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Saturday, April 2, 2011

एन इवनिंग ऑफ रामअवतार बाबू

           देखो गरी-छोहाड़ा सब उधरै रख दो....औ  वो दूध के लिये कहलवा देना कि जियादे चाहिये.......खीर बनना है.... वो हरी सौंफ है संभाल कर रख दो......हांय.....अरे तो पकौड़ों के लिये 'पियाज-ऊआज' कह देना था न लेते आता.....अब कहां से मिलेगा.....न हो तो छोटे को भेजो....नरैना की दुकान अभी बंद नहीं हुई होगी.......ले आये दो चार किलो जो लाना है.....अरे लाने कह रहा हूं तो लगी हो तिखारने  पइसा पेड़ पर उगता है .... सेंत में....हेंत में  मिलता है..........

........ए बच्ची उधर नहीं ......अरे उसमें कुछ नहीं है...........अरे बोतल है.......दवाई वाली बोतल है ....उसे मत छूओ....देखा.....मुंह बनाया न.......इसलिये कह रहा था .....दवाई है.....बदबू आती है......मत छूओ..... अच्छा अब  जाओ खेलो बाहर......अजी सुनती हो.....जरा नेबू ओबू काट कर ये थोड़ा नमकीन है..... एक कटोरी में करके उपर छत पर पहुंचवा दो........न हो तो तुम खुदै लिये आओ.....लड़के देखेंगे तो दिक करेंगे........अरे उसमें कुछ नहीं दवाई है......तुम नाहक सक करती हो.......  उपर कोई है क्या छत पर......आंय.....बहू .......हवा ले रही है.......औ कौन........रतना बिटिया भी है.... ....कब आई ससुराल से......तभी बाजार में नन्हे मिले थे तो कह रहे थे कि बिटिया की गाड़ी अभी घर की ओर ही गई है......... .कैसे हैं उसके यहां सब........अच्छा सुनो....वो नेबू औ नमकीन तनिक इधर ही लेती आना......नहीं अभी नहीं खाउंगा....थोड़ा देर बाद........ओ हो....तुम तो जिद पर आ गई....अरे कह तो रहा हूं  कि खाउंगा......बाद में खाउंगा....मेरे लिये अलग से एक थाली में निकाल कर रख दो......आंय रतना इधर ही आ रही है..........सुनो  ये थैली जरा उधर रख दो......अरे कु्च्छ नहीं है उसमें तुम........अ  हां .....जीती रहो बिटिया......और कैसी हो.....मुन्ना  कैसा है......आंय.....अरे तो दवा ओवा अच्छे से करवा दिया करो.....क्यों कंजूसी करते हो तुम लोग ........  सभाजीत से कहो कि  पइसा-कउड़ी के साथ साथ लइका बच्चा लोग का खान-पान भी देखें.............पिछली बार गया था तो मुन्ना एकदम सूख सा गया था....... अच्छा ....हां.....तब ठीक है......वो छत से कौन उतर रहा है.....बहू है....अच्छा ....अच्छा....हम्.....अच्छा.... तो अब मुन्ने की तबियत ठीक है न.....चलो अच्छा है भगवान सब भला करेंगे.....अच्छा जाओ आराम कर लो.....बहू को देखो कोई काम ओम हो तो हाथ बटा दो.......

  अजी सुनती हो...वो थैली कहां रखी.....अरे कहां है.....वहीं है वहीं है कहे जा रही हो...... नहीं मिल रही.........अरे तो आकर दे दोगी तो कौन  सा पहाड़ टूट पड़ेगा .......एक थैली संभाल कर रखने नहीं होता है......अरे तो पहले बताना था न ....मुझे क्या पता यहीं चादर के पीछे रखी है.....अच्छा तो वो नमकीन औ नेबू निचो..

      ले आईं.......अच्छा उधरै रख दो..... मैं जा रहा हूं छत पर ...... और हां थोड़ा सा पानी भी लेती आना..........अरे उसे कहां टटोल रही हो.....उसमें कुछ नहीं रखा है.....दवाई है....ओ हो तुम समझती ही नहीं........जेब फट जाएगी.....क्या करती हो......अरे तो खुले पैसे तो छोड़ दो.....कल फिर बस में कंडक्टर से खुले के लिये झिकझिक करनी पड़ेगी....भगवान जाने ये औरतें कब पतियों की जेब साफ करना छोड़ेंगी........अरे तो .....सुनो तो :-)



