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Saturday, June 18, 2011

तीन ठरकी बूढ़े.....उनकी रंगीनमिजाजी.......यानि कि...... शौकीन (1982)

     बासु चटर्जी की कुछ फिल्में बड़ा अलहदा विषय लेकर बनी हैं जिनके बारे में अक्सर समीक्षकों और फिल्म प्रशंसकों के बीच चर्चा रही है। ऐसी ही एक फिल्म थी 1982 में बनी 'शौकीन' जिसके मुख्य किरदार थे अशोक कुमार, उत्पल दत्त, ए.के.हंगल। इन तीनों ने इस फिल्म में तीन 'ठरकी' बूढ़ों की भूमिका निभाई है जो कि थोड़े रंगीन मिजाज के हैं। आज सुबह यही फिल्म डीवीडी पर देख रहा था।


      समरेश बसु के द्वारा लिखी कहानी पर बनी इस फिल्म का कथानक कुछ यूं है कि तीनों मित्रों में से साठ वर्षीय ओम प्रकाश चौधरी ( अशोक कुमार) कांट्रेक्टर का काम करते हैं और अपनी इस साठ साल की उम्र में खिड़की पर खड़े होकर आती जाती महिलाओं को चश्मा बदल बदल कर निहारा करते हैं। एक दूर का चश्मा, एक नजदीक का। इत्र फुलेल का शौक तो खैर है ही। डॉ. भास्कर के अनुसार उन्हें सिगरेट और शराब से दूर रहना चाहिये। लेकिन अपनी पत्नी और डॉक्टर के समझाने के बावजूद वह यदा कदा अपने सिगरेट और शराब के शौक को अपने दोस्तों जगदीश (उत्पल दत्त) और इंद्रसेन (ए के हंगल) के साथ पूरे करते रहते हैं।


      उनके दोस्त भी कम नहीं हैं। जगदीश और इंद्रसेन दोनों ही की पत्नियों का निधन हो चुका है। जगदीश जिनके कई घर किराये पर चलते हैं अक्सर अनुराधा नाम की एक नि:संतान विधवा की ओर लपलपाये दिखाई देते हैं। एक तारीख के आने के पहले ही खुद को खूब सजाने संवारने में जुट जाते हैं, हिम्मत बंधाते हैं लेकिन जैसे ही एक तारीख आती है वह हर महीने की तरह इस महीने भी अनुराधा के यहां जाने पर एक कप चाय पीते हैं, रूपये लेते हैं और रसीद थमा देते हैं। हां, इतनी कोशिस जरूर करते हैं कि रूपये लेते समय और रसीद देते समय उंगलियां अनुराधा के हाथों को स्पर्श कर जांय। उनकी यह कोशिश भी कभी कभी नाकाम हो जाती है जब अनुराधा रसीद लेते वक्त चुटकी से रसीद यूं पकड़ती है जैसे उसके हाथ गीले हों, कहीं छू न जाय। ऐसे में जगदीश महाशय कट कर रह जाते हैं।

     दूसरी ओर उनके दूसरे मित्र इंद्रसेन जो कि खुद को एंडरसन कहलाना पसंद करते हैं और उसी तरह अंग्रेजी वेशभूषा में रहते हैं अक्सर अपनी सेक्रेटरी से फ्लर्ट करने की कोशिश में नजर आते हैं। फिल्म देखने जाने पर सेक्रेटरी के हाथों को कुर्सी के हत्थे के जरिये छूने की कोशिश करते हैं लेकिन ज्यादा कुछ सफल नहीं हो पाते।

          ऐसे में ही एक दिन ओमप्रकाश चौधरी (अशोक कुमार) की पत्नी तीर्थ यात्रा पर जाती है। दस बारह दिन के लिये चौधरी को मुक्ति मिल जाती है। ऐसे में एक शाम तीनों ही दोस्त शराब पी रहे होते हैं और एक दूसरे को अनुराधा और सेक्रेटरी लाली की बात उभार कर छेड़ रहे होते हैं कि तभी अशोक कुमार अपने एक अनुभव को शेयर करते हुए कहते हैं कि जब वह एक बार नासिक के डाक बंगले में ठहरे थे तो चौकीदार को किसी मालिश आदि का इंतजाम करने को कहा क्योंकि बिना मालिश के उन्हें नींद नहीं आ रही थी। चौकीदार ने कुछ गलत समझा और एक स्थानीय युवती को भेज दिया। अब अशोक कुमार असमंजस में पड़ गये। कभी इस तरह का कोई अनैतिक काम किये नहीं, आगे हिम्मत हो नहीं रही सो किसी तरह उस युवती को पैसे आदि देकर टरकाया।

