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Monday, May 2, 2011

पैठ बनाने की हसरतें v /s इस्तेमाल होते ब्लॉगर

        अक्सर देखा गया है कि लोगों की फितरत होती है किसी के लिये भी चाहे-अनचाहे जी हजूरी करने की या कहें कि हीही फीफी करते समय बिताने की । यह फितरत कई बार इतना ज्यादा उनके व्यवहार में घुल मिल जाती है कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि वह कोई ऐसी वैसी हरकत कर रहे हैं जिसे अमूमन जी-हजूरी की संज्ञा दी जाती है। मुसीबत ये कि लोगों की इसी फितरत को पहचान जुगाडु प्रवृत्ति के लोग अपनी सामाजिक पैठ बनाने में उनका इस्तेमाल करना चाहते हैं और बखूबी इस्तेमाल करते भी हैं।

      अभी हाल ही में दिल्ली वाले कार्यक्रम को लेकर जिस तरह की हाय तौबा मची है उसी को देखा जाय तो यह स्पष्ट हो जायगा कि कैसे कुछ लोगों द्वारा अपना रूतबा बढ़ाने, प्रभाव जमाने जैसी अभिलाषा के चलते ब्लॉगरों का इस्तेमाल किया गया,  कैसे लोगों की निजी महत्वाकांक्षा की खुराक बनने हेतु ब्लॉगर यूटिलाइज किये गये, कैसे चाटुकारिता के आभा मंडल के चलते खुशदीप जैसे ब्लॉगर को आहत हो गुड बाय पोस्ट लिखने की नौबत आन पड़ी। खैर, ये 'टंकी-युग' चलता आया है, चलता रहेगा। कईयों को आहत (? ) हो टंकी पर चढ़ते देखा है और कइयों को उतरते। वह अलग विषय है, फिर कभी।

   फिलहाल तो यहां मेरा मानना है कि क्या जरूरी है कि हम किसी के प्रभामण्डल में शामिल हो उसी के हिसाब से अपनी गतिविधियां संचालित करें, उसी के घेरे चक्रव्यूह में चाहे अनचाहे ब्लाइण्ड फॉलोअर बनते रहें ?  क्या यह हमारी गुलाम मानसिकता का प्रतीक नहीं है कि हम ब्लॉगर जैसे स्वतंत्र प्लेटफार्म मिलने के बावजूद अपनी मानसिकता एक किस्म की जी-हजूरी की ओर झुकाये रखते हैं। अरे कभी तो अपने आप को स्वतंत्र रहकर सोचो यार , कि जरूरी है 'गुलाम तासीर' को खुराक पहुंचाई ही जाय।

    जब भूसे की तरह पुरस्कार घोषित किये जा रहे थे तभी लोगों को शक हुआ था कि ये पुरस्कार है या घेटो क्रियेशन।  और लोग थे कि गदगद ..... कि हमें पुरस्कार मिला.....।  भूल गये कि इसकी तह में एक सड़ांध है जो गाहे-बगाहे किन्हीं बंदों की सामाजिक पैठ बनाने हेतु दिमागी खुराक है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।  ऐसे बंदे जानते हैं कि लोगों का कैसे इस्तेमाल करना चाहिये, मजमा कैसे जुटाना चाहिये और उस जुटे मजमे को कैसे अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हुए पैठ बनाना चाहिये।  दिल्ली प्रकरण उसी की एक मिसाल है।

  यहां सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों लोग अपने आपको किसी के लिये इस्तेमाल होने देते हैं, क्यों अपने आप को एक स्वतंत्र इकाई मानने से बचते हैं। माना कि लोग समूह में रहते हैं, समूह में सोचते हैं, एक तरह से सोशल एनिमल हैं, बावजूद क्या जरूरी है कि अपने सोशल स्टेटस को ही ताक पर रख दें। वही सोचें जो हमें दूसरे सोचने को कहें, वही करें जो हमें दूसरे करने को उकसायें....ये कहां की बुद्धिमानी है। पुरस्कार आदि बांट कर जो लोग ब्लॉगरों के धड़े को अपना मान खुश हो रहे थे तो यह उनकी बहादुरी नहीं, यह ब्लॉगरों की कमजोरी थी जो कि बिना किसी विचार-मनन के भूसे की तरह बंटते पुरस्कारों पर इतराते रहे, आत्ममुग्ध रहे। शायद यह आत्ममुग्धता उनकी नियति थी, है  और आगे भी रहेगी........ और तब तक रहेगी जब लोग अपने आपको गुलाम मानसिकता से ढंके रहेंगे, स्वतंत्र सोचने विचारने के प्लेटफार्म पर भी समूहन को न्योतेंगे।

