बच्चों के साथ पकड़ा गया हो और आते जाते, जिस किसी को मौका मिले, वह इन सब को पीट कर, अपना हाथ साफ़ कर रहा हो..!!

जो नेता भीड़ को इकट्ठा करके अपनी बातें मनवा ने के विरूद्ध अपनी बयानबाज़ी कर रहे हैं, उन्हों ने, राजकीय जीवन के दौरान,

ना तो कभी अपने समर्थकों की भीड़ जुटाई होगी,

ना कभी रैलियाँ निकाली होगी,

ना कभी धर-ना-प्रदर्शन किए होंगे..!!

सच्चे हठ योगी तो, सो-ये हुए भूखे महिलाएं और बच्चों पर आँसू गैस के गोले दाग़ने वाले नेतागण हैं..!!

अब सारी सयानी जनता को इनकी ही हठ योगशिबिर ऍटेन्ड करना चाहिए, कम से कम मार खाने से तो बच ही जाएंगे..!!


मेरा भारत सदैव महान..!! यदा-कदा, जय जय हिन्दुस्तान..!!

मार्कण्ड दवे।

डा० अमर कुमार said...


सतीश जी, आपने बहुत ही सँतुलित और रोचक तरीके से यह ब्यौरा पेश किया है । बधाई हो !


@ दीपक बाबा साहेब :
हमारी लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ़ नहीं, उस व्यवस्था के खिलाफ़ चलनी चाहिये, जो इसे खाद पानी देकर पोस रही है ! बिडँबना यह है कि इस कड़ी में सबसे निचले पायदान पर हमारे मध्य के लोग यानि जनता खड़ी दिखती है । उतने बड़े जमावड़े में क्या 10% भी इतने स्वच्छ चरित्र के रहे होंगे, कि वह पूरी हनक से अपने को इस व्यवस्थित भ्रष्टव्यूह का अभिमन्यु सिद्ध कर सकें ? सभी यदि गाल बजाने में पारँगत नहीं हैं, तो इस प्र्श्न का ज़वाब देने में हमारे सूरमा बगलें झाँकते नज़र आयेंगे ।


@ माननीय अनुराग शर्मा जी :
चमत्कारों के सहारे चलने वाले इस देश में, जहाँ नित एक नये भगवान पैदा होते हों.. बाबा द्वारा मास हिस्टीरिया पैदा कर देना अनोखा नहीं है । हमारे बीच से भी भगवान पैदा होते हैं, और... वह सड़क किनारे पीपल के तने के सहारे टिक कर परित्राणां साधुनाम में व्यस्त हो जाते हैं ।

shilpa mehta said...

सतीश जी - बहुत अच्छी पोस्ट | यही कहना चाहूंगी - कि यह दुनिया ब्लेक एंड व्हाईट नहीं है - सब कुछ ग्रे है यहाँ | तो आपकी और मेरी चोइस सही और गलत के बीच नहीं - बल्कि - कम और अधिक गलत में है | और जो टिकट की बात है - तो यदि देश हित के लिए लड़ना है - तो लड़ाई बिना पैसे और पावर के हो नहीं सकती | क्या बुरा है यदि लाखों की इनकम वाले लोग ५ हज़ार का टिकट ले रहे हैं? क्या पीछे बैठने वालों को योग सीखने नहीं मिल रहा? टी वी तो पीछे तक होते ही हैं ना?
मैं नहीं कह रही कि बाबा रामदेव ईमानदार हैं या नहीं - ना कि दिग्गी जी बेईमान हैं या नहीं | मैं यह कह रही हूँ कि यदि आपको सिस्टम से लड़ना है -तो पैसे की ताकत भी चाहिए और इतनी नेम और फेम भी कि लोग ध्यान दें जब आप अनशन पर बैठें | नहीं तो कई जन साधारण सार्वजनिक स्थलों पर आत्मदाह भी कर लेते हैं और कई घर में छुप कर आत्महत्या - पर ना सरकार के कान पर जून रेंगती है - और माफ़ कीजियेगा - ना ही मेरी और आपकी तरह अपने घर में या ऑफिस में पंखे के नीचे बैठ कंप्यूटर पर ब्लॉग टाइप करने वालों के कान पर | हम कुछ पल को वह न्यूज़ सुन कर डिस्टर्ब होते हैं ज़रूर - फिर अगले दिन किसी ब्लॉग पर कोई रोमांटिक कहानी पढ़ वाह वाह करते भूल जाते हैं उस दर्द को | तो यदि ध्यान खींचना है समाज का - तो पैसा और ड्रामा - दोनों ज़रूरी हैं |

