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Wednesday, March 2, 2011

ढेलेदार तैयारी ऑफ आई ए एस, पीसीएस, मास्टरी, फास्टरी.......एण्ड गदेलाईजेशन :)


    ये तब की बात है जब मैं  कुंभ के मेले के दौरान इलाहाबाद गया था और उसी दौरा्न कुछ अपने अनुभव लिखे थे एक पोस्ट के रूप में। वही पोस्ट अब 'बेस्ट ऑफ सफ़ेद घर' श्रृंखला के तहत चुन कर री-पोस्ट कर रहा हूँ.......

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      स बार इलाहाबाद में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के यहां जाने का मौका मिला अल्लापुर में । उनके रहने के तौर-तरीकों को ध्यान से देखने में कई अलग चीजों से वास्ता पडा। इन्हीं में से एक जगह मसाला कुचकुचाते रामकिसुन मिल गये। एक गिलास में हरा धनिया, लहसुन, मिर्च डालकर उसे बेलन से गिलास में ही कुचकुचा रहे थे। बगल में ही रेडियो पर बज रहा था - राम करे ऐसा हो जाये......मेरी निंदिया तोहे .....

        वहीं एक तरफ दीवाल पर सिंहासन पर बैठे हुए सम्राट अशोक का चित्र टंगा था । देखते ही लगता था कि कोई बंदा यहां पर सिविल सर्विसेस की तैयारी में सम्राट अशोक को आदर्श मान रहा है। जरूर IAS, PCS बनना चाहता है। दूसरी दीवाल पर नियॉन, ऑर्गन, क्रेप्टॉन से सुसज्जित Periodic Table । शायद Chemistry की तैयारी भी चल रही है।

          एक जगह घी, तेल, चावल, दाल आदि को रखे देखा। उन्हीं के बीच चॉक से लिखा था Welcome 2009. कुछ पुराने पोस्टर या चित्रों के फाडे जाने या हटाये जाने के अवशेष दिख रहे थे। एक जगह विवेकानंद का चित्र था। बगल में अखबार की कोई कटिंग चिपकी थी जिसमें एक शख्स की Black and White फोटो दिखी । पूछने पर पता चला एक बंदा यहां का सिविल सर्विसेस में चुना गया था। इसी कमरे में रहता था। सो, हम लोगों ने उसके सम्मान में अखबार में आये उसके चित्र को कटिंग कर यहां चिपका दिया है। छात्रावास मैनेजर कमरा देने से पहले ही हिदायत दे देता है, इस कटिंग को हटाना नहीं। दीवाल पर चिपके रहने देना है।
       
       तहरी बनाई जा रही थी। उन्हीं सब के बीच कुछ हंसी-मजाक वाला बतकूचन भी चल रहा था। विषय था कौन....कहां.....क्या........कैसे..... । हर बात के पीछे हंसी ठट्ठा जमकर हो रहा था।

       एक बोले - अरे रामकिसुन जी, आप तो खाली एक अढैया खा लोगे और लगोगे सोने। थाली भी नहीं सरकाओगे कि कम से कम वही सरका दें। बाद में भले सुबह उठ कर सूखी कटकटा गई जूठी थाली को एक घंटा मांजोगे।

      - अरे तो क्या हुआ। मांजते तो हैं न। मेरा तो ये मानना है कि खाना खाओ तो वहीं सो जाओ। थाली सरकाना मतलब एहसान फरामोश हो जाना है। कि, खा लिये और सरका दिये।

       मैं रामकिसुन जी की खाना खाने और थाली न सरकाने के पीछे छुपे दर्शन को देख थोडा दंग था। हंसी-मजाक भी दर्शनशास्त्रमय हो उठा। तभी एक और विषय उठा - नमक । दरअसल बगल के कमरे से कोई छात्र नमक लेने आ पहुँचे। उनके यहां नमक खत्म हो गया था। मैंने देखा नमक के नाम पर बडी-बडी डली थी डिब्बे में । मैं पूछ बैठा - अरे भई, ये तो पहले पुराने समय में मिलने वाला नमक है, बडे-बडे ढोके वाला। अब भी मिलता है क्या। ये तो आयोडाइज्ड नमक नहीं है।

  एक बोले - यहां किसको बच्चा होने जा रहा है जो आयोडीन वाला नमक खाये।

सभी फिर एक बार ठठाकर हंसे ।

    अरे भई, सस्ताहवा नमक लिये, ढेला फोडे, डाल दिये। एतना सोचने लगे तो कर लिये तैयारी कम्पिटीशन की।

फिर भी,   क्या अब भी ये मिलता है, मैंने तो समझा था बंद हो गया होगा।

    बंद तो नहीं हुआ लेकिन अब भी बडे-बडे डली या ढेले के रूप में गांव देहात में बिकता है। गांव से आ रहे थे तो मय झोला-झक्कड यह ढेलेदार नमक भी टांग लाये थे।