      वैसे, इस पुरस्कार वितरण-ग्रहण आदि के बारे में कुछ लोग चाहे जितना भ्रम पालें कि जब कोई पुरस्कार 'कह कर' दे रहा हो तो कोई कैसे इन्कार करे, आखिर कुछ सोच कर ही तो दे पुरस्कार दे रहा था, लेकिन लोग अंदर से जानते हैं कि इस तरह के भूसैले पुरस्कारों की क्या अहमियत है। वह यह भी खूब समझते हैं कि इन सब में उसकी वाकई कोई सार्थक भूमिका है या महज किसी की महत्वाकांक्षा पूर्ति हेतु खुराक बना हुआ है।

 और अंत में,

          कहा जा रहा है कि लोग अपनी विनम्रता के चलते इस कार्यक्रम में उपस्थित हुए, भ्रष्टाचार के आरोपी से पुरस्कृत हुए, हंसे-मुस्कराये...ब्ला...ब्ला किये....। लेकिन इसी विनम्रता को लेकर मेरा मानना है कि आप भले ही सौ में से निन्यानबे प्रतिशत विनम्र बने रहिये, अपने बात व्यवहार में विनम्रता का पैमाना निन्यानबे प्रतिशत बनाये रखिये, लेकिन अपने आप में एक पर्सेंट का दम्भ जरूर रखिये क्योंकि यह एक पर्सेंट का दम्भ ही है जो आपके उस निन्यानबे प्रतिशत की दशा और दिशा निर्धारित करता है। कल को यह नहीं हो कि कोई भी ऐरा-गैरा आकर आपको अपने बात से प्रभावित कर अपना काम निकाल ले, सिर्फ इसलिये कि आप विनम्र स्वभाव के हैं....नहीं.....ऐसे समय उस एक पर्सेंट के दम्भ को आगे करिये और झटक दिजिए ऐसे तत्वों को जो आप का इस्तेमाल अपने लाभ के लिये, अपने जमावड़े के लिये करना चाहते हों।

 खैर, ब्लॉगिंग-फ्लॉगिंग को लेकर अभी न जाने कितने की-बोर्ड खटखटाये जायेंगे, किड़बिड़ाये जायेंगे.....लेकिन  जरूरत यही है कि इस स्वतंत्र प्लेटफार्म पर अपना स्वाभिमान बनाये रखा जाय, किसी के लिये खुद को इस्तेमाल न होने दिया जाय। जिन्हें इस तरह का शौक हो कि अपने आगे पीछे दो-चार 'चन्टू-बन्टू' लिये हुए विचरण करने का, तो उन्हें विचरने दिया जाय....शायद यही उनकी नियति है....ब्लॉगर क्यूं विचरे।   

   
- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां इस वक्त की-बोर्ड खटखटा रहा हूं।

समय -  सात-पांच 

41 comments:

Arvind Mishra said...

पहुंचे मुंबई और सल्कनते होते ही हाल चाल ले लिया दिल्ली के -
क्या खूब अपने संचार तंतुओं को सक्रिय रखते हैं आप!

संजय @ मो सम कौन ? said...

सतीश भाई, आज बसपाई रंग से दो सौ प्रतिशत सहमत।

Rahul Singh said...

एक-दूसरे के काम आना ही सामाजिकता है.

अरुण चन्द्र रॉय said...

बहुत सही कहा पंचम जी आपने...

ajit gupta said...

पंजीकृत और अधिकृत कार्यक्रमों और पुरस्‍कारों को ही स्‍वीकार करना चाहिए। आज जो सम्‍मानों की बन्‍दरबांट हो रही है उससे लेखन का ध्‍येय ही समाप्‍त हो जाता है।

प्रवीण पाण्डेय said...

सर्वे भवन्तु सुखिनः....

VICHAAR SHOONYA said...

सतीश जी कहा जा रहा है की पुण्य प्रसून महोदय ने दिल्ली वाले कार्यक्रम का बहिष्कार सिर्फ इसलिए किया क्योंकि वहां पर एक भ्रष्ट व्यक्ति पुरष्कार बात रहा था. कल मैं इन्ही पुण्य जी का ब्लॉग देख रहा था जिसमे इनकी तस्वीरें सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह के साथ हैं. अब बताइए सोनिया और मनमोहन से पुरस्कृत होते वक्त इनका भ्रष्टाचार विरोध तेल लेने चला गया क्या ?

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आप कुछ लिंक देते तो हम भी अपडेट हो लेते।
ठंडे पड़े हुए हैं वर्धा की गर्मी में चादर लपेटे। :)

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी की ई-मेल से प्राप्त टिप्पणी -

कल इस मुद्दे पर दो चिंतित ब्लॉगरों के फोन आये। मैंने कहा कि भाई जहाँ नेता, पत्रकार और ब्लॉगर तीनो इकठ्ठे हों वहाँ तो प्रलय हो जाना चाहिये। मामूली टुन्न फुन्न से ही मामला निपट जाना मिलावट को दर्शाता है । कोई चीज शुद्ध नहीं रही। इंसान जो मिलावटी तरकारियाँ खा रहे हैं, मिलावटी दूध पी रहे हैं और मिलावटी जी रहे हैं, मिलन में इतना कम घालमेल होना उसी का असर है।

मुझे बहुत दुख है कि तीनों जमात ने अपने लेवल का भी खयाल नहीं रखा, इतने में ही निपट निपटा गये। कितना स्टैंडर्ड डाउन हो गया है नेताओं का, पत्रकारों का, ब्लॉगरों का!

