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Tuesday, April 5, 2011

डेमोक्रेसी ऑफ 'बाजारू किंगडम'

       आज सुबह टीवी में खबर देखा कि PAC के सामने घोटालों से संबंधित पूछताछ हेतु जब नीरा राडिया पेश हुई तो उन्होंने एहसान जताने वाले लहज़े में कहा - कहिए, आप लोग क्या कहना चाहते हैं, मैं आप लोगों के 'रिक्वेस्ट' पर उपस्थित हुई हूं।

      सुनते ही मुरली मनोहर जोशी का पारा चढ़ गया कि ये क्या कह रही हैं मोहतरमा .....और नीरा राडिया को चेताया कि - माईंड योर लैंग्वेज, हम 'रिक्वेस्ट' नहीं करते 'आदेश' देते हैं।

        यह पूरा प्रकरण मुझे कुछ-कुछ उस राजा के तरह का लग रहा है जिसके ज्यादातर दरबारी धनलोलुपता के चलते पाला बदल कर विरोधी खेमे में जा चुके हैं और राजा को पता ही नहीं कि उसके पीछे क्या घट चुका है। राजा को अब भी लगता है कि वह अधिकार संपन्न है, आदेश देने की हैसियत रखता है।

        दूसरी ओर विरोधी खेमे द्वारा धनबल के जरिये ज्यादातर दरबारीयों को अपनी ओर कर चुकने के बाद उसमें इतना 'कुटिल-आत्मविश्वास' आ गया है कि उसे लगता है कि यह राजा मेरी दया पर ही अपनी कुर्सी पर टिका है....चाहूं तो चुटकी में अपने उन दरबारीयों के दम पर राजा को हटा दूं ..... और यह 'कुटिल-आत्मविश्वास' उसके बोल-चाल, रहन-सहन, बात-व्यवहार सभी में बखूबी झलक भी रहा है तभी तो उसे लग रहा है कि राजा केवल अनुरोध कर सकता है....आदेश नहीं दे सकता ।

      खैर, यह तो अच्छा हुआ कि समय रहते बात पकड़ ली गई और राडिया को चेताया गया कि अपनी औकात में रह कर बात करे....लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि राडिया ने उस चेतावनी को वास्तविक तौर पर समझा भी होगा या केवल silly topic कहकर ऐंवे ही टाल दिया होगा। क्योंकि अब तक देखा गया है कि यह तबका अपने धनबल और नेटवर्किंग के जरिए समूची व्यवस्था को ही अपने पैरों तले समझता है ( जो कि काफी हद तक सच भी है ), ऐसे में कत्तई नहीं लगता कि राडिया को ज़रा भी एहसास हुआ होगा कि उसके लहजे में क्या खामी थी।

           लेकिन यह परिस्थिति वाकई शोचनीय है कि एक ओर तो धनिक तबका पूरे देश को अपनी जागीर समझे, उसी हिसाब से बात-व्यवहार करे और दूसरी ओर जनता के चुने हुए प्रतिनिधि अपने आप को लाचार महसूस करे....और ऐसा हो भी क्यों नहीं....आखिर यही तो वह तबका है जिससे कि राजनीतिक चंदा मिलता है....इन्हीं के जरिए तो अपनी चुनावी नैया पार लगाई जाती है.....ऐसे में राडिया जैसा 'अनुरोध प्रकरण' न हो तो क्या हो जिनकी कि डिक्शनरी से ही 'आदेश' शब्द को निकाल फेंका गया है।


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां के तमाम कारपोरेट घरानों के सीवर अरब महासागर में खुलते हैं।

समय -  वही, जब राजा भरे दरबार में राज-नर्तकी को चेताये कि - वह अपनी औकात में रहे और तभी राज-नर्तकी कहे -  मैं अपनी औकात के बारे में तो नहीं जानती महाराज, लेकिन मैं इतना जरूर जानती हूं कि आपकी औकात एक अंगूठे से ज्यादा की नहीं है.....क्योंकि हर पांच साल बाद वह अंगूठा ही है जिससे कि आपकी औकात नापी जाती है.........बटन दबाकर।

  ये अलग बात है कि उस बटन को दब-वाने का 'नज़राना' हम देते  है  :)

14 comments:

शिवकुमार ( शिवा) said...

बहुत सुंदर लेख ..

दीपक बाबा said...

मस्त........

सत्ता और धनबल का नग्न नृत्य चालू आहे....

सञ्जय झा said...

sirf excell ki factory lagaye hain ka
ho pancham da.....bari ragar ke dhoyen hain.........

jai ho...

नीरज गोस्वामी said...

गज़ब का व्यंग...बल्कि यूँ कहूँ मारक व्यंग...वाह
नीरज

देवेन्द्र पाण्डेय said...

पारखी नज़र और कमाल की अभिव्यक्ति।
...शर्मनाक ।

Ashok Pandey said...

राजा को अब भी लगता है कि वह अधिकार संपन्न है, आदेश देने की हैसियत रखता है ...हा हा हा

इस देश में बड़ी संख्‍या में वामपंथी बुद्धिजीवी रहते हैं जिन्‍हें लगता है कि वे काफी महत्‍वपूर्ण कार्य कर रहे हैं ... हा हा हा हा

हम हर साल बड़े गर्व से आजादी के तराने गाते हैं : लिखेंगे नयी कहानी, हम हिन्‍दुस्‍तानी ... हा हा हा हा हा

इस देश का नागरिक कहलाने से बेहतर है कि चुल्‍लू भर पानी में डूब मरा जाए।

सतीश पंचम said...

अशोक जी,

अमूमन सभी देशों में कुछ न कुछ समस्याएं हैं....कहां तक जाइयेगा। इसलिये जो अपना देस है वही सही...जैसा है, जहां है यूं ही चलता रहेगा और हम लोग भी उसमें डगर झगर चलते रहेंगे :)

प्रवीण पाण्डेय said...

......और उस पर से सीनाजोरी।

Udan Tashtari said...

अफसोसजनक स्थितियों के निर्माताओं को जब स्वयं ऐसी स्थिति झेलनी पड़ती है तो अक्सर मूँह से बेसाख्ता ऐसा ही निकलता है- माईन्ड योर लैन्गवेज!!

rashmi ravija said...

..आखिर यही तो वह तबका है जिससे कि राजनीतिक चंदा मिलता है....इन्हीं के जरिए तो अपनी चुनावी नैया पार लगाई जाती है"

बस यही तो बात है...गिव एन टेक यहीं हो जाता है और आम जनता हमेशा हाशिए पर ही रहती है.

Abhishek Ojha said...

यूँ ही डगर झगर चलता रहे तो भी बुरा नहीं है :)

अनूप शुक्ल said...

:) बोलो सच्चे दरबार की जै!

खुशदीप सहगल said...

राडिया ने ही अपनी कॉन्टेक्ट पावर के दम पर राजा को राजा बनाया था...

राडिया के प्रथम नाम नीरा को उलटा कर देखिए रानी ही निकलेगा...

जय हिंद...

ajit gupta said...

जब राजा ही मंगता हो जाए, कभी वोट मांगे और कभी धन तो फिर ऐसा ही होना है। बहुत बढिया प्रसंग उठाया है।

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