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Sunday, March 6, 2011

दुई साल बाद..... 'उजास'


आपने गौर किया होगा कि धार्मिक स्थानों पर अक्सर ही कुछ ऐसे उच्छृंखल तत्व पाये जाते हैं जो कि तीर्थस्थलों पर स्नान करती महिलाओं को ताकते रहते हैं, उनके उघड़ी देह को जान बूझकर निहारते रहते हैं। धर्म, अध्यात्म जैसे क्षेत्र होने न होने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता.....उनकी मानसिक जुगुप्सा उन्हें ऐसा करने के लिये ललचाती है। 

      वहीं, हमारे हिंदू धर्म की कुछ ऐसी कुप्रथाएं भी हैं जो कि उनके इस कुत्सित मानसिकता के लिए पोषण का काम करती हैं।  कुछ इसी विषय को लेकर मैथिली के लेखक प्रदीप बिहारी जी ने एक रोचक कहानी लिखी थी और जिसके बारे में मैंने अपने ब्लॉग सफ़ेद घर पर चर्चा भी की थी। फिलहाल बेस्ट ऑफ सफ़ेद घर श्रृंखला के तहत वही पोस्ट यहां री-पोस्ट कर रहा हूँ। उम्मीद है सवा दो साल पुराने इस पोस्ट को पढ़ते हुए नये पाठक इस दिलचस्प कहानी को पढ़ लाभान्वित होंगे।   

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     धार्मिक स्थानों पर स्नान करती महिलाओं को, उनके उघडे तन को कुछ लोग रसभरी निगाहों से देखने के इच्छुक होते हैं और अपने इसी प्रयोजन से वह घाट और घटोली तक छान मारते हैं कि कहीं कोई महिला उघडी हुई दिख जाय। जब ऐसे लोग उन महिलाओं को निहारते हैं तो महिलाओं के घरवाले सबकुछ जानते समझते हुए भी कुछ कह नहीं पाते, एक यह भावना भी होती है कि कहीं झगडा-टंटा करने से धार्मिक कार्य मे विघ्न न पड जाय, लेकिन उनके अंदर ही अंदर मन बेचैन जरूर रहता है कि कम्बख्त मेरे घर की मरजाद को घूर रहा है और मैं कुछ कह नहीं पा रहा।

       इस मुद्दे पर हाल ही में लेखक प्रदीप बिहारी की कहानी उजास पढी, जो कि छठ पूजा के दौरान होने वाले ऐसे ही क्रियाकलापों पर आधारित है। काफी अच्छी और सशक्त लेखनी का परिचय दिया है प्रदीप जी ने।

कहानी का साराँश कुछ इस प्रकार है कि -

       रामभूषण बाबू के दोनों बेटों की शादी हो गई थी, लेकिन दोनों के कोई बच्चा नहीं था, सो रामभूषण बाबू की पत्नी ने मनौती मांगी थी कि यदि उन्हे पोता हुआ तो छठ पूजा के दौरान वह अपने आँचल पर नटुआ( नचनिया) नचवाएंगी। कुछ समय बाद बहू के पैर भारी हुए, पर इससे पहले कि पोता हो, रामभूषण बाबू की पत्नी चल बसी।

       अब पोते के जन्म के कुछ साल बाद रामभूषण बाबू को सबने याद दिलाया कि पत्नी की उस मनौती को बहू पूरा करे जिसमे पोते के जन्म के बाद अपने आँचल पर नटुआ नचवाने की बात थी, वरना जरा भी उंच नीच हुई नहीं कि छठ मईया का प्रकोप सामने होगा। रामभूषण बाबू काफी दुविधा में थे क्योंकि जवान बहू को कोई कैसे हजारों लोगों के सामने बेपर्दा होकर बैठने दे। बात आँचल पर नटुआ के नचाने की थी, लेकिन इस उपक्रम मे बहू को साडी को आधा ही पहनना पडता और इससे जाहिर था कि उसका बदन उघाड हो जाता, लोग मजे ले-लेकर देखेंगे यह सोचकर ही रामभूषण बाबू परेशान थे। खुद की पत्नी जो बूढी थी, यदि वह आँचल पर नचवाती तो ठीक था, लोग उस गंदी नजर से न देखते , लेकिन किसी तरह धार्मिक मनौती भी तो पूरी करनी थी।

     काफी अनमने ढंग से वह घाट की ओर चले, रास्ते मे लोगों की बातें सुनकर तकलीफ भी होती रहीं।

