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Sunday, April 24, 2011

ह्यूमिलियेशन

यात्रा के दौरान गरीब रथ से जबलपुर उतरकर तीन घंटे बाद वाली रांची एक्सप्रेस का इंतजार कर रहा हूं। प्लेटफार्म पर मेरे बगल में कोई महिला अपने बारह तेरह साल के दो बच्चों के साथ बैठी है। बच्चे हंस बोल रहे हैं अपनी मम्मी से। सामने ही जबलपुर रीवा पैसेंजर आकर लगी है। पब्लिक धड़धड़ा कर जा चढी है। सारी सीटें भर उठी हैं। एक बच्चा उबकर अंगड़ाता कह रहा है, मम्मी पापा कब आएंगे। मां भी कुछ व्यग्र भाव से कहती है आते ही होगे। इतने में एक पैंतीस चालीस का शख्स हांफते हुए आया और जोर से डांटते हुए बोला - मैं उधर टिकट ले रहा था तो तू बच्चों को ले गाड़ी में नहीं बैठ सकती थी....कुत्ती ....गांव जा रही है.....मिस काल तो देती कि तुझे बैठने को तो कहता ...अब जा खड़ खड़े। सुनते ही महिला चुपचाप सिर नीचे किये सामान समेट गाड़ी की ओर बढ गई, बच्चे जो अब तक हंस बोल रहे थे सकपका कर सुराही, झोला उठाकर वह भी बढ चले अपनी मम्मी के पीछे पीछे। लोग इन लोगों की ओर ताकते रहे।

शायद जिस पापा को अगोरा जा रहा श्रा वो यही थे।

- सतीश पंचम

स्थान - सोशल ह्यूमिलियेशन की झलक दिखलाता जबलपुर प्लेटफार्म
नंबर दो।

समय - सुबह के सात सत्तावन।

19 comments:

Arvind Mishra said...

आप जा /आ कहाँ रहे हैं मान्यवर ? प्रशांत प्रियदर्शी से मिलने ?:)

ajit gupta said...

भारत में अभी असभ्‍यता भरी पड़ी है।

सतीश पंचम said...

अरविंद जी, जौनपुर जा रहा हूं हफ्ते भर के लिये। वाया जबलपुर वाया इलाहाबाद वाया वाया....रेल टिकट की नॉन अवेलिबिलीटी पर यह कट पेस्ट यात्रा वाया वाया करनी पड़ी है।
लेकिन मजे हैं ऐसी कट पेस्टी यात्रा के भी :)

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

जबलपुरिया ब्लौगर कृपया नाराज़ न हों. अब तक दसियों बार जबलपुर स्टेशन पर उतरा हूँ और आज तक वहां किसी भी वेंडर को प्रिंट रेट पर चीज़ें बेचते नहीं देखा. बड़ी लूट-खसोट है प्लेटफॉर्म पर. जबलपुरिया ब्लौगर इस और ध्यान दें, आपके नगर की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है.
बकिया, बीमारू राज्यों में ऐसा बोल-चाल तो आम है.

Kajal Kumar said...

कभी कभी तो हैरानी होती है कि कोई यूं बोल ही कैसे सकता है...

सतीश पंचम said...

निशांत जी,
कृपया इस तरह के वाकयों को नगर विशेष से जोड़कर न देखें। ये तो हर शहर का हाल है। अतः छवि तो हर शहर की लगभग एक सी है कहीं कम तो कहीं ज्यादे।

शोभना चौरे said...

इस मोबाईल संस्क्रती ने तो सारे समाजवाद को हिला दिया है |

मीनाक्षी said...

कम से कम सार्वजनिक स्थान पर गुस्सा कंट्रोल करना आ जाए तो ऐसी घटनाएँ न कम हो जाएँ...

प्रवीण पाण्डेय said...

अपनी कमजोरी का सार्वजनिक प्रदर्शन।

Rahul Singh said...

यह तो यत्र-तत्र-सर्वत्र किस्‍म का है, आपको जबलपुर प्‍लेटफार्म पर मिला (या आपका ध्‍यान गया.)

Patali-The-Village said...

इस को सभ्यता की कमी ही कहा जा सकता है| धन्यवाद|

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

प्रिय सतीश जी, बात ही ऐसी है कि नगर विशेष से जोड़ना पड़ा. मैं मूलतः मध्यप्रदेश वासी हूँ और जबलपुर से मुझे प्रीति है क्योंकि नगर सुन्दर और लोग आत्मीय हैं पर यह समस्या मुझे और कहीं उतनी गहरी नहीं लगी जितनी जबलपुर में. हर नगर में कुछ दोष होते हैं. यदि दिल्ली के ऑटोवाले दुष्ट हैं तो यह एक तथ्य है.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

जो माई को गरियाये, वो बाप हरामी होता है!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

शिक्षा ज़रूरी है। लडकियों को समर-कलाओं की शिक्षा, लडकों को तमीज़ और सभ्यता की शिक्षा और छोटे-बडे सभी को अन्याय और बदतमीज़ी का समुचित प्रतिकार करने की शिक्षा।

राज भाटिय़ा said...

अरे अरे... उस आदमी को सब गुस्सा कर रहे हे, जो उचित भी हे, लेकिन आप सब लोग टी वी पर जब इस से भी गंदी गालिया देते हुये कला कारो को देखते हे तो उस समय कोई आवाज क्यो नही उठाता, बस एक बार सब मिल कर आवाज ऊठाये फ़िर देखे आप को ओर आप के बच्चो को साफ़ सुथरे प्रोगराम देखने को मिलेगे, एक आदमी को सब गरिया रहे हे, जड को पकडो, ओर आज कल यह असभ्यता पढे लिखो मे ज्यादा हे इस टी वी के कारण

अनूप शुक्ल said...

बड़ा गड़बड़ आदमी था भाई जो ऐसी बात बोला।

Poorviya said...

yeh sab sabhi log karte hai kuch log parde main aur kuch log sarvjanik.....kabhi na kabhi jayadatar logo ne is se milti julti bhasa ka paryog kiya hoga ............
sawam par bhee yeh niyam laagu hota hai.....

jai baba banaras.......

मनोज कुमार said...

मन दुखी हो जाता है यह सब पढ़कर, सुनकर।
कब हम सभ्य होंगे?

नीरज गोस्वामी said...

पत्नी को हुइमीलियेट करना हर पति का परम धर्म है...सभ्य,असभ्य, सुसंस्कृत, पढ़े लिखे, धनाड्य, गरीब, अनपढ़, गंवार श्रेणी के पति भी इस रोग के शिकार हैं...

नीरज

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