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Sunday, April 10, 2011

अब न दुलराइये सजन....कि पब्लिक 'निहार' रही है


         मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि हम सभी के जीवन में कहीं न कहीं भ्रष्टाचार का अंश जरूर है और मैं ही नहीं आप में से लगभग सभी की शायद यही राय होगी। हम चाहे-अनचाहे उससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभान्वित भी हो रहे हैं, संभवत: आगे भी होते रहेंगे। किंतु विडम्बना यह है कि तरह तरह से लाभान्वित करने वाली वह भ्रष्टाचारी रेखा इतनी महीन है कि हमें समझ ही नहीं आता कि हम कब भ्रष्टाचार की जद में हैं और कब शुचित व्यवहार की जद में। 

       मसलन, अभी हाल ही में अख़बार में देखा कि एक टैक्स कंसल्टेंट से एक बंदा सवाल कर रहा था कि वह अपनी पत्नी को मकान का किराया देता है, बताया जाय कि किराया चेक से दिया जाय या कैश से। अब इस सवाल को पढ़ते ही समझ आ जाता है कि बंदे ने टैक्स बचाने के चक्कर में ही यह अनूठा रास्ता अख्तियार किया है। वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि इंसान अपनी पत्नी के साथ साथ उसी मकान में रहे, अपनी दैनंदिन सामाजिक, व्यवहारिक, शारीरिक आदि जो भी जरूरतें लगे सभी को पूरा करे, तिस पर अपनी उसी पत्नी को मकान का किराया भी दे।

        बहरहाल, ये और इस तरह के बैक-डोर रस्ते ऐंवे ही नहीं अख्तियार किये जाते, इसे अख्तियार करने के लिये मजबूर किया जाता है, छोटे छोटे लूप होल्स के जरिए, बड़े बड़े फर्मों के जरिए कानूनी जामा पहनाया जाता है जिसे अपनाते हुए पति अपनी पत्नी को हाउस रेंट देता नजर आता है तो कहीं बेटा अपने पिता को किराया देने का सबूत देते हुए अपने ऑफिस में किराये की रसीद नत्थी करता है। इस तरह के तमाम बैक-डोर टैक्स सेविंग्स हम सभी जानते हैं....कहीं न कहीं इस्तेमाल भी करते हैं, लेकिन तब उसे टैक्स सेविंग्स की टैक्निकेलिटीस कहकर टाल दिया जाता है कि भई ये तो करना ही पड़ता है वरना तो इतनी महंगाई में खांये क्या कमायें क्या। 

          खैर, ये सब तो पहले से ही चला आ रहा है आगे भी चलेगा ही, लेकिन इस तरह के हिडन करप्शन से दो चार होते रहने वाले लोग जब अन्ना हजारे के आंदोलन में खोखले नारे लगाते हैं तो वह कहीं न कहीं चुभता है....कहीं न कहीं खटकता है। यहां मुंबई में देख रहा था कि अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर नारे लगा रहीं थीं जन-लोकपाल बिल लाओ..... भ्रष्टाचार हटाओ....भ्रष्टाचार हटाओ। लेकिन मुझे समझ नहीं आता कि ऐसे लुप्त हो चुके सेलिब्रेटी ऐसे वक्त पर अचानक कहां से लाइमलाइट में आ जाते हैं जबकि पिछले कुछ दिनों से उनका कुछ अता पता ही न हो। कैमरा ऐसे लोगों को कैसे ढूंढ लेता है।  

          मुझे इस आंदोलन के दौरान मन ही मन शंका थी कि कहीं ये पीपली लाइव का नत्था सरीखा प्लॉट न हो जाय क्योंकि जिस तरह से मीडिया ने पूरी कवरेज की थी, लोगों के नाचते गाते चेहरों को उनके विचारों को टेलिकास्ट किया था वह हूबहू पीपली लाइव स्टाइल में चल रहा था। बताइये आपको कैसा लग रहा है.......आपके हिसाब से क्या होना चाहिये.....ये देखिये लोगों ने अपने बालों को किस विशेष अंदाज में कटवाकर अपना रूख  जन-लोकपाल बिल के पक्ष में जताया है......पीपली के रिपोर्टर की तर्ज पर देख रहा था पुण्य प्रसून वाजपेयी भी कह रहे थे....लोगों के मूड को देख अब अण्णा वही राह चुनेंगे...वही करेंगे जिस राह को जनता चाहेगी....लोगों का रूख देखिये लोग कैसे गा रहे हैं....और तो और  कपिल सिब्बल जिस अंदाज में हाइकमान से बातचीत करने और आदेश जारी करने न करने के बारे में प्रेस से मुखातिब हो रहे थे वो कहीं न कहीं पीपली लाइव के उस दृश्य की याद दिलाता था जिसमें सरकारी अधिकारी कहता है कि - We are waiting for the High Court orders.....लेकिन गनीमत है कि इस पीपली लाइव में नत्था न होकर सामाजिक सरोकार से जुड़े अण्णा हजारे थे....जिनके समर्थन में जो हुजूम उमड़ा उससे सरकार को आखिरकार नर्म रूख अपना कर पूरे मामले को सुलझाना पड़ा।

