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Saturday, April 30, 2011

रूबाबी पावर

आज हफ्ते भर की छुट्टी गाँव में बिता कर वापस मुंबई लौट रहा हूँ। सुबह
सुबह के माहौल के बीच बनारस से गाड़ी पकड़ने के लिये सरकारी रोडवेज बस से
जाने की बजाय प्राईवेट बस से सफर कर रहा हूँ। पीछे कन्डक्टर किसी से बहस
में उलझा था। रह रहकर बाकियों से टिकट पूछ रहा था, पैसे ले दे रहा था।
हरहुआ के पास बस रूकी और कोई यात्री उतरा। उसके उतरते ही कन्डक्टर ने कोई
गंदी सी गाली दी। पास बैठे एक यात्री ने यूं ही पूछा - का भईल हो ?
कंडक्टर ने उसी रौ में बड़बड़ाते कहा- अरे वही पुलिसवा यार......ससुर लोग
पराईबेट जानके जब देखिए तब कपार पे सवार रहते हैं.....कमाएंगे कंडालन
रूपईय्या औ किराया मांगो तो गां* खोल देंगे। एतना पे भी रूबाब हाईए
रहेगा।
- अरे त का करब......सरकारी मनई अईसे होता है......तिस पर पुलिस त अउरो ।
- अरे त किरायौ त देना चाहिये कि कुल बहादुरी उतना सा किराया बचा लेने
में ही है। साले लोग पराईबेट जान के हरदम परेसान करता है कभी ये कागज
दिखाओ.....कभी वो दिखाओ.....कागज बराबर रहेगा तो भी सौ पचास उपर से
दो......चाह पानी खातिर.......एनकरी बहिन क भो** मारौं ए लोग के घर में
चाह पानी नहीं मिलता है न तभी पराईबेट वालन से बटोरता है। बाकि हम तो इहे
कहेंगे कि मरिहौ त पराईवेटै वाला गाड़ी फूंकने के लिये ले जायगा घाट
पर......सरकारी नहीं।
- अरे त का करोगे.......
- का करोगे वाला सवाल नहीं है......क्या हमारे बच्चे नहीं हैं ......उनकी
फीस पानी नहीं लगती है कि सेंत में ही बड़े हो जाते हैं.......अरे हम
मेहनत करते हैं तो चार पईसा मिलता है ....ये लोग के तरह नहीं कि लाठी
ठकठका के पईसा कमाओ। अरे मैं तो कहता हूँ कि ई पुलिसिया साला जो अभी उतरा
है ई जब मरीहे त हम आम के लकड़ी न देब फूंके खातिर.......बबूरे (बबूल)
वाली लकड़ी देब। जेतना अनेत करते हैं ये लोग सब भगवानै जानते हैं। अबहीं
पिछलै हफ्ता रात के समय उहै फाटका के पास सबका गठरी मोठरी खोल के एक रात
को चेक कर रहा था, उसमें क्या है इसमें क्या है.....थोड़ा निकालो.....ससुर
वहीं पैरवा फंस गया औ छींटा गया जगहीये पर। बाद में जी आर पी वाले चेक
किहिन तो चउवन हज्जार रूपिया जेबै में मिला साले ।

कंडक्टर की बातें सुनकर लगा कि वह पुलिस वालों की अवैध वसूली और बिना
टिकट रोज आने जाने वाली आदत से बेहद त्रस्त है, तभी उसके मन में पुलिस
वालों के प्रति इतनी घृणा ने जड़ जमा लिया है। इन्हीं सब बातों से दो चार
होता हुआ बनारस आ पहुंचा।

