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Wednesday, March 16, 2011

अंतिम री-पोस्ट......मधुमास के आलोक में :-)

मित्रों,

        धीरे धीरे होली आ ही गई है और उसके आने के साथ ही  सफ़ेद घर के चुनिंदा पोस्टों की श्रृंखला अब यहीं समाप्त की जाती है।   इस होली की फगुनाहट में.....जहां मधुमास चारों ओर अपना असर दिखा रहा है,  हवा में एक किस्म की मस्ती सी छाती जा रही है , वहीं  अब से  सफ़ेद घर पर नई पोस्टों के आने का सिलसिला भी शुरू हो जाएगा ।

      अब तक आप लोगों ने जो मेरी पुरानी पोस्टों को झेला (हाँ, झेलना ही कहूंगा :) .....उसके लिये बहुत बहुत शुक्रिया :)  अभी और ढेर सारी रोचक पोस्टें हैं  जिन्हें कि री-पोस्ट किये जाने का विचार था लेकिन फिर सोचा कि री-ठेल सीज़न वन को यहीं  एक विराम दिया जाय...........री-ठेल सीज़न टू फिर कभी :) 

    फिलहाल पेश है बेस्ट ऑफ सफ़ेद घर श्रृंखला में  अंतिम री-पोस्ट ....... 'मनबोध मास्टर की डायरी'

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    कल ट्रेन में बैठे-बैठे एक अच्छी रचना पढने का मौका मिला। किताब थी विवेकी राय रचित 'मनबोध मास्टर की डायरी' । उसमें एक जगह बताया गया कि किस तरह लेखक एक बैंडबाजे वाले की खोज में चले और उन्हे पढे लिखे बैंडबाजे वालों के एक दल के बारे में जानकारी मिली। एक जन ने बताया कि -

  
स्कूल के मास्टर लोग शादी-विवाह में बैंड बजाने का काम करने लगे हैं। ..... ये लोग बजनिया नहीं हैं लेकिन पेट और परिस्थिति जो न करावे । इनमें बीएड, बीपीएड, विद्यालंकार, शास्त्री, आचार्य सभी शिक्षित लोग हैं। इनके एक रात का सट्टा भी ज्यादा नहीं है - बस पांच सौ रूपये रात समझिये।

सभी अध्यापक हैं ?

'पूरा स्टाफ समझिये । वह जो बडा सा ढोल होता है और जिसे ड्रम कहते हैं तथा जो इतने जोर से बजाया जाता है कि उसकी आवाज से घर की खपरैल तक खिसकने लगती है। उसे अंग्रेजी के लैक्चरर बजाते हैं। संस्कृत वाले पंडित जी तमूरी पिटपिटाया करते हैं। ......इतिहास के अध्यापक शक्सफोन और नागरिक शास्त्र के अध्यापक बल्टहार्न बजाया करते हैं। कमाल का काम है कारनट का। सो इसे गणित और विज्ञान के अध्यापक बजाते हैं। हिन्दी विभाग यहाँ भी उपेक्षित है। हिन्दी टीचर को झाँझ मिली है। बजती तो खूब झमाझम है पर अन्य सुरीली आवाजों के आगे उसकी क्या बिसात है ? अर्थशास्त्री वाले मसक बजाते हैं। एक बार हवा भर दी तो बस उंगलीयाँ भर हिलानी है। ......महत्व का काम पीटी टीचर का है।......यहाँ डांसर बिना बैण्ड अधूरा लग रहा था। बाहर से रखने पर अपनी मौलिकता जाती रहती। इसीलिये शारिरिक शिक्षक ने इसमें अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार यह दल तैयार हो गया।

......तो ये बाजा बजाना औऱ अध्यापन कैसे एक साथ कर लेते है ?

बाजा वे गर्मी की छुट्टियों में ही बजाते हैं। प्रायः हमारे यहाँ लग्न विवाह के दिन उसी लम्बी छुट्टी में पडते हैं। अध्यापकों के पास शिमला, नैनीताल मे तरावट लेने के लिये जाने भर तो पैसा होता नहीं। .....सो एक दो महीने का धन्धा उठा लेते हैं।......