    दूसरे छात्र बोले - अरे बस नमक। और वो ससुराल से खटाई और घी लेते आये वह क्यों नहीं बताते।
पता चला जिस छात्र के बारे में बातें हो रही थीं उसकी शादी हो चुकी है और दो बच्चे भी हैं। पत्नी सुदूर देहात में अपने दो बच्चों के साथ है और ये महाशय यहां कम्पिटीशन की तैयारी कर रहे हैं। पत्नी का चयन शिक्षामित्र के रूप में गांव में हो गया है और कुछ खर्चा पानी घर का वह ही उठाये हुऐ हैं।

      तो बात चल रही थी नमक के ढेले पर। कि......नमक का ढेला फोडा, दाल में डाला, दाल तैयार। तभी एक गांव-देहात का एक छात्र मजे लेकर कुछ गाने लगा। प्रहलाद नामक एक छात्र को चिढाते बोला -
अरे कहा है न-

हाय राम,
आईल कइसन बेला,
हमरे नौ-नौ गदेला* 
बलम मोरे फोडें ढेला..... बलम मोरे फोडें ढेला

* गदेला =  बच्चे

     उसका इतना कहना था कि सब लोग फिर एक बार हंस-हंसकर लोट पोट होने लगे। दरअसल यह गीत बिरहा वाला गीत है और एक पत्नी के दर्द को बयान कर रहा है कि मेरे नौ-नौं बच्चे हो गये हैं और आमदनी का ये हाल है कि पति मेरे ढेला फोडने वाला काम कर रहे हैं। ढेला फोडना यानि निरर्थक काम करना।

      मैं भी सोच में पड गया कि यार ये तर्ज तो काफी छांट कर लाया है पट्ठा। यहां तो सचमुच प्रहलाद पतिदेव घर से लाये हुए नमक का ढेला फोड रहे हैं, निरर्थक सरकारी नौकरी के लिये प्रयत्न किये जा रहे हैं जिसकी आशा अब बढती उम्र के कारण क्षीण होती जा रही है और वहां पत्नी है कि अपने बच्चों को लेकर किसी तरह चल रही है।

      यह बैठकी काफी देर तक चली। अब तो पोस्ट भी लंबी हो चली है......चलिये बंद करता हूँ न आप लोग कहेंगे, क्या ढेलेदार पोस्ट है.....ससुर फोडते रह जाओ, कुछ न निकले :)

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां से इलाहाबाद के लिये इस्पेसल टरेनिया छोड़ने की कहिन हैं ममता देबी जी ......

समय - वही, जब इलाहाबाद के अल्लापुर में ठेले पर अखबार बेचता युवक आवाज लगाये - नया रोजगार समाचार आय गया है... IAS, PCS, कलेट्टरी, मास्टरी, BEd, MEd, .........लई लो.....रोजगार समाचार.....

  और तभी एक शख्स आकर पूछे -  वो 'जूता अभिचमक अधिकारी' वाली वेकेंसी नहीं आई क्या ?  कब से रूमाल खरीद के तैयारी कर रहा हूं......कि कहीं से औचक निरीच्छन हो....... और..... डट लूँ  :) 


17 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बडे शकुन का कार्ये करती हैं सफल बंदों की निशानियाँ। इलाहाबाद के कमरों में देखी हैं।

Arvind Mishra said...

वाह ,इलाहाबादी दिन साकार हुयी उठा -अल्लाह्पुर में आज भी कुछ नहीं बदला -नौकरी करने गया तो बस इन्ही शब्द चित्रों को फिर साक्षात पाया =कितनी ही तमन्नाएं यहीं मिट गयीं बिचारी अंगडाई भी न लेने पायी ...और हाँ कुछ ऐसे बने की बनाना सार्थक हो गया -राम करें राम किशन का दिन भी बहुरे .....

PADMSINGH said...

अरे गजबे कर दिये हैं पंचम जी ... एकदम सजीव चित्र खींच दिये हैं इलाहाबादी तैयारी का। इलाहाबाद मे यह भी एक काम जैसा ही है। शादी से पहले लड़की वाले पूछते हैं लड़का क्या करता है ... वो इलाहाबाद मे तैयारी कर रहा है। और तैयारी का ऐसा माहौल केवल इलाहाबाद मे और विशेष रूप से अल्लापुर(वर्तमान मे भारद्वाज पुरम) मे देखने को मिलता है। अपना भी चार पाँच साल अल्लापुर के किराये के मकान मे गुजरे हैं... मेरी यादों से वो दिन कभी नहीं उतरते... जब दुकान से बन मक्खन चाय के साथ खा कर पुलकेशिन द्वितीय को पढ़ते। कटरा का होटल वाला 20 रोटियों के आगे देने से कन्नी काटने लगता था ... हा हा हा ... बहुते गज़ब

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सुन्दर चर्चा। डर यही है कि इधर ये कलट्टर बने नहीं कि बेचारी शिक्षामित्र का पत्ता न कट जाये।

Kajal Kumar said...

