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Friday, March 11, 2011

लाज लगने का 'साटि-फिटिक' और लिंगानुपात .......

    कभी- कभी परिस्थितियां बड़ी अजीब सी बन आती हैं और उन्हीं परिस्थितियों से निकल आता है हास्य और कुछ सामाजिक सरोकार भी। ऐसी ही एक विचित्र परिस्थिति बनी थी दो साल पहले एक महिला के साथ और उसी मुद्दे पर मैंने एक पोस्ट लिखा था। चुनिंदा पोस्टों की श्रृंखला में पेश है वही पोस्ट। 


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    क्या कभी ऐसा भी हुआ हैं कि लोक-लाज के कारण छुट्टी का कारण आप नहीं बताना चाहते ? 


    ऐसा ही एक 'लजाधुर' वाकया जानकर मैं थोडा हैरान हुआ हूँ। दरअसल बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने में कई महिलाओं की आपस में मित्रता स्कूल के प्रांगण में यूं ही बन जाती है, उनमें बतकूचन भी खूब होता है, कभी बच्चों को लेने स्कूल जल्दी पहुँच गईं तो बतकूचन का दौर लंबा भी हो जाता है, हास-परिहास का दौर तो खैर चलते ही रहता है। 

    अभी हाल ही में श्रीमतीजी ने एक इसी तरह की महिला की बात बताई जोकि स्कूल में अपने छोटे बच्चे को लेने आती हैं, उस महिला की उम्र लगभग चालीस-पैंतालीस के आसपास होगी। बातचीत के दौर में पता चला कि उन महिला की एक बडी बेटी है जिसकी अभी जल्दी ही अगले महीने शादी होने वाली है, इस कारण अपने बच्चे को, जो कि पहली कक्षा में पढता है, शादी के दौरान अपने साथ गाँव ले जाना है । लेकिन मुसीबत ये है कि छुट्टी मांगे तो कैसे, टीचर सोचेगी कि इनकी बेटी की शादी होने जा रही है और लडका पहली कक्षा में पढ रहा है, इतनी उम्र में ये सब ? 

    पहले तो मैं भी माजरा नहीं समझ पाया कि आखिर इसमें लाज की क्या बात है, कइयों के बच्चे शादी के काफी दिनों बाद होते हैं तो इसमें असमंजस कैसा.....लेकिन फिर पता चला कि अभी उनकी कुल पाँच बेटियां है, लडके के इंतजार में एक के बाद एक लडकियां होती गई और जब बडी उम्र में छठे पर लडका हुआ तो जाकर खुशी का ठिकाना न रहा, लेकिन यह खुशी यह असमंजस भी ले आएगी, ऐसा उन्होंने न सोचा था। 

    बातचीत के दौर में अन्य महिलाओं ने हंसते हुए उस महिला को सलाह भी दी कि ,बता दो सही कारण, इसमें इतना शर्माने की क्या बात है, लेकिन उन लोगों की मित्रवत हंसी भी उस लाज को ढंक न सकी और अंत में एक दूसरे उपाय के तहत बात बनाते हुए कारण दिया गया कि घर में किसी और की शादी पड गई है इसलिये जाना पड रहा है। 

    खैर, अभी तक यह पता चला है कि बच्चे को स्कूल से ले जाने की छुट्टी मिल गई है औऱ वह महिला अब तक स्कूल में अन्य महिलाओं के बीच बतकूचन का मुद्दा बनी हुई है, खुद ही हास-परिहास में शामिल यह कहते हुए कि - इतनी उम्र में....यह सब :)

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- सतीश पंचम


 (जब पहली बार इस पोस्ट को लिखा था तो कुछ रोचक टिप्पणियाँ आई थी, सोचा उन्हें भी शेयर करता चलूं  :)





दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...



अरे! उस महिला को तो सामाजिक रूप से परमवीर चक्र का सम्मान मिलना चाहिए था। इन्ही के कारण तो समाज में लिंग अनुपात कुछ बना हुआ है, और वे हैं कि शर्म से मरी जा रही हैं।




सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...


सतीश जी,

आपने तो बड़ी अच्छी चर्चा छेड़ दी। लड़कियों की संख्या बढ़ाकर भी लड़का पाने की लालसा लिंग-अनुपात को ठीक रखने में बड़ी कारगर रही है। यह हमारी पुरातन सोच का एक उज्ज्वल पक्ष है। आधुनिक सोच तो कन्या (भ्रूण) की हत्या करा रही है।


एक रोचक उदाहरण अपने ब्लॉग पर पोस्ट करता हूँ। विषय प्रवर्तन का धन्यवाद।:)

lata said...


ऐसा एक वाक़या मेरे साथ भी हुआ था,
कुछ एक साल पहले मै अपनी एक सहकर्मी के घर पहली बार गई,उसने मुझे अपनी 2 बहनो, मम्मी-पापा से मिलवाया और एक 11-12 साल की बच्ची से मिलाते हुए कहा की वो उसकी मौसी की लड़की है,
बाद मे जब मेरा आना जाना उनके घर बढ़ गया तो काफ़ी बाद मे पता चला को वो उसकी रियल सिस्टर थी :)
Gyan Dutt Pandey said...