Poorviya said...

sarkar ke pass jo power thee wah sarkar ne dikha dee.murda aur sota huya aadmi ek samaan hota hai yeh sab usi tarha huya hai...

yahi baba kal ko bhagawa atankwadi hojye aur sarkar ke kuch numindo ko agwa kar le to yahi sarkar uske samne ghutne takteti najar aayegee ....

aur aap jaise logo ka kahana hoga ki baba ne galat kiya ....

jai baba banaras...

नीरज गोस्वामी said...

सतीश जी सबसे पहले तो बेहद साफगोई से अपनी बात रखने के लिए बधाई...जो हुआ बुरा हुआ...कम से कम निहथ्थे निर्दोष लोगों को रात गए मार पीट कर भगाने का काम गलत नहीं बहुत गलत हुआ...दो पाटों के बीच हमेशा निर्दोष निर्मल आम इंसान ही पिसता है...इतिहास गवाह है पिटाई हमेशा निर्दोषों की ही होती आई है...आम इंसान हमेशा इस्तेमाल होता आया है और होता रहेगा क्यूँ की उसकी अपनी कोई पहचान नहीं है और वो हमेशा एक मसीहा चाहता है जिसके पीछे चल कर वो अपने ख्वाब पूरे होते देख सके जिनके हकीकत में बदलने के सब्ज़ बाग़ दिखाए जाते हैं...बाबा फिर से अपने आश्रम में हैं, सरकार अपने बंद कमरों में और पुलिस थाने में लेकिन आम इंसान अपने लुटे पिटे शरीर और दिल के साथ कल भी सड़क पे था आज भी है...

नीरज

रंजना said...

बाबा की राजनितिक महत्वकांक्षाएं हैं, बाबा बडबोले हैं,इससे इनकार नहीं किया जा सकता...

लेकिन फिर भी यही प्रश्न की आज के दिन में बाबा या अन्ना ग्रुप जो प्रश्न उठाते हैं, और जिस तरह उसे व्यापकता देते हैं, क्या वे हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं ????

चलिए इस विषय पर बहुत बात हो रही है,इसलिए अधिक क्या कहना...मैं बात करती हूँ उस विषय पर जो आपकी ही तरह कभी मुझे भी बहुत नागवार गुजरता था...

वही पहली पंक्ति में पांच हजार रूपये की फीस वाली...

इधर कुछ समय पहले ऐसा अवसर आया की स्वतः ही इसका समाधान मुझे मिल गया...

आपको तो पता ही होगा की गाँव, कस्बे और शहरों में बाबा के अनेक चिकित्सा सेंटर हैं...कभी आप गए हैं वहां ?

वहां डाक्टरी परामर्श के लिए कोई फीस नहीं देनी पड़ती,जबकि डाक्टरों को नियमित वेतन तराशत द्वारा मिलता है...दवाइयों के दाम उस बीमारी से सम्बंधित किसी भी एलोपैथ या होम्योपैथ की दवाइयों से कभी कभी तो पचास प्रतिशत या उससे भी कम होती है...