.......इनको बारात में ले जाने से कई समस्यायें हल हो जायेंगी। बैठे बिठाये सफेदपोश बाराती मिल जायेंगे। ......बाजा बजाने के बाद जब कपडे बदल कर ये लोग महफिल में बैठते हैं तो महफिल उग जाती है। वह खादी की चमक, वह टोपी-चश्मा, वह भव्य व्यक्तित्व तथा मुख पर विद्या का वह प्रकाश। बारात में बैंड बाजे के साथ कोई बोलता आदमी भी होना चाहिये। यहाँ दर्जनों मिल जाते हैं। संस्कृताध्यापकों को तो बारात में शास्त्रार्थ का एक नशा जैसा है....।

......कर्मकांड की समस्या भी हल। द्वार पूजा से लेकर विवाह तक के सारे काम संस्कृताध्यक्ष से करवा लिजिये। अगर बाजा बजते में कोई मौका आ गया तो उन्हें छुडाया भी जा सकता है...तमूरी ही तो बजाते हैं।

लेखक ने इतना जानकर सोचा कि इन अध्यापकों वाले बैंड बाजे से किस तरह बात की जाये - पढे लिखे लोग हैं। सो लेखक ने कई मजमून बनाये -

- क्यों महानुभाव आपकी एक रात की सेवा का क्या पुरस्कार होता है ?

किन्तु यह बात जँची नहीं। दूसरा मजमून बनाया -

- आपके अनुरंजन कार्य की दैनिक दक्षिणा क्या होगी ?

नहीं यह भी नहीं जम रहा। अंत में लेखक ने मजमून कुछ इस तरह तैयार किया -

- हमारे यहाँ के माँगलिक कृत्य के सानन्द सम्पन्न होने में आपका जो अमूल्य सहयोग प्राप्त होगा उसकी मुद्रा रूप में कितनी न्योछावर आपकी सेवा में उपस्थित करना हम लोगों का कर्तव्य होगा ?

यह वाक्य कुछ जमा और विशिष्ट बजनियों के गौरव के अनपरूप जँचा। 


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      यह व्यंग्य मैं मनबोध मास्टर की डायरी से साभार पेश कर रहा हूँ। विवेकी राय जी से मैंने एक बार बनारस से ही फोन पर बात की थी, काफी अच्छा लगा था। खुद विवेकी राय जी शिक्षक रह चुके हैं। यह व्यंग्य उन्होंने तब लिखा था जब शिक्षकों की तनख्वाह रोक ली जाती, महीने के पचास साठ रूपये वोतन मिलते थे। आज भी कई शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों को परले दर्जे का कारकून ही समझा जाता है। यह व्यंग्य उसी की याद दिलाता है। विशेष रूप से बाजे का चुनाव शिक्षकों के विषय से मैच कर रहा है - झाँझ - हिंदी विभाग को - बजती तो झमाझम है पर बाकी बाजों के सामने उसकी क्या बिसात...और विशेषकर पीटी टीचर का डांसर बनना तो अहोभाग्य ठहरा :)



     अर्थशास्त्र का तालमेल जिस तरह मसक बाजा से करते हुए बताया गया उसे बहुत सराहा जा सकता है। आज के दौर में जब सभी अर्थशास्त्री एक मेज पर बैठ टिपिर टिपिर आंकडे कंम्प्यूटर पर टिपिकते है तो एसे में विवेकी राय जी का अर्थव्यवस्था के बारे मे यह कहना - मसक बाजा अर्थशास्त्र वाले टीचर बजाते हैं, एक बार हवा भर दो बाद में बस उंगलियां ही हिलानी हैं :D

    ( हमारी अर्थव्यवस्था भी मसक बाजे की तरह ही तो नहीं, एक बार हवा भरी..... बाद में उंगली कंम्प्यूटर पर चल पडी, हजारों अर्थशास्त्रज्ञों की तरह :) 

- सतीश पंचम



स्थान - वही, जहां के बाज़ारों में आम पहले आ जाते हैं...... बौर बाद में।


समय - वही, जब बारात में बजनिया मास्टर लोग चाय पीने के लिये जुटें और तभी प्रिंसिपल आकर कहें - चाय पीकर ताकत बटोर लो..... ढोल की रस्सी टैट करना है।

18 comments:

अनूप शुक्ल said...

अंतिम री-पोस्ट के बाद अब अगली रि-पोस्ट श्रंखला का इंतजार है।

डॉ. मनोज मिश्र said...

.....इतिहास के अध्यापक शक्सफोन और नागरिक शास्त्र के अध्यापक बल्टहार्न बजाया करते हैं। कमाल का काम है कारनट का। सो इसे गणित और विज्ञान के अध्यापक बजाते हैं। हिन्दी विभाग यहाँ भी उपेक्षित है। हिन्दी टीचर को झाँझ मिली है। बजती तो खूब झमाझम है पर अन्य सुरीली आवाजों के आगे उसकी क्या बिसात है ? अर्थशास्त्री वाले मसक बजाते हैं। एक बार हवा भर दी तो बस उंगलीयाँ भर हिलानी है। ......महत्व का काम पीटी टीचर का है।......यहाँ डांसर बिना बैण्ड अधूरा लग रहा था। बाहर से रखने पर अपनी मौलिकता जाती रहती।..
............वर्तमान हालात ही ऐसे हैं ,यह विचार भी बुरा नही है.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत बढिया।

प्रवीण पाण्डेय said...

