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Tuesday, May 24, 2011

गोपनीय श्रद्धा .......गोपनीय ईश्वर

        आज लिफ्ट बंद होने से सुबह जब ऑफिस जाते समय अपनी बिल्डिंग की सिढ़ियों से नीचे उतर रहा था तब अचानक ही सामने की दीवार पर नज़र पड़ी। दीवार पर नया नया रंग रोगन किया गया था। सिढ़ियों के पास का कोना जहां कि अक्सर ‘पान के थुक्कारे’ , दंतनिपोरों के चिर-परिचित दागी निशान दिख ही जाते थे, वह जगह भी साफ सुथरी लग रही थी। यह सब देख कर अच्छा लगा कि चलो कुछ तो चेतना आई लोगों में। वरना तो लोगों को कहते रह जाओ कि भई पान की पिचकारी कोने अतरे मत छिटकाया करो, थूका-थाकी मत करो लेकिन मजाल है जो ‘बन्धु-भगिनी’ लोग मान जांय।


         अभी मेरा यह नव-चेतन दीवारों का अवलोकन कर ही रहा था कि तभी नज़रें सामने की दीवार पर पड़ी। वहाँ विराजमान थे देवी देवता लोग। तुरंत ही सीढ़ियों के पास वाली इस साफ-सफाई का कारण पता चल गया। लोगों ने ‘पान-चबेरों’ और ‘दन्त-निपोरों’ से परेशान होकर दीवार को अच्छे से रंग रोगन करवा कर वहां देवी देवताओं की तस्वीरों को सटा दिया। अब जो कोई थूकना चाहेगा भी तो सामने ईश्वर को देख खुद ही ठिठक जायेगा। नतीजा, दीवार साफ की साफ और ‘पान-चबेरे’ कहीं और जाकर पिचकारी मारते होंगे।

       वैसे, ईश्वर को इस तरह दीवारों पर सटा कर उनसे ‘वाचमेनी करवाने’ की तरकीबें काफी समय से उपयोग में लाई जा रही हैं। अक्सर देखा गया है कि सड़क के किनारे जहां दीवारें Standing Ovasion के चलते धारापुरी बनी रहतीं थी, वह देवताओं के चित्रों के आते ही साफ सुथरी नज़र आने लगती हैं। मनुष्य की धर्म-भिरूता का क्रियेटिव इस्तेमाल होते देखना अच्छा लगा।

       उधर देख रहा हूं कि स्टीफन हॉकिंग ने ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हुए कहा है कि ईश्वर जैसी चीज कुछ नहीं हैं। न सिर्फ ईश्वर, बल्कि मृत्यु के बाद स्वर्ग और नरक का भी कोई अस्तित्व नहीं है। जो कुछ है इसी जीवन में है, इसी दम है। उनकी बातों को पढ़ने पर मुझे भगवतीचरण वर्मा के लिखे उपन्यास चित्रलेखा की वह पंक्तियां याद आ गई जिनमें वह ईश्वर जैसे गूढ़ विषय के बारे में बिल्कुल सरल ढंग से कहते हैं - ईश्वर मनुष्य की सर्वोत्कृष्ट कल्पना है। और वाकई उनकी इस बात में काफी दम है कि जिसे किसी ने देखा नहीं, न किसी ने जाना है, न किसी ने छूआ है.....उसने केवल अपने श्रद्धाभाव के बलबूते एक ऐसे रचेता की कल्पना कर ली है जिससे कि वह आज भी उतना ही डरता है जितना कि युगों पहले डरता था, आज भी उसके प्रति श्रद्धा भाव रखता है जैसा कि पहले रखता था। हां, कालक्रम में कभी भक्ति कम तो कभी ज्यादा जरूर होती दिखती है, लेकिन वह अलग मुद्दा है।

        आज यदि ईश्वर के अस्तित्व को लेकर बहस छिड़ी है तो यह कोई नई नहीं है। और न ही स्टीफन हॉकिंग के विचार ही नये हैं। उनसे पहले भी कईयों द्वारा ईश्वर के अस्तित्व पर इसी तरह की बातें कही गई हैं और आगे भी कही जाती रहेंगी। किंतु मेरे हिसाब से ईश्वर हैं या नहीं हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है श्रद्धाभाव, महत्वपूर्ण है वह विश्वास जो कि मुश्किल परिस्थितियों में फंसे इंसान को एक किस्म की मानसिक शांति प्रदान कर सके, एक तरह का संबल प्रदान कर सके, क्योंकि देखा गया है कि जहां मित्र-सम्बन्धी, पुरखे-पुरनियों के आशीर्वाद तक काम नहीं करते वहां यही कल्पनाजन्य ईश्वर है जो कि आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।


 - सतीश पंचम

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 चलते चलते -
 
 मेरे फोटो ब्लॉग Thoughts of a Lens से पेश है 'लहबर'
 

'लहबर' उठाये हुए एक फ़कीर

51 comments:

आशीष श्रीवास्तव said...

ईश्वर का निर्माण ही डराने के लिए हुआ है!

Rahul Singh said...

विश्‍लेषण का रोचक दृष्टिकोण.

Vivek Rastogi said...

जब हम नये नये मुंबई पहुँचे थे तो नेरुल में ११ वें माले पर फ़्लेट था और सुबह ७.५० निकलने का समय होता था और वही समय बिजली रानी के जाने का, तो हम ११ माले सीढ़ियों के रास्ते ही आते थे, तो लोगों के जूते चप्पल, पान पीक, और कचरा सबके दर्शन होते थे।

Arvind Mishra said...