तेरह वर्ष तक मैं एक गंभीर रोग से ग्रसित थी..लाखों की अंगरेजी दवा खाई और अंत में थक हारकर किसी के जबरदस्ती खींचने पर बेमन से इनकी दवाइयां खरीदी और खाई...मात्र चार महीने में मेरा रोग समूल समाप्त हो गया...इनकी दवाओं के कितने असर कितने लोगों पर प्रत्यक्ष देखें हैं मैंने,क्या बताऊँ...

खैर, जहाँ कहीं भी इनके चिकित्सालय हैं, वहां एक समर्पित योग गुरु भी हैं,जिनसे यदि आप संपर्क करेंगे तो वे पूर्णतः निःशुल्क सप्ताह से लेकर दस या पंद्रह दिनों के लिए आपके घर आकर आपके रोग के अनुसार आपको आसन सिखायेंगे,आपके अभ्यास में योग, प्रकृति प्रेम ,मानवता और अध्यात्म को लायेंगे...लाभुक स्वयं सदस्यता ग्रहण कर इस प्रकार के शिविर पारिवारिक से लेकर सामूहिक स्तर तक जगह जगह शहर में करवाते रहते हैं...

जो सदस्य इन गतिविधयों में लगे रहते हैं,आश्रम द्वारा उन्हें पहले तो अच्छी तरह निःशुल्क ही ट्रेंड किया जाता है और फिर आमजन को योग से जोड़ने का संकल्प लिवा इन्हें स्थान स्थान पर नियुक्त कर दिया जाता है...

इस प्रकार के जितने भी गतिविधियाँ हैं,उसमे धन तो लगता ही है न...इस धन का मुख्य श्रोत वही अगली लाइनों में बैठे धनाढ्य हैं....तो क्या बुराई है इसमें ??

सतीश पंचम said...

रंजना जी,

अपने अनुभवों को बांटने के लिये बहुत बहुत आभार।

आज अरविंद जी के ब्लॉग पर मैंने बाबाओं के प्रति अपनी असहिष्णुता को बयां किया है, संभवत इन बातों को जान मेरी ओर से थोड़ी तल्खी कम हो ।

किंतु इतना तय है कि ज्यादातर बाबा-साबा ढकोसले वाले ही होते हैं। उनके प्रति मेरे मन में संभवतः असहिष्णुता सदा के लिये जम गई है। अपनी विश्वसनियता उन लोगों ने खो दी है। अब यह उन पर निर्भर है कि वे आम जनता के बीच विश्वसनीयता साबित करते हैं या वैसे ही रंगे सियार बने घूमते रहेंगे।

shilpa mehta said...

रंजना जी - एग्ज़ेक्ट्ली यही मैं भी कहना चाहती हूँ - यदि काम करना है - तो धन तो लगता ही है | गलत तब है - जब इंसान अपने पर्सनल फायदे के लिए धन एकत्र करे - वह भी गलत तरीके से | - जो धन को सिर्फ देश सेवा के माध्यम के रूप में एकत्र किया जा रहा है - वह भी पूरी ईमानदारी से मेहनत से -- तो इसमें क्या बुराई है ? यह जो लोग कह रहे हैं कि वे पैसा लेते हैं ,पैसा लेते हैं,पैसा लेते हैं - इन कमेंटर्स मे से कौन - कोई एक भी हो - है जो बिना सैलरी के - सिर्फ सेवा के लिए नौकरी या बिजनेस या कोई और उद्योग कर रहा है - एक भी व्यक्ति है ऐसा - प्लीज़ कहे ...? बाबा तो फिर भी खुद के नाम पर कुछ भी नहीं रख रहे - सब कुछ त्रस्त के नाम पर है

शोभना चौरे said...

कहा ही पढ़ा था ,"युद्ध कोई भी जीते हार तो सैनिको की ही होती है "
कल की घटना को देखकर बार बार मन में यही ख्याल आता है बाबा और सरकार के बिच की सेतु (जनता )कहा जाये ?

प्रवीण पाण्डेय said...

