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Saturday, May 28, 2011

द स्टोरी ऑफ 'कुल्हड़ यूटिलाइजेशन'

        जाने क्या बात होती है मिट्टी के बने बर्तनों में कि मैं अक्सर ही उनकी ओर आकर्षित हो उठता हूँ। मिट्टी के बने मटके, सुराहीयाँ, कुल्हड़, सकोरे सभी मुझे बचपन से ही बहुत प्रिय रहे हैं। अब भी जहाँ कहीं मौका मिलता है मिट्टी के बनी सुराही, कुल्हड़ आदि अदबदाकर खरीदता हूँ। यात्रा के दौरान मिट्टी की सुराही खरीदना तो मेरा एक तरह का शग़ल ही है।  मेरी श्रीमती जी मेरी इस सनक पर मौज लेने से नहीं चूकतीं। कहती हैं - अब तक न जाने कितने साल गुज़ार दिये हो इसी 'बम्मई' में (मुंबई में ), लेकिन अब भी 'गँवरपन' झलकता है। मैं मुस्कराकर रह जाता हूँ। बच्चे भी मेरी इस 'गँवईं' फ़ितरत से बखूबी परिचित हैं। यदा कदा टोक भी देते हैं - क्या पापा ..... सुराही आप ही ढोना....वहां हमसे नहीं होगा हाथ में सुराही लेकर चलना।  लेकिन मैं अपने इस गँवईपने में भी आनंद पाता हूँ। मिट्टी के बर्तनों में मिलने वाला सोंधापन, उनकी छुअन एकदम अलग ही अहसास देते हैं।

       यहाँ तक कि जब कभी गाँव जाता हूँ तो शाम की चाय पीने के लिये ज्यादातर बाज़ार की ओर रूख़ कर लेता हूँ क्योंकि वहां की कुछ गुमटीयों में कुल्हड़ में चाय मिलती है और उस चाय में जो सौंधापन मिलता है वैसा सौंधापन मेरे हिसाब से महंगे से महंगे बर्तनों में भी नहीं मिल सकता। उस सोंधेपन की बात ही अलग होती है, अपने आप में एक तरह की देशज महक। शुरू-शुरू में मैं गाँव में जिन गुमटीयों पर जाता था, वहां के दुकानदार मेरे पारिवारिक पृष्ठभूमि को, पिताजी, चच्चा, ताऊ सभी से परिचित होने के कारण  'काँच के गिलास' में चाय उड़ेलकर देने लगते थे। उन्हें लगता था कि बम्बई वाले भला मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पियेंगे ?  मुझे चाय उड़ेलते समय रोकना पड़ता था, कि चाय कुल्हड़ में दिजिए, काँच वाले ग्लास में नहीं। साथ में आये चचेरे भाई तब मजे लेते हुए कहते - ऐन्हंय कुल्हड़ै में चहीया दिह.........ई नवा सउखीन मनई हएन ( इन्हें कुल्हड़ ही में चाय दो.......ये नये शौकीन आदमी हैं ).

     दरअसल देखा गया है कि अब गाँवों में भी, हाट-बाजार आदि में ज्यादातर चायवाले काँच के गिलास का इस्तेमाल करने लगे हैं। कुल्हड़ में चाय देना थोड़ा सा महंगा पड़ता है। काँच का ग्लास धोने पर फिर से दुबारा इस्तेमाल किया जाता है, जबकि कुल्हड़ तो एक ही बार इस्तेमाल होता है और फिर फेंक दिया जाता है। लेकिन गाँवों में भी कुछ 'भगत टाईप' के लोग होते हैं, उनके लिये बाजारू चाय यदि पीना भी पड़े तो कुल्हड़ में पियो, काँच का ग्लास 'फरचा' नहीं होता। ऐसी मान्यता है कि धोने के बावजूद काँच का ग्लास सिर्फ दिखावटी तौर पर साफ होता है, ओसकन से मांजा नहीं जाता इसलिये उसे फर्चा कहना गलत है। कुल्हड़ ही ठीक है, पियो और फेंक दो। ऐसे में दुकानदार 'भगतिहा लोगों' का ख्याल रखते हुए दोनों रखते हैं। काँच का ग्लास भी और कुल्हड़ भी। जिसे जैसी जरूरत, वैसी सर्विस।

