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Tuesday, April 26, 2011

पुरूवा कि पछुआ

यूं तो फिल्मों में और तमाम रूमानियत भरे गीतों में पूरवा हवा का बड़ा
मनमोहक वर्णन किया गया होता है, बड़ा बखान होता है...मेरे देश में पवन चले
पुरवाई....मेरे देश में.....या फिर चले चले रे.... चले पवन पुरवईया....
....ब्ला ब्ला। लेकिन जो लोग खेती किसानी में हैं वो जानते हैं कि इस
पुरवईया पवन से गेहूं की दंवाई, ओसाई के वक्त कितनी मुश्किल उठानी पड़ती
है। अभी जब मुंबई में था तब घर फोन करने पर पता चला कि रात में बारिश आ
जाने से खेतों में कट कर रखे गेहूं के बोझ भीग गये हैं। सुनते ही मन
खराब हो गया । दैव को भी अभी ही बरसना था क्या....फिर ये बरखा बुन्नी के
दिन भी तो नहीं हैं कि बरसा जाय। दिन भर मन व्यथित रहा कि इतनी मेहनत से
गेहूँ की तैयार फसल पर दैव की टेढी निगाह पड़ गई.....मन ही मन द्वंद्व
चलता रहा कि मैं यहां क्या कर रहा हूं। खेती किसानी वाला ये अर्ध-शहरी
मन दिन भर इन्हीं सब बातों से गुणा भाग करता रहा और शाम तक निश्चय कर
लिया कि हफ्ते भर के लिये ही सही गांव हो आउं, अपने अम्मा बाबू से मिल ही
आउं।
इधर निश्चय हुआ और मेरे समस्त क्रिया-कलाप मेरी इस संभावित यात्रा
की ओर केन्द्रित होते चले गये। इसी बीच छुट्टी वगैरह और तमाम आफिस के काम
निपटाते उपटाते दो दिन निकल गये। रेल्वे की हनुमान्यॉटिक ततकाल सेवा की
वजह से अपना डेरा-डम्मर उठाये गांव पहुँच गया।
यहां आकर देख रहा हूं कि अब भी उन गेहूँ के गीले बोझों को खोल-खालकर
सुखाया जा रहा है, धूप में कड़ा किया जा रहा है। लेकिन सारी मेहनत निष्फल
किये दे रही है यह पुरवा हवा जिसकी खासियत होती है कि यह फसलों के डंठल
को नर्म कर देती है और उससे फसलों की दंवाई करने में अच्छी खासी
मुश्किलों से रूबरू होना पड़ता है।
मसलन, जब पुरूआ हवा की वजह से गेहूँ के डंठल नर्म पड़ जाते हैं तो
थ्रेशिंग के वक्त बार बार थ्रेशर के ब्लेडों से लपेट उठते हैं और मशीन
बंद कर उन ब्लेडों को साफ करना पड़ता है। जो कुछ दंवाया जाता भी है तो
उसमें ढाठा ज्यादा निकलता है, भूसा कम जिससे पशुओं के चारे में दिक्कत
आती है। जबकि यही डंठल कड़े होते तो थ्रेशर के ब्लेडों से टकराकर गेहूँ और
भूसे के रूप में पूरे पौधे को बारीक हिस्सों में तोड़ देते और पंखे की
सहायता से ओसाई के जरिये गेहूँ और भूसा अलग अलग फेंक देते हैं।
वहीं यह भी देखने में आया कि पूरवा हवा की नर्माहट लिये गेहूँ के डंठल
जब ज्यादा तेजी से घूमने वाले थ्रेशिंग ब्लेड से टूटने की बजाय लपेट उठते
हैं तब बहुत तीव्र घर्षण होता है और थ्रेशर से भूसे के साथ साथ चिंगारी
निकलने लगती है और एअर पैनल के जरिये ओसाये गये भूसों के ढेर में जा
गिरती है। फिर तो जरा सी हवा चलने की देर है, आग और भूसा तैयार है ही।
अभी पिछले दिनों इसी तरह के वाकये के कारण पास के गाँव में कई जगह भूसे
अचानक सुलग उठे और कई घर चपेट में आ गये। इन सब के कारणों पर विचार किया
गया तो यही माना गया कि शुरूवात में ही पछुआ हवा यदि चली होती तो गेहूँ
के बोझों में नर्माहट न आती और हादसा न होता।

फिलहाल ये मौसम है कि रात में फिर बारिश हुई, गेहूँ के बोझ फिर भीग गये
हैं। अब तो उन्हें अलट पलट कर सुखवाने का भी मन नहीं करता कि जब धूप होगी
तब देखा जायगा अभी से क्यूं जान देना। लेकिन वह किसान ही क्या जो थक हार
जाय, अभी फिर रह रह कर उलटने पलटने का काम शुरू कर दिया जायगा। मेहनत
अपनी ओर जीवट तत्व खींच ही लेती है।

- सतीश पंचम

17 comments:

Poorviya said...

yeh sab purua ka dosh hai....

jai baba banaras................

दीपक बाबा said...

