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Thursday, April 7, 2011

कोलाज ऑफ कैटरीना बबुनी बजरिए.... आमसूत्र

       आमसूत्र कहता है कि लालच को जितना पकने दो.........मिलन उतना ही मीठा होता है....सब्र करो...सब्र करो ....गहरे सुनहरे पे रंग ठहरने दो........क्योंकि सब्र का फल मीठा होता है.......

   हां कैटरीना बबुनी ...सच कह रही हो.........एकदम सही कह रही हो... ..... सचमुच आमसूत्र के हिसाब से ही अब तक लालच को पकने दिया गया है ......पिछले साठ-बासठ बरिस से वह लालच पके जा रहा है.....पके जा रहा है...... पकते हुए गहरा सुनहरा  रंग...... देखो कैसे निखर आया है......कैटरीना बबुनी यह सब उसी आमसूत्र का कमाल हय  .....बकिया तो  बासठ साल से आम लोग सबर ही तो कर रहे हंय.......और करें भी क्यों नहीं......बड़े बड़े ज्ञानी-गुनी....संत महतमा लोग कहि गये हैं कि सबर करने का फल मीठा होता है.... लेकिन ये कोई नहीं बताये कि जियादे सबर करने पर कभी कभी फल सड़ भी जाता है।

  और वही हुआ है....... देश के लोगों ने इतना लंबा सबर किया कि पकने की कौन कहे.... पूरा  देशवै सड़ने लगा है.....सड़ कर बजबजाने लगा है......देस के नेता लोग गन्हाने लगे हैं........जहां जाते हैं दूर से ही दुतकारे जाते हैं.....खजुअहे कुक्कुर की तरह.......लेकिन अपनी खजु-अहट को वो भला क्यों माने.....चढ़ जाते हैं अन्ना हजारे जैसे साधू मनई के कपार पर.....चाहते हैं कि एक बार अन्ना के मंच पर साथ साथ दिख जांय तो जिनगी भर की खजु-अहट से छुटकारा मिल जाय...... लोग उनको भी साफ सुथरा मानै लगें...... लेकिन जनतौ चलाक हो गई है.....दौड़ा लेती है ऐसे खजुअहे कुक्कुरों को.....क्योंकि अब और सड़न नहीं चाहती जनता .....

      आम जनता ने बहुत सबर से ई आमसूत्र  को सहा है.... भोगा है.....अब समय आ गया है कि वही आमसूत्र को दामसूत्र में बदल दिया जाय....जो कोई घपला करे......तुरंतै दाम वसूलो...... निकालो बाहर........जितने का घपल्ली किया सबका दाम देओ ।


      बाकि यह सब की चिंता तुम काहे करोगी कटरीना बबुनी.....तुमको कौन चिंता है .....तुम खाली आम खाओ....पेड़ सलमान गिनेंगे  :) 


 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर कटरीना बबुनी अक्सर पेड़ के आसपास घुमते-घामते सूटिन्ग करती हैं।

समय - वही, जब अन्ना हजारे के मंच पर जाने के लिये एक नेता लालायित हो और तभी उसका पीए कहे -   न जाने वहां कितना देर बैठना पड़ जाये,   भोजन-ओजन किए हैं कि नहीं। 

(चित्र: साभार यहां से  )

10 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अब सब मिलकर इतना पका दिये कि आम कड़ुवा गये, खास मीठे हो गये।

Abhishek Ojha said...

पेड़ सलमान गिनिंगे. सही है. वैसे मौका मिले तो बहुत तैयार हैं आम खिला कर पेड़ गिनने वाले. :)

Udan Tashtari said...

अब समय आ गया है कि वही आमसूत्र को दामसूत्र में बदल दिया जाय..बिल्कुल आ गया है.

Arvind Mishra said...

अभी तो इधर टिकोरे हैं और उधर क्या पक गए हैं ?

संजय @ मो सम कौन ? said...

मौजूदा हालात में आप सब आशावादियों से सहमत होने का मन करता है लेकिन जनता जनार्दन की याददाश्त और यहाँ तक की नीयत के बारे में अपने को बहुत ज्यादा ऐतबार नहीं है। फ़िर भी मीठे में खटास न डालते हुये ’आमीन’ कहते हैं।
’अभिषेक’ ने तो अपनी सहमति दे दी है, कैटरीना बबुनी का जवाब आये तो मजा आये:)

Rahul Singh said...

बोतल भर रस.

Poorviya said...

आम जनता ने बहुत सबर से ई आमसूत्र को सहा है.... भोगा है.....अब समय आ गया है कि वही आमसूत्र को दामसूत्र में बदल दिया जाय....जो कोई घपला करे......तुरंतै दाम वसूलो...... निकालो बाहर........जितने का घपल्ली किया सबका दाम देओ ।


jai baba banaras.......

सञ्जय झा said...

मौजूदा हालात में आप सब आशावादियों से सहमत होने का मन करता है लेकिन जनता जनार्दन की याददाश्त और यहाँ तक की नीयत के बारे में अपने को बहुत ज्यादा ऐतबार नहीं है। फ़िर भी मीठे में खटास न डालते हुये ’आमीन’ कहते हैं।

hamnam bhaijee ki bat hamri bhi mani jaye......

anna...

rashmi ravija said...

सही कहा...सब्र का फल मीठा जरूर होता है,जब तक सब्र की एक मियाद हो...
अन्यथा फल के सड़ने की बदबू असहनीय हो जाती है.

जयकृष्ण राय तुषार said...

बहुत ही सुंदर पोस्ट सतीश जी बधाई और शुभकामनाएं |

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