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Monday, February 28, 2011

पूँछ उठावन.....री री री रीss रेssss ..... :)


      कभी-कभी पुरानी चीजों को झाड़ पोंछ कर निहारने में आनंद आता है, कुछ कुछ वैसा ही आनंद मुझे अपनी इन ग्राम्य सीरीज़ की पोस्टों को पढ़ते समय मिल रहा है, और इसी के चलते रीठेल श्रृंखला के तहत पेश है वही बतटोवन पोस्ट......जिसे पढ़ते हुए कुछ यूं लगा जैसे कोई गँवई मनई साईकिल चलाते हुए ....आस पास किसी को न पा.....सूनसान राह घाट देख लंबी तान छेड़ते हुए गाये............ रीss रीss रीss......रीss  रेsssss ........ :)
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       गाँवों में कई कहाँनिया...कई बातें....कई गोपन छिपे होते हैं.....आराम कर रहे होते हैं.....जिन्हें यदि खुलिहार दिया जाय तो ढेर सारी बातें उघड़कर सामने आ जांय ..... मानों वह बातें खुलिहारे ( छेड़े) जाने का ही इंतजार कर रही हों।

      ऐसी ही एक दिलचस्प घटना मेरी ग्राम्य यात्रा के दौरान घटी जब भरी दुपहरी एक जगह जनगणना कार्य के दौरान फार्म में किसी महिला का नाम लिखने की बारी आई। महिला का नाम और उम्र का कॉलम लिखने के दौरान बात चली कि फलांने की पत्नी का क्या नाम है..... यह कौन गाँव से ब्याहकर आई हैं ...... मायका किधर से  हैं......। पूछने पछोरने पर घरवाले कुछ असहज से  हो गए और बात को वहीं खत्म किया गया।

  बाद में एक साथी से पूछा तो पता चला कि यह महिला पूँछ उठावन टाईप है।

 सुनकर एक बार झटका सा लगा कि.... क्या कहा जा रहा है ....पूँछ उठावन ?


        ज्यादा कुरेदने पर पता चला कि फलां महिला की यह चौथी या पांचवी शादी है। इसके पहले की शादियां उसके चाल चलन और संबंधों के कारण न टिक पाईं।  कई लोगों से संबंध की जानकारी होने पर छुटा छूटी हो गई।

तो इस घर में विवाह कैसे हो गया ?

  इस घर में इसलिए विवाह हो गया क्योंकि लडके की उम्र निकली जा रही थी.....कोई इसे अपनी लड़की देने को तैयार न था......लड़के का घर भी कुछ ठीक नहीं ....और ऐसी ही तमाम बातें थी...जिस वजह से लड़के ने जैसे तैसे विवाह कर अपनाया.....और एक तरह से द्विपक्षीय उद्धार किया गया। 

अब ?

 अब दोनों जन कहीं बाहर शहर वगैरह में रहते हैं.....लडका कहीं छोटा-मोटा.... काम-ओम करता है मिस्त्री वगैरह वाला।

  यह सब बातें जानकर एक बारगी लगा कि यार यह गॉसिप है या सच.....लेकिन गाँव वालों की बातें.......।

 आगे एक जगह जाने पर सभी घरवालों का नाम आदि लिखा गया...चलने को हुए तो एक जन ने कहा कि फलांने का नाम छूट रहा है। घरवाले ने एतराज किया कि उनका नाम क्यों लिखा जाय....कल को कहीं कानूनी पचड़ा न आ जाय।

 बात खोली गई तो पता चला कि घर मालिक  की साली का तलाक हो गया है और उसे अपनी बहन के यहां यानि इस घर में रहना पड़ रहा है। अब ऐसे में जनगणना में मकान नंबर....परिवार के मेंम्बर आदि लिख देने पर कहीं को कल साली के बच्चों वगैरह को लेकर कोई कानूनी पचड़ा न आ जाय। इस डर से घर मालिक हिचकिचा रहे थे नाम लिखवाने में। तब उन्हें समझाया गया कि कोई कानूनी पेंच इस जनसंख्या फार्म से नहीं आने वाला क्योंकि इसमें रिश्ते वाले कालम में साफ साफ लिखा जायगा कि - मुखिया की पत्नी की बहन

 सो यह सब लिख-उख कर काम चलाया गया।

     लेकिन इसी मकान नंबर पर छिड़े बहस पर बात ही बात में एक और दौर हंसी मजाक का भी चला।

