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Sunday, May 8, 2011

मेरा नया ब्लॉग.....Thoughts of a Lens.......सतीश पंचम

      कहते हैं कि हर इंसान में कभी न कभी, किसी न किसी बात का शौक चर्राता है, और जब चर्राता है तो नज़र भी आता है। मसलन, किसी को पढ़ने का शौक चर्राता है, किसी को लिखने का, किसी को खेल का तो किसी के पास फिल्मी चर्राहट होती है। मजे की बात यह कि शौकों का चर्राना ज्यादातर इंसानों में ही नज़र आता है, जानवरों में नहीं। यदा कदा जानवरों में दिखे भी तो उसका चर्राना या तो नज़र नहीं आता या फिर लोग उनके शौके-चर्राहट को नज़रअंदाज कर बैठते हैं। मसलन, किसी बैल को जुगाली करते करते अचानक सिंगों की खुजास मिटाने हेतु लड़-भिड़ जाने का शौक चर्राने लगता है, तो किसी भैस को दूध देते समय ग्वाले को लतियाने का शौक चर्राने लगता है, कहने का मतलब ये कि किसी के शौक कब चर्रा उठें कुछ कहा नहीं जा सकता :-)


     अब आउं असल बात पर। दरअसल मुझे फोटोग्राफी का शौक कुछ साल पहले तब चर्राया था, जब मैनें  एक डिजीटल कैमरा खरीदा था। तब मोबाइल में कैमरा आम नहीं हुआ था, बल्कि केसर - कस्तूरी जैसे ही कुछ हालत थी। किसी महंगे मोबाइल में दिख जाय तो दिख जाय, वरना आम मोबाइल कुछ यूं होते कि बात हो रही है, एहसान मानों....फोटू खेंच कर क्यों अपना टैम और मेरी बैटरी खोटी कर रहे हो म्यां। तो भई उस दौरान मैंने अपने डीजी कैम से कई फोटूएं खेंची थीं। रोल शोल का झंझट तो था नहीं कि ले जाकर स्टूडियो धुलाना पड़े या फिर नेगेटिव खराब हो जायेंगे। जितने मन आए उत्ते फोटो खेंचो। तो भई उसी खेंचा खेंची में मेरा शौक-ए-फोटोग्राफी पुरजोर चर्राया। कहीं कुकुर-बिलार दिखता तो खेंच लेता, गांव का कोई पेड़-पौधा या फुनगी-डाली न बची थी जो छूट गई हो खिंचने से। उस समय जाना कि किसी शौक का चर्राना, साधनों की सुलभता पर निर्भर है, न कि आनुवंशिकता पर, जैसा कि डार्विन-वादी वैज्ञानिकों का मंतव्य रहा है कि, आनुवंशिक गुण ट्रेल करते हैं अपने आगे की पीढ़ियों में। कम से कम फोटोग्राफी जैसे मामले में तो आनुवांशिकी आंशिक रूप से फेल होती दिखती है ( अब ये मत कहियो कि गुहा मानवों के बनाये भित्ति चित्र डार्विनवाद की पुष्टि करते हैं :)  भित्ति चित्र एक तरह से चित्रकारी की आदिम तकनीक थी जिसके वाहक एम एफ हुसैन जैसे जीव जंतु बने......राजा रवि वर्मा जैसे लोग बने, जबकि फोटोग्राफी उसी से जुड़ी कुछ चीज जैसी तो है, पर चित्रकारी नहीं। इसलिये मैं कह रहा हूँ कि डार्विनवाद फोटोग्राफी के मामले में आंशिक रूप से काम नहीं करता। फोटोग्राफी पूर्णतया नया चर्राना है, चित्रकारी आदिम चर्राहट :) 


  खैर, अपने इस फोटोग्राफी वाले शौक की चर्राहट कहूं या ब्लॉगर प्लेटफार्म जैसे साधन की सुलभता कि अपने उस शौक को मैंने एक अलग ब्लॉग के रूप में पेश कर दिया है, एक अलग ब्लॉग बना लिया है। मतलब कि अब सफ़ेद घर के साथ साथ मेरा दूसरा ब्लॉग Thoughts of a Lens भी होगा जिस पर मैं अपने फोटोग्राफी के शौक को पेश करता रहूंगा।  यूं तो पहले भी सफ़ेद घर पर कई बार अपने द्वारा खेंची तस्वीरों को पेश करता रहा हूँ, लेकिन यह उचित जाना कि फोटोग्राफी के लिये अलग ब्लॉग रहे तो अच्छा रहेगा। गिरिजेश जैसे मित्र हैं कि इस शौक-ए-चर्राहट में घी का काम करते हैं और चर्राहट...जोर मारने लगती है :) 