घोर कलऊ है भाई घोर कलियुग

Poorviya said...

घोर कलियुग hai ham jaise blogger ko to pata hi nahi tha ki waha kuch aur programme hai ham to baba ji ke sath blogger milan ke kiya gaye the ..

lakin waha to nazara hi kuch aur tha ......

bas yahi baat logo nahi pacha rahi hai...baki sabkuch theek tha....blogging ke naam par waha kuch nahi tha.....
jai baba banaras.............

दीपक बाबा said...

@मुसीबत ये कि लोगों की इसी फितरत को पहचान जुगाडु प्रवृत्ति के लोग अपनी सामाजिक पैठ बनाने में उनका इस्तेमाल करना चाहते हैं
@कुछ लोगों द्वारा अपना रूतबा बढ़ाने, प्रभाव जमाने जैसी अभिलाषा के चलते ब्लॉगरों का इस्तेमाल किया गया,

पता नहीं क्यों लगता है कि ब्लोगर्स को खाली कुर्सियां भरने के लिए ही बुलाया गया... ६० लोगो को पुरूस्कार दिया जाए तो कम से कम ६० तो आयेंगे....

रचना said...

एक प्रायोजित समाहरोह था जहां तालुकात बढ़ा कर अपने अपने काम सिद्ध किये जाते हैं , किताबो के लिये ग्रांट मिलती हैं , विश्विद्यालय जा कर पैसा ले कर भाषण देने का मौका मिलता हैं . जो लोग सरकारी नौकरी में हिंदी भाषा से जुड़े हैं उनको इसके जरिये तरक्की मिलती हैं .

किसी को पुरस्कार मिला किसी को नहीं मिला क्युकी वो उस नेट वर्क में शामिल नहीं था . जब जिसको मौका मिलता हैं वो अपने को शामिल करवा लेता हैं . आप के पोस्ट पर आये कमेन्ट मे से दो लोग ऐसे हैं जो "बड़े ब्लोगर" थे जब वर्धा मे सम्मलेन हुआ था . वो भी प्रायोजित सम्मलेन था . अगर उस सम्मलेन मे ये बड़े ब्लोगर थे तो अब जो सम्मलेन हुआ उस मे प्रायोजक को जो बड़े लगे उनको चुन लिया गया इस पर आपत्ति कोई ना ही दर्ज करे तो बेहतर क्युकी हर कोई लाइन लगाता हैं जहां से भी फ्री रेल का भाडा , चाय पानी का जुगाड़ होता हैं .
प्रसून को इतना महत्व क्यूँ , क्या योगदान हैं उनका ब्लॉग पर कितनी पोस्ट लिखी हैं . ब्लॉग मीडियम को हाइजैक करने का तरीका हैं और कुछ नहीं

नीरज बसलियाल said...

Mujhe koi award nahin mila :(

अतुल प्रकाश त्रिवेदी said...

" फिलहाल तो यहां मेरा मानना है कि क्या जरूरी है कि हम किसी के प्रभामण्डल में शामिल हो उसी के हिसाब से अपनी गतिविधियां संचालित करें, उसी के घेरे चक्रव्यूह में चाहे अनचाहे ब्लाइण्ड फॉलोअर बनते रहें ? क्या यह हमारी गुलाम मानसिकता का प्रतीक नहीं है कि हम ब्लॉगर जैसे स्वतंत्र प्लेटफार्म मिलने के बावजूद अपनी मानसिकता एक किस्म की जी-हजूरी की ओर झुकाये रखते हैं। अरे कभी तो अपने आप को स्वतंत्र रहकर सोचो यार , कि जरूरी है 'गुलाम तासीर' को खुराक पहुंचाई ही जाय।"

इन्हें पढ़कर दुष्यंत की एक पंक्ति याद आ गयी -
" जिस तरह चाहे बजा लो इस सभा में , हम नहीं हैं आदमी , हम झुनझुने हैं |"
आमीन !

रंजना said...

दिल्ली वाला कार्यक्रम ???

पूर्ण अनभिज्ञता..

सो क्या कहूँ ??

Shiv said...

