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Monday, March 7, 2011

पथरीया कोल्हू

     मेरे गाँव में पाये जाने वाले पत्थर के कोल्हू  जिन पर कि चांद, सितारे, हिरन, हाथी आदि की आकृतियां उकेरी गई हैं..... उन्हीं कोल्हूओ पर आधारित है यह पोस्ट जिसे मैंने बेस्ट ऑफ सफ़ेद घर श्रृंखला के तहत चुना है। आप भी इसी री-पोस्ट का आनन्द उठायें। 

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      मैंने अपने गाँव में बडे बडे आकार के गोल पत्थरों वाले कोल्हू देखे हैं। उन पर इंसानों, जानवरों, चाँद, सितारों, हिरन आदि की आकृतियां बनी हैं। मैं  हैरान होता हूँ कि इसे कैसे बनाया जाता होगा, सडक, परिवहन के अभाव में इसे कैसे गाँव में ढो कर लाया जाता होगा। क्या यह किसी की व्यक्तिगत सपंत्ति होती थी या पूरे गाँव की ? यही सब प्रश्न मेरे मन में इन पत्थरों को देख कर उठते थे।

               गाँव में किसी से पूछने पर बस इतना पता चलता था कि इनसे गन्ने की पेराई होती है। इसका इतिहास, भूगोल कुछ पता न था किसी को। लेकिन हाल ही में मैंने विवेकी राय जी की लिखी एक किताब कालातीत को पढते हुए इसके एक लेख में इन कोल्हुओं के बारे में कुछ जानकारी पाई है। सीवान का कोल्हू नामक इस लेख में विवेकी राय जी लिखते हैं कि -

          पथरीया माने कोल्हू।…..पुराने जमाने में आज से सौ पचास वर्ष पहले इन्हीं पत्थर के भारी भरकम कोल्हूओं से ईख पेरने का काम लिया जाता था। गाँवों में ये यत्र तत्र बिखरी बेकार पडी रहती हैं। खुरपा-गँडासा रगडकर तेज करते हैं लोग। चरवाहे बैठकर भैंस चराते हैं। लडके खेलते हैं। कोई नाच तमाशा हुआ तो उस पर बैठकर देखते हैं। जो जहां पडी हैं बस वहीं पडी हैं। कौन उन्हें इधर उधर करे।

     कोल्हूओं के गांव में लाने योग्य परिवहन के बारे में विवेकी राय लिखते हैं कि लोग हाथोंहाथ उठाकर एक गाँव से दूसरे गाँव करते डगरा लाते थे। कहीं पहाड से आती थीं यह बनकर।
  
     आगे विवेकी राय जी लिखते हैं कि जिन लोगों को पथरीया की जरूरत होती थी वे पहाड पर जाकर उसे गढवाते थे। और ऐसा भाईचारा था लोगों के बीच कि एक गाँव से दूसरे गाँव तक लोग ढकेल कर पहुँचा देते थे। जिस गाँव में पथरीया पहुँच जाती थी उस गाँव के लोगों की जिम्मेदारी हो जाती थी कि ढकेल कर अगले गाँव में पहुँचा दें। किसी का कोल्हू गाँव में रह जाना पूरे गाँव के लिये लज्जा की बात मानी जाती थी।

               इन पथरियों पर पहचान के लिये सूरज, चाँद, हिरन  आदि की आकृतियां बनी होती थीं। अब हर समय तो कोई इतने लंबे समय तक इन कोल्हूओं के साथ नहीं चल सकता था। सो एक गाँव से दूसरे गाँव, दूसरे से तीसरे……निशान के आधार पर कोल्हू सरका दिया जाता था। जिसका कोल्हू गाँव में पहुँचता था, वह इन निशानों को देख कर उसे ले लेता था।
      
         वैसे, बदलते समय के साथ, लोगों में आये दुराव के साथ एक मुहावरा भी बना है – ‘सीवान का कोल्हू होना’ -    माने ऐसा काम जिसमें सब लोग पूरी तरह सहयोग नहीं करते। किसी सामूहिक काम में जब कोई आधे मन से बल लगाता दिखता है तो कहा जाता है कि क्या सीवान ( गाँव) का कोल्हू टारने ( हटाने) आए हो।
फिलहाल तो यह चित्र मेरे ही गाँव के हैं जहां पर कि ये कोल्हू यूँ ही पडे हैं। इन पर कपडे सूखाये जाते हैं। इन पर बच्चे खेलते हैं तो कभी कभी इन पर खुरपा-गंडासा भी तेज किया जाता है।

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां की चाय  ‘पेशल….मलाई मारके’ नाम से जानी जाती है।

समय- वही, जब पत्थर के कोल्हूओं को गाँव वाले सरकाते समय जोर लगाके……हईश्या बोलते हैं और बगल के ही किसी रेडियो पर गीत बजता है –   गीत गाया पत्थरों ने…….

15 comments:

अनूप शुक्ल said...

अच्छा रिठेल है।
वैसे भी पोस्टें कोई सीवान का कोल्हू तो होती नहीं जिनको ठेलने के लिये हईस्सा कहना पड़े!

लगे रहिये! और रिठेल का इंतजार है!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

पथरीया कोल्हू और उसके परिवहन के बारे में जानकर अच्छा लगा। सच कहूँ, पुरानी पोस्ट्स का यह पुनर्प्रकाशन बहुत अच्छा लगा।

Udan Tashtari said...