          अब जबकि ये आंदोलन तात्कालिक रूप से सरकारी फैसलों में जनता की हिस्सेदारी जैसे मसले पर सफल जरूर रहा है और जैसी कि संभावना जताई गई है कि अभी आगे और भी बड़े बड़े फैसलों में जनता की ज्यादा हिस्सेदारी को लेकर  इसी तरह के आंदोलन होंगे, तो मुझे लगने लगा है कि 'सेफ्टी वॉल्व' वाला इतिहास अब फिर दुहराया जाने वाला है। उल्लेखनीय है कि जब आजादी की लड़ाई चल रही थी, जनता में अंग्रेज हुकूमत को लेकर एक जनाक्रोश व्याप्त  था और जिसकी परिणति किसी भी समय हिंसक हो सकती थी ऐसे में ए ओ ह्यूम ने प्रस्ताव रखा कि सरकारी फैसलों को लेते समय जनता को थोड़ी सी हिस्सेदारी दी जाय....एक जन- प्रतिनिधियों का समूह बनाया जाय जो कि समय समय पर सरकार को अपनी मांगों, अपने प्रस्तावों से अवगत कराये ताकि उनकी मांगो पर समुचित ध्यान देते हुए जहां तक हो सके परिस्थिति को हिंसक होने से बचाया जाय। 


     A.O. Hume द्वारा ऐसा प्रस्ताव रखने के पीछे इतिहासकारों का मत है कि भारत में बिताये अपने लंबे समय के कार्यकाल के दौरान ह्यूम को अंदेशा हो गया था कि एक बड़ी हलचल होने वाली है...भीतर ही भीतर सुगबुगाहट चल रही है और उससे बचने के लिये ही उनके प्रस्ताव को लॉर्ड डफरिन ने सेफ्टी वॉल्व के हिडन एजेंडे के तौर पर सहमति दे दी।  जिसकी परिणति रही  - इंडियन नेशनल कांग्रेस। 

         अब  ठीक वही परिस्थिती यहां भी बनी है। अण्णा हजारे ने सरकारी नुमाइंदों के साथ साथ अपने जनता के प्रतिनिधियों के रूप में जनभागीदारी की मांग की और काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार वह मान ली गई। अण्णा हजारे के आंदोलन को  पहली नज़र में देखने पर यह भी एक तरह से जनता के मन में उमड़ घुमड़ रहे विचारों के लिये सेफ्टी वॉल्व की तरह का ही लग रहा है। फर्क इतना है कि ए ओ ह्यूम ने जनआक्रोश को भांपते हुए अंग्रेजी सरकार के लाभ ( ? ) के लिये यह व्यूह रचा था और अण्णा हजारे ने अपनी जनता के हितों के लिये। 

          बहरहाल मुझे A.O Hume की लिखी एक कविता अच्छी तो लग रही है किंतु भारतीय राजनीति के सेफ्टी वॉल्व वाले इतिहास को पढ़ने के बाद थोड़ा सा अजीब भी लगता है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि एक शख्स अंग्रेजों की सुविधा के लिये सेफ्टी वॉल्व तैयार कर रहा हो और दूसरी ओर इतनी शानदार कवित्त रचे। ह्यूम लिखते हैं कि -    



