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Saturday, March 12, 2011

बारह गुस्सैल...

         चुनिंदा पोस्टों की श्रृंखला में पेश है मेरी एक खास  पोस्ट - खास इसलिए कि  इस पोस्ट की खूबी है कि ये ब्लॉगिंग की  उस विधा (कु)  का सशक्त उदाहरण है कि कैसे किसी अच्छी पोस्ट पर बेहद कम टिप्पणी होती है जबकि फालतू से फालतू पोस्ट पर टिप्पणियों की भरमार होती है .....  ( मेरी कई बेकार पोस्टों पर भी  :)

       इस पोस्ट पर कुल मिलाकर चार टिप्पणियां आई थीं लेकिन जो भी आई थीं ज्यादातर विद्वतापूर्ण थीं। अपने अपने  अनुभवों से रची- पगी हुई टिप्पणियां।  इसलिए मेरा मानना है ( और भी लोग संभवत: मानते होंगे ) कि टिप्पणियों की संख्या न देख उनकी गुणवत्ता देखनी चाहिए .और कल अनूप जी की पोस्ट पर भी मैने कहा था कि टिप्पणियों से पता चल जाता है कि कौन सी टिप्पणी थोथी है ....कौन सी भोथरी है.....कौन सी टिप्पणी दिल से की गई है....... और टिप्पणियों से ना भी पता चले.....लेकिन लेखक को अंदर से पता होता है कि उसने वाकई अच्छा लिखा है या केवल मजमा जुटाया है  : )

  तो  लिजिए पेश है वही पोस्ट ......12  Angry Men 

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     मित्रों,

     आपने देखा होगा कि  कुछ फिल्मों का इस्तेमाल अक्सर किसी जटिल चीज को समझाने के लिये किया जाता है.......शैक्षणिक संदेश देने के लिए प्रदर्शित किया जाता है...... ऐसी फिल्में व्यावसायिक तौर पर असफल भले हों लेकिन उनके कन्टेन्ट कहीं न कहीं तगड़ा संदेश देते हैं।

    ऐसी ही  एक फिल्म बनी थी  12 Angry Men,  जिसे कि अक्सर Managerial technique of Decision Making पढाने हेतु इस्तेमाल किया जाता है।  


      कल्पना करें कि आप जिस टीम में काम करते हैं वहां कई तरह के लोग हैं....सबकी अपनी अपनी मानसिकता है....... किसी का कुछ बैकग्राउंड है तो किसी का कुछ। हर किसी के अपने निजी जीवन में कुछ घटनाएं घट चुकी हैं जो कि आजीवन उनके Decision making पर असर डालती हैं और वो पूर्वाग्रह या Prejudice के तहत अपना निर्णय लेते हैं। 

      वहीं इसी टीम में कुछ एसे लोग हैं जो कि हवा का रूख देख कर फैसला करते हैं। मुंह देखादेखी फैसला करते हैं, दूसरों को देखकर फैसला करते हैं कि सामने वाले को क्या पसंद है, क्या नहीं। कहीं वो नाराज तो नहीं हो जाएंगा मेरे निर्णय लेने से।



     कुछ ऐसे सदस्य भी होते हैं जिनका कि अपने पर कॉन्फिडेंस नही होता और हर डिसिजन लेने से पहले अपने सिनियर का मुंह ताकते हैं। इस टीम में ऐसे भी हैं जो कि केवल अपनी नौकरी करते रहने के लिये ही टीम में बने रहना चाहते हैं। उन्हें जो कहा जाता है वही करते हैं। अपने से इनिशियेटिव लेने की उनमें क्षमता ही नहीं होती।

       यह फिल्म 12 Angry Men इन्हीं सब परिस्थितियों को एक जगह एक कमरे में लाकर पेश करती है। इस 12 Angry Men का ही हिंदी Version है एक रूका हुआ फैसला। फिल्म की कहानी के अनुसार एक बच्चे पर अपने पिता की हत्या का आरोप होता है। कोर्ट आदेश देती है कि बच्चे ने हत्या की है या नहीं ये फैसला एक 12 सदस्यी जूरी पर छोडा जाय। कोर्ट के आदेश के तहत फैसला एकमत से होना चाहिये।

