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Sunday, May 15, 2011

शासक की 'मंशा' और शासित की 'दशा'......अजबै घात-प्रतिघात

        इधर पांच राज्यों में चुनाव हुए नहीं कि तड़ से पेट्रोल के दाम बढ़ा दिये गये, कुछ इस अंदाज में कि जैसे सरकार बस इन्हीं चुनावों का इंतजार कर रही हो कि एक बार चुनाव निपटे तो दाम बढ़ाये जांय। खैर, दाम पहले भी बढ़ते रहे हैं, अब फिर बढ़े हैं और आगे भी बढ़ते रहेंगे। इसमें कोई नई बात नहीं है। लेकिन जिस तरह से चुनावों को ध्यान में रखकर अब तक दामों को बढ़ने से रोका गया और चुनाव निपटते ही दाम तेज कर दिये गये वह सरकार की नीयत और उसके शुचिता पर अनेक सवाल खड़े करता है।


       सवाल इसलिये, क्योंकि कोई भी सरकार अपनी जनता को धोखे में रखकर वोट बटोर लेने के बाद, जब तुरंत ही अपने किये गये वादों के विपरीत दाम बढ़ाकर अपनी तिजोरी संजोने में लग जाय तो यह राजनीतिक दृष्टिकोण से भले ही पॉलिटीकल करेक्टनेस कहलाये, किंतु नैतिक दृष्टि से उचित नहीं कहलाएगा। देखा जाय तो चुनाव होते ही, तुरंत दाम बढ़ाना एक तरह से घात लगाकर जनता को ठगने सरीखी बात है। लोगों ने विश्वास करके अपने वोट दिये थे, कि और बोझ न भी पड़े, कम से कम यथास्थिति तो बनी रहे, लेकिन यहां यथास्थिति की कौन कहे, चुनाव होते ही व्यथास्थिति ही दिखाई दे रही है। जाहिर है, जब सरकार की मंशा ही सही नहीं है तो क्या यथास्थिति और क्या व्यथास्थिति....सब बराबर। अब पेट्रोल के बढ़े दामों की वजह से महंगाई बढ़े तो बढ़े, सरकार को क्या फर्क पड़ता है। अब तो चुनाव हो गये। आगे जो होने वाले भी हैं तो अभी साल- डेढ़ साल का बखत बाकी है। तब तक तो सरकार सांस ले-ले तो क्या हर्ज है।

        उधर अदालत की ओर से अनाज सड़ने पर चिंता जताई गई है और निर्देश जारी किया गया है कि इस बार फसल अच्छी हुई है, देश में भुखमरी न होने पाये, राज्य अपने अपने कोटे का अनाज उठा लें।

     अब इस निर्देश का कितनी कड़ाई से पालन किया जाता है, पालन होता भी है या नहीं, ये तो वक्त बतायेगा, लेकिन इसमें शंका नहीं कि यदि इन छोटे-छोटे कदमों को ही यदि ध्यान में रखकर कार्यक्रम तय किये जांय और उनका सख्ती से अनुपालन हो तो बार बार महंगाई का रोना न रोना पड़े। तेलों के दाम यदि अंतरर्राष्ट्रीय बाजार के दबावों के चलते बढ़ें भी तो खाद्यानों की प्रचुर उपलब्धता से दाम तो काबू में रहें ही। यह तो कोई बात नहीं हुई कि हमारी सरकारें तेल के दाम बढ़ाने को लेकर अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार का नाम ले अपनी लाचारी जतायें लेकिन देश के भीतर ही उन कदमों को उठाने से परहेजी करें जिनसे कि खाद्यानों की सर्व-सुलभता सुनिश्चित हो रही हो।

        फिलहाल, उम्मीद तो यही की जा रही है कि कैबिनेट में स्थित तमाम महान आत्माएं अबकी खाद्यानों को सड़ने न देंगे और तेल के बढ़े दामों के बावजूद महंगाई को नियंत्रित कर पाएंगे। वैसे, अब तक प्राप्त अनुभवों से कम से कम उम्मीद तो रख ही सकते हैं, इतना तो हक बनता है......वास्तविक रूप से इन अदालती निर्देशों का क्रियान्वयन होना न होना अलग बात है :)


