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Saturday, March 5, 2011

भम्भ रर रहा है.....



 'बेस्ट ऑफ सफ़ेद घर' श्रृंखला के तहत पेश है मेरी वह पोस्ट जिसे ग्राम्य सीरीज़ के अंतर्गत पब्लिश किया था .....

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    फणीश्वरनाथ रेणु जी ने 'मैला आँचल' में एक जगह पूर्णिया के नील गोदाम का जिक्र करते हुए लिखा है कि - जब भी  गाँव का कोई नौजवान बियाह के बाद गौना करवा कर अपनी दुलहिन लेकर लौटता था तो रास्ते में पड़ने वाले नील गोदाम के पास पहुँचते ही कहता था कि गाड़ीवान....गाड़ी को जरा धीरे हाँको....दुलहिन नील गोदाम का हौज और साहब की कोठी देखना चाहती है । सुनते ही दुलहिन थोड़ा सा घूँघट सरका कर ........ओहार हटा कर देखती ..... यहाँ तो इंटो का ढेर है...........कोठी कहाँ है......।

नौजवान कहता  - देखो, वह है नील महने ( मथने ) का हौज....।

  वही हौज जिसमें कि अंगरेजी राज ने भारतीय किसानों के लाल रक्त को नीले रंग में बदल डालने की जैसे कसम खाई थी। ......  अबकी गाँव जाने पर उसी नील महने के हौज के बगल से गुजरते समय नील गोदाम की तस्वीर खींच रहा था कि तभी एक शख्स पास आ कर खड़े हो गए।  पूछ बैठे......आप पत्रकार हो क्या ? 

 नहीं भई....पत्रकार फत्रकार कुछ नहीं हूँ.......बस गाँव आया हूँ.......यहीं बगल में आया था...... घूम घामते इस नील गोदाम के करीब आ गया......सो.... तस्वीरें इसलिए ले रहा हूँ.......।

 लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि खंड़हर की तस्वीर में कौन चीज है जो आप इसे हींच रहे हैं। 

 बस ऐसे ही हींच रहा हूँ ......अच्छा लगता है.....। 

वो तो ठीक है.....लेकिन देख रहे हैं सब गाँव वाले हग-मूत कर खराब कर दिए हैं.........। सुबह आइए तो देखिए कि कैसे अंगरेज लोग को भारत वाले उनके ही नील गोदाम पर बैठ सलामी देते हैं। 


सलामी........ क्या बात कही......बातों ही बातों में नील गोदाम की तस्वीर खींचने लगता हूँ।  याद आता है कहीं कुछ पढ़ा हुआ कि ...... नील बनाने की प्रक्रिया के तहत नील की पत्तियों को इस पानी भरे हौज में डालकर सडाया जाता था......सड़ाने के बाद मथा जाता था और उसी दौर में निकलता था नील.......वही नील जिससे उठी ललकार ने भारत को पराधीन तंत्र से स्वाधीन तंत्र की ओर चलने हेतु अधीर कर दिया  ।

  तस्वीरें लेते समय मैंने ध्यान दिया कि नील गोदाम से ही सटा  है एक कुँआ........ जिससे कि पानी खींचकर नील मथने वाले हौज को भरा जाता होगा.......। कुँएं के मोटे-मोटे छूही ( घिरनी- स्तंभ ) को देख अंदाजा लगाता हूँ कि कितना सारा पानी इस कुँए से रोज खींचा जाता होगा । 

 नील गोदाम के बगल से सटी सड़क देख पता चलता है कि नील व्यापार के लिए  ही इस सड़क यातायात का समुचित प्रबंध किया गया होगा ताकि नील की फसल लिए बैलगाड़ीयों को नील गोदाम तक पहुँचने में आसानी हो और यहाँ से नील बाहर भेजी जा सके।
  
 उधर नील गोदाम का परनाला पहली ही नजर में कुछ  विशिष्ट किस्म का लग रहा है.....तीन मुहाने और तीनों अलग अलग आकार के.......  आस पास सटे हुए। 

  चंपारण में सन् 1917 में गाँधी जी ने नीलहे अंग्रेज अफसरों द्वारा किसानों से जबर्दस्ती तीन कठिया प्रणाली के तहत नील उगवाने का जमकर विरोध किया था .......तीन कठिया प्रणाली.....यानि कि  हर किसान को अपनी जमीन के 3/20 हिस्से पर नील उगाना जरूरी।