      कोर्ट के आदेश के तहत सभी 12 सदस्य एक कमरे में बंद हो जाते हैं। उन्हें बाहर जाने की तब तक इजाजत नहीं है जब तक कि फैसला न हो जाये। शुरूवात में ही कई सदस्य उस कमरे को कोसते दिखते हैं जिसमें वह बंद हैं। पंखा नहीं चल रहा, गर्मी है ये है वो हैं। यानि वह सब कमियों की बातें करते हैं लेकिन जिस बात पर Decision लेना है वही नहीं करते। कुछ देर बाद सभी सदस्य एकसाथ बैठते हैं। शुरूवात में ही कोर्ट में चले इस बच्चे के केस को ध्यान में रखते हुए जूरी मेंबर आपस में वोटिंग करते हैं कि बच्चा Guilty है या नहीं। कोर्ट में चली बहस और अपनी जो कुछ भी आधी अधूरी जानकारी के तहत 11 सदस्य बच्चे को Guilty मानते हैं, दोषी मानते हैं लेकिन एक सदस्य बच्चे को दाषी नहीं मानता। 

      बाकी के सदस्यों की भौंहे टेढी हो जाती हैं इस एक सदस्य के प्रति। वह उसका मजाक उडाते हैं कि 11 सदस्य एकमत हैं लेकिन अकेला वही है जो बहुमत के खिलाफ है। तब उस पर लोग दबाव डालते हैं कि अब वह भी एकमत से शामिल हो और बच्चे को guilty माने और हम सभी इस बंद कमरे से बाहर निकले। हम सभी को अपने अपने काम निपटाने हैं। किसी को फिल्म देखने का वक्त हो रहा था तो किसी को कुछ। लेकिन चूंकि फैसला कोर्ट आदेश के तहत एकमत से होना चाहिये अत वह बारहवां सदस्य अपने सहमत न होने का कारण बताता है और हर एक प्वॉइंट को तफ्सील से रखता है। लेकिन फिर भी जूरी के सदस्य उससे सहमत नहीं होते। वह चाहते हैं कि जल्दी से फैसला हो और उन्हें घर जाने मिले। कुछ बहस और झडप के बाद वह बारहवां सदस्य एक प्रस्ताव रखता है कि अब तक मैने जो यहां बात बताई है उसके बाद भी आप लोग सहमत नहीं हैं। इसका काट ये है कि एक बार और वोटिंग करवाई जाये और यदि एक और वोट बच्चे को निर्दोष माने तो बहस जारी रखी जाय। इस बार वह बारहवां सदस्य खुद से ही वोटिंग में हिस्सा नहीं लेता।

        वोटिंग होती है और आश्चर्यजनक ढंग से एक औऱ सदस्य बच्चे को निर्दोष मानता है। NOT GUILTY वाला वोटिंग पर्चा सबके आंख की किरकिरी बन जाता है। इस बात पर भी बहस होती है कि किसने किया होगा ये एक वोट। तभी वह शख्स जिसने बच्चे के पक्ष में वोट किया था खडा होता है और अपनी बात को रखता है कि क्यों वह बच्चे को निर्दोष मानता है। अब जूरी का फैसला टर्न लेना शुरू करता है 10 लोग बच्चे को दोषी मानते है लेकिन 2 लोग बच्चे को दोषी नहीं मानते।

     उन्ही के बीच एक जूरी सदस्य यह कहते हुए लगातार अपनी बात रखता है कि बच्चा दोषी है और रहेगा। पडताल करने पर वह खुद बताता है कि उसके घर में उसका बेटा उसका सम्मान नहीं करता। स्पष्ट था कि वह जूरी मेंबर उस बच्चें में अपने बेटे का अक्स देख रहा था और फैसला भी उसी हिसाब से ले रहा था।

      बहस आगे बढती है और फिर उन लोगों की बीच रायशुमारी होती है। अबकी बच्चे को निर्दोष मानने वालों की संख्या बढ जाती है। जूरी का फैसला एक दूसरी तरफ जाते देख एक और सदस्य बच्चे को निर्दोष मानने लगता है। यह सदस्य उस तबके का प्रतिनिधित्व करता लगता है जो कि देखा देखी फैसला करता है। उसका खुद का कोई डिसिजन नहीं होता।


