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Monday, March 14, 2011

दूल्हों का वर्गीकरण......बायोबुढ़ापा पद्धति से :)

     दूल्हों के भी कई प्रकार होते हैं ये मैंने एक साहित्यिक कृति को पढ़ते हुए जाना था, अन्यथा अब तक तो यही समझा था कि दूल्हा आखिर दूल्हा होता है....उसमें कौन सा क्लासिफिकेशन ? लेकिन नहीं, दूल्हों में भी क्लासिफिकेशन होता है, वर्गीकरण होता है। उसी वर्गीकरण को लेकर लिखी गई पोस्ट को री-पोस्ट कर रहा हूं।  
  
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     साहित्यिक रचनायें पढते हुए कभी कभी कुछ रोचक जानकारीयां भी मिल जाती हैं। अभी शनिवार को ही अमरकांत जी की साहित्य अकादमी पुरस्कृत रचना ‘इन्हीं हथियारों से’ पढ रहा था। राजकमल द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास के एक प्रसंग के द्वारा दुल्हों के बारे में एक रोचक जानकारी मिली है। प्रसंगानुसार घर के बच्चे, घर की बूढी दादी जीरादेवी से दूल्हों के प्रकार के बारे में पूछते हैं। उन्हें दादी ने पहले भी ये बातें बताई हैं लेकिन बच्चे, दादी के पोपले मुँह से मजाकिया तौर पर फिर दुल्हों के प्रकार के बारे में जानना चाहते हैं ।

तब दादी जीरादेवी अपने पोपले मुंह से बताना शुरू करती हैं–

- “ तो ए बाबू सुनो । शादी –ब्याह की सबसे अच्छी उमिर होती है सोलह से बीस बरीस तक। इस उमिर के दुल्हा को ‘बर’ कहते हैं। ‘बर’ को देखकर सबका जी जुडा जाता है। दुल्हन का दिल भी उल्लास से भर जाता है।

    अब आगे बढो। बीस से पच्चीस बरिस के दुल्हा में वह बात नहीं, फिर भी कोई हरज नहीं। इस उमिर के दुल्हा को बर नहीं ‘बरूल्ली’ कहते हैं। अब पच्चीस से आगे बढो।

    पचीस से तीस बरीस तक के दुल्हे का चेहरा रूढ होने लगता है। मूँछ के बाल कडे हो जाते हैं। बोली भी रूखी और कडकीली हो जाती है। इस उमिर के दुल्हा को ‘बरनाठ’ कहते हैं।

     तीस से चालीस बरिस का दुल्हा को ‘जरनाठ कहते है। इस उमिर में देह, बोली – किसी में भी नरमाहट नहीं रहती। चमडी एकदम मोटी हो जाती है। इस उमिर का दुल्हा बडा चालाक हो जाता है, हमेशा अपने मतलब की बात सोचता है। रात-बिरात घुमक्कडी करने लगता है। कई चक्करों में रहता है, ए बिटिया। बीबी से हराठी-मुराठी की तरह ब्यौहार करता है। हमेशा जली-कटी सुनाता है।

     हाँ, ए बिटिया, चालीस से आगे के दुल्हा को ‘खुरनाठ’ कहते हैं। इस उमिर में शरीर और मुँह फैल जाता है।चेहरे पर एक दो गहरी लकीरें दिखाई देने लगती हैं जैसे कच्ची सडक पर बैलगाडी की लीक। अधपके, मूँछों के बाल झाडू के सींकों की तरह फरकने लगते हैं। वह बुढौती को छिपाने के लिये इतर-फुलेल , खिजाब लगाता है। उसके गले मे बलगम भर जाता है और वह हमेशा खुर-खुर किये रहता है। वह सबको गुस्से से घूर-घूर कर देखता है। सबसे टोका टोकी करता है। उसकी दुलहन उससे बहुत डरती है।

     अमरकांत जी ने जीरादेवी के मुँह से इतने विस्तार से ये विवरण दिये हैं कि आखिरकार मानना ही पडता है कि पुराने जमाने के बुजुर्गों की भी एक बौध्दिक सोच होती थी जो अपने आप में एक अलग ही गरिमा लिये रहती थी।

    बहरहाल, ये बातें पढते हुए अचानक ही मुझे समलैंगिक विवाह वाला मुद्दा भी याद आ गया। मैं अब सोच रहा हूँ कि समलैंगिक विवाह से जन्मे इस नये किस्म के दुल्हे का क्या नामकरण किया जा सकता है।
उम्र की सीमा का लोप कर दिया जाय तो जहाँ तक मेरा ख्याल है जीरा देवी के द्वारा बताये गये‘बरूल्ली’ दुल्हे की तर्ज पर समलैंगिकों के लिये नया नाम होमुल्ली' कैसा रहेगा ?