     खैर, भगत लोगों की भगत लोग जानें, अपन तो सौंधेपने पर लट्टू हैं और जिसकी परिणति होती है कि मुंबई वापस लौटते वक्त अक्सर पच्चीस तीस कुल्हड़ खरीद कर अपने बैग में डाल लेता हूँ। चचेरे भाई मौज लेते हैं लेकिन मेरी पसंद को वो भी जानते हैं। इसलिये मोल भाव करके कुल्हड़ खरीद लिया जाता है। और अब देखिये कि, वही कुल्हड़ जिसकी गाँव में कदर नहीं होती, यहां मुम्बई लाते ही उसकी कीमत बढ़ जाती है। संभाल संभाल कर इस्तेमाल करता हूँ कि जल्दी चुक न जाय। वैसे भी कुल्हड़ में चाय केवल मैं ही पीता हूँ, वो भी ज्यादातर छुट्टी वाले दिन, वरना मुंबई की इस भागादौड़ी में कहां जगह है इस तरह के शौकों के लिये । उधर श्रीमती जी ने भी कुछ कुल्हड़ वाली चाय का आनंद लिया ( जानता हूँ कि अच्छा तो उन्हें भी लगता है :)


     अब मेरे साथ होता यह है कि कुल्हड़ के छोटे आकार को देखते हुए पहले एक छोटे स्टील के ग्लास में चाय छान कर आ जाती है और फिर मैं उसे अपने कुल्हड़ में उड़ेल उड़ेल कर पीता जाता हूँ, खिड़की से बाहर ताकते हुए। पहले तो होता यह था कि कुल्हड़ से एक बार पीने के बाद आदतन उसे फेंक देता था। लेकिन बाद में ख्याल आया कि यार जब मुझे ही पीना है अपने उसी कुल्हड़ में तो क्यों न धो-धाकर दुबारा उसी कुल्हड़ का इस्तेमाल करूँ। इसलिये अब यह करता हूँ कि, कुल्हड़ में चाय पीने के बाद उसे तुरंत ही धो देता हूँ ..... ( हाँ भई, कुछ शौक ऐसे भी पूरे किये जाते हैं :)

    इससे होता यह है कि कुल्हड़ तुरंत ही धो देने से वह फिर नये सरीखे हो जाते हैं, पंखे ही हवा खाकर फिर सूख भी जाते हैं। इस तरह पहले जो कुल्हड़ एक बार ही पीने के इस्तेमाल होता था अब सात आठ बार तक इस्तेमाल होने लगा है। अभी भी कुछ कुल्हड़ बचे हैं, जब कुछ महीने बाद खत्म होंगे तो हो सकता है फिर एक बार गाँव का चक्कर लग जाय। तब की तब देखी जायगी। अभी तो अदरक वाली चाय बन रही है.....चलूँ.....आज एक नये कुल्हड़ का उदघाटन जो करना है :)


- सतीश पंचम
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चलते चलते -

मेरे फोटो ब्लॉग Thoughts of a Lens की तस्वीर और साथ ही है -  रहिमन चिंतन


रहिमन निज संपत्ति बिना, कोउ न बिपति सहाय ।
बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सकै बचाय ।।
 Blog URL - http://lensthinker.blogspot.com/

42 comments:

डा० अमर कुमार said...

.सत्य वचन प्रभो.. मिट्टी का सोंधापन मिट्टी में पले लोग ही जानें ।
जिन्हें बचपन से ही धूल मिट्टी से दूर रखा गया है, उनसे शिकायत करना भी वाज़िब नहीं !
आने वाली पीढ़ियों को ठेठपन की निष्कलुष सँस्कृति से दूर ले जाने के उत्तरदायी हम भी हैं... इस हद तक कि गाँवों में दस-ग्यारह दुकानों पर धूल आँकने के बाद लस्सी शरबत इत्यादि मिलेगा, इसके उलट हर जगह उपल्ब्ध है.. ठँडा माने कोकॉ-कोला की फ्रेशॉलोजी ! अब ’एक्ज़ोटिक रेनी-अर्थ, कैन्डिड वुड फ्रैगनेन्स" के कार परफ़्यूम और रूम-फ्रेशनर भी आ गये हैं... कल्लो जो करना है । अभी पिछले ही महीने इलाहाबाद में मैंने पाया कि मिट्टी के कुल्हड़ में गन्ने का रस पीने के लिये रु.10 अतिरिक्त देने होते हैं.. यह उस इलाहाबाद और बनारस की बात है, जिसके सोंधेपन पर मैं नाज़ किया करता था ।
इन्हें म्यूज़ियम में देखूँ, उससे बहुत पहले ही इनकी याद दिलाने का शुक्रिया !