     एक सदस्य तब अपना फैसला पलट देता है जब उसे लगता है कि जल्दी फैसला हो जाय तो उसे घर जाने को मिले । सिनेमा की टिकटें उसकी जेब में उमड घुमड रही होती हैं। इस पर एक सदस्य भडक जाता है उस शख्स को कहता है कि उसने अपना फैसला क्यों बदला उसे Explain करे। सिर्फ इसलिये कि सिनेमा देखने उसे देर हो रही है, वह अपना फैसला नहीं बदल सकता। आखिर उसने अभी कुछ देर पहले एक बच्चे को मौत की सजा देने के पक्ष में फैसला दिया था....अचानक फैसला क्यों बदला ?

Explain Me !

     बहस और आगे बढती है और धीरे धीरे जूरी पलट जाती है और अंत में फैसला सर्वमान्य ढंग से आता है कि बच्चा निर्दोष हैं।

       इस पूरी फिल्म को एक ही कमरे में फिल्माया गया है। फिल्म की जान है इसकी Script.....



  उस वक्त का सीन गजब का है जब मनोरंजन टिकट के कारण एक सदस्य फैसला बदलता है और उसे सामने वाला अपने शब्दों से पानी पानी कर देता है......उस वक्त मुंह से बरबस ही निकल आता है.....औह.....क्या लपेटा है बंदे ने। 

     पूरी फिल्म को एक तरह से आदर्श फिल्म माना जा सकता है जो कि विभिन्न तबके के लोगों, उनकी मानसिकता और Decision Making की उनकी क्षमता को खूबसूरती से पेश करती है। 

- सतीश पंचम



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 इस पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियां - 

उन्मुक्त said...



न्यायमूर्ति होमस्, अंग्रेजी में फैसला लिखने वाले न्यायमूर्तियों में सबसे जाने माने न्यायमूर्ति हैं। उनका कहना है,



१ - जज़ वास्तव में फैसला मुकदमों के तथ्यों पर ले लेते हैं फिर उस पर कानून का जामा पहना कर उसका कारण लिखते हैं।

२ - उनके तथ्यों पर लिये गये, अधिकतर फैसले, कानून दायरे के बाहर होते हैं और inarticulate major premise पर निर्भर होते हैं।

     मैं inarticulate major premise का ठीक से अनुवाद तो नहीं कर पाउंगा पर यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस प्रकार बड़े हुऐ और हमें कैसा वातावरण मिला।


ऐसे लेखों पर कमेंट कम क्यों आते हैं?



यह भी हो सकता है क्या कि पढ़ने के बाद कहने को कुछ न बचे?

मैं तो अक्सर ऐसी 'भीड़' से रूबरू होता हूँ। अभी हम लोगों ने एक आंतरिक प्रोजेक्ट पूरा किया। 45 दिन चले इस प्रोजेक्ट में फिल्म में वर्णित सारी मनोवृत्तियाँ देखने को मिलीं।

अच्छा होता यदि आप उनको अलग से समझाते ताकि ऐसे मौकों पर काम आता।

इस लेख के लिए बधाई।
ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...


फिल्म की कथा बहुत रोचक लगती है। और यह तो होता है कि जल्दी जान छुड़ाने को कुछ लोग सहज सहमत हो जाते हैं।


अच्छा प्रबन्धक वह है जो इस तरह के लोगों और स्थितियों को पहचान कर दुहे। :)



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24 comments:

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

इस पोस्ट से परिचय कराने के लिए धन्यवाद, सतीश. यदि मैंने उस समय टिपण्णी की होती तो शायद मार्क ट्वैन की इस बात से मेरा सुर मिलता कि “Whenever you find yourself on the side of the majority, it's time to pause and reflect.”

अनूप शुक्ल said...

रोचक पोस्ट!