बढियां लिखा ,थोडा और लम्बा होता तो निबंध श्रेणी में आता
यह सच है कि ईश्वर का कोई भौतिक वजूद तो नहीं ही है मगर फिर करोडो लोग उसे मानते क्यों हैं!
इस प्रश्न के जवाब में ईश्वर की सार्थकता छिपी है !

प्रवीण पाण्डेय said...

ईश्वर के प्रति श्रद्धा से यदि कुछ गुण आयें तो हाकिंस महोदय को क्या आपत्ति हो।

ajit gupta said...

हमारे शहर में तो आजकल दीवारों पर परम्‍परागत चित्र बना देते हैं। जिससे दीवारे साफ-सुथरी रहती है। यह दृष्टिकोण तो आज ही पता लगा, बड़ा अच्‍छा है। ईश्‍वर है या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन आस्‍था जरूर होनी चाहिए‍ जिससे विपत्ति काल में किसी को पुकारने का योग बने। नहीं तो मनुष्‍य क्‍या करेगा? आपके विचारों से सहमत।

सञ्जय झा said...

badhiya vishleshan........

jai ho.

shilpa mehta said...

अब श्री स्टीफन हॉकिंग व ऐसे कई गहन ज्ञानी व्यक्तियों से सिर्फ यह पूछना चाहूंगी - आपकी जेब में जो मोबाइल फ़ोन है - वह किसने बनाया? जिस कम्प्यूटर पर आप यह लेख पढ़ रहे हैं - वह किसने बनाया? आपका टेबल , कुर्सी आदि - क्या यह सब अपने आप बने ? जब छोटे से फोन को बनाने के लिए एक पूरी इंजिनीरिंग कम्पनी चाहिए - तो जीवन जो इतना जटिल और सुचारू है - अपने आप - एक्सीडेंटली कैसे बना होगा? जो साइंस कहती है कि "मैटर कांट बी जनरेटेड नॉर डिस्ट्रोय्ड" वह साइंस कैसे जीवन के अचानक शुरू और अचानक ख़त्म हो जाने की बात स्वीकार करती है? बिग बैंग थीअरी के हिसाब से - धमाका हुआ - और दुनिया शुरू हुई - उनसे पूछो कि - रेगिस्तान में तेल भी है , सिलिकोन भी - और मोबिल बनाने के सभी कच्चे पदार्थ हैं (जबकि बिग बंग के वक्त तो जीवन का कुछ भी कच्चा माल नहीं था ) - यदि रेगिस्तान में धमाका हो - तो क्या बहुत से मोबाइल फोन निर्मित हो जायेंगे - वो भी इतने परफेक्ट कि वे नए मोबाईल फोन्स को जन्म देते रहें और अपनी संतति बढाते रहें ?

सतीश पंचम said...

शिल्पा जी,

मैं भी पहले यही सोच कर हॉकिंग जैसे विचारों को कोसा करता था कि ऐसा कैसे ईश्वर के अस्तित्व को नकारा जा सकता है। किंतु समय के साथ बदलाव आते आते यही मानने लगा हूँ कि सचमुच ईश्वर एक मनुष्य की कल्पना जनित रचना है और बेहद उपयोगी कल्पना है।
यदि एक बार मान भी लिया जाय कि संसार की रचना ईश्वर ने ही स्थूल रूप में की थी तो अगला सवाल स्वाभाविक रूप से उठेगा कि फिर ईश्वर की रचना किसने की ?

rashmi ravija said...

मजाल है जो ‘बन्धु-भगिनी’ लोग मान जांय।

अब तक कोई 'भगिनी ' ऐसे कार्य में संलग्न नहीं नज़र आयीं...वो भी किसी ऑफिस में.
आपने समदर्शता दर्शाने के लिए इस शब्द का उपयोग किया क्या?...:)

shilpa mehta said...

जी सतीश जी - इसका जवाब भी साइंस ही में है - और हर धर्मं के ग्रंथों में भी है - वह यह कि - "as per science - energy and mass cannot be generated - nor destroyed - they can normally convert form - i.e - energy can change form - heat, light, etc ; and mass too can change form - coal carbon di oxide etc. Under special conditions of relativity - energy and mass can convert to each other by e = m.c.c ; thus a constant total amount of mass and energy exist in universes for all time - beyond the self generation and destruction of galaxies. To conceive or measure all the total matter and energy present in universes-is beyond our present measuring systems - for the time being , it is considered to approach to infinity (not be equal to infinity - approach towards infinity) "
और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार "ईश्वर अनादि और अनंत हैं - वे रूप बदलते रहते हैं - जो उन्हें अप्रत्यक्ष (energy) रूप में ना समझ सकें - उनके लिए स्थूल रूप (material) है - किन्तु रूप चाहे जैसा भी स्वीकार जाए - प्रत्यक्ष , स्थूल या अप्रत्यक्ष - इनमे से कोई भी रूप - जो हमारी सीमित ज्ञानेन्द्रियों (मन, आँखें, ....) से हम समझते हैं - वह अपूर्ण है"
मेरे इंग्लिश ब्लॉग पर मैंने "स्टार लाइफ साइकिल" और "एंटी मैटर " पर पोस्ट लिखे हैं - आप चाहें तो उस पर चेक कर सकते हैं http://ret-ke-mahal.blogspot.com/search/label/universe . चाहें तो मेल पर भी इस विषय में चर्चा हो सकती है |

सतीश पंचम said...