अभी गाड़ी आने में समय था इसलिये मुसाफिर खाना में अखबार बेच रहे एक
नौजवान से अखबार खरीदा। हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान प्रमुखता से
छापा गया था। ब्रिटेन की शाही शादी को भी बहुत हाईलाईट किया गया था।
उधर गाड़ीयों की आवाजाही को लेकर अनाउंसमेंट चल ही रहा था कि कहीं से
पुलिस के सात आठ जवान आ पहुंचे। उनके आगे आगे सादी वर्दी में कोई
पुलिसिया अधिकारी चल रहा था। अखबार वाले छोकरे को देखते ही उस अधिकारी ने
अपने पास स्थित एक छड़ी से जोरदार वार किया। अखबार वाला छोकरा जैसे इसके
लिये तैयार बैठा था, तुरंत अपने अखबार को बीच में लाते हुए पुलिसिया वार
झेल गया। तुरत फुरत अखबार समेटते हुए हट गया। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर उसी
जगह पर आ खड़ा हुआ जहां से भगाया गया था। अबकी उसने अखबारों को जमीन पर न
बिछा हाथों में लेकर खड़े खड़ बेचना शुरू किया। चार पांच मिनट बाद दो तीन
और किशोरवय बच्चे हाथों में अखबार लिये आ गये और उससे सहानुभूति-पूर्वक
कुछ पूछने लगे संभवत: जानना चाहते थे कि जोर से तो नहीं लगा।

इन दोनों केसेस को देखकर अजीब अनिश्चय की मन:स्थिति बनती है कि आखिर
पुलिस का कौन सा चेहरा उसके कर्तव्यनिष्ठा से मेल खाता है ? प्राईवेट बस
आपरेटरों को जहां तक मैं समझता हूँ उनकी मनमानी से सभी परिचित होंगे ही,
लेकिन एसे मे जान बूझकर वर्दी का धौंस दिखाते हुए उन्हें परेशान करना
कहीं न कहीं अनुचित जान पड़ता है। इसके उलट जब बनारस स्टेशन पर अनधिकृत
अखबार वाले को मारते हुए परिसर से भगाता है तो वह कर्तव्य के रूप में भले
सही लगे लेकिन तौर तरीके से अनुचित जान पड़ता है।

एक ओर जीविका के लिये लोग जहां तक हो सके अपने से हाथ पैर मार रहे
हैं, अपनी गरीबी को झटक फेंकने के लिये जी तोड़ कोशिश करते हैं लेकिन
वर्दी वाला यह प्रशासनिक अमला है कि जी-तोड़ कोशिश की विसंगतियों पर चोट
करता दिखाई दे जाता है। कुल मिलाकर जनता के बीच ही असमान विकास की बड़ी
गड्डम गड्ड सी एक तस्वीर उभरती है।
संभवत: इस तस्वीर को समझने का एक तरीका ये हो सकता है कि हमें पता रहना
चाहिए कि हम विकासी टेबल के किस ओर बैठे हैं....... ऐसा विकासी टेबल
जिसके दूसरी ओर विकसित-सुविधाभोगी वर्ग दिखाई दे रहा है तो दूसरी ओर
कमजोर, लड़खड़ाता विकासशील भारत जो अपनी गरीबी और फटेहाली को ड्राईवर,
खलासी, परचून, दूध वाला आदि के जरिये ढंकने की कोशिश करता दिखाई पड़ रहा
है। वही तबका जो कल तक टेबल के इस ओर था, अपने हमपेशे से कुछ सहानुभूत
वाला व्यवहार रखता था.... अलग ढंग से पेश आता था, वही तबका टेबल के दूसरी
ओर जाते ही अलग व्यवहार करने लगा। माने सब कुछ ये जो हम सिस्टम को लेकर
हलकान रहते हैं वो एक विकासी टेबल के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है.....उसी के
हिसाब से हमारा नजरिया बनता है, बिगड़ता है और कभी कभी दिग्भ्रमित भी हो
जाता है।

- सतीश पंचम

स्थान - बनारस- दादर स्पेशल डिब्बे का लोअर बर्थ।

समय - यही कोई तीन-ऊन बजे होंगे।

14 comments:

anshumala said...

