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Saturday, May 7, 2011

'तबकेबाज भारत' की 'तबक्की जनता'

 सुविधाभोगी जूतों की आरामखोरी v/s मेहनतकश चप्पलें 
      कभी कभी मुझे लगता है कि भारत और इंडिया दो अलग देश हैं, जिनकी जमीन की रजिस्ट्री एक ही आफिस में, एक ही टेबल पर साथ-साथ हुई, लेकिन उस रजिस्ट्री के बाद भारत अपने उन कागज पत्तरों संभालने में लगा रहा जबकि इंडिया उन्हीं दस्तावेजी कागजों के राकेट बना हवा में उड़ाता रहा। 

     देख रहा हूँ कि इंडिया जो कि अपने दस्तावेजों के राकेट बना बना कर उड़ा रहा था, अब सचमुच हवा में उड़ने लगा है....सीधे आसमान की ओर.....रूपयों की पतंग और सुविधाओं की डोर थामें-थामें तो उधर भारत आज भी अपने उन्हीं कागज पत्तरों को संभालने में लगा है।  दरअसल मौका था यूनिक आईडेंटिफिकेशन कार्ड बनवाने का जिसके बारे में पूछताछ करने मैं अचानक ही मुंबई के एक सेन्टर में जा पहुंचा। अचानक इसलिये कि आज शनिवार के दिन बिजली का बिल भरने जब जा रहा था तब रास्ते में पड़ने वाले स्कूल के बाहर जुटी भीड़ से पता चला कि यहां यूनिक आइडेंटिफिकेशन कार्ड बनाया जा रहा है और ये भीड़ उसी के लिये एकत्रित है। मैंने थोड़ा रूककर और जानकारी लेना ठीक समझा क्योंकि देर सबेर मुझे भी यह कार्ड परिवार सहित बनवाना तो ही है।

      मैंने ध्यान दिया तो जो भीड़ थी वो पूरी की पूरी आस पास की झुग्गियों के लोगों की थी, उनमें ज्यादातर सब्जीवाले, दूधवाले, आटोवाले, टैक्सीवाले, छोटे दुकानदार जैसे लोग ही थे, कोई नौकरीपेशा या कह लें कि सुविधाभोगी वर्ग का शख्स न दिखाई पड़ा। वैसे भी सब्जी, दूध वाले इसी तबके को मैंने देखा है कि इलेक्शन के दौरान यही अभावग्रस्त  तबका जमकर हिस्सा लेता है, जबकि अपने लिये सुविधाओं की मांग करता, चें...चें...पें पें करता  सुविधाभोगी वर्ग उस दिन सिविक सेंस छोड़ अचानक 'सिनिक' हो उठता है...."हमारे एक वोट से देश में कोई बदलाव न होगा" सोचते हुए छुट्टी मनाता अपने घर पर पड़ा रहता है।
  
   एक जन से जब मैंने पूछा कि क्या करना होगा, कौन कौन से डाक्यूमेंट लगेंगे तो दो जन पास आते हुए साथ साथ बोले - पैन कार्ड, राशन कार्ड का 'झिराक्स' लगा दो, इलेक्सन कार्ड का भी।

- उसके बाद ? 

- उसके बाद फार्म जमा करने का....एक दिन कागद-बीगद चेक करेगा..... बाद में ओ लोग बोलेगा कि कबी आके फोटो बिटो 'पाड़ने' का....ओ दिन फेमिली का सब लोग को लाके फोटो खिचाने का।

- कितना तारीख तक चलेगा ? 

- साल से उपर चलेगा अभी तो ।

- साल से उपर ?

- हां, फिर क्या ? इतना जल्दी नईं होने का.....कितना पब्लिक है....सबका बनाते बनाते साल तो निकलना मांगता - दूसरा हंसते बोला।

      मै भी मुस्कराते हुए आस पास का मुआयना करता रहा। मन ही मन सोच रहा था कि, मैंने पूछा तो एक ही शख्स से था लेकिन बताने के लिये दो चार जन बता रहे थे।  कहीं मैं शक्ल से लल्लू तो नहीं लग रहा हूँ :-)
    
     जहां तक मैं जानता हूँ.....आपको यदि किसी कागजी काम में जानकारी नहीं है तो जिस किसी को भी उसके बारे में जानकारी होगी तो वह जरूर आगे बढ़कर मदद करता है, जबकि तथाकथित             सुविधाभोगी वर्ग ऐसे समय या तो अपने मोबाइल में नजरें गड़ाये गिटिर पिटिर करेगा या थोड़ा बहुत बता कर टरका देगा।  

  अभी मैं ये सब पूछ ही रहा था कि एक महिला लाईन में झगड़ने लगी....लोग कहते कि लाईन से आओ तो वह अपनी तेरह चौदह साल की बेटी की ओर इशारा करते कहती - इसको इस्कूल को जाने का है.....खाड़ा हो जाएगा.....कल भी आया था ....पेपर बरोबर नईं बोल के वापस भेजा। 