ब्लागिंग में भी यह अदा दिखती है। हम लोग अच्छा, बहुत अच्छा कहकर कट लेना चाहते हैं। जल्दी टिप्पणी करें, बवाल कटे , अगली पोस्ट पर पर व्यवहार निपटाया जाये।

उन्मुक्त जी की बात सही है कि हमारे फ़ैसले लेने का आधार हमारे अपने अनुभव होते हैं।

Rahul Singh said...

एक रुका हुआ फैसला मैंने देखी, इसमें कई अलग किस्‍म की खास चीजें थीं, जिनमें से एक यह भी याद आ रही है कि फिल्‍म में किसी पात्र का नाम नहीं है, शायद.

सतीश पंचम said...

राहुल जी,

फिल्म में पात्रों के नाम न होने के बारे में आपने बड़ी रोचक बात बताई है ।

मैने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया था, और मैने अंग्रेजी वाली 12 Angry Men देखी है....एक रूका हुआ फैसला अभी तक नहीं देख पाया हूं।

अनूप शुक्ल said...

पोस्ट के ठेल-रिठेल पर अलग से तनिक विस्तार से लिखा जायेगा। मेरी समझ में लो ब्लागर की यह मासूम भावना ,कि उसकी उस पोस्ट को अभी तमाम लोगों ने पढ़ा नहीं है और उसके फ़िर से पढ़े जाने की संभावनायें हैं, ही उससे रिठेल करवाती हैं। ब्लागर अपनी तथाकथित अच्छी फ़ोटो को मुग्धा नायिका की तरह निहारता है और मौका मिलते ही फ़िर से ठेल देता है। :)

अनूप शुक्ल said...

ऊपर पोस्टों की जगह फ़ोटो टाइप हो गया।

Udan Tashtari said...

एक रूका हुआ फैसला देखी है...12 Angry Men नहीं देखी....आओ, सतीश, बतियाये तो कमी बेसी निपटे. :)

सञ्जय झा said...

bilkul samayik post.....
post ke mool-bhavana se poorntah sahmat..........

kahani ki prastooti 'rapchikatmak'

re-thel ap ko pata hai....hame nahi..


pai lagoon........

सतीश पंचम said...

संजय जी,

मोहे काहे शर्मिंदा कर रहे हैं....अइसे नहीं कहना चाहिए......पैलगी बड़ो से की जाती है....मित्रों से नहीं :)

मैं तो अकवार में भरने वाला मानुख हूं...झप्पी पा के आनंदित होने वाला :)

सतीश पंचम said...

समीर जी,

काहे की कमी बेसी ?

मुझे तो कुच्छौ नहीं बुझा रहा :)

बाकी तो बतियाने का क्या है.... मैं एकदम टिचन्न होकर बतकूचन करने वालों में से हूं....इनारे की जगत पर बैठ दातून करने वालों सरीखा :)

rashmi ravija said...

एक रुका हुआ फैसला...मेरी पसंदीदा फिल्मो में से एक रही है...खासकर अन्नू कपूर की एक्टिंग...काबिल-ए-तारीफ़ है.
पता नहीं..अब ऐसी फिल्मे क्यूँ नहीं बनतीं :(

रंजना said...

सारा ध्यान जाकर सिकुड़ गया है उक्त फिल्म पर...

मैं आजतक अक्षम रही हूँ सर्वश्रेष्ठ अभिनेता अभिनेत्री के नाम निर्णीत करने में ..पर यदि कोई मुझसे पूछे कि आज तक देखे गए बहुत सारे अच्छे फिल्मों में से सर्वश्रेष्ठ किसे कहूँगी तो मुझे एक मिनट नहीं लगेगा इस फिल्म का नाम लेने में...मास्टरपीस है यह फिल्म....

हाँ ,मुझे यह पता न था कि इसी विषय पर कोई अंगरेजी फिल्म भी है...

टिप्पणी की क्या कहियेगा..आपने जो कहा मैंने भी बड़ी प्रखरता से अनुभव किया है...टिप्पणी की प्रतिआशा में फेंकते चलो भागते चलो वाला सिस्टम ही अधिक है यहाँ....

वैसे गिरिजेश जी का कहना भी सही ही है...कई बार उत्कृष्ट कुछ पढ़ कहने को शब्द नहीं मिलते...तब भी टिप्पणी करना कठिन लगता है...

anjule shyam said...