रश्मि जी,

ये ऑफिस की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि अपनी बिल्डिंग की बात कर रहा हूँ जहां पर कि मैं रहता हूँ और आसपास में कई भगिनी लोग सुबह सुबह काली वाली तमाखू मिसरी से दांत चमकाती नजर आती हैं :)
वह काली मिसरी दांत उनके चमकाती है लेकिन दीवारें बिल्डिंग की धूमिल हो उठती हैं।
और एकाध तो हैदराबादी बुढी अम्मी टाईप भी हैं जो पान का पूरा बक्सा ही लिये डोलती रहती हैं :)

सतीश पंचम said...

शिल्पा जी,

लगता है कि आपने बहुत गहन विचार मंथन किया है इस विषय पर जबकि मैं ऐसा शख्स हूँ जो रोज सुबह तीन अगरबत्ती जलाते हुए सोचता हूँ कि क्यों जला रहा हूँ, न जलाउं तो कौन सा ईश्वर अप्रसन्न हो जाएंगे :)

shilpa mehta said...

सिर्फ जानकारी के लिए - मैं तो किसी सुबह भी - एक भी - अगरबत्ती नहीं जलाती हूँ - पर ईश्वर के अस्तिव पर मुझे कोई संदेह नहीं है | आरती पूजा में ज्यादा विश्वास भी नहीं है -अविश्वास भी नहीं | वार त्यौहार पर कर लेती हूँ थोडा बहुत - वो भी शायद विश्वास की नहीं बल्कि समाज की वजह से | मैं नहीं मानती कि ईश्वर हमारी अगरबत्तियां चाहते हैं ... :)) या कि वे - यदि वे ईश्वर हैं तो - हमसे कुछ भी चाहते हैं | क्या माँ अपने दूध पीते बच्चे से कुछ चाहती है ? अगरबत्ती ? .............. अब यह तो कमेन्ट विंडो में ही डिस्कशन हो चला है .... :))

डा० अमर कुमार said...

Subscribed Comments !
It is exhilarating post.

रंजना said...

एकदम सही कहा...महत्वपूर्ण यह नहीं कि ईश्वर है या नहीं...महत्वपूर्ण यह है कि ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कितने लोग उर्जा पाते हैं, सन्मार्ग पाते हैं...यदि एक विश्वास इतना कुछ अच्छा करवाए,तो उसके अस्तित्व को मान लेने में कोई बुराई नहीं....

भय और प्रेम,यही दो अवयव हैं जो समाज को सुसंगठित व्यवस्थित रख सकते हैं...और ये दोनों ही एक परम सत्ता की अवधारणा से पूर्ण हो सकते हैं...

VICHAAR SHOONYA said...

पता नहीं ईश्वर ने हमें गढ़ा है या हमने ईश्वर को. अभी मैं कहीं पढ़ रहा था की नीग्रो लोगों ने अपने लिए काली चमड़ी वाले ईसा मसीह की कल्पना की है.

Vivek Jain said...

बहुत बढिया
साभार
- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

वाणी गीत said...

ईश्वर एक कल्पना ही सही , दुःख में जब कोई मददगार नहीं होता , वही काम आते हैं ....

यदि इस तरह से भी सफाई रह सके तो क्या बात है ...मगर चित्रों का उपयोग रास्ता रोकने , जमीन हड़पने के रूप में भी तो इसी तरह किया जाता है ...जयपुर में लगभग हर चौड़ी सड़क पर कई जगह छोटे मंदिरों रूपी अवरोध मिल जाते हैं , किसी में हिम्मत हो तो हटाकर दिखाए ...

आशीष श्रीवास्तव said...

शील्पा जी,

- यदि रेगिस्तान में धमाका हो - तो क्या बहुत से मोबाइल फोन निर्मित हो जायेंगे - वो भी इतने परफेक्ट कि वे नए मोबाईल फोन्स को जन्म देते रहें और अपनी संतति बढाते रहें ?

क्या आपने Chaos Theory पढ़ी है? यदि नही पढ़ी है तो मैं आपको उसे पढ़ने की गुज़ारिश करुंगा।

इस थ्योरी के अनुसार प्रकृति स्वयं ही पुनरावृत्ति को बढ़ावा देती है। यदि रेगिस्तान के रेत के ढेरो को देंखे या नदियों के डेल्टा को, तो वे अपनी ही पुनरावृत्ति करते दिखेंगे! इनमे तो जीवन नही है, तो पुनरावृत्ति कैसे हो रही है! किसी ईश्वर से या प्रकृति ही ऐसी है जो किसी Fractal के जैसे व्यवहार करती है ?
DNA और एक निर्जीव Fractal मे एक समानता है, अपनी पुनरावृत्ति !

मानव जीवन कुछ हजार वर्षो का है, जबकि ब्रह्माण्ड की आयु अरबों वर्ष के पैमाने मे है। ब्रह्मांडीय घटनाएँ लाखों वर्षो के पैमाने मे चलती है, जिससे यह होता है कि मानव मन जिसे समझ न पाये उसे ईश्वरीय कृति का नाम दे देता है।

वे दिन इतिहास मे ज्यादा दूर नही है, जब बीमारियों को ईश्वर का प्रकोप माना जाता था!

shilpa mehta said...

