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Saturday, March 26, 2011

ब्लॉगिंग में शुचितावाद की चिल्ल-पों और स्टोरी-ब्वॉय टाइप लेखन


    लेखन में शुचितावादिता कितनी होनी चाहिए.....इस मुद्दे को लेकर काफी लंबे समय से बहस चली आ रही है और संभवत: आगे भी चलती रहेगी। लेकिन इधर देखा जा रहा है कि शुचितावादिता के नाम पर कुछ ज्यादा ही नाक भौं सिकोड़ी जा रही है। कुछ ज्यादा ही चिंतित होने का भ्रम पाला जा रहा है.... न सिर्फ पाला बल्कि दूसरों से भी पलवाया जा रहा है कि देखो कहीं आप चिंतित होने से नहीं छूट जाओ वरना कहोगे कि बताया नहीं :-)

     खैर, अभी कुछ समय पहले ही प्रिंट में चर्चा थी कि ब्लॉगिंग में गाली वगैरह बहुत होती है, स्तर ठीक नहीं है, फलां है ढेकां है । उसके बाद कई ऑफ्टरशॉक पोस्टें आईं और आते चली गईं। अब इधर देख रहा हूं कि फिर से चिंतित होने का मौसम शुरू हो गया है......आपका लेखन कैसा होना चाहिए....सामाजिक सरोकार होना चाहिए......शुचितावादी होना चाहिए..... bla   bla  bla  ....।

     इस तरह की चिंताओं को देख मुझे लगता है कि यदि कोई नया नया ब्लॉगर इन चिंताओं को देख ले तो उसे ब्लॉगिंग से कन्नी काटते देर नहीं लगेगी। पोस्ट लिखते हुए डरा सहमा सा रहेगा कि कल को कहीं मुझे ऐसा लिखने पर टोक न दे, कुछ कह न दे।  एकाध संवेदनशील ब्लॉगर कहीं अपना रास्ता ही न नापने लग जांय कि - हटाओ यार, वर्तमान लेखकीय चिंताएं क्या कम हैं जो इस तरह की नई नई चिंताएं पाली जांय....ये लिखो....वो मत लिखो.....ऐसा लिखो....वैसा लिखो। पब्लिशर्स की इन्हीं  सारे नखरों से पार पाते हुए ब्लॉगिंग में आये और फिर वही बंदिशें 'तुगलकी ठर्रे' की शक्ल में यहां भी घेर लें तो इससे तो दूरी भली।

     मैं कभी कभी सोचता हूं कि यदि इसी तरह की चिंताओं को तवज्जो दिया जाता, या यही चिरकुट चिंतन काशीनाथ सिंह पर दबाव डालने में सफल हो जाता तो आज काशी का अस्सी जैसी उत्कृष्ट कृति सामने नहीं आ पाती।  यही चिरकुटई चिंतन रहता तो मंटो को कभी कोई नहीं पढ़ पाता। उस वक्त भी इसी तरह का चिरकुट चिंतन जारी था कि इतना खुलेपन से नहीं लिखना चाहिए.....ठीक नहीं है.....अच्छा नहीं है खुला लिखना। लेकिन न तो मंटो ने उन सबकी परवाह की और न काशीनाथ सिंह ने और आज उसी का प्रतिफल है लोग उनके लेखन का लोहा मानते हैं, उनके वैचारिक खुलेपन की तारीफ करते हैं। 

   आज देखता हूं कि गूगल बाबा के जरिए मुफ्त का एक ब्लॉगर प्लेटफार्म मिल गया तो लोग लगे चिंतन झाड़ने कि ऐसा लिखना चाहिए, वैसा लिखना चाहिए। कल को कहीं सचमुच इन चिंतकों को कोई नीलकमल प्लास्टिक कुर्सी पर बैठने वाला भी पद मिल जाय तो इनका पैर ही जमीन पर न पड़े। तब तो आकाश क्या चीज है...... ऐसे घनघोर चिंतक अंतरिक्ष में भी बांस लेकर पहुंच जाएंगे टेका लगाने के लिये कि हम ही हैं जो अब तक थामे हुए हैं :-)