मल्टीटास्किंग तो हमारे यहाँ पर बहुत पहले से है, मोबाइल वाले इसको पैटेन्ट करा लिये, अन्याय हो गया।

नीरज गोस्वामी said...

सटीक व्यंग्यात्मक पोस्ट...आनंद आगया पढ़ कर...आप तो बस यूँ ही पोस्ट ठेलते रहिये...

नीरज

Arvind Mishra said...

बढियां ,अब आगे की सुध लेंव

Poorviya said...

bahut sunder vyang hai aaj ki sarkar par ----ek sikhak jo aap ki bhaviysa ki kalam tayaar karta hai ----

wo bachara apne pet ki khatir drum baja raha hai------

jai baba banaras........

anjule shyam said...

मेरे पाप टिचर हैं और इस बात को मैं बेहतर तरीके से सम्जः सकता हूँ जब हमारी फ़ीस देने के दिन होते थे और सेलरी कई महीनो तक रुकी रहती रहती थी ....बहुत बहुत शुक्रिया मेरी गुजारिश है रिठेल पोस्ट कुछ दिन और चलने चाहिए थे...

सुशील बाकलीवाल said...

चलती रहे रि-पोस्टिंग.

टिप्पणीपुराण और विवाह व्यवहार में- भाव, अभाव व प्रभाव की समानता.

anshumala said...

व्यंग्य तो वाकई अच्छा है | वास्तव में समाज में भी मास्टरों की यही स्थिति थी वैसे तो लोग उन्हें काफी इज्जत देते है की मास्टर है यानि पढ़े लिखे विद्वान् टाईप किन्तु जब बात पैसे की हो तो उन्हें कुछ भी नहीं समझा जाता था " का है, मामूली से मास्टर ही तो है " | आप के लिए ये री पोस्ट थी पर हमारे लिए तो सब नया था |

Sawai SIingh Rajpurohit said...

Bouth hi aacha blog hai aapka....
Visit My Blog PLz.

नीरज बसलियाल said...

मजा आया

सतीश पंचम said...

@ अंशु जी,

" का है, मामूली से मास्टर ही तो है "

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ठीक इसी तरह की भावना मैंने यहां मुंबई के एक म्युनिस्पल स्कूल में पढ़ाने वाले मास्टर की बातों में देखी है।

यूं तो वे बहुत प्रसिद्ध कवि हैं लेकिन कहते हैं कि जैसे ही मैं कवि सम्मेलन में अपना परिचय शिक्षक कह कर देता हूं....सामने वालों की गर्मजोशी ठंडी हो जाती है। इसलिए इंटरव्यू आदि में कभी भी अपना परिचय शिक्षक के रूप में नहीं देता।

शोभना चौरे said...

आपकी सारी रिपोस्ट पढ़ी बहुत श्रेष्ठ संकलन है |मास्टर की इ स तरह छबी बनाने बनाने में हमारे सम्पूर्ण समाज का ही योगदान है |
प्रथम सीढ़ी ही शिखर पर पहुंचाती है हम सब भूल जाते है |

सञ्जय झा said...

abhi abhi to re-thel ki rawani ayi thi........aur aap 'samapan' kar rahe hain.......

अंतिम री-पोस्ट के बाद अब अगली रि-पोस्ट श्रंखला का इंतजार है।.........hame bhi hai.....

fagunaste.

ZEAL said...

.

@- आपके अनुरंजन कार्य की दैनिक दक्षिणा क्या होगी ?

मुझे तो ये पांति बहुत जमी ...Short and sweet !

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rashmi ravija said...

बढ़िया व्यंग्य...
हमारे लिए भी ये रिठेल नहीं थी...वैसे मुझे, अच्छी चीज़ें कई-कई बार पढ़ने की आदत है...जबकि जो पसंद ना आए उसे एक बार भी ख़त्म करना मुश्किल
लीजिये आपकी पोस्ट को अच्छी भी कह दिया...:)...सचमुच बढ़िया पोस्ट

Kajal Kumar said...

हमारे यहां गांवों में तो यह आम बात है कि शादी-ब्याह में बाजा बजाने वाले पार्ट टाइम ही बाजा बजाते हैं वर्ना सबके कुछ न कुछ अपने काम-धंधे हैं. यह भी कि, शादी ब्याह में उन्हें बाक़ी बारातियों की ही मानिंद महत्वपूर्ण माना जाता है. शहर के बैंड-बाजे वालों की तरह का तो वहां कोई सोच भी नहीं सकता.

री-ठेल से कोई परहेज नहीं. जीवन में मिठाई भी कोई एक ही दफ़ा तो नहीं खाई जाती :)

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