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Saturday, May 21, 2011

हेमा मालिनी और बराक ओबामा

          आज सुबह जब मुंबई के माटुंगा इलाके में सैर के लिये निकला था तब अचानक ही स्ट्रीट लाइट के खंभों पर नज़र पड़ी। हाथों में एक कलम थामे हुए अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा थे । ध्यान देने पर पता चला कि वह किसी पेन बनाने वाली कंपनी EMonte का विज्ञापन है। हाथों में एक कलम थामे ओबामा की तस्वीर के नीचे लिखा था - G8 Summit Official Pen. पढ़ते ही मुस्कान आनी स्वाभाविक थी।


       एक ये लोग हैं कि आधिकारिक तौर पर कलम, दवात सब कुछ राजनेता की तस्वीर के साथ बेचना जायज मानते हैं, जबकि हमारी हेमामालिनी बेचारी ने एक वाटर प्यूरीफायर के बारे में सवाल क्या पूछ लिया, पूरी संसद हलकान हो उठी । गौरतलब है कि हेमा मालिनी ने सांसद रहते हुए एक वाटर प्यूरीफायर का विज्ञापन किया और उन्हीं दिनों संसद में प्रश्नकाल के दौरान सवाल पूछा था कि वाटर प्यूरीफायर वाले उत्पादों को Excise से छूट क्यों नहीं दी जाती, उन्हें छूट देना चाहिये। इधर उन्होंने सवाल पूछा उधर राजनेताओं के दिल में नैतिकता की नसें फड़कने लगी, उनके सवाल पर शक किया गया कि - हेमा मालिनी एक वाटर प्यूरीफायर के विज्ञापन से जुड़ी हैं, लिहाजा इस तरह के प्रश्न उन्हें नहीं उठाने चाहिये जिससे कि चाहे अनचाहे उस विज्ञापन दाता कंपनी को लाभ पहुँचाये। खैर, मामला धीरे धीरे शांत हुआ और समय के साथ सुन्न पड़ गया।

         ऐसा ही एक और मामला याद आता है जिसमें कि राजनीतिज्ञों पर अंकुश लगाने के लिये विख्यात पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन को जब घेरा गया था। हुआ यूं कि, श्री टी.एन.शेषन ने 'सफल' ब्राण्ड के फ्रोजन वेजिटेबल्स के लिये एक विज्ञापन किया था जिसमें वह कहते पाये गये कि 'मैं नाश्ते के तौर पर राजनीतिज्ञों को तो कच्चा खाता हूँ लेकिन दिल से वेजिटेरियन हूँ'। उनके विज्ञापन की इन्हीं लाइनों पर राजनीतिज्ञों की भौहें चढ़ गई और नतीजतन वह विज्ञापन टीवी से लुप्त हो गया। सार्वजनिक जीवन में रहने वाली हिच एन फिच :)

          अब इधर देख रहा हूँ कि मुम्बई में ओबामा कलम बेच रहे हैं। अब पता नहीं कि जाने वो कौन सा लाभ होगा एक कलम को G8 Summit का ऑफिशियल पेन घोषित करने से। उन कलम दवातों से कितना फंड उधर-इधर होगा लेकिन इतना तय है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों के प्रति जिस अंदाज में हम लोग व्यवहार करते हैं, उस से अलग किस्म का विदेशों में चलन है। वहां हर एक चीज को व्यापारिक नजरिये से देखा जाता है। कलम, टाई, रूमाल सब कुछ ऑफिशियली दाम देकर बाकायदा रसीद के साथ बेचा जाता है। इतने का टैक्स, इतने का प्रमोशनल चार्ज ..... इतने की ब्राण्ड अम्बैसडरी.....यानि सब कुछ क्लियर कट।