    खैर, ऐसा नहीं कि मैं ब्लॉगिंग में एकदम से खुलेपन का समर्थक हूं.......लेकिन इतना भी बंद मानसिकता को लेकर ब्लॉगिंग नहीं करना चाहता कि बुरका पहनाकर तस्वीर खेंचूं और कहूं कि यही है 'सभ्य-सलोना शुचितावाद' ऐसी शुचितावादिता को दूर से ही प्रणाम करना पसंद करूंगा जो कि ढके छुपे तौर पर तो सब कुछ मान्य किये हो और पब्लिक प्लेटफॉर्म पर आते ही शुचितावाद की चादर ओढ़ ले। 

   रही बात कि ब्लॉगिंग में कैसा लिखना चाहिए....कैसा लिखते हुए दिखना चाहिए तो इसकी ज्यादा फिक्र वही लोग करते पाये जाते हैं जिनके पास लिखने को कुछ नहीं होता.....(जैसे कि अभी मैं लिख रहा हूँ :-)   हां भई, जब आप को कुछ न सूझे लिखने के लिये तो सीधे 'ब्लॉगरीय शैवाल', 'टिप्पणी कवक' या फिर 'ब्लॉगराना फंगस' आदि पर एकाध पोस्ट ठेल दिजिए। ब्लॉग, ब्लॉगरी, टिप्पणी, फिप्पणी ऐसे कुछ विषय हैं जिन पर कि ज्यादा मेहनत नहीं करनी होती सिर्फ ज्योतिषीय ढंग से गोल मोल कह दिजिए कि आज कल लोग ब्लॉगिंग में सार्थक नहीं लिख रहे, अच्छा स्तर नहीं है लेखन का, लोग गाली वगैरह लिखते हैं, कल को लोग पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे bla bla…. फिर देखिए....टिप्पणी दर टिप्पणी लोग समझाने आएंगे कि नहीं भई ऐसा नहीं है....लोग अच्छा लिख रहे हैं....बहूत बढ़िया लिख रहे हैं.....सार्थक सृजन कर रहे हैं....लाइमलाईट में नहीं आ रहे सो अलग बात है...tit....tit....tit इतना सुनना होगा कि ब्लॉगर जिसने पोस्ट लिखी होगी फूल कर कुप्पा हो जायगा.....कुप्पा न हुआ तो कुप्पी तो जरूर होगा कि मेरी पोस्ट पर हुए विचार विमर्श का ही परिणाम था कि लोगों को पता चला कि सचमुच ब्लॉगिंग में सार्थक लिखा जा रहा है, वरना तो लोगों को पता ही नहीं था कि ब्लॉगिंग में क्या हो रहा है :-)

    बहरहाल ये और इस तरह की बातें न जाने कितनी बार ब्लॉगिंग में लिखी जा चुकी हैं कि अब तो पता चल जाता है कि बंदे ने बैठे ठाले यूं ही लिख मारा है। वरना तो यदि लिखने शुरू किया जाय कि ब्लॉगरी पर किन किन लोगों ने और कब कब चिंतन के नाम पर पोस्ट ठेली है तो कई खण्ड, पुनर्खण्ड, खण्डे-खण्ड बनते चले जांय :-)

  Anyway,   अब थोड़ा व्यंग्य को साईड में रखते हुए  अपनी ओर से भी कुछ कह लूं ( जैसे कि अभी तक कोई दूसरा ही कहे जा रहा था :-)