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां का शेयर मार्केट तेल के बढ़े दामों के आलोक में सोमवार के दिन 'झुल्लन-टुल्लन' होने को बेताब है ।


शासक की 'मंशा' और शासित की 'दशा' - अजबै घात-प्रतिघात  

समय - वही, जब रोमन शासक को जनता की ओर से फसल अच्छी होने के उपलक्ष्य में भेंट प्रस्तुत की जा रही हो और पीछे खड़ी उसकी रानी कहे - फसल अच्छी होने का मतलब है कि लोगों का पूरा ध्यान अपनी खेती पर रहा है। तब तो जरूर पिरामिड, क्रीडागार, और वो तमाम पत्थरों से होने वाले मूर्ति निर्माण स्थल आदि जनता द्वारा  दुर्लक्षित हुए होंगे।

   और तभी रोमन राजा अपनी प्रिय रानी से रोश प्रकट करते हुए कहे - हे रानी, होश में आओ...... यह रोम है..... कोई उत्तर प्रदेश नहीं।


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चलते चलते -

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Thoughts of a Lens  (http://lensthinker.blogspot.com) - Satish Pancham

11 comments:

मनोज कुमार said...

मंशा पर सवाल उचित है।

Kajal Kumar said...

जनता का पिछवाड़ा बहुत विशाल और मज़बूत होता है जिसे आदत ही है वहां जुतियाए जाने की, सदियों से....

Arvind Mishra said...

यह तो सरासर जुल्म है ...पेट्रोल माफिया की झोली भरेगी अब तो

प्रवीण पाण्डेय said...

मंशा तो मालूम ही रहती है पर राजनीति में टाइमिंग हगुत ही महत्वपूर्ण है।

Gyandutt Pandey said...

तो यह राजनीतिक दृष्टिकोण से भले ही पॉलिटीकल करेक्टनेस कहलाये, किंतु नैतिक दृष्टि से उचित नहीं कहलाएगा।
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ये नैतिक क्या होता है जी?! आज की राजनीति में एण्टरटेनमेण्ट की आस रखें, नैतिकता की कोई ग्रण्टी नहीं! :)

rashmi ravija said...

देखा जाय तो चुनाव होते ही, तुरंत दाम बढ़ाना एक तरह से घात लगाकर जनता को ठगने सरीखी बात है।
बिलकुल सही बात

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

ये तो सरकार है असरकार नहीं!!!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

विडम्बना यह है कि बहुसंख्यक वोटर इस तरह के चालू पैंतरेबाजी के भुलावे में आ भी जाते हैं। शायद वोटर के पास कोई विकल्प भी नहीं है।

अनूप शुक्ल said...

पेट्रोल के दाम जिस गति से बढ़ रहे हैं उससे लगता है कि साइकिल का जमाना आयेगा फ़िर लौटकर।





तस्वीर चकाचक!

सञ्जय झा said...

ghat-pratighat par post ne
kuthar-ghat kar diya lagta hai....

bakiya chalte-chalte ne kafi waqt
roke rakhha.....

rapchik....jai ho.

रंजना said...

मन तो मनो भारियाया हुआ है..इसलिए आपकी पोस्ट की आशाजनक बातों पर सुस्ताये हुए खाली " देखते हैं" कह कर निकल जाने वाला था ....

लेकिन ई जो आप दे दिए न...

"समय - वही, जब रोमन शासक को जनता की ओर से फसल अच्छी होने के उपलक्ष्य में भेंट प्रस्तुत की जा रही हो और पीछे खड़ी उसकी रानी कहे - फसल अच्छी होने का मतलब है कि लोगों का पूरा ध्यान अपनी खेती पर रहा है। तब तो जरूर पिरामिड, क्रीडागार, और वो तमाम पत्थरों से होने वाले मूर्ति निर्माण स्थल आदि जनता द्वारा दुर्लक्षित हुए होंगे।


और तभी रोमन राजा अपनी प्रिय रानी से रोश प्रकट करते हुए कहे - हे रानी, होश में आओ...... यह रोम है..... कोई उत्तर प्रदेश नहीं। "

बस झरफरा गया मिजाज...

का कहें हैं...जबरदस्त..

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