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Friday, April 15, 2011

प्रकृति के बीच दुपहरीया छपास बजरिए 'रॉयल्टी ऑफ ब्लॉगिग'

पुलिहर दर्पण
         पिछले दिनों मुंबई के भायखला इलाके में स्थित एक 'जू' में जाना हुआ। हुआ यूं  कि भायखला स्टेशन पर एक मित्र का   इंतजार कर रहा था कि पता चला महाशय अभी किसी काम में अचानक फंस गये हैं, आने में डेढ़ दो घंटे लगेंगे। सो, अब न घर वापस जा सकता था न कहीं और, सो सीधे पास ही स्थित प्राणी-संग्रहालय चला गया। मन में आया कि बच्चों को भी ले आता तो ठीक था, लेकिन परिस्थिति ऐसी बनी कि अकेले ही समय बिताने के लिये जाना पड़ा। संयोग से उस वक्त मेरा कैमरा मेरे साथ था। 


     सो, चिड़ियाघर में जाते ही चारों ओर पेड़ पौधों की  हरियाली देख कई चित्र खेंचे, कुछ जानवरों के भी चित्र खेंचा लेकिन उतना मजा नहीं आया, दरअसल दुपहर का समय था, उसलिये कुछ तो जानवर अपनी अपनी कोठरीयों में जाकर सुस्ता रहे थे, तो कुछ इस अंदाज में आंखों में आँखे डाल देख रहे थे मानों कहना चाहते हों  - हमारी खेंची गई तस्वीरों की रॉयल्टी भिजवा देना....... वैसे भी तुम ब्लॉगर लोग अपनी 'थकी-थुकी पोस्टों' के अखबार वालों द्वारा छाप लेने भर से बिदक जाते हो....... (भले ही अपनी छपास की भूख मिटने से अंदर ही अंदर खुश क्यों न हों) नाराजगी दर्शाते हुए अपनी उन पोस्टों के लिये पैसों की उम्मीद तक बांध लेते हो ( जबकि ब्लॉगर प्लेटफार्म किसी दूसरे के पिताश्री का है  ). कुछ ब्लॉगर तो अपनी उन्हीं पोस्टों की किताब तक छपाकर यहां वहां चिटकाते नजर आते हैं.....ऐसे में पैसे का मसला जाने कहां बिला जाता है....लेकिन जैसे ही कोई अखबार उठाकर छाप देगा तो लगोगे चिचियाने....अरे अइसा हो गया....वइसा हो गया।  
 रॉयल्टी नहीं आई अब तक......

        ऐसे में आप लोगों के दिखावटी नाराजगी को देख हम जानवरों का भी तो कॉपीराइट- फापीराइट जैसा कुछ हक तो  बनता ही है जिनकी कि आप लोग नंगी-पुन्गी तस्वीरें खेंच लेते हो और अपने ब्लॉग पर चिपका कर बच्चों जैसे पहेलियां बुझवाते हो...टाइम पास करते हो.... बताओ ये कौन सा जानवर है ......इसे देखो....इसे पहचानो..... वो तो हमारी भलमनसाहत है कि हम जानवर लोग अपनी नग्न तस्वीरों के खेंचने पर तुम ब्लॉगरों पर पोर्नोग्राफी का केस नहीं करते वरना अब तक आप लोग जेल में नाव चला रहे होते.....नाव....... नहीं....नाव नहीं कुछ और चलाया जाता है वहां.....अब हम जानवर लोग तो कभी जेल गये नहीं तो कैसे बताएं कि जेल में क्या चलाया जाता है, क्या कूटा-पीसा जाता है, जेल तो मनुष्य ही जाता है.......क्या कभी किसी जानवर को देखा है जेल में बंद ?  

      सो भई अपन तो जहां तक हो सका जानवरों की तस्वीरें लेने से बचते बचाते ही रहे कि क्या पता कल को कहीं मानहानि का दावा ही न कर बैठे कि हमारी नंगी पुन्गी तस्वीरें खेंच कर ले गया है एक ब्लॉगर...अब तक उसने रॉयल्टी नहीं भेजी.... अत: पोर्नोग्राफी एक्ट के तहत उसे अविलम्ब गिरफ्तार किया जाय :) 

बस रॉयल्टी आ जाय तो खिलूं.....वरना .......
     खैर,  यही सब देखते-विचरते जा पहुंचा प्राणी संग्रहालय  के बोटानिकल गार्डन के पास स्थित एक खूबसूरत 'निसर्ग उद्यान' में। वहां जाकर मुंह से बरबस ही निकल गया..... ओह....कितना तो सुन्दर है यह जगह।