ब्लागिंग करते हुए जिस मेन-स्ट्रीम मीडिया की ऐसी-तैसी करते रहते हैं उसी मीडिया में कोई लेख छप जाने से उसको स्कैन करके ब्लॉग पर चढ़ा लेते हैं और नीचे लिख देते हैं; "ढिमका दैनिक में छपा मेरा लेख. बड़ा करके पढ़ें के लिए क्लिक करें." उसी मीडिया के लिए पोस्ट तैयार करके लिख देते हैं; "अखबार वाले यह पोस्ट छप सकते हैं." उसी मीडिया से चाहते हैं कि वह ब्लॉगर सम्मलेन कवर करे. अपने ब्लॉग पर जिस नेता को गाली देते हैं उसी के हाथों पुरस्कार लेने के लिए लाइन में खड़े रहते हैं. जिस हिंदी साहित्य में राजनीति होने की बातें करते हैं उसी हिंदी साहित्य के साहित्यकारों से आशीर्वाद लेने के लिए घिघियाते रहते हैं.

मैं पूछता हूँ कि अगर वही सबकुछ करना है तो फिर उन्हें गरियाना ही क्यों? साल २००९ में रांची में एक तथाकथित ब्लॉगर सम्मलेन में चला गया था. वहां जाकर पता चला कि ब्लागरों का इस्तेमाल कई लोग कर रहे थे. दिल्ली की घटना आश्चर्यचकित नहीं करती. लेकिन क्या केवल उस मुख्यमंत्री का दोष है? क्या केवल उस पब्लिकेशन का दोष है?

सतीश पंचम said...

@ शिव जी,

क्या केवल उस मुख्यमंत्री का दोष है? क्या केवल उस पब्लिकेशन का दोष है?
------------

इस प्रकरण में वो मुख्यमंत्री और पब्लिकेशन उतने दोषी नहीं हैं जितने कि हमारे ही बीच के तथाकथित इतिहास लिखने वाले, और तथाकथित व्यंग लिखने वाले जुगाडु ब्लॉगर।

उस मुख्यमंत्री और उस पब्लिकेशन को तो अपना काम निकालना था और उसी तरह इन जुगाडुओं को अपनी पैठ बनानी थी .....दोनों के बीच सिम्बायोटिक रिलेशन बनना स्वाभाविक था। इस चक्कर में इस्तेमाल हुए ब्लॉगर जिन्हें कि पता ही नहीं चला कि पर्दे के पीछे क्या खेल खेला जा रहा है।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

आदरणीय सतीश जी, मुझे नहीं लगता कि ब्लागर्स किसी सम्मान के लिये लिखते हैं. और फिर इसे हम सम्मान के स्थान पर प्रोत्साहन जैसा क्यों न माने. ठीक है, देने वाले जिसे उचित समझ रहे हैं दे रहे हैं. अब मैं एक अलग नाम से लिख रहा हूं, ऐसा नहीं है कि यदि मेरा नाम कहीं आये तो मुझे अच्छा न लगे. प्रशंसा हर व्यक्ति को अच्छी लगती है और कहीं न कहीं व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देती है.
लेकिन इस सब को लेकर क्यों हम बिना मतलब के सर दर्द को मोल लें. जिसे मिला, अच्छा है, न मिले तब भी अच्छा मानिये. जाना अच्छा लगे जाइये, न अच्छा लगे न जाइये.
मेरा मानना तो यह है कि आप स्वान्त: सुखाय लिखते हैं और ब्लागिंग या अन्य कोई माध्यम स्वान्त: सुखाय ही है, तो आपको इन चीजों को दिल पर नहीं लेना चाहिये. और यही विनती खुशदीप जी से की है. किस ब्लागर को कौन मुख्यमन्त्री क्या दे देगा, और कितनों को दे देगा. इसलिये खुशदीप जी से फिर प्रार्थना है कि लिखना न छोड़ें...

अजय कुमार झा said...

बहुत खूब ..वाह क्या लिखा आपने और क्या खूब टिप्पणियां दी हैं मित्र ब्लॉगरों नें ( हो सकता है कि कई ब्लॉगरों को मित्र कहने पर भी आपत्ति हो ) , लेकिन खैर ., कमाल तो ये है कि यहां कुछ उन ब्लॉगर की टीप भी आपके सुर में सुर मिलाती नज़र आई जिन्होंने खुद ही पोस्ट लिखकर इस समारोह के बाबत और उसके आयोजकों के बाबत कुछ अच्छा अच्छा लिख मारा था , चाहें तो टिप्पणीकर्ताओं की ताज़ी पोस्टें देख लें । और रही बात पुरस्कारों की , आयोजन की , उसमें शिरकत करने वाले ब्लॉगर्स की और आपके अनुसार यूज हो जाने वाले ब्लॉगर्स की ..कितने मासूम हैं न हमारे ब्लॉगर हर बार इस तरह के विवाद के बावजूद आने के बहाने तलाश ही लेते हैं , काश कि कोई कह पाता कि उसे हाईजैक करके ले आया गया उस कार्यक्रम में , वहां कोई सदमें में बैठा , या बहुत ही अप्रत्याशित दुखी नहीं मिला सभी मुस्काते मिले बेशक बाद में जाकर जी भर के गरिया सकने के लिए अपनी पोस्टों का सहारा लिया हो । ...जारी

अजय कुमार झा said...