   जब अशोक कुमार यह बात बता रहे थे तो दोनों मित्र बड़े ध्यान से सुन रहे थे। इसी बीच जगदीश की अकुलाहट देखते बन रही थी। फिर क्या हुआ फिर क्या हुआ वाला भाव था उत्पल दत्त के चेहरे पर। उदर ए के हंगल भी कुछ उसी मूड में आ गये और तीनों ने तय किया कि शहर से बाहर चल कर कुछ दिन ऐश किया जाय। अशोक कुमार ने भी हामी भरी। लेकिन जगदीश (उत्पल दत्त ) की जिद थी कि उसी नासिक वाले डाक बंगले में चलो, अनुराधा न सही....कुछ तो मिलेगा। लेकिन अशोक कुमार के यह कहने पर कि काफी पुरानी बात है ये अब वह लड़की वहां होगी भी या नहीं, कहीं और चला जाय। इस बीच गाड़ी के लिये ड्राईवर की जरूरत होती है, ऐसा ड्राईवर जो इन तीनों ठरकी लोगों की पोल न खोले। इसलिये नया ड्राईवर रखा जाता है जिसकी कि भूमिका मिथुन चक्रवर्ती ने निभाई है।

        मिथुन का कथानक कुछ ऐसा है कि उसकी गर्लफ्रेण्ड गोवा में एक होटल में गाना गाती है और वह खुद बेरोजगार होकर बंबई में पड़ा है। पंदरह दिन बाद उसका इंटरव्यू है और तब तक उसे कोई काम नहीं होता। ऐसे में कुछ दिनों के लिये मिथुन चक्रवर्ती ड्राईवर बनने के लिये तैयार हो जाते हैं। इधर तीनों ही दोस्तों में तय नहीं होता कि कहां के लिये आउटिंग की जाय। कोई अजंता एलोरा कहता है तो कोई माउंट आबू। उत्पल दत्त भड़क जाते हैं कि हम क्या विदेशी हैं जो इस तरह के जगहों पर जांय। चलना है तो उसी नासिक वाली जगह पर चलो। तभी मिथुन चक्रवर्ती (ड्राईवर सखाराम) चालाकी से सलाह देता हैं कि क्यों न आप लोग गोवा घूम लें। और सभी लोग उसकी बात मान गोवा चलने को तैयार हो जाते हैं। सखाराम भी खुश कि इसी बहाने अपनी गर्ल फ्रेण्ड से मुलाकात भी हो जायगी। आठ दस दिन साथ रहेगा सो अलग।

        लेकिन यहां कहानी ट्वीस्ट हो जाती है। सखाराम अपनी गर्लफ्रेण्ड अनीता (रति अग्निहोत्री) से इन तीनों को मिलवाता है, रहने का ठिकाना सखाराम अपनी गर्लफ्रेण्ड अनीता के पास वाले बंगले में ठीक करता है लेकिन ये तीनों बूढ़े उस अनीता पर ही नजरें गड़ा देते हैं। अनीता से तीनों नजदीकी बढ़ाते हैं। उधर अनीता इन नजदीकियों के चलते अपने प्रेमी सखाराम से मिलने का बहाना सोच इन बूढ़ो को थोड़ा सा फ्रैण्डली लुक देती है लेकिन ये बूढ़े उसे कुछ और समझ अपनी प्यास मिटाने का साधन मानने लगते हैं। रसोई का काम अनीता के जिम्मे होता है। इसलिये तय होता है एक दिन दोपहर में अशोक कुमार रूकें और बाकी दोस्त बाहर सखाराम को लेकर घूमते रहें। इस बीच अशोक कुमार मौका तलाशें और अपना उद्देश्य पूरा करें।