      एक ओर छोटा सा तालाब, उसमें तैरती छोटी छोटी मछलियां......कुछ डूबती...कुछ उतराती ..... वहीं कमल की पंखुड़ियां भी जैसे बस खिलने को हैं।
वहीं तालाब के किनारे शीतल बांस के झुरमुटों की छांव....करीने से सजी हरी घास..... तालाब के उपर ही एक लकड़ी का बना छोटा पुल..... जिसके नीचे के थिर पानी को देखने का आनंद ही अलग था। मन कुछ यूं मस्त  हुआ कि लगा  एक कविता रची जाय।  


        वैसे भी मेरा तो यही मानना है कि संसार में जिस किसी ने भी पहली कविता रची होगी जरूर वह इसी तरह के प्राकृतिक माहौल में रहा होगा.......सिवाय जंगल-झाड़ियों के, कोई उसकी कविता सुनने वाला वहां न होगा, ऐसे में प्रकृति से प्रेरित जो भी कविता उसने रची होगी.....वह जरूर उसके हृदय से खुद ब खुद उमड़ी होगी। 
रास्ता.....तालाब......तालाब....रास्ता.......
मन इत्थे ही रमिया सी यारा

          अभी इसी प्राकृतिक छटा का आनंद ले रहा था  कि तभी कोई पक्षी अचानक उड़ते हुए आया और तुरंत ही पानी में डुबकी मार बैठा। मैं थोड़ा उत्सुक हुआ कि जाने कौन सा पक्षी है .....इस तरह अपनी आँखों के सामने किसी पक्षी को पानी में डुबकी मारते कई साल  बाद देखा।  एक सेकंड बीता, दो सेकंड बीता, पांच, दस....लेकिन वह पक्षी था कि पानी में जाने के बाद निकल ही नहीं रहा था। मैंने सोचा शायद यह पानी के भीतर ही भीतर कहीं दूर निकल गया होगा और वहां पुल के उस पार से निकल उड़ गया होगा...लेकिन तकरीबन मिनट भर बीते होंगे कि अचानक ही वह पक्षी पानी में से बाहर निकला और सामने के पेड़ पर जा बैठा। मैंने कैमरा चालू कर उसकी तस्वीरें लेना शुरू किया...नाम पता नहीं....शायद पनडुब्बी....या क्या कुछ जो भी हो। थोड़ा अचरज, थोड़ी उत्सुकता, थोड़ा बचपना....कुल मिलाकर अच्छा लग रहा था। करीबन एक घंटा वहां ठहरा और कुछ तस्वीरें-उस्वीरें उतारी।

 पेश है उन्हीं में से कुछ की झलकी  - 

इस प्रकृति का कापीराइट किसके पास है वत्स....

धूप और हरियर पौध   

उंघती दुपहरी .....



सर्पिल लतायें....

बांस के झुरमुट और ठंडी रेलिंग


खामखां एक मिनट पानी के अंदर रहा......कुछ मिला ही नहीं....सारी मछलियां जाने कहां चरने चली गईं  



हम सब बस खिलने को  हैं .....सभापति भौरे जी नहीं आए अब तक :)
 मुंबईया खिलान......... 

  - सतीश  पंचम

स्थान - वही, जहां धुँए-धक्कड़, शहरी चिल्ल-पों के बीच प्राकृतिक छटा अब तक बची हुई है। 

समय - वही, जब मैं अपने कैमरे से तस्वीर ले रहा था और तभी एक गिलहरी मुझसे थोड़ी दूरी बना ताक रही थी......मानों कहना चाहती हो - मेरे लिये कुछ खाने लाये हो या खाली हाथ झुलाते चले आये  :)  

21 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

घुमाई, फोटू खिंचाई, चौचक खिंचाई.. सब एक साथ!
मित्र को धन्यवाद जिनके कारण एक अच्छी पोस्ट पढ़ने को मिली।
दूसरी पोस्ट, इस पोस्ट को देखकर घर में हुई प्रतिक्रिया की आनी चाहिए...अकेले घुमाई मजेदार पक्ष तो आना शेष ही है।

ajit gupta said...

कई बार हमें लगता है कि हमारा लेखन या विचार मौलिक है लेकिन यदि सत्‍य की खोज की जाए तो हमने इसे कहीं न कहीं से जरूर लिया होता है। वातावरण में अनेक शब्‍द और विचार हैं उन्‍हीं के माध्‍यम से हम अपने अनुकूल विचार ग्रहण करते हैं। लेकिन जब लिख लेते हैं तब गर्व से कहते हैं कि यह मेरा मौलिक विचार है। पार्क की अच्‍छी सैर कराई है।

प्रवीण पाण्डेय said...