 किसी ने कहा कि -  सुनने में आया है कि जनगणना वाले लोगों से यह कह कर पैसे लेते हैं कि लाईए आप का मकान नंबर सोझ  ( ठीक)  कर दूँ ताकि जो आपके भाई से मुकदिमा वगैरह चल रहा है....आपके फेवर में हो जाय। थोड़ा खर्च वर्च हो जाय बस।

  वहीं किसी ने कहा कि-  कुछ लोग तो सामने से आकर कहते हैं कि भाई मेरा यह मकान नंबर वगैरह डाल दो....सौ-पचास ले लो और क्या।

 यह बातें मजाक मजाक में ही लोग बोल रहे थे और कहीं खूब हंसी ठट्ठा हो रही थी।

 बात की बात मे इंसानों की दो कैटेगरी मान ली गई ।

 जो लोग प्रगणक के कहने से पैसे देते हैं कि इससे उनका काम हो जायगा वह - जाहिल और जो लोग सामने से आकर प्रगणक को पैसे का लोभ देते हैं वह - चालू

   तो भईया....यह तो मजाक मजाक में हुई बातें थी....लेकिन कहीं न कहीं यह होता तो होगा ही......मेरे गाँव में नहीं तो किसी और के गाँव में........तभी तो गाँव वाले आपसी हँसी-पडक्का में यह बातें कह सुन रहे थे।

 आगे और जाने पर ऐसी न जाने कितनी दिलचस्प बातें.....दिलचस्प किस्से सुनने मिलते लेकिन एक तो भरी दुपहरी और उपर  से भूख की कुलबुलाहट ने घर लौटने की इच्छा जागृत की।  अगले दिन मुझे वापसी के लिए ट्रेन भी पकड़नी थी। सो लौट पड़ा गमछा बाँधे-बाँधे ।

  लेकिन इतना तो तय है कि यदि साहित्यकार, रिपोर्टर, लेखक आदि कभी कहानी का रोना रोएं.....रोचकता की कमी का रोना रोएं तो एक बार उन्हें जरूर किसी इस तरह के अभियान में साथ हो जाना चाहिए.....। परिवार.....बिखराव....प्रेम प्रपंच.....और ऐसे तमाम मुद्दे हैं जो उन्हें  यहां से सीधे सीधे गाँव के जरिए कन्टेंट दे सकते हैं.....लेकिन बात वही है कि एसी ऑफिस का सुख छोड़कर .....लूची वाली आँच झेलने के लिए यह जमहत कौन उठाए ?

    मीडिया में जो चल रहा है....जैसा चल रहा है चलने दिया जाय.....यू ट्यूब से कंटेंट देकर....नाग नागिन के विवाह दिखाकर....चमत्कार महिमा बताकर.....गणेशवाणी सरीखी बातें बताकर.....काली गाय को पके आलू खिलाकर.....कल्याण कराकर........या फिर सल्लू.....कैट के किस्से सुनाओ.....की फर्क पैंदा ए.....चल्लण दो ऐंवे ही :)


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ रहकर  गुलजार लिखते हैं...... चाँद की गठरी....सर पे ले ली....आपने ये कैसी जहमत दी हैss.....पहली बार मुहब्बत........

ये आँखों की ज़द और ये गमछे के साये  :)
समय - वही, जब चाँद की गठरी उठाकर कोई चला जा रहा हो और धरती रास्ता रोक कर कहे- कभी मेरी भी गठरी उठा कर देखो......चाँद से  छह गुना भारी है।

( अपनी आँख की जद तक गमछा बाँधे हुए मैं भरी दुपहरिया गाँव गाँव तस्वीरें लेते हुए जब घूम रहा था तब उसी दौरान साथ चल रहे प्रगणक ने मेरी भी एक तस्वीर खेंच ली.... गमछा बाँधे हुए ये मेरी वही तस्वीर है )



( ग्राम्य सीरीज चालू आहे......)

16 comments:

Rahul Singh said...

हमने पहली बार पढ़ी, क्‍या खूब कहानी निकली है.

PADMSINGH said...

जनगणना की धूम आज खतम हुई.. अभी परसों ही मलिन बस्ती के मालवीय परिवार से कोई पूछ रहा था। शादी हो गयी है ? नहीं? बच्चे कितने?... अच्छा इस शहर मे क्या करने आए... नौकरी करने? या सादी कर के? या परिवार के साथ। शादी कित्ते उमर मे हुई...लिख दो पंदरा सोला... नहीं, अठारा लिखो...