ऐसी दुर्लभ जानकारी...बहुत गजब!!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मस्त पोस्ट। इतना कुछ तो हम भी नहीं जानते थे।

Arvind Mishra said...

इतना रीठेल क्यों मचाये हुए हैं सतीश जी -अब इन लेखों को पढ़े हुए इतना अरसा अभी नहीं हुआ कि इन्हें फिर से पढ़कर कोई नया तत्वज्ञान हो जायेगा -मुझे लगता है कि आपको कुछ मौलिक योगदान देना चाहिए न की साल एक दो साल पहले के लेखों को ठेलते रहना चाहिए जब तक कि ऐसा करने का कोई अवसर और सटीक औचित्य न हो .....या आपने उसमे ऐसा कुछ विशिष्ट न जोड़ दिया हो जो फिर से पढने में लाभदायी या आनन्द दायक हो !

Rahul Singh said...

मजा आ गया, शानदार.

निर्मला कपिला said...

ाच्छी जानकारी। धन्यवाद।

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

पिछले साल भर में देखा कि बज़ पर, ब्लॉग पर ढेर सारे नये साथी आ जुड़े हैं तो उन्हीं के लिये ये पोस्टें री-पोस्टिंग की जा रही है और पड़े पड़े पोस्टें खराब भी हो रहीं थी किसी में फंगस लग चुका था तो किसी में जंग,तो कुछ पोस्टें एकदम से ज़र्दही गई थीं :)

सो उन्हीं पोस्टों को साफ करके, मांज रगड़कर फिर उन्हें निहारने में अलग ही आनंद आ रहा है....इसलिये भी री-पोस्ट किये जा रहा हूँ :)

अभी होली तक ऐसे ही री-पोस्ट चलता रहेगा.... तब तक हो सकता है मौलिक लेखन हेतु मुझे भी कोई Muse मिल जाय :)

सतीश पंचम said...

और हां अरविंद जी, जहां तक मैने देखा है आप मेरी पोस्टें नियमित पढ़ते रहे हैं .... देशज शैली के कारण उनसे ज्यादा जुड़ाव भी महसूस करते हैं इसलिये भी शायद आपको यह पोस्टें ज्यादा पुरानी नहीं लग रहीं :)

मेरी री-पोस्ट से होने वाली असुविधा हेतु माफी चाहूंगा ....फिलहाल होली तक ऐसे ही चलते रहने का इरादा है :)

सञ्जय झा said...

achhi re-thel hai .... lekin balak-shalak ke liye to khali khalish theluahi hai....

rel ke theliye........

pranam

rashmi ravija said...

सबसे अच्छा लगा..... इतनी ईमानदारी और भाईचारे से इन पथरियों का यूँ एक गाँव से दूसरे गाँव तक धकेल कर पहुंचा देना...

कहाँ गए वो दिन...

anjule shyam said...

बेहतरीन -----रिठेल हम जैसे नए पाठक के लिए ये सिलसिला जारी रहना चाहिए...

सतीश पंचम said...

श्री भूपेन्द्र सिंह जी की मेल से प्राप्त टिप्पणी -


भाई जिओ,मेरे मामा जी के गाँव जौनपुर मे भी ऐसा ही एक कोल्हू था /वाकई गाँव की आत्मनिर्भरता विलुप्त होने से बहुत कुछ खो गया है /अब तो पुराने पदचिन्हों को देख कर ही मन बहलाना होगा /आपका धन्यवाद पुरानी स्मृतियाँ ताज़ी करने के लिए/
सादर,

Dr.Bhoopendra Singh
T.R.S.College,REWA 486001
Madhya Pradesh INDIA

सतीश पंचम said...

श्री सुजीत श्रीवास्तव की मेल से प्राप्त टिप्पणी

सतीश जी,

पहले हमारे गाँव में मड़हा (छान) उठाने के लिए दूसरे गाँव के लोग बिन बुलाये चले आते थे बस उनको खबर लग जाय. हमने खुद सर पे पगड़ी बाँध के दूसरे गाँव में जा कर मड़हा उठाया है....
लेकिन अब ये सब सिर्फ यादें भर रह गयो है.. आज तो लोग बुलाने पर भी नहीं आते. . .
फिर से वाही पंक्तियाँ लिखता हूँ...

वक़्त का ये परिंदा कब रुका है कहाँ,
मै था पागल जो इसको मनाने चला..
चार पैसे कमाने मई आया शहर,
गाँव मेरा मुझे याद आने लगा...

वक़्त का ये परिंदा कब रुका है कहाँ. . . .

सतीश पंचम said...

उपर की दोनों टिप्पणीयों में मेल से प्राप्त कुछ प्रतिक्रियाएं हैं जो कि मेरी पुरानी पोस्टों को रि-पब्लिश करने के बाद आती रही हैं।

मेल से प्राप्त इन प्रतिक्रियाओं को अक्सर अपने तक ही सीमित रखता हूं ...क्योंकि ये ऐसे सब्सक्राईबर हैं जो कि सूदूर बैठ बिना ब्लॉगरीय शोर-शराबे के मुझे पढ़ते हैं और उनकी प्रतिक्रियाएं मुझे कुछ अलग ही सुकून दे जाती हैं।

उम्मीद है रि-पोस्टिंग की वजह का धुंधलका अब छंट चुका होगा :)

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