अब बात घेटो बनने बनाने की ,,क्या ये भी अब बार बार बताना होगा कि घेटो की घटा कब कहां किनको बार बार दिखाई दे जाती है ..अफ़सोस तो ये है कि मेहमाननवाजी की बखिया उधेडने का मौका उन्हें नहीं मिल पाता जो खुद मेहमाननवाजी करते हैं ,,नहीं तो यही अविनाश वाचस्पति मुंबई में भी सभी ब्लॉगर्स के साथ बेंच कुर्सी पर मजे से सबसे मिल कर आ गए । .

अब पुरस्कारों की बात ....हिंदी ब्लॉगिंग में बहुत से महानुभाव तो ऐसे ही हैं जो खुद हिंदी ब्लॉगिंग में गले तक उतरे होने के बावजूद उसे बालटी भर भर के गलियाते हैं , उसकी सडांध की बू महसूस करते हैं मगर फ़िर भी बार बार सूंघते हैं , शायद ये देखने के लिए कि बू की मात्रा बढी या घटी है ..। सम्मान पाने वाले , सम्मान देने वाले सभी अयोग्य थे , शायद चाटुकार भी थे , और किसी ने तो कहा कि सेटिंग करके पैसे भी खिलाए थे ..लेकिन किसी ने भी ये नहीं बताया कि वो थे कौन चौंसठ में से दस बीस नाम तो यूं ही लिए जाने चाहिए थे आराम से ताकि आयोजकों को और सम्मान लेने वालों को भी कुछ तो अहसास होता अपनी गलती का और वे शायद आगे से योग्य होने की कोशिश करते ....जारी

अजय कुमार झा said...

चलिए फ़िर भी शुक्र है कि आपको और कुछ मित्र ब्लॉगरों को इस समारोह से जुडी सकारात्मक बातों ने न सही लेकिन नकारात्मक बातों ने इस बात के लिए प्रेरित किया ये भी कम बडी बात नहीं है आखिर विचारों के मंथन के लिए ही तो ब्लॉगिंग की जा रही है ।

हिंदी ब्लॉगिंग में इस तरह के विवाद इसके लिए हतोत्साहित करने वाले कदम साबित होंगे या कि उत्प्रेरक का काम करेंगे ये तो भविष्य ही तय करेगा लेकिन मैंने तो देखा है कि इसी खींच तान ने अब तक दो एग्रीगेटर को हिंदी ब्लॉगर्स से दूर कर दिया ....लेकिन ब्लॉगिग चलती रही है और चलती रहेगी । कुछ ज्यादा लिख गया हूं , मगर मुझे विश्वास है कि आपका स्नेह बना रहेगा

बी एस पाबला said...

कैसे कुछ लोगों द्वारा अपना रूतबा बढ़ाने, प्रभाव जमाने जैसी अभिलाषा के चलते ब्लॉगरों का इस्तेमाल किया गया

इसका सकारात्मक मतलब यह हुया कि अब ब्लॉगर भी कुछ माद्दा रखते हैं किसी का रूतबा बढाने में !?

चीयर्स

बी एस पाबला said...

बात स्वतन्त्र प्लेट फार्म की बार बार हुई है तो
यह भी बूझा जाना चाहिए
कि
ब्लॉगस्पॉट जैसे मुफ्त के प्लेटफार्म का उपयोग कर अपने आप को व्यंग्यकार, साहित्यकार, ब्लॉगर बताना
भ्रष्टाचार नहीं माना जाए
अनैतिकता ना मानी जाए
मुफ्तखोरी ना मानी जाए :-)

इससे यही माना नहीं जाए कि गूगल भी हमें 'यूज़' कर रहा है? विज्ञापनों के लिये खुद को इस्तेमाल न होने दिया जा रहा
आखिर क्यों वह इतनी 'सेवा' कर रहा है हम ब्लॉगरों की? लोग गदगद हैं कि गूगल हमारी कितनी चिंता करता है? क्यों लोग गूगल की गुलामी को स्वीकारते हुए उसके खजाने को भरने के लिए बेगारी किए जा रहे है उसका खजाना भरने के लिए

देखते है कितने लोग गूगल के छिपे एजेंडा को समझ कर ब्लॉगिंग छोड़ देंगे

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

झा जी, मित्र कहने के लिये धन्यवाद :) और आपको भी मजदूर दिवस की बीलेटिड बधाई... ;)

राज भाटिय़ा said...

