सफेद घर में आपका स्वागत है।

Wednesday, May 18, 2011

एक साहित्यकार, एक शिश्नजीवी पुत्र, एक कथा कोलाज और ढेर सारे जीवनानुभव

       कुछ साहित्यिक रचनायें इस तरह की होती हैं कि दिल पर अपनी अमिट छाप छोड़ देती हैं। उन्हें पढ़ने के बाद भी काफी समय तक उपन्यास की बातें जेहन में घूमती रहती हैं। ऐसी ही एक कृति है अमृतलाल नागर जी की जिसे कि साहित्य जगत में 'अमृत और विष' के नाम से जाना जाता है और साहित्य अकादमी से पुरस्कृत भी है।          

       मैं इस उपन्यास के बारे में काफी कुछ लिखना चाहता था लेकिन संशय था कि मैं अपनी बातों से सही सही न्याय कर पाउंगा या नहीं। इसलिये पुस्तक के कुछ अंशों को ही यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ। पाठक खुद इस कृति के बारे में अंदाजा लगायें कि कितनी सशक्त रचना है - 'अमृत और विष'।

   उपन्यास के मूल में हैं साहित्यकार श्री अरविन्द शंकर , जिनके कि उम्र के साठवां पड़ाव छूने पर साहित्य प्रेमियों द्वारा षष्टि-पूर्ति का आयोजन किया जाता है। इसी षष्टि-पूर्ति के दौरान जब लोग लेखक की खूब बड़ाई करते हैं, मान सम्मान करते हैं तो साहित्यकार अपने भीतर ही भीतर कुछ अजब भाव महसूस करता है। अजब इसलिये कि उसके जीवन में कई ऐसे स्याह पन्ने हैं जो उसे असम्मान के लायक बनाते हैं। उसे याद आता है कि उसका एक बेटा शिश्नजीवी है। शिश्नजीवी इसलिये कि अपनी प्रेमिका से ब्याह कर पढाई छोड़कर कैरियर चौपट कर चुका है और जब समय बीतते प्रेम कम हो गया तो उसे छोड़ बैठा। जीविका न मिल पाने पर यहा वहां की भटकन उसे एक धनी महिला के चक्कर में ले उड़ी और अब उसी बेटे भवानी के बारे में सोच सोच साहित्यकार परेशान है। लोग पढ़ाई करके धन कमाने वाले बुद्धिजीवी होते हैं, लेकिन भवानी ऐसा निकला कि जीविका हेतु शिश्नजीवी बन गया अर्थात एक दूसरी अमीर महिला के पैसों पर जीवन यापन करने लगा।   

  पुस्तक के अंश से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस मन:स्थति में लेखक गुजर रहा है - साहित्यकार लिखते हैं ..... 

      मैं डर रहा था कि अभी हाल के किसी कोने से मेरे पुत्र भवानी का ससुर चिल्लाकर कहने ही वाले होंगे - यह व्यक्ति पूजा पाने योग्य नहीं है। इसके लम्पट बेटे ने मेरी सुन्दर सुशीला और साध्वी बेटी को पहले अपने प्रेमपाश में फंसाया, मुझे उसके अंतर्जातीय विवाह के लिये सजातीय कलंक सहना पड़ा और अब उसे तथा अपनी दो सन्तानों को निराधार छोड़कर उसने एक कुल्टा प्राध्यापिका को अपना तन-मन अर्पित कर रक्खा है। और ये, महान लेखक, उदार और न्यायवान कहलाने वाला नीच अरविन्द मेरे बार बार लिखने पर भी अपनी पुत्र-वधू और पोतों को अपने पास बुलाकर नहीं रखता। मेरे पत्रों का उत्तर नहीं देता। मेरे जैसे दीन-हीन बूढ़े क्लर्क की गृहस्थी पर खर्च का एक अतिरिक्त बोझ डाले हुए इसे शर्म नहीं आती।


.....

....