डा० अमर कुमार said...

आज टिप्पणी करने में बहुत ही खुलापन का एहसास हो रहा है,
कोई टेन्शन नहीं, कोई प्रतीक्षा नहीं, उन्मुक्त निर्बाध प्रतिक्रिया !

प्रवीण पाण्डेय said...

हर प्राकृतिक वस्तु में मन रमता है, रेल में भी कुल्हड़ चले थे।

Gyandutt Pandey said...

सौखीनी करने का मन हो आया यह पढ़ कर! मंगवाता हूं एक कोड़ी कुल्हड घर में ही चाय पीने को!

ajit gupta said...

आपके प्रिय कुल्‍हड़ की एक बात और बता देते हैं। अमेरिका में एक इण्डियन स्‍टोर में कुछ खरीददारी करने गए, देखा मिट्टी का सकोरा (लोटा जैसा) वहाँ रखा है। हमने उसके दाम देखे केवल मात्र 8 डॉलर का था। है ना कीमती चीज, सम्‍भाल के रखने का फार्मूला भी आपने दे ही दिया है। बढिया है जी, कोई तो सुराही का प्रयोग कर रहा है।

Poorviya said...

उस चाय में जो सौंधापन मिलता है वैसा सौंधापन मेरे हिसाब से महंगे से महंगे बर्तनों में भी नहीं मिल सकता। उस सोंधेपन की बात ही अलग होती है, अपने आप में एक तरह की देशज महक।

yahi saudha pan apne watan kiyaad dilata hai aur ham log jab mauka lagata hai pahuch hi jaate hai .....

kulhaad sambhal ke rakheyga september se bambai aana jaana suru ho raha hai........

jai baba banaras.......

Arvind Mishra said...

ये तो पूरा गमला दिख रहा है :)
इन दिनों इधर डिजाईनर मिट्टी के कप मिल रहे हैं -
कभी आईये तो दिखाऊँ !

मनोज कुमार said...

बहुत काम की बात बताई आपने।

Abhishek Ojha said...

बड़े नवाबी शौक हैं जी :) 'नवा सउखीन' ही कहूँगा मैं भी.

सतीश पंचम said...

ज्ञान जी,

कभी कभी आप एकदम 'ठेठऊ' हो जाते हैं...नतीजतन मैं शब्दों को समझने में अचकचा जाता हूँ :)

हो सके तो ये 'एक कोड़ी कुल्हड़' की संख्या को मैट्रिक सिस्टमानुसार गिन दिजिए :)

मुम्बईया गिटिर पिटिर सब कुछ भुलाय देत है :)

Patali-The-Village said...

कुल्हड़ में चाय पीने का मजा ही कुछ और है | धन्यवाद|

सागर नाहर said...

अब कहाँ कुल्हड़ और कहाँ काँच के ग्लास! अब तो गाँवों में भी प्लास्टिक के यूज एंड थ्रो ग्लास में चाय मिलने लगी है।
वैसे हो शौकीन आप!
:)

सतीश पंचम said...

सागर जी,

आपने सही कहा कि अब प्लास्टिक के ग्लास चलन में आ गये हैं। गुमटीयों पर अब ये भी खूब दिखते हैं लेकिन यदि कुछ 'चहपियारों' से पूछो तो उनका मानना है कि- चाय थामते यदि ढंग से इन प्लास्टिक के कपों को न पकड़ा जाय तो समुची चाय 'फुक्क' से बाहर आ जाती है, ओठ जलना, कपड़ा खराब होना एडीशनल प्रापरटीज् हैं :)

Gyandutt Pandey said...

@ सतीश -
कोड़ी = 20
शायद अंग्रेजी के स्कोर से बना है!
देखें - http://bit.ly/josE2N

सतीश पंचम said...