आज के मुंबई के अखबार में एक खबर और है वो ये की पूर्व मुख्यमंत्री अशोक राव के जिस आदर्श में सास के फ़्लैट के कारण गद्दी गवाई उसका ६५ लाख का पेमेंट उन्होंने मुंबई पुलिस के एक बड़े अधिकारी से पैसे रिश्वत ले कर दिया था अब बोलिए क्या कहेंगे | ऐसे ही हम दो साल पहले जम्मू गए थे जब टैक्सी से हम घूमने ले लिए गए तो टैक्सी वाले ने बताया की अमरनाथ यात्रा को लेकर जब बवाल हुआ था तो कैसे उन्होंने पुलिस वालो को पकड़ पकड़ कर पिटा था ( लहूलुहान पुलिस वालो को हम सब ने टीवी पर देखा था ) वो बेचारे भी इसी तरह अवैध उगाही से परेशान थे और आन्दोलन के समय पूरा बदला निकाला | यानि कश्मीर से कन्या कुमारी तक देश का यही हाल है |

प्रवीण पाण्डेय said...

विकास में पुलिस का स्थान तो होना ही है।

रंजना said...

दुखती राग पर हाथ धर दिए भैया...क्षुब्ध त्रस्त हैं विकास का ई गड्डम गड्ड देख के.....

नीरज गोस्वामी said...

आपकी पोस्ट आज पुलिस में चल रहे भ्रष्टाचार और दादा गिरी की पोल खोल रख देती है...क्या लिखते हैं आप...वाह..
नीरज

Kajal Kumar said...

पता नहीं कि पुलिसियों को ठुल्ला क्यों कहा जाता है

VICHAAR SHOONYA said...

सतीश जी टेबल की दोनो तरफ वाले लोग एकही धरती और एकही नस्ल के हैं और दोनों एक दुसरे के सहारे से ही आगे बढ़ते हैं. एक सरकारी कर्मचारी की नाथ उतरने का काम ये आम आदमी ही करता है और बाद में जब ये सरकारी आदमी नंगई पर उतर आता है तो फिर शिकायत करता है.

Vivek Rastogi said...

ऐसा नहीं लगता कि इन पुलिस वालों के लिये जनता को कानून अपने हाथ में ले लेना चाहिये तबही ये मुठ्ठी भर पुलिस वाले सुधरेंगे....

Arvind Mishra said...

एक दुश्चक्र है बोले तो विसियस सर्कल -लोई किसी से कम नहीं है -
बस मौके की तलाश है -कुछ पल आप यहीं ठांव गुजार सकते हैं
मगर पता नहीं आपको कवन सी ऐसी जल्दी रहती है :)
का ई दर है कि दुबारा पहले जईसन प्रेम भाव न मिले ? तब काहें हो ?

मनोज कुमार said...

मामू की मामू गिरी!
सब वर्दी का कमाल है...

दीपक बाबा said...

मूंगफली के ठेला से फ्री की मूंगफली, जूस वाले से फ्री का जुस, और कोई ठेले वाला गर गलती से मीट मच्छी बनाता है तो उसकी तो खैर नहीं ....... रात दाल भी उसे नसीब हो न नहीं...

Poorviya said...

कश्मीर से कन्या कुमारी तक देश का यही हाल है |

jai baba banaras....

राज भाटिय़ा said...

एक बात समझ मै नही आती, हम क्यो एक दुसरे को लुटने मे ही लगे हे, कोई भी हो सब मोके की तलाश मे हे केसे दांव लगे ओर उस की जेब का माल मेरी जेब मे आ जाये, ओर सभी दुखी हे....आज १०% लोग ही ईमान की खाते हे, बाकी सब बेईमानी तेरा आसारा...

Udan Tashtari said...

क्या कहें...

Rahul Singh said...

लगता है कंडक्‍टर नया था या हो सकता है उसका यही रोजाना का पाठ-पूजा हो.

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