जी आशीष जी - थीअरीज़ तो मैंने बहुत सी पढी हैं - जो किसी ना किसी तरह यह प्रूव करने की कोशिश करती हैं कि ईश्वर नहीं हैं | लेकिन यह अपनी अपनी समझ है कि हम कहाँ तक आकर अपना पठन रोक देते हैं | इंटरनेट इंजिनीरिंग में एक चीज़ है - डिस्कनेक्शन प्रोटोकॉल्स में - जिसे कि "the white versus black army " कहते हैं - जिसमे आप कहाँ पर क्लोजिंग थोपते हैं सिस्टम पर - उस तरह से सिस्टम के बीहेविअर अलग अलग होते हैं | और जिसे आप प्रकृति कह रहे हैं - उसका कच्चा माल - एनरजी एंड मैटर है - जिसे आप एक लाइफ लेस, इंटलेक्ट लेस वास्तु मानते हैं - लेकिन साइंस कहती है कि ऐसा कुछ नहीं हो सकता जो पहले नहीं था , और जो अब है - वह कभी समाप्त हो नहीं सकता | only change in form is possible. तो फिर - जब एनर्जी और मैटर ख़त्म या शुरू नहीं हो सकते - तो जीवन , और बुद्धि कैसे ? मैं मानव जीवन की ही बात नहीं कर रही हूँ - जीवन मात्र - किसी भी रूप में - आप चाहें तो इस पर आगे भी डिस्कशन हो सकता है |

आशीष श्रीवास्तव said...

शिल्पा जी,

मै नास्तिक तो नही लेकिन संशयवादी (Agnostic) हूं!
Chaos Theory एक गणितीय माडेल है। इसके अनुसार सारी प्रकृति मे व्यवस्थित रूप से व्यवस्था है, चाहे वह जीवित हो या मृत, चाहे वह परमाण्विक स्तर पर हो या ब्रह्माण्डिय स्तर पर!

सर्व-शक्तिमान ईश्वर की सत्ता मे ऐसी अव्यवस्था क्यों ?
सर्व शक्तिमान ईश्वर ने जीवन के निर्माण मे इतने प्रयोग क्यों किये है? उदाहरण के लिए कैम्ब्रीयन विस्फोट ?

यह एक ऐसा विषय है जिसमे ना तो आप हार मानेंगी ना मै! बहस चलती रहेगी!

सतीश पंचम said...

@ मानव जीवन कुछ हजार वर्षो का है, जबकि ब्रह्माण्ड की आयु अरबों वर्ष के पैमाने मे है। ब्रह्मांडीय घटनाएँ लाखों वर्षो के पैमाने मे चलती है, जिससे यह होता है कि मानव मन जिसे समझ न पाये उसे ईश्वरीय कृति का नाम दे देता है।
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ईश्वर की कल्पना के पीछे यही बात लागू होती दिखती है। अमूमन देखा गया है कि प्रकृति के जिस किसी अंश पर मनुष्य का बल नहीं चलता उसे ही अक्सर दैव रूप में आराध्य माना गया है। आर्यों द्वारा जल देवता, वायु देवता, अग्नि देवता....आदि के लिये जो दैवत्व माना गया है वह इसी 'अवश' अवधारणा के तहत ही संभावित लगता है, कि जिस पर वश न चले उसे दैव रूप में स्वीकार किया जाय।

इसी प्रकार उपयोगिता की दृष्टि से भी दैवों की कल्पना की गई होगी जैसे कि प्रारंभ में दूध आदि की दृष्टि से गाय का दैवीकरण, वनों की लकड़ियों की आवश्यकता के रूप में वनदेवी....आदि।

सतीश पंचम said...

आशिष जी,

जिस संशयवाद की बात आप कह रहे हैं, संभवत: मैं भी उसे कभी कभी अनुभव करता हूँ।

मान लिजिए - जंगल में एक हिरनी अपने बच्चे को जन्म देती है। जन्म देते वक्त वहां न कोई नर्स है न कोई दाई न कुछ। ऐसे में देखा गया है कि जो हिरनी का बच्चा क्षण भर पहले जमीन पर पड़ा होता है वह थोड़ी देर में खुद ब खुद उठ कर हिरनी के थन के पास मुँह लगाकर दूध पीने लगता है।

अब सवाल यह उठता है कि उसे किसने बताया कि उसे दूध वहीं थन के पास ही मिलेगा। किसने उसे यह सहज बोध कराया कि यही उसकी माँ है और उससे ही ममत्व पायेगा, जबकि वह जंगल है और आस पास कोई नहीं।

ऐसे में उस कल्पित ईश्वर पर संशय आना स्वाभाविक है कि यह संभवत उसी ईश्वर का ही कमाल है। ऐसे में संशयवाद को बल मिलना स्वाभाविक है।

और यह भी सही कहा कि बहस तो चलती रहेगी....एक दूसरे से हार न माना जायगा..... :)

shilpa mehta said...

यह बात आपने बिल्कुल ठीक कही - यह बहस भी [ईश्वर ही की तरह :)) ] - अनादि और अनंत है | अब सतीश जी के ब्लॉग के कमेन्ट विंडो पर तो इस विषय में पूरी बहस पोसिबल नहीं ही है - तो आप चाहें तो मेरे प्रोफाइल को क्लिक कर मेल भेजें - तब आगे डिस्कशन करेंगे | क्योंकि आपके प्रोफाइल में तो इमेल लिंक मुझे मिला नहीं........

सतीश पंचम said...