    इस प्रणाली को बनाए रखने के लिए..... नील  उगाने के लिए..... किसानों को नीलहे अंग्रेज अफसरों ने महंगे ब्याज पर कर्ज दिया........एक ओर अनाज की बजाय.......जबरी नील उत्पादन करवा कर शोषण.....दूसरी ओर   लिया हुआ कर्ज...... हालत यह थी कि एक बार लिया हुआ कर्ज गले की फांस बन कसता जाता.....कसता जाता....... ठीक हमारे वर्तमान में विदर्भ क्षेत्र के कपास उगाने वाले किसानों की तरह नील किसान भी छटपटाते रहते  । आज, फिर हालात वही है...... हमारे इन कपास उत्पादक किसानों को भी सरकार अच्छा खासा कर्ज दे रही है....खुलकर.....लेकिन यह कर्ज कब और कैसे लौटा पाएंगे किसान...... इसकी किसी को फिक्र नहीं है। फिक्र है तो उन सरकारी आँकड़ो की कि, जो सहायता राशि के नाम पर कागजों में चुप्पे से उतर आती है और रजिस्टरों में आराम फरमाती है.....यह कहते कि हमने तो गरीब किसानों की सहायता ही की है.......अब कोई और किसान आत्महत्या करे तो हम क्या करें............ सहायता राशि..........मरणोपरांत  कागज के फूलों में बदल जाती है।

   वैसे, नील युग का अवसान होने के कारणों में जहाँ एक ओर जर्मनी द्वारा नये किस्म के रासायनिक रंगों का अविष्कार था तो दूसरी ओर  1917 में चंपारण में गाँधीजी द्वारा चलाया गया नील आंदोलन........विरोध इतना तगड़ा था कि अंग्रेज पीछे हटने पर मजबूर हुए। बीरभूम, पाबना, खुलना आदि इलाके नील विरोध के मुखर क्षेत्र थे।   उधर जर्मनी के सस्ते और विविध रंगों ने भारतीय प्रणीली से बनने वाले नील के बाजार को ध्वस्त करना शुरू कर दिया दिया था .....धीरे धीरे नीलहे अंग्रेज साहबों की कोठियों पर भंभ ररने लगा........और एक वह भी समय आया कि नीलहे किसानों ने अपनी विजय पताका फहरा दी.............भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक सफल युद्ध। 

  परंतु  वर्तमान में विदर्भ के कपास उत्पादक  किसानों की  जो हालत है...... कभी वही हालत नील की फसल उगाते किसानों की भी रही थी। उस समय संगठित विरोध का स्वर विदेशीयों के प्रति था........ अब .......अब किसका तो विरोध किया जाय और किसका समर्थन......कुछ समझ नहीं आता......। परिस्थितियां गड्डम गड्ड हैं........हमारी ही सरकार.....हमारे ही लोग.....लेकिन फिर भी किसानों की आत्महत्या रूकने का नाम नहीं ले रही। गरीबी, सहायता, मौत, मुआवजा......इस सब का कुचक्र चल ही रहा है......जो चीज पहले हो रही थी....अब भी वही हो रही है.....बस रंग बदल गया है......पैकिंग वही है.....।

 तनिक इन दो चित्रों को देखिए....एक में नील है......दूसरे में कपास ..... दोनों ही चीजों के बाँधने का तरीका एक समान ही है.......।  अगर हालात कुछ नहीं बयां करते हैं तो कोई बात नहीं.....लेकिन यह जालीदार पैकिंग तो बहुत कुछ बयां कर रही  है । नील भी उसी तरह पैक की जाती थी.....कपास भी।    

      अब चंपारण केवल बिहार में ही नहीं है.....भारत के हर राज्य में है.....। अफसोस, भारत में फैले इन तमाम  चंपारणों को चेताने के लिए......ललकारने के लिए कोई राजकुमार शुक्ल जैसा किसान नहीं है .......कोई गाँधी नहीं है....कोई ललकारता देहात नहीं है।


- सतीश पंचम

( From  ग्राम्य सीरीज......)

18 comments:

संजय @ मो सम कौन ? said...

कोई ललकारता देहात नहीं है....क्योंकि देहात अब शहर बन गये हैं और सुविधाभोगी होकर ललकार नहीं लगाई जा सकती, सिर्फ़ चाटुकारिता की जा सकती है।

Rahul Singh said...

पहली बार पढ़ा, सचमुच बेस्‍ट.
''रेणू जी ने 'मैंला आँचल' की वर्तनी में ''रेणु और मैला'' संशोधन सुझाव पर विचार करेंगे.

सतीश पंचम said...

राहुल जी,

ध्यान दिलाने के लिये शुक्रिया.

वर्तनी सुधार दिया हूँ :)

Arvind Mishra said...

मैंने पिछली बार शायद यह पूछा था कि नील के पौधे का वानस्पतिक नाम क्या है ?
मेरा सवाल अब भी वही है!

PADMSINGH said...