     ब्लॉगिंग में क्या लिखा जाना चाहिए, कैसे लिखा जाना चाहिए, किस तरह का मानदंड अपनाना चाहिए ये अब चिंता-चिन्तन का विषय नहीं रहा। लोग खुद-ब-खुद अपनी सीमाएं पहचानने लगे हैं। लोगों को समझ है कि क्या पढ़ना है क्या नहीं पढ़ना है। यदि इस मानसिकता से लिखा जाय कि -  कल को उनके लिखे को लोग पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे, तो जो कुछ भी लिखा जायगा वह बनावटी होगा, एक तरह का छुपाव लिये होगा, जिसमें कि केवल गुडी गुडी बातें और कहानी टाइप कल्पनाएं होंगी। लोग जब भी लिखेंगे उसे गल्प और कल्पना की आड़ लेकर लिखेंगे ताकि उनकी वास्तविक मानसिकता को एक तरह की नकाबपोशी मिले।

    यदि यही सब गल्पायन और छद्म शुचितावादिता वाला 'स्टोरी-बॉय' लेखन होना चाहिए तो क्यों न बजाय ब्लॉग पढ़ने के, सीधे कहानियाँ ही पढ़ी जांय, कम से कम कहानी तो ढंग से पढ़ने मिलेगी।  
वैसे भी जहां तक ब्लॉग का मूल उद्देश्य है वह यही कि आप जो कुछ अभिव्यक्त करना चाहते हैं उसे खुले ढंग से अभिव्यक्त करें, उसे लोगों के सामने लायें। 

     लेखन आदि को लेकर तमाम शुचितावादी बंदिशें उपरी तौर पर ओढ़ने की बजाय असल जिंदगी में शुचितावादी हुआ जाय तो बात बने। इसे तो शुचितावादिता  कत्तई नहीं कहा जायगा कि घर से कबाड़ीवाला ढेर सारी मिजाज तर करने वाली 'वासन्ती बोतलें' बटोर कर ले जाय और अगले दिन ही नैतिकता पर एक पोस्ट ठेली जाय।

   मेरे हिसाब से इस तरह की बनावटी शुचिता केवल अपना गम गलत करने का ही जरिया है, एक तरह का Reality Substitution, कि जो कुछ वास्तविक जीवन में नहीं मिला उसे वर्चुअल स्पेस में पाने की चाह रखी जाय। और ऐसी ही चाहतों के तहत हर दो चार दिन पर पोस्ट दर पोस्ट लिखी जाय कि लोग ऐसा क्यों नहीं कर रहे, लोग समझ क्यों नहीं रहे, लोगों को ऐसा करना चाहिए.....वैसे लिखना चाहिए...... The height of Social  तकधिनवा :-)
  
  मेरा मानना है कि लोगों को लिखने दो, जैसा भी, जो भी लिखना चाहते हैं। जो लोग मिशनरी तौर पर लिखते हैं, अपने धर्म का प्रचार करने हेतु लिखते हैं उन्हें भी लिखने दो ताकि लोगों को पता तो चले कि अपने धर्म को महान बताने वाले ऐसे लोग अपने खुद के धर्म को किस हद तक जानते हैं, पहचानते हैं या फिर ऐंवे ही मजमा जुटाते रहते हैं। जिसे पढ़ना होगा वह पढ़ेगा जिसे नहीं पढ़ना होगा वो नहीं पढ़ेगा।  और जो लोग अपनी पोस्टों में खुलापन रखते हुए गली-कूचे की भाषा लिखते हैं, गलिहर बातें लिखते हैं उन्हें भी लिखने दो, क्योंकि यही वो लेखन है जो मंटो और काशीनाथ सिंह तैयार करता है। 

  और ऐसा भी नहीं है कि लोगों को समझ नहीं है..... लोगों के पास अपनी समझ है, वो जानते हैं कि क्या पढ़ना है क्या नहीं। किसे पढ़ने से समय नष्ट होगा, किसे पढ़ने से केवल मजमा जुटान होगा, और सौ बात की एक बात   लोग अब 'छद्म-शुचितावादी लेखन' की नसें जल्द पकड़ लेते हैं ....क्योंकि इसके लिये किसी स्पेशल डिग्री-फिग्री की जरूरत नहीं पड़ती........महज़ ऑब्जर्वेशन ही एनफ़ है  :-)  

 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर कि दो अप्रैल के दिन होने वाले फाइनल को लेकर तगड़ी सुरक्षा का इंतजाम किया जा रहा है । 

समय - वही, जब एक 'अमीबात्मक ब्लॉगर'  किसी दूसरे 'ब्लॉगरीय कवक' से कहे - यार तू हमेशा दुखी होकर हर दो चार दिन बाद 'सभ्य-सलोना कैसे बनें' जैसी बोझिल पोस्टें क्यों लिखता है ? 