          जबकि भारत में सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोग यह सब खुलेआम नहीं बेच सकते। संभवत पानी, सब्जी, कलम-दवात ये सब छोटी चीजें हैं जिन्हें बेचने से साख पर असर पड़ता है। साख बनाने के लिये जमीनी अम्बेसडरी करनी पड़ती है, उसके बाद चाहे जमीन हो या जमघट, सब बेचा जा सकता है। कभी किसानों के नाम पर जमघट लगवाइये, कभी प्लांट विरोध नाम पर तो कभी पिछड़ों के नाम पर । एक बार आप ने जमघट लगवा लिया तो आप की राजनीतिक जमीन खुद ब खुद तैयार हो जायगी, फिर आप अपनी इस जमीन को बेचें या होल्ड करके रखें, यह आप पर निर्भर है.....मगर खबरदार, कभी पानी और सब्जी जैसी टुच्ची चीज बेचने की कोशिश की तो!

     आखिर 'Public life' में रहने का भी तो अपना एक स्टैण्डर्ड होता है ....... भले 'वर्चुअल' ही क्यों न हो   :)


- सतीश पंचम

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  चलते चलते -

    मेरे दूसरे ब्लॉग - Thoughts of a Lens जो कि एक फोटो ब्लॉग है, से पेश है ये छायाचित्र जिसका शीर्षक है - 'द्रौपदी'


'द्रौपदी'
      दरअसल इस 'गुलाब और पत्थर' छायाचित्र को देखते ही मुझे वह महाभारत का प्रसंग याद आ गया जिसमें कि एक ओर जुए के दौरान हारी हुई, अपमानित द्रौपदी है और दूजी ओर उसके पांचो पति राजसभा में मौजूद हैं। उनके पास द्रौपदी के अपमानित होते देखते रहने के सिवा कोई चारा नहीं, यानि कि जड़-पत्थर की मानिंद पांचो  बैठे रहे।

18 comments:

rashmi ravija said...

श्री टी.एन.शेषन वाला विज्ञापन तो मुझे बहुत ही पसंद था एकदम appropriate .

और सुबह-सुबह माटुंगा ??...वहाँ सुना है एक इलाका बिलकुल किसी छोटे से दक्षिण भारतीय शहर जैसा है.....साम्भर...रसम..फ़िल्टर कॉफी की खुशबू भरी होती है हवाओं में....अगर ब्रेकफास्ट के लिए गए थे तो फिर एक पोस्ट तो बनती है,वहाँ की :) { मेरी योजना है, एक दिन सुबह-सुबह वहाँ धमकने की }

Rahul Singh said...

एक सीमेंट कंपनी का विज्ञापन सड़कों पर देखा, हमारे बारे में फलां मेट्रो और फलां हाइवे बनाने वालों से पूछो, यह एक अलग सुर है. इन निर्माणों में जरूर यह सीमेंट लगा होगा, अमिताभ भले ही नवरतन तेल न लगाते हों.

anshumala said...

हमार देश के नेताओ को क्या टुच्ची समझ रखे है क्या आधे से ज्यादा करोड़पति होते है जो नहीं है वो नेता बनाने के बाद या तो बन जाते है या सारा पैसा किसी और के नाम से स्विस बैंक में दबा के रखते है और हमारे यहाँ नेता क्या उसके परिवार खानदान उसके चेला चपाटे सभी को सरकारी खर्च पर ऑफिशियली सब कुछ दिया जाता है पर बताया कुछ नहीं जाता |

वैसे मुझे लगता है की द्रौपती गुलाब के फुल की तरह नाजुक और कोमल नहीं थी वह तो छली गई क्योकि उसने एक दो नहीं अपने पांच पति पर भरोष कर रखा था | फोटो अच्छी है |

नीरज गोस्वामी said...

Draupdi....waah...aapke sense of humor ko slaam....

Neeraj

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सफल ने विज्ञापन के क्षेत्र में अलग ही प्रतिमान रखे थे। और सेशन साहब ने उस समय के लगभग अदृश्य चुनाव आयोग में जान डालकर आम भारतीय को यह विश्वास दिलाया था कि हर क्षेत्र में बस एक (ईमानदार और) सक्षम व्यक्ति की दरकार है। यह सही है कि यूरोप संस्कृति व्यापार की संस्कृति रही है मगर वे अपने देशों में नियम-अनुशासन तो रखते ही हैं।

Gyandutt Pandey said...