मेरा मंझला मामा मुझसे छ महीना छोटा है!


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13 comments:

अनूप शुक्ल said...

बच्चे और पोस्टें जो न करायें! :)

Arvind Mishra said...

मैंने अपनी पहली टिप्पणी में ही कहा था कि लिंगानुपात जैसे शब्द मेरे मन में कुछ और ही इमेजेस बनाने लगते हैं -और आपने इन पोस्टों को चुनिन्दा पोस्ट कहने का कोई तो मानदंड अपनाया होगा -या अपने मन से ही -स्वनिर्धारण कर लिए हैं ..नहीं ...नहीं ऐसे ही जानना चाहता हूँ !

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

पोस्टों को चुनिन्दा कहने का यही मानदंड अपनाया कि जो पोस्टें मुझे अच्छी लग रही हैं वही पोस्ट कर रहा हूं...बाकी तो यदि टिप्पणियों को मानदंड बनाउं तो वह भी खरा न उतरे क्योंकि मेरी एक से एक फालतू बेमतलब सी पोस्टों पर टिप्पणियों का अंबार है जबकि अच्छी पोस्टों पर कम ही टिप्पणियां हैं और जिनमें से कुछ को थोथी टिप्पणी भी कहा जा सकता है....Hollowness of Comments :)

यदि गूगल के पॉपुलर पोस्टों को मानदंड मानूं तो वह भी न्याय नहीं करता ....हालिया पांच छह महीनों की पोस्टों को ही चुनकर दिखाता है....सो वह भी सही नहीं है।

इसलिये सबसे उचित यही समझा कि जो मुझे मन से अच्छा लगा वही पोस्ट किये जा रहा हूं।

Udan Tashtari said...

पहले तो हर घर की कहानी थी यही.

प्रवीण पाण्डेय said...

मेरे भतीजे मुझसे बड़े हैं और 7 वर्ष की आयु में मैं दादा बन गया था।

सतीश पंचम said...

और हां.... इसलिये भी कि यह पोस्ट एक बेहतरीन उदाहरण है इस बात का कि कैसे टिप्पणियों के माध्यम से मामले के दूसरे पहलू की ओर इशारा किया गया था, क्योंकि जब मूल पोस्ट लिखी गई थी तब मुद्दा केवल लाज पर केन्द्रित था कि कैसे लोग शर्माते हैं इस तरह से बताने में...... लेकिन बाद में टिप्पणियों ने लिंगानुपात की ओर भी ध्यानाकर्षण किया और इस तरह से पोस्ट को एक नई दृष्टि से देखा गया।

Rahul Singh said...

हमउम्र चाचा की तरह, उसके अनुकरण में अपनी मां को भउजी कहना आम रहा है.

नीरज बसलियाल said...

अच्छा किस्सा , उतने ही अच्छी प्रतिक्रियाएं भी :)

Suresh Chiplunkar said...

:) :) :)

rashmi ravija said...

ये मेरे लिए रीठेल नहीं थी...क्यूंकि पहली बार पढ़ा...

पहले तो ऐसे वाकये आम थे...और एक बात मुझे कभी समझ नहीं आती..अक्सर फिल्मो में भी...एक बड़ी बहन होती है..शादी लायक और उसका एक स्कूल जाता भाई होता है...चितचोर, परिचय.. ...(और भी कई सारी फिल्मे...नाम याद नहीं आ रहा)

पर आज स्थिति थोड़ी बदल गयी है....embarrassing हो जाता है,जरा

रंजना said...

अरे यह तो बढ़िया ध्यान दिलाया आपने....लड़के के इन्तजार में पांच छः साथ लड़कियों की लाइन लगाना...सही में इससे लिंगानुपात सही रखने में बड़ी सहायता मिलती है...

लेकिन आज तो गाँव देहात वाले भी शहर जा भ्रूण परीक्षण करवा लेते हैं और कन्या भ्रूण को जन्म देने की जहमत नहीं उठाते....

एक तरह से देखिये तो इसमें आशाजनक भी कुछ है.....जिस प्रकार से कन्या भ्रूण नष्ट किये जा रहे हैं और लिंगानुपात बढाया जा रहा है,हम आशा रख सकते हैं कि अगले पांच सात दशक बाद लड़कियों की भारी डिमांड रहेगी...शायद फिर से मत्रिसत्तात्मक समाज की स्थापना हो...

डॉ. मनोज मिश्र said...

रोचक पोस्ट,आभार.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

@ इसलिये सबसे उचित यही समझा कि जो मुझे मन से अच्छा लगा वही पोस्ट किये जा रहा हूं।

बिल्कुल - यही मनमौजियत धर्म का पालन होना चाहिये। आगे भी इसी आधार पर ठेलिये-रीठेलियेगा!

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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