  और तभी 'ब्लॉगरीय कवक' कहे - एक बोतल ढरकाने के बाद इससे ज्यादा की उम्मीद रखना असभ्यता है :-)

37 comments:

सञ्जय झा said...

T A R A K...........
....................

KAHAN LAGA ........ PATA KARNA HOGA..


JAI HO....

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

हुम्म्म... अब कल आई कुछ पोस्टें पढ़नी पड़ेंगीं.

Arvind Mishra said...

अच्छी झाड पिला दी है आपने ,आशा है सबक/सटक लेगें लोग !

Poorviya said...

bloggin ek tarh se aap ki personal diary hai aap ka jo man ho wah likhe .
ek bandhan mukt blogging....

jai baba banaras....

दीपक बाबा said...

ये हुई न बात ........ :)

कल मैंने जो पोस्ट लिखी थी, पर लिख नहीं पाया...... आपने चिल्ल-पों का सही जवाब दे दिया......

आभार.

rashmi ravija said...

सीधी सी बात है....अपने comfort zone में रहकर आपको जो लिखना हो लिख सकते हैं...पढ़ने की जबरदस्ती तो किसी की है नहीं...अच्छा लगे पढ़िए...ना लगे...दूसरा ब्लॉग पढ़िए.

हाँ, बस किसी का अपमान ना किया जाए

ये भाषणबाजी, सुझाव...निर्देश या प्रतिकार...कि किसी ने किसी को कवि क्यूँ कह दिया...कहानीकार क्यूँ कह दिया....भाषा ऐसी क्यूँ लिखी..वैसी क्यूँ लिखी...बैठे-ठाले लोगो के काम हैं...लिखनेवालों को अपने मन का लिखने के लिए ही समय कम पड़ता है...इन सब पचड़ों में कौन पड़े.

anshumala said...

http://mangopeople-anshu.blogspot.com/2010/11/mangopeople_29.html

ये उस लेख का लिंक है जब मैंने भी कुछ आपत्ति उठाई थी | पर साथ में ये बात भी तब कहा था की सभी को अपने ब्लॉग पर सब कुछ लिखने का हक़ है पर कुछ खास चीजे प्रकाशित करते समय कुछ चीजो का ध्यान रखे |

मैंने भी कई बार कहा है की ब्लॉग आम आदमी का मंच है और उसे बिना रोक टोक के कहने का हक़ मिलाना चाहिए और सभी का इस पर सामान अधिकार होना चाहिए | सिर्फ साहित्यकारों के लिए सिर्फ सामाजिक मुद्दों के लिए सिर्फ किसी सन्देश आदि के लिए नहीं होना चाहिए | खुद मुझे मेरे ब्लॉग पर आ कर कोई बता गया है की आप ये फालतू की चीजे क्यों लिखती है देखिये फला विषय पर आप ने जब लिखा था तो आप को कितनी सराहना मिली थी उसी तरह के मुद्दों पर लिखा कीजिये, अब इस पर क्या कहू यही की उन्हें भी कहने का हक़ है सो उन्होंने भी कह दिया |

प्रवीण पाण्डेय said...

चिल्लपों मची रहेगी,
लिखते रहें,
जैसे हैं, दिखते रहें।

akhtar khan akela said...

sty vchan saahsik vchan mubark ho . akhtar khan akela kota rajsthan

राज भाटिय़ा said...

मजे दार.... बहुत सही पकडी आप ने नब्ज जी.धन्यवाद

खुशदीप सहगल said...

सतीश पंचम जी,

हम तो अपुन को वही टिटिहरी मानते हैं जो पैर ऊपर उठा कर इसी उम्मीद में सोती है कि आसमान गिरेगा तो पैरों पर ही थाम लिया जाएगा...