मुझे तो आज तक समझ नहीं आया कि आख़िर इस मुइ सिविल सर्विस में रखा क्या है

सञ्जय झा said...

वो 'जूता अभिचमक अधिकारी' वाली वेकेंसी नहीं आई क्या ? कब से रूमाल खरीद के तैयारी कर रहा हूं......कि कहीं से औचक निरीच्छन हो....... और..... डट लूँ :)

KAMAL KI ASSEMBLING HAI BHAIJEE......
RAHPET DIYE ....... MASTATMAK.....

PRANAM.

डॉ. मनोज मिश्र said...

ई तहरी का आनंद तो पढ़ाई के दौरान इलाहाबादी जीवन में ही मिला ,अब तहरी में वह स्वाद नहीं मिलता.
बढ़िया लगी पोस्ट.

rashmi ravija said...

ये रीठेल जबरदस्त थी...
किन किन मुश्किल हालातों में पढ़ते हैं...ये घर से दूर रहनेवाले छात्र और घर वाले भी कितनी मशक्कतों से इन्हें पैसे जुगाड़ कर के भेजते हैं...
पर कई छात्र इसका बेजा फायदा भी उठाते हैं और यूँ ही समय गंवाया करते हैं.

मुंबई के लोग विश्वास नहीं कर पाते कि पच्चीस-छब्बीस की उम्र तक घर वाले खर्च उठाते हैं...(मैने उन्हें बताया नहीं कि कई बार तीस की उम्र तक भी तैयारी ही चलती रहती है...विभिन्न परीक्षाओं की )

सोमेश सक्सेना said...

हम तो सुने हैं कि कई लोग दस-दस, पंद्रह- पंद्रह साल तक तैयारी में ही लगे रहते हैं और कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि बाप-बेटा एक साथ ही तैयारी करते हैं। सही है क्या?

Abhishek Ojha said...

दिल्ली में भी ये डेरा जमता है. जूता अभिचमक, एकदम चकाचक शब्द है जी :)

संजय @ मो सम कौन ? said...

गुरू, हम भी तो यही कर रहे हैं, ढेला फ़ोड़ने का काम:))

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना, धन्यवाद
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें.

Rahul Singh said...

झाड़े रहो कलेक्‍टरगंज.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

...बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट। आनंद आ गया।

anshumala said...

जब बनारस में थे तो कई लोगो के बारे में सुने थे की इलाहबाद तैयारी के लिए गए है समझ नहीं आता था की बनारस का बुरा है किसी चीज की तैयारी के लिए फिर वहा खुला एक बड़ा कोचिंग संस्थान फिर इ धारा पलट गई दुसरे जिले के मेडिकल और इंजीनियरिंग वाले बनारस आने लगे | पर एक बात है मै जितने भी इन तैयारियों वालो को बस यु ही तैयारी करते जाते देखी सब के सब सिर्फ टाइम पास करते रहे बने कुछ नहीं | वैसे आप को बताऊ जो सच में कुछ पढ़ते है वो इस तरह से नहीं खाते पीते है मेरा भाई भी इंजीनियरिंग कर रहा था तो कहता था की हम लोग तो आराम से रोज पूरा और अच्छा खाना बना कर खाते है सबकी पारी लगती है |

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी की ई-मेल से प्राप्त टिप्पणी -

@ http://safedghar.blogspot.com/2011/03/blog-post.html

नरक के रस्ते का यह टुकड़ा याद आ गया:


”खेतों के उस पार खड़ा
रहता हरदम अड़ा अड़ा
सब कहते हैं ठूँठ ।


बढ़ कर के आकाश चूम लूँ
धरती का भंडार लूट लूँ
कितनी भी हरियाली आई
कोंपल धानी फूट न पाई
चक्कर के घनचक्कर में
रह गया केवल झूठ
सब कहते हैं ठूँठ।


हार्मोन के इंजेक्शन से
बन जाएगी पालक शाल
इलहाबाद के टेसन से
फास्ट बनेगी गाड़ी माल
आकाश कहाँ आए हाथों में
छोटी सी है मूठ
सब कहते हैं ठूँठ ।


गुलाब कहाँ फूले पेड़ों पर
दूब सदा उगती मेड़ों पर
ताँगे के ये मरियल घोड़े
खाते रहते हरदम कोड़े
पड़ी रेस में लूट (?)
सब कहते हैं ठूँठ”

अनूप शुक्ल said...

मजेदार पोस्ट!
कलेक्टरी ने हाय राम बड़ा दुख दीना। :)

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