हम लोग बड़ी जल्दी बाजी में होते हैं..किसी मुद्दे पर बात करते वक़्त... मीडिया हमारी समझ विकसित करता है...आज के समय में हम शायद ही किसी मुद्दे को मीडिया के अलावें किसी और तरीके से जानने और समझने की कोशिश करते हैं. और मीडिया किस हद तक समाज की सच्ची तस्वीर पेश करता है ये आज सबके सामने आ गया है. इसी समझ और सोच के सहारे हम किसी मुद्दे पर बात करते हैं. और अक्सर जल्दी बाजी में ..हमें कहीं और जाना होता है किसी मुद्दे पर बात इसलिए करते हैं क्योंकि रोज वाले काम से उब गए होते हैं......ठीक यही एलेमेंट्स यहाँ दिख रहे हैं..फिल्म मैंने नहीं देखि है लेकिन अब देखना हर हल में होगा..बेहतरीन पोस्ट ...

संजय @ मो सम कौन ? said...

हिन्दी वर्ज़न देखा था काफ़ी छोटी उम्र में। हम पांच छह दोस्त थे और फ़िल्म शुरू होने के दस मिनट बाद फ़िल्म के पक्ष में हमारी ज्यूरी में इकलौता मत अपना ही था। अंत तक हमारी ज्यूरी का फ़ैसला भी फ़िल्म के सापेक्ष था:) फ़िल्म बहुत अच्छी लगी थी, फ़िर से याद आई।
कमेंट संख्या के बारे में क्या कहें, हम तो आपको निरपेक्ष भाव से अपने मन की सुनकर लिखने वाला मानते हैं और जानते हैं।
’की फ़रक पैंदा है?’ :))

Arvind Mishra said...

यह तो बड़ी उपयोगी और सार्थक रीठेल रही-मैं भी इस फिल्म को देखना चाहूँगा!
अब मुझे कुछ रीठेल की उपयोगिता समझ में आयी !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

जैसे फिल्म में एक आदमी पूरा फैसला बदल देता है वैसे ही एक ईमानदार टिप्पणी काफी होती है कीँ संतुष्टी के लिए। कमेंट मूड पर भी निर्भर करता है। मैं क्रिकेट मैच देख रहा हूँ..तेंदुलकर की सेंचुरी बनने वाली है..ब्लॉग पढ़ रहा हूँ। ऐसे में क्या उम्मीद की जाय।
वैसे पोस्ट इतनी दमदार है कि ढेर सारा क्रिकेट छूट गया।

सञ्जय झा said...

aapne ankwar bharne ki baat ki.......
hamra chati jura gaya.........

phir milte hain....

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

अच्छा, यह बताइये कि यह फिल्म कहां मिल सकती है?

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रबन्धन पर सुन्दर फिल्म, चाह कर भी अभी तक नहीं देख पाया हूँ, अब देखना है।

सतीश पंचम said...

ज्ञान जी,

Youtube से 12 Angry Men का ट्रेलर मिला है, पोस्ट में एम्बेड कर दिया हूं।

और एक रूका हुआ फैसला का यूट्यूब लिंक ये रहा -

http://video.google.com/videoplay?docid=-4920568512416532465#

सतीश पंचम said...

'एक रूका हुआ फैसला' फिल्म का यूट्यूब समय 1 घंटे 36 मिनट दिखा रहा है, संभवत पूरी फिल्म है....उसे भी मूल पोस्ट में एम्बेड कर दिया हूं।

सतीश पंचम said...

* Correction - 1 घंटे 58 मिनट

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

वाह! पोस्ट लिखी तब बढ़िया गयी थी। वीडियो एम्बेड के बाद बनी अब बढ़िया है! :)

डॉ. दलसिंगार यादव said...

सतीश जी, रुका हुआ फ़ैसला उस समय देखी थी जब ब्लैक-ह्वाइट टी.वी. था। अतः इस फ़िल्म से साक्षात्कार कराकर सचमुच आपने एहसान किया है। धन्यवाद। आपका पड़ोसी आज़मगढ़ी हूं।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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