अब आप कल..लो जो कन..ना है...

जय हिंद...

Kajal Kumar said...

सौ बात की एक बात... चिंता करने का इ नईं.

रचना said...

satsih = satish

befitting reply

but satish does not read satish
so satish will not comment on satish

सतीश पंचम said...

@ हम तो अपुन को वही टिटिहरी मानते हैं जो पैर ऊपर उठा कर इसी उम्मीद में सोती है कि आसमान गिरेगा तो पैरों पर ही थाम लिया जाएगा...
----------

अभी भी केवल मानने तक ही सिमित हो बंधु ? ....इधर लोगों ने विजिटिंग कार्ड तक छपवा लिये हैं पैर उपर किये हुए:)

Rahul Singh said...

छठे-छमासे यह सब होता रहे तो खुद पटरी पर और आप पटरी पर तो सब पटरी पर.

सतीश सक्सेना said...

@ सतीश पंचम,
आपका स्वागत है ...मेरा विश्वास बना रहा भगवान् का शुक्र है ! लगता है कोई है जो मुझसे बिना मेरी भूल बताये भी मुझसे बहुत नाराज़ है :-)
आभार आपका !

प्रवीण शाह said...

.
.
.
"मेरा मानना है कि लोगों को लिखने दो, जैसा भी, जो भी लिखना चाहते हैं। जो लोग मिशनरी तौर पर लिखते हैं, अपने धर्म का प्रचार करने हेतु लिखते हैं उन्हें भी लिखने दो ताकि लोगों को पता तो चले कि अपने धर्म को महान बताने वाले ऐसे लोग अपने खुद के धर्म को किस हद तक जानते हैं, पहचानते हैं या फिर ऐंवे ही मजमा जुटाते रहते हैं। जिसे पढ़ना होगा वह पढ़ेगा जिसे नहीं पढ़ना होगा वो नहीं पढ़ेगा। और जो लोग अपनी पोस्टों में खुलापन रखते हुए गली-कूचे की भाषा लिखते हैं, गलिहर बातें लिखते हैं उन्हें भी लिखने दो, क्योंकि यही वो लेखन है जो मंटो और काशीनाथ सिंह तैयार करता है।

सौ फीसदी सही बात... पारंपरिक प्रिन्ट मीडिया व ब्लॉगिंग में यही फर्क है व होना भी चाहिये... ब्लॉगिंग माने ईमानदारी, वह भी अपने आप से... ब्लॉगर जैसी सोच रखता है वह सोच बिना किसी मिलावट के झलकनी चाहिये उसके लिखे मैं... यह बात अकसर मैं भी कहता हूँ कि ब्लॉगिंग में हर वह चीज जो हम लोगों के दिलोदिमाग में निकलती है हमारी सोच में है, निकल कर आनी चाहिये... सब को पता तो चले कि कैसे कैसे विचार हैं दुनिया में... हर तरह की विचारधारा से बाकी सब का इन्गेजमेंट भी जरूरी है...

यह जो लोग अपने बच्चों को सही लगने वाले लेखन की बात कर रहे हैं या बिना कहीं कोई आग लगे हर समय आग बुझाने का संदेश देने को ही ब्लॉगिंग मान बैठे हैं... उनके लिये कुर्सी बहुत ही सुन्दर लगाये हैं आप... लपको, कब्जा करो और चिपक जाओ भाई लोगों... पर ध्यान रहे कि ब्लॉगिंग तुमको पीछे छोड़ निकल जायेगी बहुत दूर...


...

अजय कुमार झा said...