धन्यवाद ज्ञान जी,

इस जानकारी को शेयर करने के लिये।

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

हाँ !
मजा तो हैये है ई कुल्हड में !

...पर धो धो पीने वाली बात ....ज़रा हजम नहीं हुई ......ज़रा ध्यान दीजियेगा ......धुले कुल्हड में चाय पीने में सोंधापन यकीनन काफी कम हो जाता होगा ?

इसीलिये ......चाहे जितने धुल धूसरित कुल्हड हों ...... फूंक मारने और उलटा करके खटखटाने के अलावा कभी धुलते नहीं देखा |

सतीश पंचम said...

प्रवीण जी,

आपका कहना कि बार बार धुलाई से सोंधापन कम हो जाता है, सही है..... इसीलिये कुल्हड़ों की धुलाई की बारंबारता सात-आठ तक पहुंचते ही नये कुल्हड़ को अंवासना जरूरी हो जाता है।

इसलिये आज छुट्टी के दिन यह उदघाटन भी कर दिया हूँ :)

नीरज गोस्वामी said...

कुल्हड़ में पी गयी चाय और मटके के ठन्डे पानी का स्वाद भला आज प्लास्टिक के मग से चाय और फ्रिज में रखी बोतल का पानी पीने वाले क्या जानें...

नीरज

सतीश पंचम said...

@ इसीलिये ......चाहे जितने धुल धूसरित कुल्हड हों ...... फूंक मारने और उलटा करके खटखटाने के अलावा कभी धुलते नहीं देखा

------

इसके पहले किसी सतीश पंचम से भी तो नहीं मिले, फिर कैसे जानियेगा कि कुल्हड़ भी धोये-सुखाये जाते हैं :)

प्रवीण जी,

दरअसल हम शहरी अपने इन्ही छोटे छोटे क्रियाकलापों से अपने को गाँव से जुड़ा पाते हैं, यह छोटा छोटा नॉस्टाल्जिया खुशी देता रहता है।

आपकी जानकारी के लिये बता दूँ कि यहां के एक मिल मजदूर से मैं मिल चुका हूँ जो गाँव से आते समय थोड़ी सी अपने गाँव की मिट्टी अपनी गठरी में गठिया लाया था।

संभवत: परदेस की टीस, परदेसी मर्म को समझने के लिये एक विशेष प्रवासी दौर से गुजरना पड़ता है - ऐसा मेरा मानना है।

हरीश सिंह said...

बड़ा अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर, आप जैसे प्रतिभाशाली ब्लॉग लेखको का "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" परिवार में स्वागत है. इस साझा मंच में योगदान के लिए हमें मेल भेंजे.. editor.bhadohinews@gmail.com

हरीश सिंह said...

सतीश जी, १९८७ में मुंबई घर से भागकर गया था. कुछ दिन तो बहुत अच्छा लगा पर थोड़े ही दिन बाद घर की याद आने लगी. मैं एक ग़ज़ल सुन रहा था, शायद चन्दन दास की थी. जिसके बोल थे ""एक प्यारा सा गाँव, जिसमे पीपल की छाव, छाव में आशियाँ था, उसमे मेरा मकां था, छोड़कर गाव को, उस हंसी छाँव को, भीड़ में खो गए हैं. शहर के हो गए है." उस दौरान मेरे मन में जो भाव उभरे थे. वह भाव आज आपके ब्लॉग पर आकर पैदा हो गए. आपके लेखों से अधिक भावुक आपका परिचय कर गया . मेरी शुभकामना आपके साथ है.

Udan Tashtari said...

क्या याद दिला दिया...एक जमाना बीता कुल्हड़ में चाय पिये...हाँ, एक शादी में पिछली दफा कुल्हड़ में दूध जरुर औंटा कर मिला था...


आनन्द आ गया पढ़ कर.

Rahul Singh said...

मुबारक सोंधापन.
कोड़ी या कोरी (अंगरेजी के स्‍कोर) के मूल में गिनती के पुराने तरीके की याद है, जिसमें उंगलियों से गिनती होती थी (अब भी होती है), पांच-पांच उंगलियां हाथ की फिर पांच-पांच पैर की, इस तरह कुल बीस और एक (मनुष्‍य) इकाई पूरी.

anupama's sukrity ! said...