 मुझे अचरज हुआ कि स्कूलों में तो छुट्टी चल रही है गर्मियों की....फिर ये बच्ची किसी भी एंगल से ऐसे 'बजर-बोर्ड' की नहीं प्रतीत हो रही थी जोकि गर्मियों में स्कूल चलाते हों। खैर, थोड़ी बहुत झिकझिक के बाद वह महिला अपनी बेटी समेत लाईन में लग गई। मैं दो चार मिनट और वहां खड़ा रहा फिर अगले किसी दिन आने की सोच चल पड़ा। 

          अब जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ तो सोच रहा हूं कि ये वही भारत है जो अक्सर इलेक्शन कार्ड बनवाने, राशन कार्ड बनवाने की लाइनों में ज्यादातर दिखाई देता है, जबकि अखबारों में कालम लिखने वाला तथाकथित चिंता जताने वाला इंडिया ऐसे किसी लाइन में नदारद नज़र आता है और यदा कदा दिखाई भी देता है तो मीडिया के कैमरे के सामने अपनी उंगली पर लगे काले निशान को दिखाता हुआ.....मानों एहसास दिला रहा हो कि देखो......अपनी छुट्टी तुम लोगों पर कुर्बान किया हूँ.....एहसान तो मानों  यारो :-)
  
    
- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर मेरा 'यूनिक आइडेंटिफिकेशन कार्ड' कॉन्सेप्टायन स्टेज पर है।
 
समय - एक पच्चास..... 

( रिक्शे में सफर करते टंगड़ियों को अबकी गाँव जाने पर खुद ही खेंचा था.....जबकि बाकी के चित्र गूगल बाबा से साभार अधिभार सहित  :)

14 comments:

Kajal Kumar said...

अखबारों में कालम लिखने वाला तथाकथित चिंता जताने वाला इंडिया ऐसे किसी लाइन में नदारद नज़र आता है....

आमतौर से ऐसा इसलिए होता है क्योंकि यह वर्ग इन सबके बिना भी काम चला लेता है जबकि इस लाइन में लगने वालों को हर तरह के कागज रखने ज़रूरी होते हैं पता नहीं कब कौन, कौन सा काग़ज मांग ले...

Vivek Rastogi said...

कहाँ चक्कर में पड़ रहे हैं, चिंता न करें सरकार खुद घर पर आकर कार्ड बना देगी, किसी लाईन वाईन का झंझट नहीं है, ये तो उनके लिये है जिनको कुछ पता नहीं। आखिर सरकार भी तो अपने कर्मचारियों को कुछ टार्गेट देती है, जो उन्हें पूरे करने ही होते हैं, और जो मास्टर अभी दादागिरी दिखाकर कागज रिजेक्ट कर रहे हैं, वे ही आपकी सोसायटी में आकर चुपचाप फ़ार्म भरकर ले जायेंगे। वैसे जनगणना के समय ये फ़ार्म भरकर ले जाया जा चुका है।

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी की ई-मेल से प्राप्त टिप्पणी

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रिक्शे पर जूते और चप्प्ल वाला फोटो ग़जब है! केवल वह चित्र ही एक पोस्ट बन सकती थी।
बहुत प्रतीकात्मक है!

बड़े लापरवाह हो भाई!

वहाँ मुम्बई में कोई फोटो कम्पटीशन हो तो इसे अवश्य भेजना। टाइम्स के एक दिन इंडिया (या ऐसा ही कुछ था) अभियान में भेज देना था।

Rahul Singh said...

अब तो मानों आदत बन गई है.

अनूप शुक्ल said...

यूनीक पोस्ट आइडेन्टीफ़ाइड! :)

मनोज कुमार said...

हम तरक्क़ी कर गए हैं।

Shiv said...

बहुत बढ़िया पोस्ट है.

जिन्हें दो किलो चावल के लिए बारह तरह के कार्ड चाहिए उन्हें चिंता तो रहेगी ही. बात केवल एक ही है. सरकारी लोग उनका कार्ड थोड़ी तकलीफ देकर भी बना दें.

जहाँ तक एक समाज के वोट करने की बात है तो बदलाव आएगा. मुझे लगता है जल्द ही आएगा. रोना यह है कि तबकेबाज भारत वालों को यह लगता है कि सरकार बिना तबके वालों के लिए काम करती है और बिना तबके वालों को लगता है कि सरकार तबकेबाजों के लिए काम करती है. यह शोध का विषय है कि सरकार दरअसल किसके लिए काम करती है?

प्रवीण पाण्डेय said...

हम तो न जाने कब से भारत को ढूढ़ रहे हैं।

राज भाटिय़ा said...

भारत के वासियो का खुन पी कर यह इंडिया ओर इंडियन बने हे, जो इन भारत वासियो के सपनो को राकेट बना कर चलाते हे

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कमाल की पोस्ट. असल में तमाम कागज़ातों के होने के बाद भी तो इनके काम नहीं हो पाते, इन्हें पता ही नहीं कि सरकारी अमला किस तरह काम करता है :) जाकि तथाकथित संभ्रांत वर्ग काम निकालने/करवाने के तरीके जानता है.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

श्री लाल सुकुल जी का लंगड याद करा दिया सतीश भाई!!

Arvind Mishra said...

आप भी तो सटक लिए जनाब !:)

Udan Tashtari said...

बहुते सटीक...फिर कहें कि सन्नाट...

PADMSINGH said...

ये है असली मुच्ची की ब्लागिंग ... वाह!

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