इह्ह ....जईसे आप चिंतन न किए हैं ..सबको धर के रग्ड दिए हैं ,..मांज के छोडे हैं स्क्रौच ब्राईट से ..जान रहे हैं दुनो हाथ में मुंगवा लड्डू धल्ल लिए हैं ..पंचम सुर लगा के ..एकदम ओरिजनल टच के साथ । हम तो धर के थकुचले रहते हैं ..बारह ठो ब्लॉग और साईट अलग से ..।

लेकिन सुनिए जी , विजटिंग कार्ड छपाने न दीजीए जी ...अरे आप नय बनने दीजीएगा बडका ब्लॉगर किसी को ..हम जान रहे हैं ..हमारा टिप्पणी भी इस पोस्ट के साथ अमर हो गया देखिए

डा० अमर कुमार said...

पँचम भाई, अभी अभी इसी आशय की एक टिप्पणी झील के उस पार कर आया हूँ, यदि अनुमति हो.. तो वही टिप्पणी थोड़ा तराश कर यहाँ फिट कर दूँ ? अच्छा तो किये देता हूँ.

बात अपनी औ तुम्हारी
साँझी पीड़ा जो हमारी।
वो स्वरों को खोलकर, जाँचना सब चाहते हैं,
भाव उठ, बह चले जो, बाँचना सब चाहते हैं,
कर्म है उनका यही तो इस कर्म का अधिकार दे दो
संग ही मेरे हृदय के मर्म का आधार दे दो ।।
यह क्या है... साहित्य या महज़ ब्लॉगरीय अभिव्यक्ति ?
यदि कमलेश्वर को बीच में घसीटा जाये तो उनके लिखे अनुसार..
"इन कफ़स की तीलियों से
छन रहा है कुछ नूर - सा
कुछ फज़ा कुछ हसरते परवाज़ की बातें करो... "
कहीं दर्ज़ हो जाने के बाद यही फ़ज़ा और हसरते परवाज़ साहित्य कहलायेगा ।
यही शख़्स कहीं आगे लिखता है..
"इन बंद कमरों में मेरी साँस घुटी जाती है
खिड़िकियाँ खोलता हूँ तो ज़हरीली हवा आती है"
यह छटपटाहट सामयिक सँदर्भों की ब्लॉगिंग कही जा सकती है ।
अब सवाल यह है कि, यदि साहित्य समाज का दर्पण है... और इस दर्पण में आप अपनी तस्वीर तो देख ही सकते हैं, साथ ही दुनिया को भी आइना दिखा सकते हैं.. तो इस नाते ब्लॉगिंग क्या हुई... उन्मुक्त अभिव्यक्ति की एक साहित्यिक विधा या माध्यम... ? यह आप पर है कि, इसे अपनी सुविधानुसार आप जो भी कहना चाहें !

मुन्नी के बदनाम होने से शुचितावाद के प्रेमी न जाने क्यों कुँठित नहीं होते, उलटे शीला की ज़वानी पर लुँठित हो किसी कोने में छिप कर लहालोट होते रहते हैं ।

यहाँ आकर बड़ा अपनापन सा लगता था । अब देखता हूँ कि, Comment moderation has been enabled ! यह नवाबी शौक कब से पाल लिये ? आप ऎसे तो न थे !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

पता नहीं मेरी जानकारी सही है या नहीं लेकिन मुझे लगता है कि दुनियाँ के किसी भाषा में लिखने से कठिन है हिंदी में लिखना। कारण यह कि हिंदी हिंदुस्तान की भाषा है। हिंदुस्तान अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। अब बनारस के अस्सी मोहले में हो रही बतकही को दिल्ली की तथाकथित संस्कारी भाषा शैली में लिखा जाता तो 'काशी का अस्सी' पढ़कर दिल्ली वाले भी मुंह बनाते बनारस वाले भी। जैसे मैं कहूँ कि मुंबई के मेरे मित्र ने मेरी कविता पढ़कर ..बढ़िया है कहा तो मजा नहीं
आयेगा। लगेगा कि तब तो उसको कविता अच्छी नहीं लगी। लेकिन इसके स्थान पर यह कहूँ कि उसने कहा ...राप्चिक है..वाह क्या झकास है..तो अधिक सही लगेगा। कहने का अर्थ यह कि सटीक चित्रण क्षेत्रीय भाषा में ही आ पाता है।

एक स्थान के लिए वही भाषा असभ्य तो दूसरे स्थान के लिेए सटीक चित्रण हो जाता है।
आलोचकों को इसका भी ध्यान रखना होगा। वरना जैसे काशी के अस्सी किताब के आलोचक आज मुंह बनाये खिसिया रहे हैं वैसी ही स्थिति यहाँ भी हो सकती है।

सारा सच said...

nice

Suresh Chiplunkar said...