स्ट्रास कान कण्डोम का विज्ञापन करते सही जमेंगे न! :)

सतीश पंचम said...

@ स्ट्रास कान कण्डोम का विज्ञापन करते सही जमेंगे न! :)

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बिल्कुल जमेंगे :)

सतीश पंचम said...

रश्मि जी,

आपने सही पहचाना। मैं वहीं गया था। ये माटुंगा वही इलाका है जहां पर पूरा दक्षिण भारत एकाएक अपने समूचे परिवेश के साथ दिखाई पड़ता है। वहां पर स्थित इडली हाउस में कभी जाइयेगा तो वहां केवडे के पत्ते में लिपटे 'मुढो' और कटहल के पत्तों में लिपटे 'खोट्टू' का स्वाद जरूर लिजिएगा :)

सतीश पंचम said...

@ वैसे मुझे लगता है की द्रौपदी गुलाब के फुल की तरह नाजुक और कोमल नहीं थी वह तो छली गई क्योकि उसने एक दो नहीं अपने पांच पति पर भरोसा कर रखा था ।
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अंशुमाला जी, द्रौपदी के छले जाने की अवधारणा तो मेरे लिये पूरी तरह नई जानकारी है। इस नजरिये से इस घटना के बारे में कभी सोचा नहीं था।

अनूप शुक्ल said...

सही है जी।

अब कल को कोई माउस बनाने वाली कम्पनी कहेगी -सतीश पंचम यह माउस इस्तेमाल करते हैं। :)

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छा लगा पढ़कर।

प्रवीण पाण्डेय said...

पता नहीं देश बेचने वालों का विज्ञापन क्यों नहीं लगाया जाता है।

Patali-The-Village said...

बहुत अच्छा लगा पढ़कर। धन्यवाद|

Arvind Mishra said...

आजकल माधुरी बर्तन साफ़ करने वाला साबुन बेंच रही हैं ! और उनमें द्रोपदी कौन है ?
माटुंगा सुनते ही मन में में एक लायिन कौंध जाती है -जाईये नहीं सुनाता !लोग कहेंगें अश्लील है !

ajit gupta said...

बहुत बढिया जी, आपकी इस पोस्‍ट को अनरेड करके रखा हुआ था लेकिन आज एक पोस्‍ट करुणानिधि को लेकर आयी, जब उस पर पहले क्लिक किया तो वह पेज खुला नहीं। आपने उसे डिलिट कर दिया क्‍या? बड़ा तगड़ा व्‍यंग्‍य था वो।

सतीश पंचम said...

आदरणीय अजीत गुप्ता जी,

करूणानिधि वाली पोस्ट व्यंग्य के तौर पर मुझे भी अच्छी लगी थी, लेकिन कहीं न कहीं स्टीफन हॉकिंग को बीच में लाना मुझे जंच नही रहा था। इसी बीच एकाध टिप्पणी आपत्ति के रूप में भी आई जिसका मान रखते हुए उस पोस्ट को हटा दिया ।

anshumala said...

अरे कम से कम दो दिन बाद पोस्ट हटाते ताकि सभी उसे पढ़ तो लेते एक तो वो व्यंग्य था उस पर से अजित जी तारीफ कर रही है तो पोस्ट पढ़ने की इच्छा और हो गई |

रंजना said...

कभी किसानों के नाम पर जमघट लगवाइये, कभी प्लांट विरोध नाम पर तो कभी पिछड़ों के नाम पर । एक बार आप ने जमघट लगवा लिया तो आप की राजनीतिक जमीन खुद ब खुद तैयार हो जायगी, फिर आप अपनी इस जमीन को बेचें या होल्ड करके रखें, यह आप पर निर्भर है.....मगर खबरदार, कभी पानी और सब्जी जैसी टुच्ची चीज बेचने की कोशिश की तो!


सही...सौ टका सही....

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