बहुत सुंदर लिखा है आपने ..
पुरे आलेख से माटी की सोंधी खुशबू आ रही है ...!!
सच्चाई लेखनी में झलक रही है ..
बधाई.

रश्मि प्रभा... said...

sondhi chay ka apna maza hai

देवेन्द्र पाण्डेय said...

लालू यादव जब रेल मंत्री थे तो उन्होने रेलवे स्टेशनों पर प्लास्टिक के कप बंद करा कर कुल्हड़ का प्रयोग अनिवार्य कर दिया था। यह होता तो आपको कुल्हड़ धो कर न पीना पड़ता। जब मन हुआ गये और ले आये स्टेशन से कुल्हड़ खऱीद कर। पता नहीं दूसरे मंत्री, पहले मंत्री के अच्छे फैसले भी क्यों बदल देते हैं!

rashmi ravija said...

आजकल मुंबई जैसे शहर में भी रेस्टोरेंट्स में कुल्हड़ में चाय पेश करना फैशन में शुमार हो गया है. हमने तो कई बार पी है.
कुल्हड़ पर बाकायदा पेंटिंग भी की होती है. (एकाध लाइन....और कुछ बिंदियाँ )
ज्यादा महंगा भी नहीं है.

VICHAAR SHOONYA said...

सतीश जी कभी कुल्हड़ में चाय का स्वाद नहीं लिया है. दिल्ली में दिल्ली मिल्क स्कीम वाले कुल्हड़ में दही बेचते थे. एक बार वो लिया था पर दही के साथ साथ उस पात्र की मिटटी भी मुह में चली गयी जो अच्छी नहीं लगी थी. हाँ मैं गर्मियों में हमेशा मटके का पानी पीना ही पसंद करता हूँ क्योंकि फ्रिज का ठंडा पानी पीकर मुझे हमेशा जुकाम हो जाता है. इस बार भी ८५ रुपयों में एक मटका ख़रीदा है जो मटका कम मटकी ज्यादा लगता है. हमार बचुआ नाराज था की पापा इस मटके की जगह एक मदर डेयरी की आइस क्रीम का ब्रिक ही ले लेते. १५ रुपयों की बचत हो जाती. लगता है की कुल्हड़ और मटकों का महानगरों में उपयोग एक नवाबी शौक होता जा रहा है.

प्रवीण शाह said...

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सतीश जी,

आपकी यह पोस्ट पढ़ मुझे रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव जी की याद आती है... उनकी वजह से उत्तर भारत के रेलवे स्टेशनों में प्लास्टिक के कपों की जगह कुल्हड़ में चाय मिलने लगी थी... तीन फायदे थे उसमें... मिट्टी की महक-जुड़ाव, कुम्हारों को रोजगार और फुली-बायोडिग्रेडेबल होने के कारण पर्यावरण की रक्षा... पर गंवई, जमीन से जुड़े लालू का मजाक उड़ाया गया था तब...



...

prerna argal said...

bahut badiyaa prastuti.bilkul sahi kaha aapne mitti ki sondhi sondhi khusboo ki baat hi alag hoti hai.jaise barish ki boondon se mitti ki bhigi bhigi sughand se garma-garm pakode aur chay ke swad ka majaa duganaa ho jaata hai.badhaai aapko.


please visit my blog and feel free to comment.thanks.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा said...

आया है मुझे फिर याद वह गुजरा जमाना कुल्हड़ का।
खुद तो खो गया काल के गर्त में दे गया नासपीटे प्लास्टिक का उपहार।

डॉ .अनुराग said...

सूरत से वापस लौटते वक़्त रतलाम में देर रात कुल्हड़ की चाय का स्वाद .....या गाँव की ब्याह -शादी या तेरहवी में बचपन में नीचे ज़मीन पर बैठकर खाया गया खाना ...जिसमे कुल्हड़ में मिला रायता ...होता ....पूरी की पूरी एक जमात एक साथ उठती .फिर दूसरी जमात लाइन से बैठती .....एक अजीब सा अनुशासन था .एक अच्छी परम्परा ...चीज़े खोने के बाद उनकी कीमत मालूम पड़ती है ....कुछ चीजों का जिंदगी में कोई सब्सटीटयूट नहीं होता ...

संतोष त्रिवेदी said...