सुपर हिट, डुपर हिट… :) :)
ये "बाबागिरी" का शौक जो न करवाये वह कम है… :)
ऐसे ही "रगड़ते" रहिये, पंचमाई अंदाज़ में… :)

ajit gupta said...

भैया अब डराओ तो नहीं। जिसे जैसा लिखना है लिख लेने दो काहे को भाषण। कौन सुनता है किसी का भाषण। माजरा क्‍या है, समझ नहीं आया तो यही टिप्‍पणी ठेल दी है।

सतीश पंचम said...

@ अमर जी,

यहाँ आकर बड़ा अपनापन सा लगता था । अब देखता हूँ कि, Comment moderation has been enabled ! यह नवाबी शौक कब से पाल लिये ? आप ऎसे तो न थे !
-------------------

अमर जी, सच बोलने की कुछ तो कीमत देनी ही पड़ती है और उसी का प्रतिफल है ये मॉडरेशन।

इसी सफ़ेद घर पर कुछ समय पहले पुरस्कारी लाल वाली पोस्ट आई थी जिसमें ब्लॉगिंग में भूसे की तरह पुरस्कार बांटते ठलुओं की बाकायदा बारात निकाली गई थी .....जमकर ठुकाई की गई थी 'छद्म ब्लॉग हितचिंतकों' की और उसी समय से 'चिंदी सरीखे सम्मान बांटते ठलुए' परेशान हो गये और बेनामी और फर्जी प्रोफाइल से फालतू टिप्पणीयां करनी शुरू कर दी...जिन्हें पढ़ने के बाद केवल समय नष्ट होना था....सो तब से मॉडरेशन लगा दिया।

इस मॉडरेशन प्रक्रिया में बार बार लॉगिन करते हुए कमेट अप्रूव करने में मुझे थोड़ी परेशानी जरूर होती है, ..लेकिन चलता है :)

सतीश पंचम said...

सुरेश जी,

सही कहा....ये बाबागिरी का शौक जो न करवाये :)

'छद्मी ब्लॉग बाबाओं' की मौज लेने का मन होता है तो इसी तरह की पोस्टें निकल आती हैं। ये हर जगह हारमनी की बात करने, शांति बनाये रखने, आपसी भाईचारा का संदेश देने वाले बाबा लोग प्रवचन तो बहुत देते हैं लेकिन इन्हें थोड़ा सा ध्यान से पढ़ने पर इनकी मानसिकता झलक जाती है :)

सो अपन भी मौज लेने से नहीं चूकते :)

मनोज कुमार said...

बस यूं ही निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल याद आ गई ..
कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है

अनूप शुक्ल said...

अरे भाई जब सबको ’कुछ भी’लिखने का राप्चिक लाइसेन्स मिला है तो आपको कहां से यह लाइसेन्स मिला कि उनके ’कुछ भी’ लिखने पर आप यह सब कुछ लिखें? आप कहेंगे कि आपको भी ’कुछ भी’ लिखने का हक है। हम आप की यह बात मान लेते हैं और मस्त हो जाते हैं। :)

डॉ. दलसिंगार यादव said...

जब तक लिखेंगे नहीं मनोवृत्ति कैसे उजागर होगी बंधु। अतः लिखने दें। आप रोक भी कैसे पाएंगे? लोग तो स्वच्छंदतापूर्वक लेखते रहेंगे जो उनके मन में आएगा।

सतीश पंचम said...