        मुझे लग रहा है कि स्वंयम् मेरा ही अन्तर सत्य अभी अभी इस हाल में गूँज उठेगा। " तू मानवता और इमानदारी के झण्डे उठाता है, तूने अपनी पत्नी और लड़कों के दबाव में आकर केवल अपनी लड़की का सुख ही सामने रखकर, कल उसे देखने के लिए आये हुए प्रस्तावित वर और उसके पिता को यह नहीं बतलाया कि इस लड़की को पहले क्षय रोग हो चुका है। तू युधिष्ठिर के समान नरो वा कुन्जरो वा कहकर ही झूठ-सच बोल देता। कहता, हांलाकि इस समय यह पूर्ण स्वस्थ है, पर इस रोग को लेकर कभी कुछ कहा नहीं जा सकता। तू स्वार्थी है, कायर है, श्रीहीन है। तुझे अपनी षष्टि-पूर्ति पर समाज से यह सम्मान पाने का अधिकार नहीं है।


........
      इस बीच समय बीतता है, लोग काफी मान सम्मान देते हैं..... लेखक का  दूसरा बेटा आई ए एस बन जाता है।  लेकिन अभी शिश्नजीवी भवानी की चिंता लगी है। ढेरों कुछ भुगतना बाकी है। लेखक आगे लिखते हैं ----
       मैंने अभी हाल ही में हुए दो प्रेम-विवाहों की असफलता को भी देखा है। ये प्रेमिक पति-पत्नी प्रेम का नशा उतरते ही एक दूसरे को अपनी जाति जतलाने लगते हैं। आर्यसमाजी और सिविल मैरेज कानून से किए गये विवाह-कर्म का बन्धन उनके मन में बच्चों के खेल के समान ही फुसफुसा और बेबुनियाद हो जाता है। हाँ, जो युवक या युवतियाँ छोटे शहरों में बँगले वाले समाज से या बड़े शहरों में फ्लैटों वाले समाज से जुड़े हुए हैं, उनमें यह जातिगत भावना किसी भी स्तर पर नहीं सताती। महल्लों के संस्कारों से घिरा हुआ मेरा भवानी जब अपना कैरियर चौपट हो जाने के बाद प्रेम से अघा गया, तो अपनी पत्नी के ब्राह्मण्त्व को बात-बात में तुच्छ बताने लगा। मैंने एक दिन उसे समझाने की कोशिश की, कहा कि पश्चाताप करना या दुखी होना अच्छी बात नहीं। तुम किसी भी समय अपने को फिर से सफलतापूर्वक खड़ा कर सकते हो। मैने उससे यहां तक कहा कि कमाने की चिंता छोड़ दो, तुम पढ़ो और अपना इच्छित कैरियर पाओ। मैं खुशी से तुम्हारा सारा खर्च उठाउंगा।


भवानी भावावेश में आकर रोने लगा - बोला, मुझे एम ए करने से पहले अपने आपको शादी से बचाना चाहिए था।, गलती तो तभी हो गई। मैं एक गलत चीज के प्रेम में फंस गया।


    मैंने कहा - छुटकू अगर तुम्हारा प्रेम सच्चा था तो तुम्हें पछतावा न होना चाहिए।


- पछतावा मुझे इस बात का है कि मेरा सच्चा प्रेम इसके झूठे प्रेम के धोखे में आ गया।


- इसके प्रेम में झूठ क्या था भाई ?


- आप माडर्न माइण्ड को नहीं समझ सकते पिताजी। ये मेरे जैसे कल्चर्ड और रीफाइण्ड टेम्परामेन्ट के आदमी को सूट ही नहीं करती।


- अब तुम ज्यादती कर रहे हो छुटकू, उस समय जब मैं तुम्हें समझाता था, तब तुम्हें उषा में सारे गुण ही गुण दिखाई देते थे।


- वह इन्फ्लक्चुएशन था।
..............