       इस उद्देश्य से एक दिन उत्पल दत्त और ए के हंगल सखाराम को ले बाहर जाते हैं और अनीता के साथ घर में केवल अशोक कुमार रहते है। पांच छह घंटों के इस सानिध्य के दौरान अशोक कुमार विभिन्न प्रकार के विचारों से दो चार होते हैं। कभी अपनी पत्नी का भय तो कभी बदनामी का डर तो कभी कुछ। इस बीच अनिता के साथ थोड़ी वाईन आदि पीकर पियानो बजाकर पांच छह घंटे गुजार देते हैं। उधर सखाराम के साथ लौट कर आये उत्पल दत्त और ए के हंगल बार बार पूछते हैं कि क्या क्या हुआ...कैसे हुआ। अशोक कुमार शेखी मारते हुए हंसते हुए अपनी सफलता की बात कहते हैं और दोनों मित्र अशोक कुमार के अनुभव सुनाने के बाद अनीता के साथ अपने भावी आनंदमय क्षणों के बारे में सोच -सोच रोमांचित होते हैं। अगले दिन उत्पल दत्त घर पर रूकते हैं और ए के हंगल और अशोक कुमार बाहर सखाराम के साथ जाते हैं। सखाराम को बुरा लगता है कि ये क्या बेहूदगी है। लेकिन क्या करे, नौकरी तो बजानी थी। सो दोनों को बाहर ले जाता है।

      इधर घर में उत्पल दत्त बीड़ी न जलाकर सिगरेट जलाते हुए प्रभाव जमाना चाहते हैं, अनीता के निकट जाना चाहते हैं लेकिन अनीता नींद का बहाना कर अपने कमरे में सोने चली जाती है। उत्पल दत्त उसके कमरे में जाकर असमंजस में हैं कि अब क्या करे। सीगरेट बुझने पर बीड़ी जला लेते हैं, थोड़ी चहलकदमी करते हैं और ऐसे ही पांच छह घंटे बीत जाते हैं। दोनो मित्रों के वापस आने पर शेखी मारते हैं कि वह जो चाहते हैं सब मिला। आनंद आया वगैरह वगैरह।

          अगले दिन ए के हंगल की बारी होती है। वह भी कुछ इसी तरह के दौर से गुजरते हैं। पांच छह घंटे शराब पीने में गुजार देते हैं। दोनों मित्रों के वापस आने पर जब पूछा जाता है कि क्या कैसे तो ए के हंगल सच बोल देते हैं कि कहीं कुछ नहीं हुआ। पांच छह घंटे शराब पीते और सोते हुए बीता है। ए के हंगल की सच्चाई के बाद अशोक कुमार भी अपनी सच्चाई बताते हैं कि वह भी उस दिन कुछ नहीं किये थे केवल शराब पीने में और बातों बातों में ही समय बिताया था। उत्पल दत्त ने भी सच उगल दिया। लेकिन उन तीनों को शक होता है कि सखाराम कहीं हम लोगों को जान बूझकर तो नहीं ले आया यहां और अनीता के साथ फोटो खिंचकर ब्लैकमेल करने का इरादा तो नहीं। आशंका घर कर जाती है और बातचीत में ही पोल खुलती है कि सखाराम दरअसल रवि है और उसकी गर्लफ्रेण्ड अनीता के साथ नजदीक रहने के लिये उसने गोवा का प्लान बनाया था। ब्लैकमेल करने का उसका कोई इरादा नहीं था।

          सच्चाई जान तीनों बूढ़े अपने गलती का एहसास करते हैं। अशोक कुमार के जरिये फिल्म में यह संदेश भी कहलवाया गया है कि जवानी सिर्फ जवानों के लिये होती है और उसे बूढ़ों को अपनी फैंटसी के लिये इस्तेमाल नहीं करना चाहिये। हर उम्र की अपनी गरिमा होती है। फिल्म का अंत सुखांत है।

