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Friday, March 4, 2011

बदनाम गली से गुज़रते हुए.......जैसा देखा....जैसा समझा.....

   
        मेरी  बस जैसे ही रेडलाईट एरिया से होकर गुजरने को हुई, बस में बैठे सभी लोगों की नजरें बाहर की ओर टंग गईं। सडक के दोनो ओर वैश्याएं विभिन्न ढंग से ग्राहकों को अपनी ओर लुभाने की कोशिश कर रही थीं। कोई पान खाए दांत चिआरे ग्राहक को बुला रही थी तो कोई अपनी शेवन आर्मपिट को दिखाने के लिये  अपनी बाहों को बार बार उठा अपने खुले बालों को बाँधने का उपक्रम कर रही थी। किसी किसी जगह पर दो से चार वैश्याएं झुंड बनाकर बैठी थीं। उनके बैठने के तरीके अलग अलग थे। कोई साडी के पल्लों को  एक विशेष रूप से रख  ग्राहक बटोरती तो कोई स्लीवलेस पहने कँखौरियों को दिखाने को तत्पर दिखी तो कोई  यूँ ही हँसी ठिठोली करती हुई। कुछ ग्राहक वैश्याओं से मोलभाव भी करते दिखे।   
    
गुलज़ार  
     ट्रैफिक स्लो होने के कारण बस में बैठे लोग इन नजारों को जम कर देख ताक रहे थे FM पर सदाबहार गाने बज रहे थे।   वहीं, बाहर सडक पर कई लोग जो दलाल टाईप लग रहे थे, रूमाल को गर्दन में कॉलर के किनारे लपेटे.....मुंह में पान दबाये, हाथ की तर्जनी उंगली से चूने की परत खरोंचे हुए ग्राहकों को फांसने की फिराक में लगे। इन्हें देख गुलजार का लिखा कमीने फिल्म का गीत सटीक लगा.....सौदा करे सहेली का, सर पर तेल चमेली का ..........कि आया....कि आया भौंरा आया रे....गुनगुन करता आया रे..........

             इन्हीं सब नजारों के बीच से बस गुजरती हुई अपने गंतव्य कस्तूरबा गाँधी चौक पहुँची। पास ही की लेन में हिंदी गृंथ कार्यालय वाली दुकान थी। दुकान में घुसने पर पिछले नजारों से अलग दुनिया दिखी। कहीं पर अज्ञेय दिखे तो कहीं प्रेमचंद, एक ओर 'गुनाहों का देवता' सजी थी, तो एक ओर 'सारा आकाश'। वहीं, फणीश्वरनाथ रेणु के'मैला आंचल' के बगल में 'चरित्रहीन' भी लगी थी। कहीं पर मैत्रेयी पुष्पा की 'इदन्नमम' दिखी तो कहीं पर चित्रा मुदगल की 'आँवा'। बगल में ही 'वेद-पुराणों की मिमांसा' भी दिख गई। इन ढेर सारी क्लासिक रचनाओं और सरस्वती के भंडार को वैश्यालयों से कुछ ही फर्लॉंग की दूरी पर स्थित होने से  मैं सोच में पड गया कि क्या ही अजीब स्थिति है। एक ओर सरस्वती जी का भवन हैं तो पास ही में नरक भोगती महिलाओं का इलाका, जो न जाने किस पाप की गठरी को ढो रही हैं। एक ओर ज्ञानदायिनी भवनिका और दूसरी ओर चंद चहल-कदम ही दूर स्त्रीयों के नारकीय ठीये।  अजब मेल है।
  
 तभी मेरे जहन में फिल्म 'अमर प्रेमका वह दृश्य कौंध गया जिसमें दुर्गा मूर्तियों की स्थापना के लिये वैश्याओं के घर की देहरी से मिट्टी लेने की प्रथा को दिखाया गया है।   फिल्म में मूर्तिकार   से कोई प्रश्न करता है कि दुर्गा जी तो पवित्र हैं, फिर उनकी स्थापना के लिये इन बदनाम जगह वालियों के देहरी की मिट्टी क्यों ली जाती है तब मुर्तिकार कहता है कि इन लोगों के यहां की मिट्टी बहुत पवित्र होती है। ( ऐसा माना जाता है कि जो भी लोग इन वैश्याओं के यहां जाते हैं वो अपने सभी सदगुण उनके दरवाजे पर छोड़ देते हैं उसके बाद ही अंदर जाते हैं,संभवत:वैश्याओं की देहरी वाली माटी के पवित्र होने का यही मानसिक कारण हो)....प्रथानुसार, बिना इस जगह की मिट्टी लगाये दुर्गा जी की मूर्ति स्थापना नहीं की जाती

 ए बाबू मोशाय, कहीं आप उस भद्र समाज से तो न...