शिल्पा जी,

यदि आपने ध्यान दिया हो तो अमर जी ने कमेन्ट हेतु ही यहां सब्सक्राईब किया है...औऱ इसी तरह औरों की भी इच्छा होगी कि इस बहस का आनंद लिया जाय, इससे जानकारी प्राप्त की जाय।

Chaos Theory आदि के बारे में तो मुझे पता ही नहीं था कि इस तरह की भी कोई थ्योरी है। यह आप लोगों के बहस से ही जानकारी मिली।

फिलहाल सुविधा हेतु माडरेशन हटा रहा हूँ :)

shilpa mehta said...

thanks satish pancham sir .... :)) मुझे लगा - आप परेशान हो गए होंगे , हमरी बहस मोडरेट करते करते - इसीलिए कहा था - वैसे मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है आपके ब्लॉग पर ही डिस्कशन जारी रखने में .....

Gyandutt Pandey said...

मैं तो ईश्वर में विश्वास करूंगा। मैं अपना आधार नहीं खो सकता अब!

shilpa mehta said...

hear hear - thats the spirit- :)
एक समय था कि - जो विश्वास करते थे - उनके डर की वजह से - जो विश्वास नहीं करते थे - वे भी आस्तिक बन जाते थे | .. अब उसका उल्टा हो रहा है | आधार खोने की कोई ज़रुरत भी नहीं है - और यदि आप खोना चाहें भी कई ना मानने वालों कि तरह - तो भी वह आधार इतना सशक्त है कि वही आपको नहीं छोड़ेगा |
अब मिल्की वे गैलेक्सी (आकाश गंगा ) के तारे (हमारे सूर्य सहित ) मिल्की वे के बीचके जायंट ब्लेक होल के आस पास घूमते हैं , हमारी धरती सूर्य के आस पास और चाँद धरती के आस पास | चाँद कितना ही कहे कि मैंने तो उस ब्लेक होल को नहीं देखा - इसलिए वह है ही नहीं - तो क्या वो "नहीं" हो जाएगा ? वो तो सूर्य को आधार देता ही रहेगा , चाँद माने या ना माने - उसे सहारा देना बंद नहीं करेगा ये ब्लेक होल !!! और ब्लेक होल बिल्कुल ही धार्मिक ग्रंथों की विष्णु की कल्पना जैसा है ... आप विकिपीडिआ पर चेक कर लें ....
पंचम जी की परमिशन हो तो मैं यहाँ लिंक देना चाहूंगी - जो मैंने मैटर एंटी मैटर पर और गेलेक्सीज़ पर पोस्ट लिखे हैं ... मेरे इंग्लिश ब्लॉग पर हैं - हिंदी पर अभी सिर्फ पहला भाग ही है सितारों की जीवन यात्रा का ....

आशीष श्रीवास्तव said...

जो हिरनी का बच्चा क्षण भर पहले जमीन पर पड़ा होता है वह थोड़ी देर में खुद ब खुद उठ कर हिरनी के थन के पास मुँह लगाकर दूध पीने लगता है।
यह कुछ जिनेटिक प्रोग्रामिंग की तरह है ! जब आप मोबाइल चालू करते है, वह पहले सिम धुन्धेगा, सीम मिल जाये तो नेटवर्क ढूंढेगा! हिरन के बच्चे के मामले में डी एन ए बच्चे के दिमाग में कुछ ऐसी ही प्रोग्रामिंग कर रखते है, जिन कार्यो की प्रोग्रामिंग नहीं होती, माता को उसे सिखाना होता है !

मेरे प्रोफाइल फोटो पर न जाएँ , फोटो फिलासफर की लग रही है लेकिन मैं एक अदना सा सॉफ्टवेर इंजिनियर हूँ.

shilpa mehta said...

एक्ज़ेक्टली आशीष जी - पर याद रखने की बात यह है कि मोबाइल अपने आप कुछ नहीं करता - उसे किसी मनुष्य ने प्रोग्राम किया है .... यही तो बात हम कर रहे हैं ....

आशीष श्रीवास्तव said...

बिग बैंग थेओरी में न कुछ बिग था ना ही बैंग ! जार्ज गैमाओ(इस थेओरी के सबसे बड़े आलोचक) ने इस थेओरी का मजाक उड़ाते हुए बिग बैंग नाम दिया था! लेकिन बाद में इसे यही नाम मिल गया! इस थेओरी के अनुसार ऊर्जा पदार्थ का ही रूप है, बिग बैंग से पहले सिर्फ एक बिन्दु के रूप में ऊर्जा थी, बिग बैंग के समय यह ऊर्जा पदार्थ और प्रति पदार्थ में बदल गयी, और विस्तारीत होने लगी!
स्टीफन हाकिंग के अनुसार इसमे किसी ईश्वर की आवश्यकता नहीं है! लेकिन यदि आप इस बिंदु को ईश्वर कहें तो मुझे कोई आपत्ती नहीं है! लेकिन यह ईश्वर क्या आम मान्यता वाला ईश्वर है, जो बात बात पर नाराज हो जाता है ? पूजा न करने पर दंड देता है,चढ़ावा देने पर खुश हो जाता है ?

आशीष श्रीवास्तव said...

"किसी मनुष्य ने प्रोग्राम किया है"

जीवन के लिए, या मृत वस्तुओ के लिए भी प्रकृति ही प्रोग्रामर है, जो अपने नियमो से चलती है. यह किसी दैनिक क्रियाकलाप में हस्तक्षेप नहीं करती है. ना ही हमारा कोई कार्य इसके नियमो को बदल सकता है.

Chaos Theory के अनुसार प्रकृती की हर क्रिया अव्यवस्थित होती है, जिसका पुर्वानुमान असंभव है. लेकिन इस अव्यवस्था में भी एक व्यवस्था होती है जो अपने आपकी पुनरावर्ती करती है, जैसे डी एन ए का अपनी प्रतिकृती बनाना, नदीयो का डेल्टा बनाना, किसी रेगीस्तान में रेट के तीलो का बनाना, पक्षियों के समूह में उड़ान के दौरान नेता का बदलते जाना ? इसमें किसी ईश्वर की आवश्यकता ही कहाँ है ?