सतीश पंचम

स्थान - फुहार लूटती मुंबई


समय - वही, जिस दिन हाईकोर्ट का समलैंगिकों के पक्ष में फैसला आ जाये और उसी शाम पप्पू पास हो जाये :)

क्रिटिकल समय - पप्पू ने पास हो जाने के बावजूद मिठाई नहीं बांटी, ताकि लोगो में उसके बारे में कोई गलतफहमी न हो :)

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 बगल में है हंस पत्रिका का वही बहुचर्चित आवरणचित्र जिसमें दुल्हन पियरी पहने, अपना दांया पैर थोडा आगे की ओर निकाल कर खडी है और दूल्हा अपनी दुल्हन के पैर छू रहा है। अब तक जो कुछ देखा- सुना है, जो कुछ जाना समझा है ऐसे में परिपाटीयों को ढोते-ढोते छन्नी हो चुके समाज के मंडवे तले का ये दृश्य अचंभित ही करता है।



      इस पर भी पोस्ट लिखा था कभी। बाद में कहीं पढ़ा था कि ऐसा कई समाजों में विवाह के अवसर पर होता है लेकिन बहुत ज्यादा प्रचलित नहीं है यह प्रथा। 

12 comments:

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

समलैंगिक 'होमुल्ली'
हा हा हा!*

* हास्य शैली साभार डॉ. अरविंद मिश्र

Arvind Mishra said...

बढियां विवरणात्मक वर्गीकरण !

Rahul Singh said...

बातों-बातों में (शब्‍दों में) परिभाषा गढ़ देने वाली, धन्‍य हैं जीरादेवी.

प्रवीण पाण्डेय said...

शारीरिक व मानसिक स्थितिओं को अनुनादित करते शब्द।

PADMSINGH said...

होमुल्ली का वर्गीकरण दुबारा किया जा सकता है

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों मे आज भी यह प्रथा प्रचलित है...दुल्हन के भाई द्वारा धान का लावा(खील) परछन (परोसने) के बाद दुल्हन लोढ़ा(बट्टा)को अपने पैर से दबाती है और दुल्हा उसे खींचते हुए रेखा बनाता है... संभवतः यह रस्म दुल्हा दुल्हन के धन धान्य और प्रगति मे सहभागिता का प्रतीक है

डॉ. मनोज मिश्र said...

@हाँ, ए बिटिया, चालीस से आगे के दुल्हा को ‘खुरनाठ’ कहते हैं। इस उमिर में शरीर और मुँह फैल जाता है।चेहरे पर एक दो गहरी लकीरें दिखाई देने लगती हैं जैसे कच्ची सडक पर बैलगाडी की लीक। अधपके, मूँछों के बाल झाडू के सींकों की तरह फरकने लगते हैं। वह बुढौती को छिपाने के लिये इतर-फुलेल , खिजाब लगाता है। उसके गले मे बलगम भर जाता है और वह हमेशा खुर-खुर किये रहता है। वह सबको गुस्से से घूर-घूर कर देखता है। सबसे टोका टोकी करता है। उसकी दुलहन उससे बहुत डरती है।....
...आज-कल शादी व्याह के काफी मामले इसी वर्ग से जुड़े हैं.

Poorviya said...

bahut sunder vargikaran hai....

ye sab anubhav ki bate hai---

jai baba banaras........

सञ्जय झा said...

ha..ha...ha....

......

अनूप शुक्ल said...

सही है यह वर्गीकरण। लेकिन आज के दूल्हे की एक यह छवि भी देखी जाये| :
पर बारात का केन्द्रीय तत्व तो दूल्हा होता है। जब मैं किसी दूल्हे को देखता हूं तो लगता है कि आठ-दस शताब्दियां सिमटकर समा गयीं हों दूल्हे में।दिग्विजय के लिये निकले बारहवीं सदी किसी योद्धा की तरह घोड़े पर सवार।कमर में तलवार। किसी मुगलिया राजकुमार की तरह मस्तक पर सुशोभित ताज (मौर)। आंखों के आगे बुरकेनुमा फूलों की लड़ी-जिससे यह पता लगाना मुश्किल कि घोड़े पर सवार शख्स रजिया सुल्तान हैं या वीर शिवाजी ।पैरों में बिच्छू के डंकनुमा नुकीलापन लिये राजपूती जूते। इक्कीसवीं सदी के डिजाइनर सूट के कपड़े की बनी वाजिदअलीशाह नुमा पोशाक। गोद में कंगारूनुमा बच्चा (सहबोला) दबाये दूल्हे की छवि देखकर लगता है कि कोई सजीव बांगड़ू कोलाज चला आ रहा है।

ajit gupta said...

भारत के कानून में तो विवाह ही21 वर्ष के बाद जायज है तो वर तो कोई नहीं हुआ।

सतीश पंचम said...

अजीत गुप्ता जी,

अमरकांत जी ने इस उपन्यास 'इन्हीं हथियारों से' में भारत की आजादी के दौरान चल रही हलचल को, उस समय के माहौल को दर्शाया है और जहां तक मुझे याद है तब केवल शारदा कानून था...सो भी ठीक से नहीं माना जाता था....आज भी कानूनी रूप से निर्धारित आयु को ठेंगा दिखाते हुए बाल विवाह हो ही रहे हैं।

ऐसे में 21 साल की बाध्यता वाली उम्र को आजादी के समय के आलोक में माइनस करके पढ़ा, समझा जाय तो उपन्यास पढ़ने का आनंद है, वरना हम केवल वर्तमान और अतीत का घालमेल कर बैठेंगे :)

सतीश पंचम said...

और हां, आपके इस बात से सहमत हूं कि जीरादेवी द्वारा किया गया वर्गीकरण यदि मान लिया जाय तो वर कोई नही होगा...ज्यादातर बरूल्ली, जरनाठ, खुरनाठ ही होंगे विवाह के वक्त :)

शशि थरूर जैसे अधिक उम्र में दूसरा तीसरा विवाह करने वालों के लिए हो सकता है अलग कैटेगरी डिफाइन करनी पड़ जाय :)

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