   
    कैसा संजोग है, कि सरस्वती जी और दुर्गा जी का। एक शक्ती दायिनी हैं तो दूसरी ज्ञानदायिनी। जैसे दुर्गा जी को बदनाम गलियों की मिट्टी से स्पर्श पूजन की परंपरा है, वैसे ही शायद साहित्यिक कृतियों के रूप में सरस्वतीजी भी  बदनाम गली की देहरी को  छूती दिख रही हैं। न जाने कितनी उच्च स्तर की साहित्यिक कृतियां इन बदनाम गलीयों की बदौलत ही लिखी जा चुकी हैं। वैश्याओं की देहरी फिर अपनी मिट्टी का मान रखने में कामयाब रही लगती है।

     फणीश्वरनाथ रेणु की 'जूलूस' लेकर लौटते समय फिर वही दृश्य दिखे। ट्रैफिक और भी स्लो हो गया था। गहराती शाम देख वैश्याओं की संख्या और भी बढ आई थी। दलाल और ग्राहक सभी जैसे इसी वक्त को पाने में बेताब थे, मानों शाम कोई उत्सव लिये आ रही हो।  तभी मेरी नजर वैश्याओं के बीच बैठी एक बेहद सुंदर स्त्री पर पडी। शक्ल से वह कहीं से भी वैश्या नहीं लग रही थी. चेहरे पर मासूमियत, साडी के किनारों को उंगलियों में लपेटती खोलती और एक उहापोह को जी रही वह स्त्री अभी इस बाजार में नई लग रही थी। कुछ ग्राहक उसकी ओर ज्यादा ही आकर्षित से लग रहे थे। मेरे मन  में विचार उठा कि आखिर किस परिस्थिती के कारण उसे इस नरक में आने  की नौबत आन पडी होगी। इतनी खूबसूरत स्त्री को क्या कोई वर नहीं मिला होगा। मेरी लेखकीय जिज्ञासा जाग उठी। मन ने कहा........ यदि यहां की हर स्त्री से उसकी कहानी पता की जाय तो हर एक की कहानी अपने आप में एक मानवीय त्रासदियों की बानगी होगी। न जाने किन किन परिस्थितियों में यह स्त्रीयां यहां आ पहुँची हैं। कोई बंगाल से है, कोई तमिलनाडु से है तो कोई नेपाल से है। हर एक की कहानी अलग अलग है, पर परिणाम एक ही। हर एक पर कहानी लिखी जा सकती है।  

       तभी मुझे अमरकांत रचित 'इन्हीं हथियारों से' उपन्यास की लाईनें याद आ गईं जिसमें कोठा मालकिन अपने यहां की लौंडी को ग्राहकों से सावधान रहने के लिये ताकीद देती  है, कि इन  ग्राहकों को कभी अपने दिल की बात नहीं बतानी चाहिये। और न तो कभी दिल  देना चाहिये। यहां जो आते हैं सभी अपने मतलब से आते हैं। इन ग्राहकों में शराबी, जुआरी, लोभी, दलाल, कवि, लेखक सभी तो होते हैं। इनके चक्कर में नहीं फंसना चाहिये।

      अब समझ में आया कि कवियों और लेखकों को क्यों अमरकांत जी ने जुआरियों, शराबीयों और लोभियों की कोटि में रखा था। वैश्यालयों से कवियों और लेखकों को अपनी लेखकीय नायिका के चरित्र ढूँढने में सहायता जो मिलती थी। 
  
        इन्हीं सब बातों को सोचते हुए बस  जाने कब वैश्याओ के इस बदनाम इलाके को छोड मौलाना आजाद रोड पर  गई थी। मैंसोच में था। कैसी विडंबना है कि एक ओर भारत के पहले शिक्षामंत्री मौलाना आजाद के नाम सडक है वहीं दूसरी ओर साहित्य सरिता........... इन दोनों के बीच में शिक्षा व्यवस्था को मुँह चिढाता लेदर करेंसी का ठीया। 

  उधर एफ एम चैनल पर गानों के बदले अब मुख्य  समाचार पढे जा रहे थे। बराक ओबामा से प्रधानमंत्री की मुलाकात .........सुरक्षा व्यवस्था पर गहन चिंतन.. ......  राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने आज सुखोई विमान उडाया..........।

-  सतीश पंचम

12 comments:

Udan Tashtari said...

बेजोड़......