क्या थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

इस प्रकरण पर आपका नजरिया व्‍यवहारिकता के धरातल पर देखकर प्रसन्‍नता हुई।

---------
बाबूजी, न लो इतने मज़े...
भ्रष्‍टाचार के इस सवाल की उपेक्षा क्‍यों?

Vivek Jain said...

बढ़िया,

रात के अंधेरे मे पुलिसिया कार्यवाही से असहमति! लेकिन दिन के उजाले मे क्या बाबा अनशन समाप्त करने मान जाते ?
क्या भीड़/भीड़तंत्र ज्यादा बेकाबू नही हो जाता ?
योग केन्द्र के बहाने ५००० लोगो की भीड़ जुटाने की अनुमति लेकर अनशन करना और लाखों लोगो को जमा करने को क्या कहेंगे ?
अनशन भी ऐसा जिसके शुरू होने से पहले ही खत्म करने का समझौता किया हुआ हो!
बाबा की मांगे:
१. काला धन वापिस लाया जाये/राष्ट्रीय संपत्ती घोषीत किया जाये! कैसे ? संसद मे कानून पास कर या लाल किले से घोषणा कर ! क्या होगा ? पैसा वापिस आयेगा ? स्वीटजर लैण्ड पर हमला कर! या उसके साथ व्यापार बण्द कर (कितना है?)? आपके पास काले धन के क्या सबूत है? क्या लोगो की सूची है ?
२. बड़े नोट बद किये जाये ? सब्जी लेने झोले मे नोट लेकर जाये और जेब मे सब्जी लायी जाये!
३. एम एन सी बंद हो ! टाटा, विडीयोकान जैसी कंपनी का क्या होगा। वैसे बाबा का फोन, गाड़ी, एसी कौनसी भारतीय कंपनी बनाती है।
४. अंग्रेजी मे शिक्षा बंद हो, माफ किजीये, मेरी नौकरी और मेरे जैसे लाखो लोगो की नौकरी इसी अंग्रेजी शिक्षा के भरोसे है।
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Khushdeep Sehgal said...

सरकार बहुत फिज़ूल की बात हो गई है...

देश में सरकार होनी ही नहीं चाहिए...

बाबों का मार्गदर्शक मंडल देश को चलाए, राम-राज्य आने की गारंटी है...

जय हिंद...

निर्मला कपिला said...

बिलकुल सही कहा। खुश्दीप ने भी सही कहा लेकिन एक सरकार जो लोगों दुआरा चुनी गयी है उसका चलना भी लोकतन्त्र है लेकि9न बाबा लोग केवल और केवल अपनी महत्वाकाँ़अ को छद्द्मभेस मे भुनाने के लिये लगे हैं। लोगों से योग के नाम पर धन इकठा कर उन पर ही लगाना चाहिये अपनी दवायें सस्ती बेचनी चाहिये न कि पार्टिओं को चन्दे के रूप मे बाँटें और सिआसत करने मे लगायें बाबा चाहते हैं कि जैसे मै चाहता हूँ पूरा देश वैसे य्ही चले। क्या फर्क पडेगा अब ईतालियन रिमोट से देश चलता है फिर नेपाली रिमोट से चलेगा। बाबा का सच देख कर भी लोग आँखें मूँदे रहें तो देश का दुर्भाग्य ही है। लेकिन आँखें केवल कुछ सरकार की विरोधी पार्टियों ने ही मूँद रखी हैं अब जनता को अधिक देर मूर्ख नही बनाया जा सकता है। सरकार ने जल्दबाजी करके गलती की लेकिन बाबा के सच को सब के सामने लाना भी जरूरी हो गया था। असली चेहरा तो अब सामने आया जब अपनी फौज बनाने का भाषण दे दिया। वो क्या इस देश को आतंकवादियों का देश बनाना चाहते हैं? सिर्फ सरकार से अपनी खुन्दक निकालने के लिये पूरे देश को आग मे झोंकने जा रहे हैं।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.