@ जब तक लिखेंगे नहीं मनोवृत्ति कैसे उजागर होगी
-----------

और जैसे कि अमर जी ने भी ऐसे लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा - मुन्नी के बदनाम होने से शुचितावाद के प्रेमी न जाने क्यों कुँठित नहीं होते, उलटे शीला की ज़वानी पर लुँठित हो किसी कोने में छिप कर लहालोट होते रहते हैं ।


डॉ. दलसिंगार जी, इसीलिये इस पोस्ट के जरिए ऐसी मनवृत्तियों के पकड़ में आ जाने पर उनकी मौज ली गई है :)

mukti said...

बात तो आपकी सहिये है.

Kavita Prasad said...

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलया कोए
जो मन खोजा अपना, तो मुझसे बुरा ना कोए

शुक्र है, किसी के लेख या टिपण्णी से आपकी अंतर आत्मा ने आवाज़ तो दी...

शुचिता से परिपूर्ण आपकी आगकी पोस्ट के इंतज़ार में ... Kavita

सतीश पंचम said...

@
शुक्र है, किसी के लेख या टिपण्णी से आपकी अंतर आत्मा ने आवाज़ तो दी...


शुचिता से परिपूर्ण आपकी आगकी पोस्ट के इंतज़ार में ... Kavita

---------

कविता जी,

शायद आपने मेरी पोस्ट का मंतव्य नहीं समझा है....यहां मैं कत्तई दावा नही करता कि मैं शुचितावादी पोस्टें ही लिखूंगा या शुचितावादी विचारों से परिपूर्ण सोचूंगा। यह महान लोगों के बस की बात है। मुझसे यह महानता ओढ़ी नहीं जाती।

सफ़ेद घर से कई ऐसी पोस्टें निकली हैं जिन्हें सभ्य समाज में कत्तई नहीं पढ़ा जायगा और कई ऐसी पोस्टें भी हैं कि जिन्हें पढ़ते वक्त आँखों के कोर भीग जाते हैं .....सो सफ़ेद घर जैसा था वैसा ही रहेगा......और आगे भी उसकी पोस्टें पहले जैसी ही आती रहेंगी।

इसलिये प्लीज..... शुचितावादी पोस्ट की उम्मीद न करें।

Kavita Prasad said...

@ सतीशजी

उम्मीद तो में आपसे ज़रूर रखूंगी, और देर-सवेर आप उसे पूरा भी करेंगे... सिर्फ इसलिए नहीं की सफ़ेद घर क्या है और आप उसके लिए क्या परोस रहें हैं; बल्कि इसलिए की आपकी कलम में आवाज़ भी है जो की कम लेखकों में मिलती है| में दिल से चाहती हूँ की आपकी आवाज़ मेरे कानों में सकारात्मक रूप में ही पड़े| जानती हूँ की जिद कर रही हूँ... पर फिर भी उम्मीद पर ही दुनिया कायम है :]


आभार

सतीश पंचम said...

कविता जी,

आपके द्वारा अपने प्रति जताये विश्वास को देख मैं गदगद हूं :)

अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा कि कुछ अच्छा ही लिखूं ।

सञ्जय झा said...

सुपर हिट, डुपर हिट… :) :)
ये "बाबागिरी" का शौक जो न करवाये वह कम है… :)
ऐसे ही "रगड़ते" रहिये, पंचमाई अंदाज़ में… :)

is post ke liye ye 'super-duper' hit tippani lagi.....badhiya bamchak hai.

thelte rahiye....

sadar.

संजय @ मो सम कौन ? said...

गुरू, ये चिल्ल-पों न मचे तो ऐसी पोस्ट कहाँ से पढ़ेंगे हम?
unity in diversity की तरह लेखन की ये विविधता ही तो है जो जीवंत रख रही है इस अंतर्जाल को। और हम तो और धड़ल्ले से कह देंगे कि छोटी लाईन हैं तभी तो बड़ी लाईन हो आप शुचितावाद वाले लोग।
मस्त पंचम इश्टाईल।

Udan Tashtari said...

हा हा!! सही सटाया...वासन्ती को भी उचित एवं मसालेदार सम्मान मिला. :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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