सतीश पंचम said...

शिल्पा जी,

विषय से संबंधित लिंक देने के लिये काहे की इजाजत !

लिंक दिजिए :)

सतीश पंचम said...

नेट में गड़बड़ी के बाद शिल्पा जी द्वारा मोबाइल के जरिये दिया गया लिंक -


http://ret-ke-mahal.blogspot.com/search/label/universe

डा० अमर कुमार said...

.सच है, स्टीफन हॉकिंग के विचारों को उनके वैज्ञानिक भ्रम का अपरिपक्व दर्शन कहा जा सकता है । अपनी शारीरिक हालत को विज्ञान की वैसाखियों पर टिका कर वह अपने अँदर के डर को मार रहे हैं । ईश्वर के अस्तित्व को ललकारना उनके कुँठा के आवेग को दर्शाता है.. यदि हालत यहाँ से भी और नीचे गिरे तो.... यह उनका मूँदहू आँख कतऊ कछु नाहीं का अनीश्वरवाद है ।
प्रकृति के नियम न्यूटन नें नहीं गढ़े, उसने मात्र उन्हें उद्घाटित किया.. वह स्वयँ ही चिरकालिक और शाश्वत हैं ।
न्यूटन के कतिपय नियमों पर प्रश्न उठाते हुये, जिसने यह प्रतिपादित किया कि ऊर्जा को न तो पैदा किया जा सकता है, न उसे नष्‍ट किया जा सकता है केवल उसे रूपा‍न्‍तरित मात्र किया जा सकता है, वह जीनियस आइन्सटीन था । आइन्‍सटीन को भी आखिर में स्‍वयं को ईश्‍वरवादी और आस्तिक घोषित कर उस अलौकिक ईश्‍वरीय शक्ति का अनन्‍य भक्‍त कहते हुये नतमस्‍तक होना पड़ा ।
अपने देश की बात करें तो.. प्रो. ए.पी.जे. कलाम परमाणु के गुण गिनाने के क्रम में कह उठते हैं...." वास्तव में यह गति एक हज़ार किलोमीटर प्रति सेकेन्ड तक की होती है, इस अध्यधिक वेग के कारण परमाणु सँरचना एक ठोस गोले की तरह दिखती है ।... इस प्रकार हर ठोस वस्तु के भीतर काफ़ी खाली स्थान होता है, और हर स्थिर वस्तु के अँदर भी बड़ी हलचल होती रहती है । यह ठीक उसी तरह है जैसे हमारे जीवन के प्रत्येक क्षण में भगवान शिव का शाश्वत नृत्य हो रहा होता है ।"
सूक्ष्मतम कणों में व्याप्त यही अपरिमित ऊर्ज़ा सँभवतः ईश्वर को परिभाषित कर सके । कण कण में भगवान का दर्शन यूँ ही न बना होगा । इस प्रकार यह आदि शक्ति अपना अपराजेय और सर्वव्यापी स्वरूप निर्धारित करती है ।
चूँकि विज्ञान वस्तुनिष्ठता पर आधारित है, अतः वह इन्हें प्रयोगशाला में स्थापित नहीं कर पाता है । वैसे अब तक आन्सटीन के कुछ सिद्धान्त भी प्रयोगशाला में व्यवहारिक रूप से करना सँभव न हो पाया है । अखिल ब्रह्माँड ही ऎसी प्रयोगशाला हो सकती हैं ।
एक चिकित्साविज्ञानी होने के नाते मैं स्वयँ ही मानवीय सँरचना की बारीकियों और कार्यप्रणाली की पेंचीदगियों और नित खुलते इसके रहस्यों से उसी भाँति परिचित होता हूँ, जैसे ऋग्वेद-कालीन नासदीय सूक्तों के रचयिता हुये होंगे..
सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था।
छिपा था क्या कहाँ, किसने ढका था
उस पल तो अगम, अटल, जल भी कहाँ था

सृष्टि का कौन है कर्ता कर्ता है वा अकर्ता
ऊंचे आकाश में रहता सदा अध्यक्ष बना रहता
वही सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता
है किसी को नहीं पता नहीं पता नहीं है पता नहीं है पता..
आज भी लगभग यही स्थिति विज्ञानियों की भी है । पर, जो न दिखे उसे नकार दो... ऎसा कोई दर्शन नहीं कहता । स्वयँ विज्ञान भी 45% प्रतिशत अपुष्ट अवधारणाओं के सहारे खड़ा है.. फिर ईश्वर के होने या न होने पर बहस की गुँज़ाइश ही कहाँ है ?

धन्यवाद शिल्पा जी, आपके प्रयास से इस महत्वपूर्ण पोस्ट से मॉडरेशन हट सका !

आशीष श्रीवास्तव said...