         फिल्म के कुछ दृश्य वयस्कों के लिये ही उपयुक्त हैं, साहित्यकार 'शानी' द्वारा लिखे संवाद भी कमोबेश कुछ असहजता उत्पन्न करते हैं, विषय ही ऐसा है। एक दृश्य ऐसा है जिसमें अशोक कुमार लुन्गी पहने हुए समुद्र के किनारे हैं और अनीता जिद करती है कि लुंगी उतारकर पानी में उतरिये लेकिन अशोक कुमार मना कर देते हैं क्योंकि उन्होंने लुंगी के भीतर कुछ नहीं पहना है। ऐसे में एक दिन अनीता अशोक कुमार के लिये चड्ढी लेकर आती है और उनसे जिद करती है कि इसे पहनो। उधर उत्पल दत्त धोती पहने हुए समुद्र के पानी में उछल कूद मचाये रहते हैं।

          इस फिल्म को बच्चों के सामने देखने पर थोड़ी असहजता होना लाजिमी है, इसलिये हो सके तो उनके सामने देखने से बचें। वैसे इस फिल्म का वो गीत काफी कर्णप्रिय है जो कि पूरी फिल्म में कई बार अशोक कुमार के लिये बजा है जब वह चश्मा बदल बदल कर युवतियों को निहारते हैं.... बोल हैं -


जब भी कोई कंगना बोले,
पायल छनक जाये
सोयी सोयी दिल की धड़कन
सुलग सुलग जाये
जब भी कोई कंगना बोले,


चंदा को चकोर निहारे
इसी में सुख पाये रे पाये
इसी में सुख पाये
जीवन से ये रस का बंधन
तोड़ा नहीं जाये
जब भी कोई कंगना बोले

  ----------------------------------------


- सतीश पंचम

12 comments:

Rahul Singh said...

फिल्‍म के सभी मुख्‍य दृश्‍य याद आ गए.

Arvind Mishra said...

अविस्मरनीय फिल्म के दृश्यों को आपने और भी तरोताजा कर दिया ...
अपने समय के मुताबिक़ एक बोल्ड यथार्थ वादी फिल्म थी यह

Udan Tashtari said...

याद हो आई पूरी फिल्म दृश्य ब दृश्य!!

rashmi ravija said...

ये फिल्म तो नही देखी...पढ़ा बहुत है...इस फिल्म के बारे में..

आपके दिन तो अभी दूर हैं...पर लगता है...काफी एन्जॉय किया है इस फिल्म को...:)

Ruchika Sharma said...
This comment has been removed by the author.
Ruchika Sharma said...

मैंने फिल्‍म तो नहीं देखी....पर आपकी पोस्‍ट पढ़ने के बाद जरूर देखनी पड़ेगी

हंसी के फव्‍वारे में- हाय ये इम्‍तहान

मनोज कुमार said...

फ़िल्म के कई दृश्य याद आ गए।

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी पसन्द आयी थी यह फिल्म।

Khushdeep Sehgal said...

शौकीन फिल्म में अशोक कुमार और उत्पल दत्त जैसे दिग्गजों की मौजूदगी के बावजूद सबसे ज़्यादा प्रभावित ए के हंगल के स्वाभाविक अभिनय ने किया था...

इस फिल्म के बैकग्राउंड में किशोर कुमार की आवाज़ में चलता रहने वाला गाना मुझे बहुत पसंद है...

जब भी कोई कंगना बोले, पायल छनक जाए...

जय हिंद...

ajit gupta said...

कोई एक फिल्‍म तो ऐसी निकली जो रश्मि रविजा ने नहीं देखी, बड़ा आनन्‍द आ रहा है। क्‍योंकि यह‍ फिल्‍म हमने देखी थी हा हा हाहा। आज लग रहा है कि हम भी कुछ जानकार हैं। फिल्‍म के सारे ही दृश्‍य पुन: आँखों के सामने आ गए, बहुत मस्‍त फिल्‍म थी। जब भी कोई कंगना बोले वाला गीत भी बहुत अच्‍छा लग रहा था, फिल्‍म में।

Kajal Kumar said...

:)

Leela Dhar said...

Dear Friend,

Really a good moovie

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