पंचम जी, खेत खालियानी कि मुसीबतों पर चिंतानिये पोस्ट लिखी आपने.......... अनाज का एक एक दाना बहुत मेहनत से घर आता है .... ये वही जानते हैं, जिन्होंने कम से कम गाँव दिहात देखे हैं........ १० किलो के शक्तिभोग आते का बेग खरीदने वाला शेहरी तबका क्या जाने .... गेंहू के पौधे होतें है या फिर पेड़..... इतने आविष्कार और वैज्ञानिक तरकी होने के बावजूद भी भारतीय किसान मात्र मौसम के सहारे रहता है........

Mired Mirage said...

पुरवाई की इस खुराफात के बारे में सोचा नहीं था. वैसे बेमौसम बरसात से काम बिगड़ते ही हैं.
घुघूती बासूती

नीरज गोस्वामी said...

हम शहरी लोग बेमौसम की बरसात का आनंद लेते हैं वहीँ किसान पर क्या बीतती है इसका सजीव वर्णन किया है आपने...आपकी लेखनी को सलाम

नीरज

Rahul Singh said...

निसंदेह, 'वह किसान ही क्या जो थक हार जाय'

अरुण चन्द्र रॉय said...

मौसम के मिजाज़ और इसके सामाजिक, आर्थिक प्रभाव पर इतना सहज आलेख कभी कभी देखने को मिलता है.. बढ़िया लगा !... बेमौसम बरसात से शहर में रंग बिरंगे छाते तो खुल जाते हैं लेकिन किसानो के जीवन से जो रंग धुल जाते हैं उसके बारे में शायद अधिक लोग नहीं जानते....

rashmi ravija said...

बहुत कुछ जानने को मिला...
अब तो पुरवईया के जिक्र पर ये सब भी जरूर याद आएगा.

Arvind Mishra said...

जोड़ जोड़ के दर्द और पोर पोर की चुभन जगा जाती है यह कमबख्त पुरवाई!
लगे रहिये दवाई मड़ाई ओसाई तक ....

दर्शन कौर धनोए said...

बहुत खूब लिखा है ! किसान की यही नियति है

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अब तो गाँव-गाँव विशाल आकार के कम्बाइन्ड हार्वेस्टर (जिसे देहात में ‘कम्पायन’ कहा जा रहा है) गेहूँ की खड़ी फसल को ऊपर से काटकर अनाज अलग कर देते हैं। इसमें भूसा का नुकसान उठाना पड़ता है लेकिन अनाज हाथ में आ जाता है। गेहूँ भींग जाय तो दाने काले पड़ जाते हैं और स्वाद खराब हो जाता है।

तकनीक के प्रयोग से कुछ फ़ायदा तो कुछ नुकसान होता ही है। पुरवाई से इस मौसम में नुकसान है लेकिन मानसून का पानी यही हवा लाएगी।

VICHAAR SHOONYA said...

खेती करना सच में बेहद कठिन कार्य है. कहानियों और लेखों में पढ़ा करते थे की अपनी लहलहाती फसल को देख किसान सब दुःख भूल जाता है पर ये परेशानी तो फसल तैयार होकर उसके काटने के बाद की है. अभी कुछ दिनों पहले एक ज्योतिषी कह रहा था की पाण्डेय जी आपके सितारे कहते हैं की अगर आप किसान होते तो बहुत सफल रहते. बुडबक कहीं का, जब दोबारा मिलेगा तो उसकी ठीक से खबर लूँगा.

Vivek Rastogi said...

वाह खेत पर बैठकर नोकिया C-3 से ब्लॉगिंग का अपना ही मजा है।

हमने तो बहुत दिनों के बाद पछुआ हवा का जिक्र सुना है वरना तो महानगरीय जीवन में सब भूला हुआ सा ही है।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अच्छे से समझा दिया पुरवाई का दर्द।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

ओ भैया , ससुरी पुरवैया देहियौ पिरवावत है, बड़ी जालिम बयार है!!

पूरा गाँ ही पहुँचा दिया, कई बिम्बों को लेहिनिया दिया !! :)

संजय @ मो सम कौन ? said...

सुनी सुनाई बातों के आधार पर खेती को बहुत सरल समझते थे कभी, वस्तुस्थिति जानी तो अन्नदाता के लिये मन श्रद्धा से भर आता है।
एक जरा सा मौसम का बदलाव या आग की चिंगारी कैसे महीनों की मेहनत को पल भर में उलट देती है, देखा है।
खैर अब तो धीरे धीरे आसान हो रहा है लेकिन छोटे या मझोले किसान के लिये अब भी वैसे ही हालात हैं, बल्कि अगली पीढ़ी में कोई खेती नहीं करना चाहता, ये भी बहुत चिंता की बात है।

रंजना said...

पिछली पूरी बरसात निकल गयी आसमान में ताकते कि बादल अब बरसेंगे अब बरसेंगे...पर धरती का अंचल सूखा का सूखा रह गया और इस बार अप्रील ख़तम होने को है और गर्मी चढ़ान पर आई नहीं...आधा दिन गर्मी रहे भी तो शाम होते होते झमाझम बरसात हो जा रही है...लोग आनंदित हैं कि कितनी रहत है...पर आज बिलकुल यही सब मैं भी सोच रही थी,जिसका जिक्र आपने पोस्ट में किया है....

प्रवीण पाण्डेय said...

नोकिया C3 के सर्वाधिक उपयोग का पुरस्कार जाता है.....आपको।

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