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Sunday, March 13, 2011

दुलरहा ननिहाल

   कजरारी आँखों के सपने
    ननिहाल कई लोगों को अच्छा लगता है, कई बार लोग अपना ज्यादातर बचपन ननिहाल में ही बिताते हैं......मामा लोगों का लाड़ प्यार, नानी का दुलार सब मिलकर अक्सर आकर्षित करते हैं। लेकिन इसी लाड़ प्यार के चलते बच्चे कभी कभी ऐसी हरकत कर बैठते हैं कि न हंसते बनता है न रोते। कुछ उसी तरह के वाकये को लेकर लिखी गई थी मेरी पोस्ट जिसे चुनिंदा पोस्टों की श्रृंखला के तहत पेश कर रहा हूं। 


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     इस बार गांव गया तो एक चार साल के बच्चे नितिन के निर्मल क्रोध को देखने का मौका मिला । 


      हुआ यूं कि एक बच्चा नितिन अपने ननिहाल, यानि के मेरे गाँव में रहता है। खूब लाड प्यार में पल रहा है। नितिन की माँ अपने ससुराल में ही है, चार साल के नितिन को जब उसके मामा ने एक पाँच सौ के आसपास की कीमत वाला शर्ट लाकर दिया तो उसे पहनने पर उसके नाना ने कहा कि - तुम्हारी तो तैयारी हो गई । अब यही कपडा पहना कर तुम्हे तुम्हारी मम्मी के पास छोड आउंगा। 

उस समय तो नितिन कुछ न बोला लेकिन थोडी ही देर बाद एक बच्चे की आवाज आई।

अरे नितिनवा ने देखिये क्या कर दिया है ? 

     सब लोग दौडे कि क्या हो गया । आशंका सबके मन में जाने कैसे कैसे रूप लेकर आ रही थी। घर के अंदर झांक कर लोगों ने देखा कि नितिन ने अपनी उस नई नवेली शर्ट को हँसुए सो काट-काट कर चिथडें कर डाला था। पहुँचने पर हँसुआ एक तरफ फेंक कर होने वाली पिटाई के लिये जैसे एक तरह से वह अपने को तैयार कर रहा था। 

     उसकी काजल लगी आँखे देखने पर जाने कैसा तो लग रहा था। विस्मय, डर, आशंका इन सबको मिलाने के बाद एक और चीज दिख रही थी उसकी आँखों मे और वह थी- जिद्द -  न रहेगा ये शर्ट और न जाना पडेगा उसे अपने घर। 

न चाहते हुए भी, लोगों के रोकते रोकवाते भी मामा लोगों ने उसकी धुनाई कर दी। पिट पिटाने के बाद रात को वही नितिन फिर नाना की थाली के पास आलथी पालथी मार कर बैठ गया और मुंह खोलकर कहा – आ……। 

     नाना ने भी एक कौर उसके मुंह में डाल दिया। रात को जब सभी बैठे तो इस बात पर लगभग सभी सहमत थे कि बच्चे ननिहाल में रहने से बिगड जाते है। शायद कुछ हद तक ये बात सच भी है। माँ-बाप के यहाँ रहने पर अनुशासन कुछ रहता है जो कि ननिहाल में रहने पर अनुशासन पर लाड-दुलार की परत चढ जाती है ( हो सकता है ये बात सच नहीं भी हो ) 

खैर जो भी हो, नितिन के चर्चे गाँव में भी खूब हुए – पट्ठे ने नई शर्ट फाड़ डाली। 

 दुलरहा क्रोध ऐसा ही होता है शायद......और ऐसा ही होता है प्यारा सा ननिहाल जो बच्चों को बिगाड़ता भी है  :) 

- सतीश पंचम


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इस पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियां 

डॉ. मनोज मिश्र said...
बहुत सुंदर मनःस्थिति का वर्णन किया है .... .नितिन नें साबित किया कि भौतिक चकाचौध उसके प्रेम की बाधा नहीं बन सकते .

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...
अरे भैया हमारी नानी वापस ले आओ तो सैंकड़ों शर्टें निवछावर कर दूं। सवेरे नानी लिट्टी गुड़ और कमोरी में गरम किया गाढ़ा ललछरहों रंग वाला डूंड़ी (एक सींग वाली मेरी प्रिय) भैंस का दूध पिलाती थीं।
वह समय कैसे वापस मिले!


रचना त्रिपाठी said...