याद आता है कभी इसी बाजार को उड़न तश्तरी की सोच पर लाया था...

http://udantashtari.blogspot.com/2009/07/blog-post_09.html

अनूप शुक्ल said...

अच्छा लिखा है। सुन्दर!

Rahul Singh said...

रोचक विचार यात्रा.

सोमेश सक्सेना said...

दिलचस्प! एक बहुत पुराना गीत याद आ गया-

औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया।
जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा दुत्कार दिया।

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत बढ़िया चित्रण-वाह.

सञ्जय झा said...

..........
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1993 ke ek sham kolkatta ke golden
garden kuch chacha type logon ke sath
anjane me usi raste bus pe sabar ho
kar gujre.....laga koi tyohar hoga
bengaliyon ka.....

basa aane par pata chala hum kis ra
se gujre hain.....aur yaad ata gaya
o najare jo apne likha hai.....

subah uthne par pata chala rat se
hi kafi bukar hai......

o haw-bhaw aaj bhi sihran paida
karta hai......

pranam......

Arvind Mishra said...

बहुत भावपूर्ण -मैं मुम्बई १९९१-९३ के बीच था फिर लौट के नहीं गया -खैर वो अलग कहानी है ..
उसी समय फाकलैंड नामक देश किन्ही राजनीतिक कारणों से चर्चित था ..जब लोग फाकलैंड बोलते तो मैं वही समझता :)
और वैसे भी इसे फकलैंड कहना था .....
वैश्याओं पर अमृतलाल नागर ने ये कोठेवालियां लिखा था -
साजे सुखन से देह तक का सौदा सचमुच बड़ा त्रासदपूर्ण है मगर इसके लिए क्या केवल पुरुष ही जिम्मेदार है ..
मेरी संकल्पना है कि कुछ महिलाओं में बहुल पुरुष गामिता की प्रवृत्ति होती है और वे स्वभावतः स्वच्छंद स्वभाव की होती हैं और दुर्भाग्यवश वे इस
दुश्चक्र में फंस जाती है .....जहाँ से निकल पाना संभव नहीं -आज महानगरों में तथाकथित अभिजात्य वर्ग की पीढ़ियों में यह एक शौक का रूप ले रहा है
खबरे हैं वे काफी समृद्ध घरों से हैं -हाई सोसाईटी ...!
अब गलत /बुरा क्या है अच्छा क्या है इसका निर्धारण देश काल परिस्थिति के अनुसार लोग करते हैं -मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना!

anshumala said...

इनमे से ज्यादातर को नौकरी की लालचा, प्यार का झासा दे कर छोटे छोटे शहरों गांवो से यहाँ ला कर बेच दिया जाता है कुछ तो नाबालिक होती है | कई समाज सेवी संस्थाओ ने यहाँ से नाबालिको आदि को छुड़ाया है किन्तु उनमे से ज्यादातर अपने घर वापस नहीं जाना चाहती या घर वाले ही उन्हें वापस नहीं ले जाते है | कुछ समय पहले पढ़ा की की एक लड़की जो वहा तुरंत ही बेचीं गई थी ने अपनी कहानी एक ग्राहक को बताई और उसने पहले उसके भाई को फोन किया फिर पुलिस की मदद से उसे वहा से छुड़ाया |

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

एक बार मुझे भी उधर से गुज़रने का इत्तफाक़ हुआ.. सोचा मण्टो दिख जाएँ.. "हतक" और "काली शलवार" ज़हन को ठण्डा एहसास देकर निकल गई!!

rashmi ravija said...

( ऐसा माना जाता है कि जो भी लोग इन वैश्याओं के यहां जाते हैं वो अपने सभी सदगुण उनके दरवाजे पर छोड़ देते हैं उसके बाद ही अंदर जाते हैं,संभवत:वैश्याओं की देहरी वाली माटी के पवित्र होने का यही मानसिक कारण हो).

यह बताकर बहुत ही बढ़िया किया....मेरे मन में हमेशा यह बात उठती थी ....ऐसी प्रथा क्यूँ है??...हाल की फिल्म 'देवदास' में भी इसका जिक्र है...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

@प्रथानुसार, बिना इस जगह की मिट्टी लगाये दुर्गा जी की मूर्ति स्थापना नहीं की जाती ...
मालूम नहीं कि निर्देशक, पटकथा/सम्वाद लेखक का
मोटिवेशन क्या था मगर सच्चाई यही है कि परम्परागत मूर्तिकार ऐसी किसी परम्परा से नहीं बन्धे हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

एक ही जगह पर न जाने कितने उपन्यास, फिल्में और कहानियाँ दिख गयीं आपको।

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