Sons of Ind, why sit ye idle,
Wait ye for some Deva's aid?
Buckle to, be up and doing!
Nations by themselves are made!
Yours the land, lives, all, at stake, tho'
Not by you the cards are played;
Are ye dumb? Speak up and claim them!
By themselves are nations made!
What avail your wealth, your learning,
Empty titles, sordid trade?
True self-rule were worth them all!
Nations by themselves are made!
Whispered murmurs darkly creeping,
Hidden worms beneath the glade,
Not by such shall wrong be righted!
Nations by themselves are made!
Are ye Serfs or are ye Freemen,
Ye that grovel in the shade?
In your own hands rest the issues!
By themselves are nations made!
Sons of Ind, be up and doing,
Let your course by none be stayed;
Lo! the Dawn is in the East;
By themselves are nations made!
                                                  - A. O. Hume

      सोचता हूं कि जब ह्यूम इस कविता को लिख रहे होंगे न जाने उनके मन में क्या चल रहा होगा। क्यो सोच रहे होंगे वो। एक ओर उनके साथी अंग्रेज अफसर, पूरा ब्रितानी समाज तो दूसरी ओर भारत के चिकट तेल से सने पगड़ी वाले इंडियन नेटिव्स। 

न जाने किसकी ओर थे ह्यूम।

   लेकिन इतना तो तय है कि भ्रष्टाचार को लेकर जो भी समितियां आदि बनेंगी, उसमें जो भी लोग शामिल होंगे उन्हें काफी  सावधान रहना होगा, अपनी शुचिता को बरकरार रखते हुए सदस्य बनाने होंगे..... फैसले लेने होंगे क्योंकि जो भी पक्ष इससे प्रभावित होगा वह अपनी ओर से पूरी कोशिश करेगा कि पैनल के लोगों पर ही कीचड़ उछाल दे, उनकी वैधता पर ही सवाल उठाये ताकि इसी बहाने उसकी कुछ साख बचे, वह कुछ हद तक लाभान्वित हो सके। जहां तक अभी देख रहा हूं यह कीचड़ उछालू प्रक्रिया शुरू भी हो गई है शांतिभूषण और प्रशांत भूषण के मसले को लेकर कि जन-लोकपाल बिल को लेकर बने पैनल में पिता-पुत्र दोनों को ही एक साथ कैसे शामिल किया गया है। ऐसे लांछनों आदि के लिये पैनल के सदस्यों को पहले से ही मानसिक रूप से तैयारी रखनी होगी, पहले से ही इसका तोड़ निकाल कर चलना होगा वरना पूरा मामला भंडुल होते देर न लगेगी।  जहां तक मैं समझता हूं निकट भविष्य में सैकड़ों की संख्या में  ए. राजा तो जरूर मिल जाएंगे, किंतु एक और अण्णा हजारे आने की संभावनाएं कम ही दिखती है।
   
- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे अंग्रेजों ने दहेज में दे दिया था।

समय -  वही, जब ऑफिस जाते वक्त स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया ( SAIL)  की होर्डिंग दिखे जिस पर लिखा हो -   
     There's a little bit of SAIL in everybody's life.

मानों कहना चाहता हो -  
     There's a little bit of Corruption in everybody's life.

(चित्र : गूगल बाबा से साभार )

17 comments:

Arvind Mishra said...

आज हट कर लिखा है..... इट्स रियली डिफरेंट ...आननद आ गया पढ़कर ....क्या इतिहास दुहरा रहा है ?
कुछ बेईमानी और बड़ी बेईमानी में नैतिकता का विचलन कितने डिग्री है और कितना मान्य है ?
अन्ना का यह पूरा आयोजन कहीं सुनियोजित और सुचितिन्तित तो नहीं था ?हाँ ,आयोजन से जुड़े लोगों के लिए अनपेक्षित रूप से स्वतःस्फूर्त हो गया!
इसकी तैयारी काफी समय पहले से चल रही थी ..फेसबुक पर जनवरी सही ऐसे सन्देश आ रहे थे कि अन्ना आममरण अनशन पर अप्रैल में बैठेगें ..मैं सोचता था बैठेगें तो बैठेगें ...इत्ता पहले काहें परेशां हो रहे हो भाई! इस्पूरे आन्दोलन को लेकर मेरे मन में कुछ गहरे संशय हैं -
इसे मीडिया इवेंट बनाया गया जबकि मीडिया खुद भ्रष्ट है ..अपने संवाददाताओं के साथ कैसा व्यवहार है उसका?
इसे ग्लैमराईज किया गया-फ़िल्मी हस्तियाँ खुद कितनी भ्रष्ट हैं? टैक्स चोरी ?
जब जन सहभागिता के चलते आन्दोलन क्रांतिक स्तर पर पहुँचने लगा अचानक ही समाप्त हो गया -क्या जन लोकपाल विधेयक जन जन में व्याप्त भ्रष्टचार का मूलोच्छेदन कर देगा ?
इस आन्दोलन की ब्लैक शीपस कैसे अलग होंगी ? अन्ना के साथ कितने कलमुंहे भी आकर अपनी फोटो खिचायें हैं !
हना सरकार डरी है तो इसलिये की भीड़ बढ़ती जा रही थी ..यह एक शुभ लक्षण है -लोकतंत्र की जीवन्तता दिख गयी ? ऐसा आयोजन सीधे दागी मंत्रियों के इस्तीफे लेने के लिए होने चाहिए थे !