   कोई कहता- " पहले नटुआ नाचता था बुढिया के आँचल पर, आज नाचेगा युवती के आँचल पर"

       वहीं जब नटुआ आ गया तो बहू भी असमंजस मे थी कि इतने लोगों के बीच कैसे नहाये और कैसे अपने आँचल को पसार कर आधा शरीर खुला रखे। ईधर नटुआ को लेकर लोगों मे अलग ही चर्चा थी -

      यह बात जानकर कि नटुआ आज यहाँ रूकेगा नहीं और अभी नाच कर कहीं और जाएगा नाचने के लिये तो कुछ लोग कहते हैं - " ठीक है । तो साले को अभिए नचाते-नचाते गां* फार देते हैं।"

   अभी ये चर्चाएं सुनाई दे रही थीं कि फिर किसी की आवाज आई -
 " आँचल पर नटुआ नाचेगा कैसे ? "

" सो क्यों, घाट पर आँचल पसार देगी और उस पर नटुआ नाचेगा।"

" तब तो देह-दशा साफ- साफ दिखाई पडेगी"

"यही तो मजा है यार"

" आज तो साला नटुआ भी तर जाएगा"

ये सब सुनते-सुनते रामभूषण बाबू ने अपने मानसिक संतुलन को किसी तरह बनाये रखा।

       तभी उस पोते ने रामभूषण बाबू को बताया कि लोग नटुआ नाचने से पहले पटाखा फोडने कह रहे हैं। रामभूषण बाबू ने कहा- तो जाओ फोडो पटाखा, पटाखा नहीं है क्या?

पोते ने कहा - पटाखा तो है मगर....

मगर क्या ?

फोडने के लिये पन्नी खोलेंगे तो हिरोईन उघार हो जाएगी।

      पोते ने पटाखे के पैकेट के उपर छपे महिला की तस्वीर की ओर इशारा किया। रामभूषण बाबू को लगा कि उनके सामने उनका पोता नहीं दादा खडा है।

     इधर नटुआ नाच नहीं रहा था, आँचल के पास खडा था। लोगों ने इस पर भी चुटकी ली - " ईनफिरिएरिटी कॉम्पलेक्स है। इतनी कीमती साडी पर पाँव रखने की हिम्मत नहीं हो रही"

      उधर रामभूषण बाबू ने कहानी का अंत आते-आते आंचल पर नटुआ नचाने की कुप्रथा के खिलाफ एकाएक विद्रोह कर दिया और सीधे सीधे उस प्रथा को चुनौती देते हुए ललकार दिया कि चाहे जो हो.....वह बहू को आँचल पसारकर गिद्ध जैसे लोगों के बीच नहीं जाने देंगे। वह इस कुप्रथा के खिलाफ हैं। 

     इस हिदी मे अनुवाद की गई मैथिली कहानी 'उजास' को पूरा पढने के बाद महसूस होता है कि हमारा क्षेत्रीय साहित्य कितना सुघड है और उसमें कैसे-कैसे सशक्त रचनाकार हैं। प्रदीप बिहारी जी को उनकी इस सशक्त मैथिली रचना के लिये बधाई। 

- सतीश पंचम

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      मैने यह कहानी नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाओं के हिंदी अनुवाद 'मैथिली कथा संचयन' के जरिये बताई है। फिलहाल यह 'मैथिली कथा संचयन' मुंम्बई के जीवन प्रभात पुस्तकालय में उपलब्ध    है........

नोट -  जब कहानी लिखा था तो जीवन प्रभात पुस्तकालय विलेपार्ले में था, उसका मूल पोस्ट में पता लिखा था -  A-4 / 1 , Kripa Nagar, Irla Bridge, विलेपार्ले, Mumbai - 56, Phone no. - 022-26716587 ।

प्रदीप बिहारी
     अब जब बेस्ट ऑफ सफ़ेद घर श्रृंखला के तहत अपने पसंद की कुछ चुनी हुई पोस्टों को री-पोस्ट कर रहा हूँ तो पाता हूँ कि वह लाइब्रेरी अब शिफ्ट होकर अंधेरी चली गई है , उसका पता बदल गया है। 

     इसी बीच पाता हूं कि जिन प्रदीप बिहारी जी को मैंने नेट पर दो साल पहले ढूँढना चाहा था तब वह नहीं मिले थे, लेकिन अब दो साल बाद फिर से सर्च करके देखता हूं तो उन्होंने अपना ब्लॉग मेनकायन बना लिया है....उस पर उन्होंने कोई पोस्ट तो नहीं लिखी लेकिन प्रोफाइल जरूर बना दिया है। आशा है वे जल्द ही ब्लॉगजगत में सक्रिय होंगे।  ये रहा लिंक . 