हमे तो इस महा मिलन के बारे कुछ खास पता नही, ओर ना ही इच्छा हे, लेकिन जो कुछ भी पढने मै आया अभी तक अलग अलग ब्लाग पर उस से एहसास हुआ कि कही कोई गडबड रही हे, ओर हम सब को बचना चाहिये ऎसी गडबड से, मिलन हो तो यादगार हो हम उसे याद रखे ओर इंतजार करे कब अगला मिलन हो.... सब को समान सम्मान मिले. आगे राम जाने, आप ने बहुत सुंदर लिखा धन्यवाद

सतीश पंचम said...

पाबला जी,

इसमें कोई शक नहीं कि ब्लॉगर अब वह माद्दा रखने लगे हैं कि किसी प्रोग्राम में शामिल होकर उसे अलग अंदाज में सफल कर सकें।
यह अलग बात है कि बाद में मीन मेख निकालना शुरू कर दें :)

इसलिये मेरी ओर से भी चियर्स:)

anshumala said...

का कहे कुछ भी कहे तो किसी एक गुट के बना दिए जायेंगे कहा दिया जायेगा की लो जी ब्लोगिंग में कोई इन्हें पहचानता नहीं पुरुष्कार मिला नहीं तो कुछ भी कहे जा रही है | एक ब्लॉग पर नहीं उपाधि मिल गई हम जैसे ब्लोगरो को उसी के अनरूप कुछ कह देते है म्याऊ म्याऊ या भौ भौ !!! मतलब आप ही निकल ले :))

सतीश पंचम said...

जहां तक गूगल की सेवादारी की बात है, वह एक विशुद्ध व्यवसायिक कंपनी है जो अपने लाभ के लिये यह तकनीकी प्लेटफार्म लेकर आई है । इस प्लेटफार्म का मूल उद्देश्य ही है कि अधिक से अधिक लोगों को जोड़ कर उनकी क्रियेटिविटी को, रचनात्मकता को इन्कैश किया जाय बदले में लोग अपनी छपास या कहें स्वांत सुखाय वाली भूख मिटा सकें। यह एक तरह से बदलते व्यावसायिक परिवेश में दोतरफा अंडरस्टैंडिंग है, न कि सेवा। कल को यही गूगल चार्ज करना शुरू कर दे तो न सिर्फ लोग घट जायेंगे बल्कि गुगल के व्यवसाय पर भी असर पड़ेगा। दोनो ही पक्षों के अपने हित हैं। ऐसे में इसे सेवा तो कत्तई नहीं कहा जायगा।

बी एस पाबला said...

इसीलिए तो ख़ास तौर पर 'सेवा' लिखा गया है
क्योंकि यहाँ कान को सीधा और घुमा कर पकड़ने वाली बात है

आखिर ताली दोनों हाथों से बजती है तो फिर अकेला आयोजक दोषी कैसे? और ब्लॉगर नादाँ 'यूज़िया' कैसे :-)
क्या ब्लौगरों ने आयोजकों की लाखों रुपल्ली ढीली करने के साथ छिपी लालसा को भुना कर उनका उपयोग नहीं किया आपस में मिलने के लिए? अपने हजारों रूपए खर्च कर!

गूगल कुछ दे तो तकनीकी प्लेटफार्म, प्रकाशक करे तो थू थू!
गूगल पर लाभ उठायें तो व्यावसायिक परिवेश में दोतरफा अंडरस्टैंडिंग
राजनेता के हाथों कुछ मिले तो चाटुकारिता?

हा हा हा

Abhishek Ojha said...

हमें मामले की खबर तो नहीं है पर पोस्ट में असहमति जैसा कुछ दिखा नहीं मुझे.

अनूप शुक्ल said...

हिन्दी ब्लागर बड़ा मासूम होता है। भले-भोले मन का। वह लिखना-पढना-मिलना-जुलना चाहता है। इन्हीं में से कुछ लोगों को आगे बढ़कर नेतृत्व करने की इच्छा होती है। कुछ को पैठ बनाने, किताबें छपवाने , सबसे पहला बन जाने की। यह सहज मानवीय इच्छायें होती हैं। कुछ लोग इनको पूरा करने के लिये मेहनत भी करते हैं। समय,सुविधा और सहूलियत के हिसाब से अलग-अलग तरीके अपनाते हैं।

अब एक आम नौकरी पेशा ब्लागर के पास तो इतना पैसा होता नहीं कि इस तरह के आयोजन कर सके। किसी न किसी से आर्थिक सहयोग लेना होगा। प्रकाशक, हिन्दी संस्थान या फ़िर मुख्यमंत्री जी ने वह सहयोग दिया होगा। अब जब मुख्यमंत्रीजी साहित्यकार भी हैं तो जाहिर है वे भी कुछ कहेंगे ही। अपना आना सार्थक करेंगे ही।