Rahul Singh said...

अक्‍सर एक ही अण्‍णा, हजारों पर भारी होते हैं.

खुशदीप सहगल said...

डॉ अमर्त्य सेन ने The Argumentative Indians में बिल्कुल सही लिखा है कि भारतीयों ने और कुछ सीखा हो या न हो लेकिन उन्हे हर बात में मीन-मेख निकालना और फिर बहस में उलझना बड़ा रास आता है...ठेठ मेरठी भाषा में कहूं तो मुहज़ोरी करना बड़ा सुहाता है...अमेरिकी प्रोफेसरों में ये बात मशहूर है कि उनका आधा वक्त भारतीय छात्रों के तार्किक-अतार्किक बहस में बीत जाता है और आधा वक्त चीनी छात्रों के साथ इस कोशिश में कि वो कुछ बोलें...हम कुछ और करें न करें, खाली बैठे-ठाले ज़ुबानी जमाखर्च और दूसरे की टांग-खिंचाई खूब कर सकते हैं...अब अन्ना पर पिल पड़े हैं...क्या ज़रूरत थी भला चोर को चोर कहने की...सरकार को ये एहसास कराने की कि देख लीजिए जनता किस तरह उबल रही है, और ये ज्वालामुखी फटा तो क्या क्या साथ बहा कर ले जाएगा...

जय हिंद...

प्रवीण पाण्डेय said...

सेफ्टी वाल्व का सिद्धान्त सब प्रयोग में लाते हैं, कुछ दबे भावों से कुछ खुले। व्यक्तिगत और समाजगत निष्ठायें अलग अलग थीं ह्यूम की।

डॉ. दलसिंगार यादव said...

सतीश जी!
स्वार्थ की मानसिकता तो पहले ही उजागर हो गई। लोग केजरीवाल से असंतुष्ट लगे। लोगों की आपत्ति सामने आई कि समिति बनाने में लोकतांत्रिकता की अनदेखी की गई। अब अन्ना जी भले ही निःस्वार्थ हों बाकियों की स्वार्थपरता की परीक्षा तो होनी है अभी। देश में जनांदोलन के बाद जब भी नेता पद के चुनाव की बात आई लोकतांत्रिकता की अनदेखी की गई। 1947 में प्रधानमंत्री के चुनाव के समय, नेहरू के बाद नंदा जी की अनदेखी की गई, 1977 में मोरार जी का चुनाव। आगे भी कितनी ही बार लोकतांत्रिकता की अनदेखी की गई। कहाँ तक गिनाऊं? परंतु इतना ज़रूर है कि जब भी कोई करिश्माई नेता मिलेगा भेड़ें पीछे चल पड़ेंगी।

मनोज कुमार said...

@ There's a little bit of Corruption in everybody's life.
बिल्कुल सही कहा।
एक अनोखा वाकया याद आ गया।
एक सज्जन हमारे राज्य के स्वास्थ्य सचिव से मिलने गए। कुछ काम था। सचिव का चापरासी अन्दर जाने ही न दे। पहले तो चाय पानी के लिए कुछ दक्षिणा मांगा। न देने पन पान खिलाने की फ़रमाइश की, वह भी न देने पर बोला, “कुछ नहीं है तो खइनिए खिला दीजिए।”
वे अन्दर गए। ज़ाहिर है कि चापरासी की मांग पूरी करके।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

....

Rahul Singh said...

बारीकी के खतरे.

सतीश पंचम said...