     ऐसा नहीं कि लेखक केवल अपने पुत्र के बारे में ही सोच सोच हलकान है। पारिवारिक चिंता के  साथ साथ साहित्यकार अरविंद शंकर अपने लेखकीय अनुभव भी लिखते जा रहे हैं मसलन -

        दोपहर। उहुँ...। आलस है। लिखने, सोचने, कुछ भी करने को जी नहीं चाहता। बस सो जाउं, यानी थोड़ी देर के लिए मर जाउँ। आज कढ़ी बनी और स्वादिष्ट इतनी थी कि भात अधिक खा गया। अफरन के कारण लिखने की इच्छा नहीं। वैसे भी चालीस की आयु के बाद मनुष्य को भोजनोपरान्त 'वाम-कुक्षि' नींद लेनी चाहिए, आयुर्वेद का प्रमाण है - मैं तो इकसठ का हूँ।- धत् ..बेकार ही अपने इकसठ की आड़ ले रहा है। कल, परसों, नरसों इकसठ का नहीं था ? नहीं लिखता तो न सही, बहाने क्यों बनाता है।

  आगे साहित्यकार फिर अपने परिवार की ओर रूख करते हुए लिखते हैं कि -

       भवानी के बच्चे आ गये। आज सुबह से बहाने-बे बहाने से मैं कई बार घर के अंदर हो आया हूँ। ददिहाल अभी बच्चों के लिये एकदम नई है। उनकी जिद और चीख पुकार से मेरा घर गुंज रहा है। उषा को मैंने ध्यान से देखा, यहाँ आ जाने से उसके चेहरे पर निश्चय ही संतोष की कुछ रौनक सी आ गई है। इन औरतों का मन भी अजब होता है। विवाह होते ही स्वयम् उनके मनों में भी अपने पीहर के लिए परायेपन का भाव आ जाता है। लेकिन ऐसा मानस परिवर्तन शायद सब स्त्रियों में नहीं हो पाता। बहुत सी औरतें मैंने ऐसी भी देखी हैं, जो जन्म भर अपने मैके के महात्म्य को नहीं भूल पातीं। मेरा ख्याल है कि धानाधीशों और सत्ताधारीयों की लड़ैती बेटियाँ ही अधिकतर इस मनोवृत्ति की होती हैं। जो हो, बहुओं की दृष्टि से मैं अब तक सौभाग्यशाली हूँ।
............

        इस तरह के तमाम लेखन और अपने जीवन को अभिव्यक्त करते हुए अमृत और विष की कथा आगे बढ़ती चली जाती है। यहां बता दूं कि अपने उपन्यास में लेखक अरविंद शंकर,  अपने पात्रों - रमेश, लच्छू और रानी के जरिये अपने जीवन अनुभव और तमाम बातों को सुरूचिकर ढंग से आगे बढ़ाते हैं। इनकी कहांनिया लिखते समय हो रहे अनुभवों के बारे में साहित्यकार लिखते हैं -

   बहुत चाहने पर भी इधर अपने उपन्यास को मैं तनिक भी आगे न बढ़ा सका। प्रकट रूप में इसका कोई भी कारण मुझे नहीं सूझ रहा। यों मेरा मन इन दिनों प्रतिकूल परिस्थितियों की शिकायत भी नहीं कर सकता। यह भी नहीं कह सकता कि मैं इन दिनों आलस्य में पड़ा रहा। मैं प्राय: आलसी नहीं हूँ, पर अपने जीवन भर के पिछले अनुभवों के आधार पर अवश्य ही कहने को जी चाहता है कि कभी-कभी अकारण ही मेरी कल्पना-शक्ति जमकर काम करने से इन्कार कर देती है। इस शक्ति के विकेन्द्रित होते ही मेरा मन एक असीम आकाश में उड़ने वाले पक्षी की तरह लगातार मँडराता ही रहता है। न छाँह, न विश्राम और न थकन न ऊब ही। चेतना होश दिलाती है कि मनपंछी, अब शून्य या आकाश से उतरो। कार्य-संलग्नता में विश्राम पाओ। विचारों के घनाच्छादित वृक्ष की छांव में , अपनी लगन के नीड़ में स्वस्थ होकर विराजो। लेकिन ये आत्मसंबोधन चिकने घड़े पर पानी की तरह फिसल जाते हैं। न जाने इसके पीछे क्या कारण है। ऐसा लगता है कि मनुष्य की कल्पना शक्ति भी चन्द्रमा की तरह घटती बढ़ती रहती है। और उसके लिए अमावस्या भी कभी न कभी इसी क्रम में आ ही जाती है।.......इस अमावस्या की बात से सहसा ध्यान आया कि चन्द्रमा तो सदा यथावत् ही रहता है, चन्द्र और पृथ्वी के परिक्रमणों से हमें उसके घटने-बढ़ने का भ्रम -मात्र होता रहता है। मेरे जीवन का यथार्थ और कल्पनाशील व्यक्तित्व शायद इसी क्रम में मेरे काम के लिए पूनम और अमावस आते ही रहते हैं।