'कुल्हड़-महिमा' पढकर हम तो लहालोट हो गये!अपन की भी ख्वाहिश होती है कि जब गाँव जाएँ तो कुल्हडियाय लें पर अब यह दुर्लभ होता जा रहा है !

आपसे एक-आध कुल्हड़ बच-बचा जाये तो हमरी तरफ भी भेजियो !

संजय @ मो सम कौन ? said...

इस सौंधेपन के लट्टू हम भी हैं। दही जमाने के लिये मिट्टी का बर्तन खरीद कर लाया तो कई विशेषण हमने भी सुने थे:)

अभिषेक आर्जव said...

वाह रे कुल्हड़ प्रेम !
:) :) :)

रंजना said...

वाह....

अब एक और बात बताऊँ...
यदि पत्नी जी को पटा सके तो कभी गैस चूल्हे पर ही मिट्टी के हांडी में खाना पकवा कर खा कर देखिएगा...
बस करना यह होगा कि छोलनी कलछुल की जगह नॉन स्टिक में इस्तेमाल किये जाने वाले लकड़ी के लड़ने से सब चलवाइएगा...क्या जो स्वाद आता है न क्या कहूँ...

अधिक जानकारी चाहिए तो मुझे मेल कर सकते हैं आप...मैं विस्तार से इस्तेमाल विधि बता दूंगी...
अपने पास हमेशा मैं मिटटी के विभिन्न आकार के बर्तन रखती हूँ और महीने दो महीने में उसमे बनाकर सबको खिलाती खाती हूँ...

सञ्जय झा said...

'चहपियारों'

'chahasiyon'......chalega kya.....

ranju di ke baat pe gour kariyega....

aur haan...'mitti ke bartan' me pake
bhojan....bhojan nahi 'bhushan' hota hai......

jai ho....

shilpa mehta said...

रंजना जी - मिट्टी की हांडी - सुना तो है - कि बहुत स्वाद बनता है भोजन :) .... लेकिन यह भी कि मिट्टी की हांडी एक ही बार चढ़ती है -- :(
वैसे क्या आप रेसिपे बता सकती हैं - मेल पर ?

Rakesh Kumar said...

शिल्पा जी ने आपके ब्लॉग के बारे में बताया.
बहुत रोचक पोस्ट है आपकी.

हम तो कभी कभी कुल्हड़ में हंडिया का ओंटा
हुआ दूध पीते हैं जी,जो अब बहुत कम होता जा रहा है.क्यूंकि हंडिया में दूध ओंटाना फिर ओंटा हुआ मलाईदार गाढ़ा दूध पीना भी तो अब समस्या बनता जा रहा है.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार,सतीश जी.

सतीश पंचम said...

राकेश कुमार जी,

हंडिया से याद आया कि कुठुली के भीतर जब उपलों की आग में बहुत देर मिट्टी की हंडिया में रखकर दूध पकाया जाता है तब एक खास किस्म की महक आती है। उसका आनंद अलग ही है। और तो और सबसे अच्छी लगती है मिट्टी की हंडिया के भीतरी हिस्से से निकलने वाली करोनी( मलाई) जिसे सुतुही(सींप) से रगड़कर निकाला जाता है। अब तो गाँवों में भी वह सुतुही आदि नहीं देखने मिलते।

शिल्पा जी बहुत बहुत आभार राकेश जी को सफ़ेद घर से परिचय कराने के लिये।

Puja Upadhyay said...

चाय पीने का कभी शौक़ नहीं रहा तो कुल्हड़ वैसे जुड़ नहीं पाए...हाँ गाँव में हडिया में दूध उबला जाता था तो दूध पीने या वैसे ही खीर खाने का स्वाद अद्भुत होता था.

घर में दही हमेशा मिटटी के बर्तन में ही जमाया जाता, खास तौर से मकर संक्रांति में, आज वही याद आ गया. :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

मुझे भी कुल्हड़ की चाय का शौक हुआ करता था। एक बार एक दुकान पर रखे ‘फरचा" कुल्हड़ो पर एक कुत्ते की ‘किरपा’ बरसते देखकर शौक बदलना पड़ा। उसके बाद जब भी जमीन पर रखे कुल्हड़ देखता हूँ तो मुझे कुत्ते की टांग उठाकर कुल्हड़ों की धुलाई का वह दृश्य याद आ जाता है।

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