डा. अमर जी,
सृष्टि का कौन है कर्ता कर्ता है वा अकर्ता
ऊंचे आकाश में रहता सदा अध्यक्ष बना रहता
वही सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता
है किसी को नहीं पता नहीं पता नहीं है पता नहीं है पता

मेरी स्थिति भी नासदीय सूक्त के रचयिता के जैसे है!मै पूरे विश्वास से नही कह सकता कि ईश्वर है या नही! इस कारण संशयवादी हूं! मेरे कुछ प्रश्न है, हो सकता है कि वे मूर्खता पूर्ण हों।
१.सर्व शक्तिमान ईश्वर की रचना परिपूर्ण होना चाहिये, लेकिन ऐसा क्यो नही है ? DNA भी mutate होते रहता है, ईश्वर ने पहली बाद मे परिपूर्ण DNA क्यों नही बनाया ?
२. ईश्वर ने कई प्रयोग किये है, कैम्ब्रीयन विस्फोट के जीबाश्म इसका उदाहरण है, क्यों ?
३.ईश्वर ने डायनोसोर बना कर, उन्हे नष्ट कर दिया ? क्यों ? यदि जरूरत नही थी तो बनाया क्यों, यदि बना लिया तो नष्ट क्यों किया ?
४. अरबो आकाशगंगाओं मे एक साधारण आकाशगंगा के एक कोने मे पड़े साधारण दूसरी पीढी के तारे के एक साधारण मध्यम आकार के ग्रह पर मेहरबानी क्यों ?

इन सभी प्रश्नो का शायद एक उत्तर है, ईश्वर की भूमिका शायद ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति(बीग बैंग) तक सीमीत हो, उसके बाद उसने ब्रह्माण्ड को उसके हाल पर छोड़ दिया हो, जो उसके फ़्रेमवर्क मे अपने आप बीना किसी दैवीय हस्तक्षेप के चलता हो।

Arvind Mishra said...

यह आपके अलावा कोई और लिख ही नहीं सकता था -
विज्ञान की पद्धति पर परखे नहीं जा सकते ईश्वर..उसकी अपनी सीमा है ..
पर यह तर्क भी पिटापिटाया है कि जो विज्ञान द्वारा सिद्ध न होता हो वह है ही नहीं -
विज्ञान मनुष्य के ऊन्नत चिंतन से ही उद्भूत है वह ईश्वर को नहीं पकड़ पाता तो वह हो ही क्यों ?
मगर हम अध्यात्म को भी क्यों नहीं दोष देते -वहां भी तो नेति नेति है ....कहाँ कौन पकड़ पाया ,साक्षात कर पाया ईश्वर को ?
उनका प्रगटीकरण केवल आख्यानो और फंतासियों तक ही सीमित क्यों है ? क्या आपको दिखे कभी ईश्वर ?
कम से कम सशंख चक्रम सक्रीट कुण्डलं ..वाले तो दिखने से रहे .....
मगर कमाल मानव मेधा का है जिसने उन्हें खोज ही नहीं डाला अपनी विराट कल्पनाशीलता से उनके असंख्य चित्र विचित्र भी बना डाले ..
मनुष्य की मेधा की ख़ूबसूरती /परख ईश्वर के न मानने से नहीं बल्कि उसके मानने और मनुष्यता को तदनुसार प्रकारांतर से देवत्व प्रदान कर देने में है ....
जरा पढ़िए तो कभी संस्कृत की ईश वन्दनाएँ -मन प्रमुदित और रोमाचित हो उठता है -मानवीय मेधा का एक नया आयाम खुलता दृष्टिगत होता है .....नमामीशमीशान निर्वाण रूपं ...

डा० अमर कुमार said...

.आशीष जी, आपके प्रश्न का आँशिक उत्तर यहाँ है ।

shilpa mehta said...