  कुल मिलाकर मेरी नज़र में एक उत्कृष्ट कृति है। साहित्य रसिकों के लिये यह उपयुक्त तो है ही, और भी बातों जैसे जीवन के अनुभवों, मूल्यों, आस्था, नैराष्य, आलस्य,  आदि तमाम बातों को समझने, जानने के लिये एक श्रेष्ठ कृति है 'अमृत और विष'।

- सतीश पंचम


पुस्तक अंश - अमृत और विष
लेखक-  अमृतलाल नागर
लोकभारती प्रकाशन
मूल्य - 195 /- (पेपरबैक संस्करण)

14 comments:

anshumala said...

वाकई उपन्यास अच्छी लग रही है अब तो पढ़ने का कुछ इंतजाम करना होगा |

डा० अमर कुमार said...

टिप्पणी परिमितता अनुकूलन ( अरे वही कामेन्ट माडरेसन ) में त्वरित पारस्परिक सँवाद की सँभावनायें क्षीणतम हैं, अस्तु इसे ही टीपदाता का योगदान समझा जाये :)

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

पुस्तक बडी रोचक लग रही है। धन्यवाद!

Rahul Singh said...

लाजवाब हैं नागर जी.

ajit gupta said...

अमृत लाल नागर तो एक ऐसा नाम है जिसके उपन्‍यास हमारे दौर में खूब पढ़े जाते थे लेकिन दुर्भाग्‍य से अब फिल्‍मों के कारण पढ़ने का वह दौर समाप्‍त हो गया है।

Hamarivani said...

क्या आप हमारीवाणी के सदस्य हैं? हमारीवाणी भारतीय ब्लॉग्स का संकलक है.


अधिक जानकारी के लिए पढ़ें:
हमारीवाणी पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि

हमारीवाणी पर ब्लॉग प्रकाशित करने के लिए क्लिक कोड लगाएँ

Gyandutt Pandey said...

खतरनाक सा शब्द है यह शिश्नजीवी।
बाकी, किताब तो जरूर पढ़ेंगे जी!

सञ्जय झा said...

sundar................
a b h a r.............

रंजना said...

अवश्य पढूंगी....

बहुत बहुत आभार आपका...

Arvind Mishra said...

एक कालजयी कृति से परिचय कराने के लिए आभार

rashmi ravija said...

ऐसी किताबों का जिक्र...मन में एक कसक पैदा कर देता है...मन होता है...अब ये लिखना-विखना छोड़ सिर्फ पढ़ा जाए....
अब तो हिंदी पुस्तक मंगवाने की सुविधा भी हो गयी है.
अमृतलाल नागर की ढेर सारी किताबें पढ़ी हैं...पर लगता है...एक सदी गुजर गयी...

प्रवीण पाण्डेय said...

लगभग 20 वर्ष पहले पढ़ी थी यह पुस्तक, सब यादें ताजा हो गयीं।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अच्छी लगी यह पोस्ट।

अनूप शुक्ल said...

अच्छा है। नागर जी का यह उपन्यास उनके सबसे अच्छे उपन्यासों में से हैं। अभी कुछ दिन पहले इसे फ़िर से पढ़ा। पोस्ट में जिक्र अच्छा लगा। :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.