आम ब्लागर ज्यादातर मिलने-जुलने के लालच से ही ऐसे सम्मेलनों में आता-जाता है। इनाम-विनाम सोने में सुहागा हो सकता है।

अब आयोजकों को इसका अंदाजा ही नहीं हुआ कि वे कैसे एक मुख्यमंत्री, अशोक चक्रधरजी और अन्य वरिष्ठ साहित्यकारों का संबोधन इनाम वितरण और बाकी सब दो घंटे में करा लेंगे। इस बारे में सोचने की जहमत भी न उठाई हो शायद- कि क्या होगा। सफ़ल आयोजन के लिये जितनी समझ, संगठन और साधन कभी-कभी क्या अक्सर ही नहीं जुट पाते। क्या करियेगा इसका? कभी-कभी चीजें टेकेन फ़ार ग्रांटेड ली जाती हैं।

बाकी एक आम ब्लागर तो बड़ा संतोषी टाइप का जीव होता है। वह आपस में मिल-मिलाकर ही संतुष्ट हो लेता है। जिनसे नहीं मिल पाता उसके प्रति दुखी हो लेता है। इस्तेमाल होने जैसी बात आम ब्लागर नहीं सोचता। इसका एहसास तो सतीश पंचम जैसे लोग उसको करवाते हैं। :)

मेरी समझ में इस तरह के कार्यक्रम होते रहेंगे। हर कार्यक्रम करने वाला इस दावे के साथ करेगा कि हमारे कार्यक्रम में ऐसा नहीं होगा। लेकिन कुछ न कुछ ऐसा जरूर होगा जिसके लिये आयोजक की खटिया खड़ी की जायेगी।

पैठ बनाने की हसरत V/S इस्तेमाल होते ब्लागर शीर्षक से मुक्तिबोध की कविता की लाइने याद आई( बावजूद इस मसले पर बहुत कम साम्य होने के)

उदम्भरि अनात्म बन गये
भूतों की शादी में
कनात से तन गये
किसी व्यभिचार के
बन गये बिस्तर।

सतीश पंचम said...

पाबला जी,

जहां तक ब्लॉगरों के यूज करने और उनकी छुपी लालसा हेतु आयोजकों के पैसे आदि की बात है तो चाहे आयोजक पैसे खर्च करे न करे जब लोग इकट्ठे होंगे तो आपस में मिलना जुलना होगा ही ये तो स्वाभाविक बात है। इसे छुपी लालसा कह कर कमतर न करिये ये तो खुली लालसा थी और होनी भी चाहिये, आखिर ऐसे ही तो लोग एक दूसरे को जानेंगे पहचानेंगे।
लेकिन वही ब्लॉगर जब अपने लेखों में भ्रष्टाचार को लेकर पाव किलो के भेजे से पन्द्रह किलो की चिंता जताता है तो स्वाभाविक है कि उसकी ओर लोग नजर रखते हैं कि देखें क्या करता है यह बंदा कि केवल कीबोर्ड का ही वीर है। और विडंबना देखिये कि जिस भ्रष्टाचार के बारे में लिख लिखकर सर्वर तक लाल पीला कर दिया, टिप्पणियों में हत्त तेरे की धत् तेरे की किया, वही यहां जुगाडु लोगों से अभिभूत होकर लमलेट हो गया......जाने किस ओर से ब्लॉगरों को 'बाली का हार' पहना दिया गया कि सामने वाले की बोलने की, तर्क करने की आधी शक्ति ही खेंच ली गई :)

जहां तक गूगल करे तो अंडरस्टैंडिंग और राजनेता करे तो चाटुकारिता वाली बात है तो इस पर इतना ही कहूंगा कि गूगल सरकारी पुस्तकालयों में धूल फांकने हेतु किताबें नहीं खपा सकता जबकि राजनेता खपा सकता है, न सिर्फ किताब को बल्कि किताब लिखने वालों को भी यहां वहां विभागों में खपाने की क्षमता रखता है। इसलिये चाटुकारिता की बात राजनेताओं पर फबती है गूगल पर नहीं।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

गया था उस कार्यक्रम में मैं भी , पर संजीव तिवारी - जी के अवधिया से मिलना मेरी खुशी का हिस्सा है, इन कतिपय अच्छे जनों से मिलने के अतिरिक्त बाकी किसी खास बात की कोई खुशी नहीं मिली, जिसे साझा करने लायक या खुशी लायक कहूँ।

आपकी कफी बातों से सहमत हूँ। ऊपर अजय झा जी एग्रीगेटर की दुर्दशा से दुखी दिख रहे, एग्रीगेटर के निमित्त-वीरों को इस सम्मान में सम्मानित भी किया गया है, यह भी एक तथ्य है। सोच भी ऊँट की तरह करवट बदलती रहती है।

आभार..!

Shiv said...

सोच ऊँट है:-)

सतीश पंचम said...