पॉपकार्न की रायल्टी देनी थी। अब अगली बार केवल सुन्दर चित्र खींचने जाना है, स्तरीय फोटोग्राफी।

Rahul Singh said...

आपकी सार्थक 'विजिट' हमारे लिए भी आनंददायक.

खुशदीप सहगल said...

ब्लॉगर प्लेटफॉर्म बेशक किसी दूसरे के पिताश्री का है लेकिन डॉट कॉम तो संकरा प्रजाति नहीं खालिस अपनी आनुवांशिकी का परिणाम है...

न जाने क्यों घिसापिटा चुटकुला याद आ रहा है...एक टापू पर तीन अलग-अलग राष्ट्रीयता के लोग फंस गए...एक भारतीय भी था...कई दिन तक भूखे-प्यासे...तभी एक बोतल वहां तैरती हुई आ गई...बोतल खोली तो मरगिल्ला सा जिन्न निकला...जिन्न ने कहा...भई मेरे में ज़्यादा ताकत तो नहीं. फिर भी तुम्हारी एक-एक इच्छा तो पूरी कर ही दूंगा...भारतीय को छोड़ बाकी दोनों ने तुरंत अपने वतन लौटने की इच्छा जताई...जिन्न ने इच्छा पूरी कर दी...दोनों हंसी-खुशी अपने वतन पहुंच गए...जिन्न ने आखिर में भारतीय से इच्छा पूछी तो जवाब मिला...यहां मैं बहुत बोर हो रहा हूं, उन दोनों को फौरन वापस बुला दो...

जय हिंद...

सञ्जय झा said...

बस रॉयल्टी आ जाय तो खिलूं.....वरना .......


kya...panacham da....matlab...ki..je
isko....moulik chintan kahoon....to..
kya...kuch jyada to nahi hoga na....

bakiya, sochta hoon....upar ki line...ke liye ....koi copiright...
jaise koi mamla na ban aaye....

jai ho...

Arvind Mishra said...

बड़े सलीके से आपने गर्दन हलाल की है ....आहिस्ता आहिस्ता !
मैंने भी आज ही अनूप जी के याहन ऐसे ही भाव में कुछ लिखा है ...
एक फोटो श्रृंगाल महराज का है का?

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

कन्फर्म नहीं कह सकता कि यह शृंगाल है या कुछ और...उस समय पिंजरे के उपर नाम पढ़ा तो था लेकिन याद नहीं आ रहा।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

तस्वीरें मनमोहक ......किन्तु लेख तो बहुत ही मजेदार |

'रायल्टी ' के माध्यम से बहुत कुछ कह दिया भाई !

Poorviya said...

bahut bahut dhanviyad yaha bath kar mumbai ka maja liya ...

jai baba banaras....

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

ऐसे ही मित्र लोग लेट होते रहे तो आपमें एक कालजयी फोटोग्राफर को जरूर जगा डालेंगे! यह ब्लॉग भी चित्र-ब्लॉग में तब्दील हो जायेगा!

नहीं?

Abhishek Ojha said...

मुंबई में भी ऐसी जगहें हैं. बाह जी बाह. और आपने इस बीच मानसिक हल भी खूब चलाया :)

Ashok Pandey said...

जानकर अच्‍छा लगा कि आप उस स्‍थान से लिख रहे हैं जहां धुँए-धक्कड़, शहरी चिल्ल-पों के बीच प्राकृतिक छटा अब तक बची हुई है :)

.. लेकिन आगे से गिलहरियों व बंदरों का ध्‍यान रखिएगा ताकि उनकी उलाहना न सुननी पड़े :)

अनूप शुक्ल said...

मजेदार है जी!

क्या ज्ञानजी की आशंका सच में बदलेगी?

:)

rashmi ravija said...

बहुत ही ख़ूबसूरत तस्वीरें हैं....कैमरे के पीछे की सजग दृष्टि नज़र आ रही है..

अँधेरी में भी एक बहुत ही ख़ूबसूरत उद्यान है...वहाँ 105 तरह की तो बस तितलियाँ ही हैं...वहाँ भी घूम आइये....बहुत ही अलग सी तस्वीरें मिलेंगी...अब फोटोग्राफी का शौक तो है ही...सो टू इन वन...फोटोग्राफी भी ब्लॉग्गिंग भी

सतीश पंचम said...