  पेश है मेरे कुछ चित्र जो पहले भी सफ़ेद घर में छपे हैं, अब Thoughts of a Lens पर अपने नये नवेले चित्रों के साथ नज़र आएंगे। 


  तो लिजिए, नोश फरमाइये......Thoughts of a Lens


पहले मेरे कुछ सफ़ेद घर के चित्रों पर नज़र डाल लें, तत्पश्चात नये ब्लॉग पर तफ़रीह :)


शुरूवात....ललछहूँ मट्ठे से :)






































 उम्मीद है जैसा स्नेह अब तक आप लोगों का सफ़ेद घर को मिलता रहा है, वैसा ही स्नेह Thoughts of a Lens को भी मिलता रहेगा जिसका कि URL है - http://lensthinker.blogspot.com




- सतीश पंचम


स्थान - मुंबई


समय - सात पैंतालीस

19 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

स्वागत है,एक चित्र तो छुन्छा घाट का भी लग रहा है,जमाये रहिये..

अनूप शुक्ल said...

वाह जी। बधाई! लेंस के विचार देखे जायेंगे अब तो! :)

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

बहुत बढ़िया है फोटो ब्लॉग! शुभकामनायें!

Udan Tashtari said...

जा रहें हैं Thoughts of a lens पर ऐसा ही स्नेह लुटाने जैसा कि यहाँ लुटाते हैं. :)

प्रवीण पाण्डेय said...

हम पहले कहे थे महाराज, प्रेम कहाँ छुपाये छिपता है।

Arvind Mishra said...

फोटो तो खैर लाजवाब हैं -बिलकुल अन्तराष्ट्रीय ! मगर नए ब्लॉग का नाम कुछ जमा /जंचा नहीं -
ये ब्लॉग जगत में मेंटल मामला कुछ ज्यादा ही चल रहा है -विचार हलचल वलचल -अब लेंस का भी सोचने लगे !
मैं कुछ नामा सजेस्ट कर रहा हूँ -विचार कर सकते हैं -
कैनवास ऑफ़ अ लेंस .....lensoScope .....Lensget ... फोकस ....लेंस डाउन ,जीरोलेंस
मुख्य नहीं तो उपनाम के रूप में ये विचारणीय हैं

Rahul Singh said...

बढि़या तस्‍वीरें, स्‍वागत.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

आज औपचारिकता वश नहीं.. दिल से कहने को जी चाहता है .... अ-द-भु-त...

Patali-The-Village said...

बहुत बढ़िया है फोटो ब्लॉग| शुभकामनायें|

Poorviya said...

badhai ek aur naya blog .....


jai baba banaras..............

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

आपके द्वारा सुझाये नाम बेहद आकर्षक हैं, लेकिन यह नाम काफी मशक्कत के बाद रखा गया है, अभी कुछ दिन देख लेता हूं, तत्पश्चात आप के द्वारा सुझाया नाम तो है ही।

सोमेश सक्सेना said...

बहुत खूब. कुछ ट्रिक हमको भी सीखा दीजिये फोटोग्राफी के. हमें भी थोड़ा शौक है. आपको गुरु मान लेते हैं.

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

achha hai ji......

rashmi ravija said...

आपके द्वारा खींची तस्वीरें...तो किसी और ही दुनिया में ले जाती हैं ....एक रस्साकशी सी भी चलती थी,मन में...कि पहले पोस्ट पढ़ें या चित्रों का अवलोकन करें...अच्छा किया....नया ब्लॉग बना लिया...इत्मीनान से तस्वीरें देखी जा सकेंगी...शुभकामनाएं

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बहुत बढ़िया। इस ब्लॉग के चित्रों ने हमेशा आकर्षित किया है। अब एक मुश्त संग्रह देखने को मिलेगा।

रंजना said...

आप तो बड़े कलाकार टाईप के ,बड़े जबरदस्त फटोगराफर निकले भाई...

जोड़ लिया आपके लेंस को भी पाठ सूची में...काहेकि आपके कैमरे से जो गाम घर की तस्वीर निकलती है,सीधे ह्रदय भित्ती पर उतर जाती है...आत्ममुग्ध हो हम आपके चित्रों के सहारे उन गलियों में घूम आते हैं...

सञ्जय झा said...

ee subhita dene ke liye sukriya...

bahut manohar lens banaye hain....


jai ho.......

सञ्जय झा said...

oh...ho...galti se ranjna di ke comment dekhbe nahi kiye nahi to
sahmat hokar......susta lete.....

khair, ab sahmat ho lete hain....

सतीश पंचम said...

Mr. Ka_re

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इसलिये उसी अनुसार आपकी टिप्पणी माडरेट की जा रही है।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

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