मुझे याद नहीं है कि मै आज तक अपने ननिहाल में चौबीस घंटे भी रहीं हो,कभी जाना भी हुआ तो एक-दो घंटों में ही लौट आना हुआ। ननिहाल इतना पास जो है।
पापा का भी यही मानना था कि बच्चे ज्यादा समय वहाँ रहे तो बिगड़ जायेंगे। मेरे ६ मामाजी लोग हैं और मजे की बात ये कि मेरी किसी से नही बनती। आप सोच रहे होंगे ऐसा क्यों है? कभी फुरसत में अपने ब्लॉग पर बताउँगी।


( इस बच्चे का चित्र करीब पांच छह साल पहले मैंने बस में तब खेंचा था जब जौनपुर जा रहा था, बच्चा कहीं बाहर खिड़की की ओर देखते हुए किन्हीं खयालों में खोया था ....आज अपने कलेक्शन को सर्च करते हुए वही तस्वीर मिल गई तो मन में पहली बात जो आई वो यही कि अब तो वह बस वाला बच्चा काफी बड़ा हो गया होगा...संभवत: चौथी- पांचवी में राणा प्रताप और अकबर पढ़ रहा हो  :)

13 comments:

Rahul Singh said...

कुंठा से ही नहीं लाड़-दुलार से भी एंग्री यंगमैन बनता है.

PADMSINGH said...

हम तो ननिहाल मे ही पाले बढ़े... ये सच है कि जो स्नेह और दुलार ननिहाल मे मिलता है वह अनुपम है... यही दुलार कभी कभी बिगड़ने का कारण बनता है.. लेकिन ननिहाल को ही दोष् नहीं दे सकते

Arvind Mishra said...

यह इंगित करता है की एट्टीच्यूड का मेच्योरटी मनुष्य के शिशुकला में ही जाती है जबकि उसे उचित अनुचित का विवेक ही नहीं रहता -और विवेक होने के बाद भी यह कायम रहता है, हाँ थोडा नियंत्रित हो रहता है !

Udan Tashtari said...

स्नेह दुलार तो बेशक ननिहाल का अतिशय ही होता है...मगर मामा के द्वारा की पिटवई देख ऐसा लगा तो नहीं इस केस में..

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

पोस्ट पढकर अहसास हुआ कि अपना बचपन तो बेकार ही गया।

प्रवीण पाण्डेय said...

आज के संदर्भों में इतना क्रोध तो बनता है। नयी शर्ट को उससे जोड़ दिया जो उसे नापसन्द है। अब लोकतन्त्र की नाकामयाबी की सजा किसे दी जाये?

abhi said...

dulaar kabhi kabhi ladkon ko bigadti hai, lekion aksar aisa nahi dekha jaata...
main bhi apne nanihaal mein pala bada hua hun aur beintahan pyaar bhi mila naani se,maama se, mausi se...

राज भाटिय़ा said...

ननिहाल मे ही नही जब भी बच्चे को हद से ज्यादा प्यार मिलता हे बच्चा बिगड ही जाता हे... मेरे को ननिहाल मे जाने से कभी अच्छा नही लगता था, जब कि सब बहुत प्यार करते थे, अपना घर ही अच्छा लगता था.

मनोज कुमार said...

जब भी बीमार पड़ता था, नानी के यहां चला जाता था। बिना किसी डॉक्टर को दिखाए ठीक होकर लौटता था।
ये बड़े होने के बाद की बात है।
बचपन तो उनके साथ ही बीता। उनकी छांव में।

Poorviya said...

ab bacche nani hal ki jgah cinamahall jate hai...

jai baba banaras.....

डॉ. दलसिंगार यादव said...

अच्छा चित्रण है ननिहाल में रहने वाले बच्चों की मानसिकता का। मेरे साढ़ू का लड़का भी ननिहाल में रहता है। आपकी कहानी पढ़कर उसकी याद आ गई। यह समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या किया जाए? उसे ननिहाल से अपने घर भेजा जाता है तो एक विद्रोही व्यक्तित्व का सृजन हो सकता है। न भेजा जाए तो बदमिज़ाज़ी व्यक्तित्व को बढ़ावा। बड़ी ही दुविधाजनक स्थिति है।

डॉ. मनोज मिश्र said...

नानियाउर भला केका सुंदर न लागे भाय.

सञ्जय झा said...

sahi hai....sabse jyada man-munhar
nanihal me hi hota hai......

dhanyawad....

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