.ललकारने के लिए कोई राजकुमार शुक्ल जैसा किसान नहीं है .......कोई गाँधी नहीं है....कोई ललकारता देहात नहीं है।
...... शायद आराम और सुविधाभोग ने भीतर के लाल को फिर नीला करना शुरू कर दिया है...
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कल ही कमलाकांत त्रिपाठी की पुस्तक 'पाहीघर' पढ़ रहा था... नेतृत्व के अभाव मे किसानों द्वारा किए गए कई विद्रोह कुचल दिये गए... उस समय की अकुलाहट और सामाजिक स्थिति का बड़ा सजीव चित्रण है पुस्तक मे।

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

मुझे इसका वानस्पतिक नाम तो नहीं पता है। नेट पर सर्च करने पर Indigofera tinctoria के रूप में पढ़ने मिला।

डॉ. मनोज मिश्र said...

बढ़िया चित्रण किया है,आभार.

अनूप शुक्ल said...

टिप्पणी पुनर्प्रकाशन!

बहुत सुन्दर लेख। रिपोर्ताज। ललकारता लेख। फ़टकारता रिपोर्ताज। जय हो।

Udan Tashtari said...

सुपर्ब!!! बेस्ट ऑफ पंचम दा...

Anu Singh Choudhary said...

सतीश जी, बहुत बढ़िया रिपोर्ताज। नील के इलाके में ब्याही गई, बल्कि रेणु जी के शहर में... लेकिन आज नई निगाह से इतिहास को देखा। वरना तो जो इतिहास हमें विरासत में मिला है उसको हम for granted लेकर चलते हैं कई बार... रिपोर्ट की पहली पंक्तियां मेरे लिए deja vu है, ऐसे ही मैं भी पहली बार पूर्णिया पहुंची थी तो घूंघट के पीछे से नील के हौदे दिखाए गए थे। :) वैसे देहात तो शहर बन ही गए हैं सतीश जी, हम शहरी नहीं हो गए क्या?

Kajal Kumar said...

इतिहास के झरोखे से बर्तमान की तह तक. सुंदर आलेख.

anshumala said...

किसानो को आर्थिक मदद नहीं दी गई है उनके कर्ज माफ़ किये गए है ये किसानो को राहत नहीं दी गई है राहत तो उनको कर्ज देने वाले बैंको को दी गई है जो दिए कर्ज वसूल न कर पाने से संकट में थे | खेती के लिए समिचुत संसाधन अच्छे बीज से ले कर सिचाई की सुविधा तक की व्यवस्था और उनकी उपज का सही मूल्य मिल जाये तो उन्हें किसी से शायद कर्ज लेने क आवश्यकता ही न पड़े |

सतीश पंचम said...

अंशु जी,

आपकी बात से पूर्ण रूप से नहीं किंतु आंशिक रूप से जरूर सहमत हूं।

दरअसल ढेर सारे किसान तो ऐसे हैं जिन्हें बैंकों ने उनकी मालमत्ता देख, उनकी वापसी करने न करने की संभावनाओं को देख पहले ही मुंह मोड़ लिया....कर्ज देने से मना कर दिया और मजबूरन उन्हें निजी साहूकारों से ज्यादा ब्याज पर कर्ज लेना पड़ा।

ऐसे ढेरों किसानों की कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है क्योंकि जबर लोग साहुकार ठहरे.... स्थानीय रसूख तो है ही....

फिर इसी किस्म का ही रसूख था 1917 के समय भी जिसके दम पर ब्रितानी सरकार तब चल रही थी।

प्रवीण पाण्डेय said...

देहात की ललकार तो टैम्पों की पों पों में गुम हो गयी है।

खुशदीप सहगल said...

सतीश जी,

सिम्पली जस्ट हैट्स आफ टू यू...

प्रणब बाबू ने इस बार के बजट में किसानों को कर्ज देने का टारगेट पौने पांच लाख करोड़ रखा है...पिछले साल से एक लाख करोड़ ज़्यादा...लेकिन यही समाधान है तो पिछले साल पौने चार लाख करोड़ के टारगेट के बावजूद 22,000 से ज़्यादा किसानों ने खुदकुशी क्यों की...ये जवाब प्रणब बाबू ने बजट में नहीं दिया...

जय हिंद...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

ऐतिहासिक? सामाजिक? कुल मिलाकर गज़ब की पोस्ट। आज के समय से तुलना प्रासंगिक है। हमें कम से कम मानवता के मामले में तो इतिहास से सबक लेना ही चाहिये।

<>@ नील के पौधे का वानस्पतिक नाम क्या है ?

निम्न लिंक पर पत्तियों के चित्र के साथ ही पौधे के कुछ नाम भी हैं: नील, नीलिनी, इंडिगो (और जैसा कि पंचम जी ने कहा - Indigofera tinctoria)

मनोज कुमार said...

सुंदर शब्द चित्र।
विचारोत्तेजक रचना।

ZEAL said...

गाँव की रूप-रेखा का बेहतरीन चित्रण ।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

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