( ऐसे रामअवतार बाबू लोग अक्सर हर गली कूचे, कस्बे में पाये जाते हैं.....अपनी ही दुनिया में कुछ हद तक 'रमे-रमे से'........... कुछ कुछ बावर्ची फिल्म के ए.के. हंगल टाइप ...........जिनका युवराज सिंह के Re-vital विज्ञापन की तर्ज पर 'मूल-मंत्र' होता है ......ये भाग-दौड़ भरी लाईफ........थकना मना है   :- ) 


  कल इन्हीं तरह के एक शख़्स से मिलना हुआ, जिसकी परिणति है  यह पोस्ट ।


- सतीश पंचम



स्थान - वही, जहां पर कि हवादार छतों के केवल ताले ही हवा लेते हैं।

समय - वही, जब रामअवतार बाबू चुप्पे से अपने थैले में हाथ डालने को हों और तभी बेटा आकर कहे - बाबूजी, आज फिरिज में बरफ नहीं जमा, अम्मा कह रही हैं कोका कोला मिला लिजिए :)

(चित्र  - बावर्ची फिल्म से )

22 comments:

अनूप शुक्ल said...

:) एक बिचारी छत पर का का धरायेगा! :)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

...मस्त पोस्ट है। सटीक चित्रण।

मनोज कुमार said...

मज़ेदार ... रोचक!!

प्रवीण पाण्डेय said...

सुबह से शाम तक जीवन में निचुड़े राम अवतार को ठीक से नींद ही आ जाये, यही बहुत है।

Rahul Singh said...

न जाने राम के कितने अवतार.

ajit gupta said...

एकदम आँखों देखा हाल।

दर्शन कौर धनोए said...

Pahli baar aai hun ? post achhi lgi !

खुशदीप सहगल said...

घर-घर की कहानी...

मेरे स्वर्गीय पापा का नाम भी राम अवतार है...

जय हिंद...

सञ्जय झा said...

kuchou nahi hai.....kuchou nahi hai......kah kar post nipta diye...
rakhhe ka the bataibe nahi kiye....

are koi bhale log bataoge ka rakhe the pancham babu usme..........eh..are ....ohi joun ke liye....nimbu pani mangai rahe hain......

jai ho...

anshumala said...

बिलकुल अपने आस पास का ही एक चरित्र सा | फिर यहाँ पर छत जाने के लिए समय ही किसके पास है वही भाग दौड़ भरी जिंदगी ---

शोभना चौरे said...

एक मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया का सटीक चित्रण और असली भारतीय परिवार का भी |
हमारे यहाँ इतने रामावतार है अब रामजी को अवतार लेने की जरुरत कहाँ ?
बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट |

Poorviya said...

.उसमें कुछ नहीं रखा है.....दवाई है....ओ हो तुम समझती ही नहीं.


bahut sateek ...

jai baba banaras....

Arvind Mishra said...

रम में रमते राम -अवतार !

दीपक बाबा said...

क्या कहते हैं, रापचिक पोस्ट.....

सुशील बाकलीवाल said...

दवाई की जरुरत सबसे ऊपर.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

वाह सतीश जी !

क्या शैली है .....लेख-कहानी कम ,,,बिलकुल दृश्यकाव्य लगती है आपकी पोस्ट |

बहुत ही रोचक , आम आदमी की विकट किन्तु सहज दिनचर्या का गज़ब का चित्रण ...

Anupam Singh said...

Bhaag daur bhari zindagi.. thakna mana hai!
likhte rahiye, rukna bhi mana hai!
badhiya lekh.

शालिनी कौशिक said...

bahut achchha laga aapke blog par aana.safed ghar vaise bhi shanti sukoon deta hai vahi aapke blog ne bhi kiya.

संजय @ मो सम कौन ? said...

एक जरा सा शौक पूरा करने के लिये कितना सिर खपाना पड़ता है:))

नीरज गोस्वामी said...

आहा...संवादों के माध्यम से क्या रोचक कहानी बुनी है...एक दम सच्ची...लगा जैसे सलीम देख रहे हैं...आप की लेखन शैली के तो कायल हो गए...कसम से...

नीरज

rashmi ravija said...

कल इन्हीं तरह के एक शख़्स से मिलना हुआ, जिसकी परिणति है यह पोस्ट ।

अच्छा तो उन शख्स के मेहमान आप ही थे...जिनके स्वागत के लिए इतनी तैयारियाँ की जा रही थीं...:)

Padm Singh said...

दवाई के शौकीनों की अजब गज़ब दुनिया... :)

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