ज्ञान जी,

पहले तो देरी से रिप्लाय करने के लिये क्षमा चाहता हूं।

जहां तक कालजयी फोटोग्राफी की बात है तो जो भी चीज नेट पर आ गई वो अपने आप में ही कालजयी हो जाती है...भले ही अटरम पटरम गटरम वगैरह ही क्यों न हो :)

वैसे एक बात और समझ आ रही है कि पुराने लेखकों साहित्यकारों में भी जो अब तक कालजयी लेखक नहीं माने जाते वह भी गुगलैव(दैव) योग से कालजयी हो उठे हैं, उनकी भी रचनाएं अब जब तब अगले पता नहीं कितने काल तक सर्वर पर जिये जायेंगी :)

इसलिये नेट का एक लाभ यह भी है कि वह कालजयी रचनाधर्मिता के उत्पादन में सक्षम है, लेकिन लोग बाग हैं कि मान ही नहीं रहे....लगे हैं अपनी उन्हीं कालजयी पोस्टों की किताब छपवाने में....शायद डबल कालजयी होने की लालसा हो :)

सतीश पंचम said...

जहां तक चुटकुलों - कहांनियों की न जाने क्यूं टाइप याद जैसी बात है तो मुझे भी गिरिजेश की लिखी एक ठो...था/थी..याद आ रही है...लेकिन जाँण दो....कौन टाइम खोटी करे :)

सतीश पंचम said...

रश्मि जी,

आप अँधेरी में किस इलाके की बात कह रही हैं......थोड़ा तफसील से बतायें वैसे आज तो मूड़ था शिवड़ी इलाके में आये फ्लेमिंगो पक्षियों को निहारने का लेकिन जा नहीं पाया....सुना है लोग बसों में भर भर के जा रहे हैं देखने....ये साइबेरियाई फ्लेमिंगो भी कहेंगे क्या अजीब लोग हैं मुंबई वाले..... लगता है कम्बख्तों ने अब तक पंख पखेरू नहीं देखा है :)

सतीश पंचम said...

@ संजय' Comment

बस रॉयल्टी आ जाय तो खिलूं.....वरना .......


kya...panacham da....matlab...ki..je
isko....moulik chintan kahoon....to..
kya...kuch jyada to nahi hoga na....

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अरे संजय जी,

राज़ की बात बताउं तो आपके इस कमेंट के बाद ही मैने थोडा ध्यान दिया कि मैंने क्या लिखा था और उसका वाकई में क्या भावार्थ निकलता है ....वरना तो मैं पोस्ट लिखते समय धुनकी में कैप्शन देते चला गया था :)

अब उसे दुबारा पढ़ा तो लगा कि हां कैप्शन वाकई सटीक था...क्योंकि जिसका जो भी जिसका स्वाभाविक गुण है वह हर हाल में सामने आता ही है.... जिसे खिलना होगा वह खिलेगा ही...

ऐसे में स्वाभाविक गुणधर्म के लिये नेम फेम और वो तमाम अइसा हो गया वइसा हो गया जैसे चिंतन-चुन्तन के कोई मायने नहीं होते :)

सतीश पंचम said...

@ अभिषेक' Comment

मुंबई में भी ऐसी जगहें हैं. बाह जी बाह. और आपने इस बीच मानसिक हल भी खूब चलाया :)
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अभिषेक जी,

ये मानसिक हल एक तरह से मौज है जिसे हरदम हलकान रहने वाले ब्लॉगरों हेतु लिखा था। दरअसल ब्लॉग,ब्लॉगिंग, ब्लॉगरत्व पर इतना सारा लिखा गया है कि उस पर कुछ और लिखना नाहक ही समय नष्ट करने सरीखा है, लेकिन अब भी लोग हलकान हैं...चिंतातुरता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही....वह भी तब जबकि अंगरेजी के मुकाबले हिंदी ब्लॉगिंग एक छोटे से पोखर की तरह है...उसी में लोग-बाग डूब-उतर रहे हैं, इतरौअल फाने हैं :)

सो अपने से तो अब ब्लॉगिंग को लेकर सिरियस पोस्ट नहीं लिखी जाती ....लिखी क्या जब लिखने बैठता हूं तो हंसी छूट जाती है कि क्या लिख रहा हूं....इसलिये ऐसी मौजों के जरिये थोड़ा लिख उख देता हूं।

रही बात कि अखबारों में क्रेडिट देने की बात तो उससे मैं भी सहमत हूं कि जब अखबार कहीं से कंटेंट देते हैं तो कम से कम उस ब्लॉग का जिक्र तो कर ही सकते हैं जहां से कंटेंट दिया है। और जहां काट छांट की बात है तो कई बार कॉलम की साइज वगैरह को लेकर उन्हें यह कदम उठाना पड़ता है जिसे कि समझा जा सकता है, बल्कि मेरी पोस्ट में जब हिज्जों की गलती हुई थी तो उसे सुधार कर अखबार वालों ने पब्लिश किया था...सो यह सब तो चलते ही रहेगा...और ऐसे ही चलेगा अपुन का हल :)

Madhavi Sharma Guleri said...

रोचक है !!

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