अनुराग जी,

मैं भी स्वांत: सुखाय वाले लेखन का हिमायती हूं और उसी अनुसार लेखन भी करता हूं क्योंकि उससे मुझे सूकून मिलता है अच्छा लगाता है।

रही बात 'पुरस्कार' को 'प्रोत्साहन' मानने की तो मेरा मानना है कि प्रोत्साहन हो या पुरस्कार, उसकी गरिमा बनाये रखना चाहिये न कि भूसे की तरह बांटते चलना चाहिये।

देख रहा हूं कि पुरस्कारों का यह आलम है कि -

(पुरस्कार प्राप्त द्वय Excuse me :)

एक को श्रेष्ठ ब्लॉगर का पुरस्कार दिया जा रहा है तो दूजे को आदर्श ब्लॉगर का पुरस्कार दिया जा रहा है। यानि पहले वाला श्रेष्ठ तो है लेकिन आदर्श नहीं या फिर दूसरा वाला आदर्श तो है पर श्रेष्ठ नहीं :)

यह तो वही हाल हुआ कि.. मंत्रालय जब कम पड़ गये तो मंत्रालयों का बंटवारा कर दिया मसलन 'खेलकूद मंत्रालय' को बांट कर एक को 'खेल-मंत्री' बना दिया दूसरे को 'कूद-मंत्री' बना दिया :)

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

मसलन 'खेलकूद मंत्रालय' को बांट कर एक को 'खेल-मंत्री' बना दिया दूसरे को 'कूद-मंत्री' बना दिया :)
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खेल मन्त्री और कूद मन्त्री तो गनीमत; नौबत खेद मन्त्री [खे(ल)(कू)] तक बनाने की भी है! :)

rashmi ravija said...

@अजय झा जी,
अविनाश वाचस्पति जी कोई दुश्मन नहीं, मित्र ही हैं....वे मुंबई आए...मिलने की इच्छा जाहिर की...काफी ब्लॉगर्स उनसे मिलने के बहाने एक दूसरे से परिचित हुए....वहाँ किसी पुरस्कार वगैरह जैसी कोई बात नहीं थी.

और हाँ, हम सब बेंच-कुर्सी पर नहीं...जमीन पर बिछे गद्दे पर बैठ कर मिले थे :)..एक जैन मंदिर के सभागार में (महावीर जैन जी के सौजन्य से )

rashmi ravija said...

ब्लॉग जगत के अंदर पुरस्कारों की सच्चाई सबको पता है.
पर ब्लॉगर्स की ब्लॉग से अलग भी एक दुनिया होती है...घर-परिवार...नाते-रिश्तेदार....दोस्त-पड़ोसी...उनके सामने इस सम्मान का प्रदर्शन निश्चय ही उन्हें ख़ुशी देता होगा...तो इसमें हर्ज़ क्या है
खुश हो लेने दीजिये...
जब मुझे चार महीने ही हुए थे ब्लॉग्गिंग की शुरुआत किए हुए...मुझे भी पुरस्कार मिला था...(तब मुझे इसके पीछे की राजनीति नहीं पता थी) मैने काफी दिनों तक वो...टैग भी अपने ब्लॉग पर लगा रखी थी....फिर इन पुरस्कारों की असलियत पता चली तो हटा ली.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सतीश जी,सारी बातें दीगर.. मुझे सबसे अधिक अफ़सोस इस बात का हुआ कि एक समय कादम्बिनी पत्रिका का पहला पृष्ठ हंसिकाएं पढता था मैं.. और उसकी रचयिता डा. सरोजिनी प्रीतम वहाँ उपस्थित थीं और उनको प्रथम पंक्ति में सिर्फ बिठा भर दिया गया था.. उनकी उपस्थिति का किसी को भान न था.. सब चक्रधर जी के साथ फोटो खिंचवाने में मशगूल थे.. और बची खुची फूटेज पुण्य प्रसून ले गए..
मोबाइल साइलेंट करने के अनुरोध के बाद जब प्रेजेंटेशन शुरू हुआ तो आयोजकों के बच्चे पंचम स्वर में रोने लगे और उनकी आवाज़ मोबाइल के तीव्रतम रिंगटोन से तीव्र थीं.. अपना तो डॉक्टर के साथ appointment था लिहाजा खिसक लिए!!!

Kajal Kumar said...

:)

वाणी गीत said...

ब्लॉगर्स मीटिंग आजकल सबसे ज्यादा वही कर रहे हैं जिन्हें ब्लॉगर्स से सोशल नेटवर्किंग की शिकायत हुआ करती थी :)
पुरस्कारों और सम्मलेन के बारे में नो कमेंट्स ...
स्वाभिमान सहित स्वतंत्र लेखन की बात स्वीकार्य होनी चाहिए सबको ...और हम तो करते भी यही हैं !

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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