    री-पोस्ट करने से मुझे अपनी पोस्टों को कुछ हद तक अपडेट करने के काम भी हुए जा रहे है .....


आनंदम्..... आनंदम्  :)

(सभी चित्र - गूगल दद्दा से साभार )

13 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जाकी रही भावना जैसी..

डॉ. मनोज मिश्र said...

अच्छी कहानी और(कु) प्रथा से परचित कराया आपनें .कुछ भाई लोंगो का यही शौक है और लत भी.
बढ़िया पोस्ट.

Arvind Mishra said...

लोक जीवन की कतिपय कुप्रथाओं पर चोट है यह कहानी

सतीश पंचम said...

@ मनोज जी,

कुछ भाई लोंगो का यही शौक है और लत भी


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मनोज जी, आपने गजब याद दिलाया।

जौनपुर का शाही पुल याद है न ?

वहाँ पर मैंने कई बार रिक्शे से आते जाते समय ऐसे लोगों को पुल पर बने छतरीयों में बैठ यही सब करते धरते देखा है।

पहली नज़र में देखने पर ये लोग प्रकृति प्रेमी प्रतीत होते हैं...पुल के नीचे से गोमती नदी के बहने का आनंद लेते प्रतीत होते हैं लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है कि वे नदी किनारे बने घाट पर स्नान करती, कपड़े बदलती स्त्रियों को देख रहे होते हैं।

एक बार इसी पुल पर से रिक्शे से जाते समय रिक्शेवाले से पूछा था कि क्या ये लोग रोज आते हैं यहां.....तो रिक्शेवाले ने कहा था कि -

लंणभक हएन ससुरे.....का जानै मान मरजाद.... एक दुई बार लोग डांट कर भगाये भी लेकिन फिर आ जात हैं, पुलिस प्रशासन कहां तक बरजे.

मनोज कुमार said...

घाट पर आने वाले घुटे हुए ऐसे ही लोग हमारी सांस्कृतिक परंपराओं को बदनाम करते हैं।
एक विचारोत्तेजक पोस्ट।
आभार इस प्रस्तुति के लिए।

anu said...

कटु सत्य उघाड़ दिया है कहानी ने... मन की बेचैनी भी

Sunil Kumar said...

यह सब वर्षों से चला आ रहा है मगर इसका खुलासा किया आपने, कुप्रथा से अवगत कराने का धन्यवाद

Poorviya said...

ek katu pratha---
jai baba banaras--

सतीश पंचम said...

सुनील जी,

इसका खुलासा मैने नहीं किया है मैंने तो केवल प्रदीप जी की कहानी को यहां प्रस्तुत भर किया है बाकी तो ज्यादातर विद्वगण इस तरह की असहज करती बातों के बारे में थोड़ा बहुत जानते ही हैं।

संजय @ मो सम कौन ? said...

कुप्रथाओं का विरोध होना ही चाहिये। राम भूषण बाबू ने विदोह किया तो जायज ही है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

पोते के व्यवहार को देखकर "होनहार बिरवान के ..." कहावत याद आ गयी। सच है कुरीति के विरोध के लिये किसी न किसी को तो सामने आना ही पडेगा। अंततः वही पहले सामने आ सकते हैं जिनके परिवार/समाज को उन कुरीतियों का खामियाज़ा भुगतना पडेगा।

anitakumar said...

कहानी अच्छी लगी, आप के दिए लिंक से प्रदीप जी के प्रोफ़ाइल पर पहुंची, मेनकायन पर क्लिक किया और मेस्सज आया
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हम बिना क्लिक किए वापस आ गये, आप से ही सुन लेगें उनकी लिखी कहानियां…:)

सतीश पंचम said...

अनिता जी,

निश्चिंत रहिए, मेनकायन पर केवल वार्निंग ही आती है कि इस साइट के कंटेंट व्यस्कों के लिये हैं, लेकिन वहां एक भी पोस्ट नहीं हैं :)

प्रदीप बिहारी जी ने ये वार्निंग क्यों लगा रखी है अपने ब्लॉग पर ये तो वही अच्छी तरह बता सकते हैं लेकिन उनका प्रोफाइल देखना हो तो जरूर जाया जा सकता है....

Content Warning मैसेज के बावजूद :)

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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