आशीष जी - कल मेरे सिस्टम में नेट में कुछ प्रॉब्लम आ गया था - सॉरी फॉर द डिले | लिंक तो सतीश जी को भेज ही दिया था - और उन्होंने पोस्ट भी कर दिया है ... धन्यवाद सतीश जी .... :))
अब - आपके प्रश्न -
"(१) स्टीफन हाकिंग के अनुसार इसमे किसी ईश्वर की आवश्यकता नहीं है! लेकिन यदि आप इस बिंदु को ईश्वर कहें तो मुझे कोई आपत्ती नहीं है!" -- आवश्यकता ? यदि ईश्वर नहीं - तो आपके मेथेमेटिकल मॉडल द्वारा जीवन की संरचना की ही आवश्यकता नहीं थी - जीवन एक पेड़ के फूल की तरह है - जैसे मैटर और ऊर्जा से मैटर और ऊर्जा का पुनः पुनः रूपांतरण और पुनर्सृजन होता ही रहता है , किन्तु यह दोनों ना कभी शुरू , ना ख़त्म हो सकते हैं - यह किसी "आवश्यकता" के लिए नहीं - यह तो एक खेल की तरह होता ही रहता है ( - जैसे आप कैरम , लूडो या चेस जमाते हैं - खेलते हैं - फिर जमाते है - फिर खेलते हैं आदि | ) वैसे ही जीवन स्रोत ईश्वर से जीवन का |
"(२) लेकिन यह ईश्वर क्या आम मान्यता वाला ईश्वर है, जो बात बात पर नाराज हो जाता है ? पूजा न करने पर दंड देता है,चढ़ावा देने पर खुश हो जाता है ?" - जी नहीं - जैसे माँ अपने बच्चे से कहती है कि पढाई नहीं करोगे तो हमेशा के लिए खेलने जाना बंद - वैसे ही धार्मिक गुरुओं ने इंसान के लिए यह सजा की बात कही | हर बच्चे को डराना नहीं पड़ता - और हर माँ अपने बच्चे को डरा कर ही गाइड करे ऐसा ज़रूरी नहीं - कोई बच्चा अपने आप समझदार है - तो कोई माँ बिना सजा के डर से भी अपने बच्चों में अच्छे गुण ला सकती हैं - उसी तरह - हर मनुष्य को एक ही लाठी से नहीं हांका जाता - और हर गुरु भी एक ही पद्धति से अपने फोलोएर्स को नहीं चलता | जहाँ इस्लाम के पुनः -स्थापक आदरणीय मुहम्मद जी ने वहां शिक्षा देनी शुरू की जहाँ उन्हें सजा के डर से पढ़ना ज्यादा उचित लगा , वहीँ जीसस की सीख दया और आपसी प्रेम पर आधारित है - क्योंकि उनके हिसाब से - उस वक्त - उन लोगों के लिए यही ठीक था| और श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन को तो कई तरह के रास्ते बताये - क्योंकि वे अर्जुन को नहीं - हम सब को संबोधित कर रहे थे | इसका अर्थ यह नहीं कि रास्ते सिर्फ उतने ही हैं जितने वहां गीता में बताये गए हैं - सिर्फ यह है कि वहां - उस वक्त और उस औडीएंस के लिए उतना ही देना था - तरीके तो और भी हैं | मेरे इंग्लिश ब्लॉग पर मैं गीता का श्लोक बाय श्लोक डिस्कशन कर रही हूँ - आपका वहां स्वागत है (http://ret-ke-mahal.blogspot.com/search/label/Bhagwad%20Geeta ) हिंदी ब्लॉग पर तो अभी सिर्फ पहला ही अंक है |
"(३) सर्व शक्तिमान ईश्वर की रचना परिपूर्ण होना चाहिये, लेकिन ऐसा क्यो नही है?" - परिपूर्ण की परिभाषा - व्हाट इस परफेक्ट ? इस इट यूनिक?? इज रोज परफेक्ट एंड लोटस इज़ नोट ? आप कैरम को परफेक्ट ज़माने के बाद स्ट्राईकर से क्यों बिगाड़ते हैं?
"(४) ईश्वर ने कई प्रयोग किये है" - नहीं - प्रयोग नहीं - खेल - लीला
"(५) आकाशगंगाओं मे एक साधारण आकाशगंगा के एक कोने मे पड़े साधारण दूसरी पीढी के तारे के एक साधारण मध्यम आकार के ग्रह पर मेहरबानी क्यों ?"
- यह आपसे किसने कहा कि सिर्फ धरती पर ही जीवन है? हिन्दू ग्रंथों के अनुसार अनगिनत ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी सिस्टम्स ) हैं - जो बनते बिगड़ते रहते हैं | साइंस ने भी यही कहा है ...
"(६) डायनोसोर बना कर, उन्हे नष्ट कर दिया ? क्यों ? यदि जरूरत नही थी तो बनाया क्यों, यदि बना लिया तो नष्ट क्यों किया ? " - लीला | हमें क्या ज़रुरत है कि पहले बच्चों को ए बी सी डी ... पढाएं - फिर शब्द ,वाक्य और निबंध - आखिर तो सब नष्ट हो ही जाना है ना (मृत्यु ) - फिर जब जीवन सिर्फ पचास या सौ साल का है - तो इतनी सिरदर्दी क्यों ? क्योंकि हम अपने बच्चों से प्यार करते हैं - जो प्यार ईश्वर की ही देन है .... यह प्यार - और केअरिंग - पदार्थ और ऊर्जा के किसी केओटिक कॉम्बिनेशन से नहीं बना - भले ही हमारा शरीर बना हो ...
bahut hi lamba cment hai - pata nahi pablish ho sakta hai ya nahi?

shilpa mehta said...

@ arvind mishra ji - yah jo aapne kaha - ki na vigyan aur na dharmashastra - eeshwar ko pakad paye - vo isliye ki hamari samajhne kee shakti seemit hai | ek choti si samudra kee boond , ya uskee gahraaiyon mein rahne vaali machhli - yadi kahe ki mujhe samjhaao ki samudra kaisa hai - to kaise samjhaya jaaye? vah bhee tab - jab samjhane vaala guru bhee usi kee tarah - bas thoda sa jyada jaankari vaala - ho?

Kajal Kumar said...

शुक्र है कि अभी पान-थुकइयों को भगवान की शर्म है...

mahendra srivastava said...

बहुत सुंदर,अच्छा लगा

सञ्जय झा said...

exceelant.........

pranam.

sudha murty said...

mr satish pancham,
i have come to this post through alinksent by my daughter - shilpa mehta - she praized your writing to me . it is a good post and rich discussion . regards

सतीश पंचम said...

Thanks a lot Sudha ji.

Rakesh Kumar said...

वाह! ईश्वर के बारे में सुन्दर बातें जानने को मिलीं.शिल्पा बहिन ,आशीष जी,सतीश जी,डॉ.अमर जी और अन्य सभी का बहुत बहुत आभार.

मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

जय हो, बहुत कुछ पढा (कितना समझा, यह नहीं कह सकता)

संतोष त्रिवेदी said...

यदि ईश्वर के अस्तित्व को आस्था से जोड़कर देखा जायेगा तो किसी तर्क या सबूत की गुंजाइश नहीं , पर यथार्थ में इसके उलट.आपका, शिल्पाजी और अमरजी का आकलन अपनी अपनी जगह सही है .आत्मबल के लिए ईश्वर का संबल गलत नहीं है .

Anmol Sahu said...

If God created the world, then from where he come? If no one create the world, then from where it come? Who is Programmer? सब्र रखिये विज्ञान हमारे हर प्रश्न का उत्तर देगा।

Dr. Er. Shilpa Mehta : डॉ. इंजी. शिल्पा मेहता said...

:) that was me on behalf of mumsy :)

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