@ डॉ अमर्त्य सेन ने The Argumentative Indians में बिल्कुल सही लिखा है कि भारतीयों ने और कुछ सीखा हो या न हो लेकिन उन्हे हर बात में मीन-मेख निकालना और फिर बहस में उलझना बड़ा रास आता है...
---------

एक ओर तो भारतीयों पर आरोप लगता है कि उन्हें हर बात में मीन-मेख निकालना आता है तो दूजी ओर यही तथाकथित बुद्धिजिवी कहते हैं कि भारत के लोग साठ साल से चुप क्यों बैठे हुए थे....अब तक बोले क्यों नहीं.......अचानक कहां से लोग बोलने लगे कि ये बिल लाओ वो फलां ढेका लाओ।

यानि ऐसा भी वही लोग बोलेंगे और वैसा भी वही लोग बोलेंगे.... बाकि सब लोग तो कूढ़मगज हैं न!

सञ्जय झा said...

dar hai ke ........ anna-gandhi.......mohre na ban jayen.....
jaisa ke......t.v pe dikh raha hai..

pranam.

rashmi ravija said...

मन में इस तरह के प्रश्न उठना स्वाभाविक है...

पर बेहतर नहीं कि कोशिश करके असफल हुआ जाए बजाए इसके कि असफलता के अंदेशे से कोई कोशिश ही ना की जाए ??

Abhishek Ojha said...

'सत्य वचन ! '

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी की E- Mail से प्राप्त टिप्पणी
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सतीश पंचम और अंग्रेजी कविता!
आनन्दम आनन्दम।

अब कम से कम एक ब्लॉगर तो मुझे अंग्रेजी कविताओं के प्रयोग पर टोक नहीं पायेगा। यह बात एक दूसरे ब्लॉगर को चैट के दौरान बताने पर उन्हों ने ऐसा कुछ कहा - क्या अंग्रेजी कवितायें केवल आप ही क़ोट कर सकते हैं? उनकी मेट्रो सोच की अल्टरनेटी प्रक्रिया पर मैं देहाती हैरान हुआ और बात को :) लगा कर आगे बढ़ा दिया। यह अटकने से बचने की सरल और किफायती प्रक्रिया है।

खैर! कविता तो वाकई जबरजंग है और मुझे इस बात की जलन है कि इसे मैं क्यों नहीं लगा पाया?

अब बात सेफ्टी वाल्व पर करते हैं। कोई भी आन्दोलन या काम बिना दोषों के नहीं होता। 'धूमेनावृताsग्नि:' एक पुराना दृष्टांत है जो थोड़े हेर फेर के साथ स्मोकलेस आग के इस जमाने में भी सच है।

अब धुयें के कारण कोई आग जलाना तो छोड़ नहीं देता। मेट्रो ब्लॉगर ने भी कुछ ऐसी ही बात चैट के दौरान की।(यह बताने का मकसद यह उदाहरण देने का है कि पंचम दा की पोस्टें उनके अनजाने ही विद्वान प्रबुद्ध जन के 'चैटीय विमर्शों' में स्थान पाती हैं।)

...तो आग जलाइये लेकिन धुयें पर भी नजर रखिये। कहीं ऐसा न हो कि केवल धुँआ धुँआ ही हो जाय और नजदीक होने के कारण आग आप को लेस कर फुस्स हो जाय! आग पवित्र होती है तो उसे जलाने वाले/लों को भी पवित्र होना चाहिये वरना 'जलाने' को 'लगाने' होने में समय नहीं लगता। मुझ ढपोरशंख को तो इस पोस्ट के मायने यही लगते हैं।

रही बात सेफ्टीवाल्व की तो इसका प्रयोग बहुत पुरातन काल से होता रहा है। मनुष्य़ हर दफा चढ्ढी चढ़ा कर जंग तो नहीं लड़ सकता या लड़ा सकता है। जब बात जंग तक आती है तो वह भी कर लेता है लेकिन सेफ्टीवाल्व की खोज में उस समय भी लगा रहता है।

- गिरिजेश राव

VICHAAR SHOONYA said...

पंचम जी मेरे मन के कुछ संशयों को अपने स्वर दिया है.

Poorviya said...

इसे मीडिया इवेंट बनाया गया जबकि मीडिया खुद भ्रष्ट है ........

jai baba banaras.......

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

पता नहीं कुछ बदलाव आयेगा या यूंही हल्ला हो कर रह जायेगा।
अभी तो लोग भ्रष्ट-भ्रष्ट खेल खेल रहे हैं!

अनूप शुक्ल said...

बहुत खूब!
कई सारे बहुत खूब हैं इस पोस्ट में।

:) बहुत खूब!

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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