डेट आफ बर्थ बताओ चाची?... का??... जनम कब हुआ... हम्मे का पता... !!!

प्रवीण पाण्डेय said...

मीडिया, फिल्म और पूँछउठावन, इन पर एक पोस्ट ग्राम्य सीरीज़ के बाहर भी बनती है।

Udan Tashtari said...

रीठेल सुखद रही, अतः मुबारक.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

गमछे वाला फोटू गजबे है भैया!

सञ्जय झा said...

aisi re-thel antaral par milti rahe......

pranam.

anshumala said...

गांव में कुछ महिलाऊ को लेकर वास्तव में ऐसे ऐसे किस्से होते है की सुन कर लगता है की फ़िल्मी गासिप से ये कही भी कम नहीं है और कुछ बातो से लगता है की क्या इन्हें वास्तव में इतनी आसानी से बेफकुफ़ बनाया जा सकता है | इ तो मार्डन गमछा है असली तो उ लाल रंग का चेक वाला होता है |

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

आपने सही पहचाना, इस गमछे को मॉडर्न ही कहना चाहिये क्योंकि असली वाला तो लाल/ नीले रंग के चेक वाला होता है जिसे कि अपने कंधे पर रखे हुए लोग अक्सर गांवों में दिखाई देते हैं, फिर भले धूप हो या न हो, कुछ काम हो या न हो लेकिन कंधे पर जरूर होना चाहिये।

अब तो गमछे का चलन धीरे धीरे कम होते जा रहा है। जो गमछा होता भी है तो गर्मी आदि में धूप से बचाव हेतु।

सतीश पंचम said...

राहुल जी,

इस तरह की पोस्टों की 'रीठेल श्रृंखला' चलाने के पीछे उद्देश्य ही यह था कि जो लोग अब तक न पढ़े हों या जिनसे छूट गया हो वह भी पढ़ लें :)

विशेषत: वह पोस्टें, जो मुझे बेहद पसंद हैं या जिनसे मैं सीधे तौर पर जुड़ा हूं :)

सुशील बाकलीवाल said...

पूंछ उठावन का परिचय बठिया लगा ।

इंदु पुरी गोस्वामी said...

हम भी घूम आये पूरे गाँव में. पर -'ए भाई! ऐसी उलटी सीधी बाते ना करो प्रगणकों के लिये .काहे के पैसे लिए होंगे?और तुम्हारे गाँव वाले भी ना अब मासूम नही रहे.बेच खाए शहर वालों को.ये ऐसे देंगे? देंगे? सच्ची? हाय तो मेरी ड्यूटी वहाँ लगवा देते न् कम से कम तुम से ही दो चार सौ झपट लेती.
हा हा हा
फोटो में बड़े जम रहे हो बाबु!

इंदु पुरी गोस्वामी said...

हाँ मैंने गांवों को बहुत करीब से देखा है और जिस गाँव में कीचड से हो के जाती थी उस गाँव से बदली हुई तो पक्की सड़कों से गुजरी.और वहाँ की विधवाओं,विकलांगों के लिए,सडको,एनिक्ट्स बनाना जैसे हर काम में अपनी आत्मा की संतुष्टि के लिए खूब और खूब किया. किन्तु ये किसी के सग्गे नही होते.इन्हें इनके पास बैठ कर फ़ालतू की बकवास तेरी मेरी करने वाले ज्यादा सुहाते हैं.इन्हें इससे कोई लेना देना नही कि किसी टीचर ने आ के इनके बच्चो की पढाई का स्तर सुधारने के लिए कितनी मेहनत की.
कब ये आपके विरुद्ध खड़े हो जाए और हंगामा कर दे कुछ नही कह सकते.
एक दो बेड एलिमेंट्स के सामने सारा गाँव चुप्पी साध लेता है.
हा हा हा किन्तु.... जब मैंने ही खुद को नही बदला अब तक तो ये क्यों बदलेंगे खुद को.
हा हा हा हा
मैं तो ऐसीच हूँ और रहूंगी पर ...आपको पढ़ना अच्छा लगता है.एक सीधा सादा आदमी जो जो सच है वो बोलता,लिखता है.आपकी इस ईमानदार अभिव्यक्ति की मैं दिल से सम्मान करती हूँ.

डॉ. मनोज मिश्र said...

@पूँछ उठावन..
अब ई बोली भी विलुप्त होने के कगार पर ही है.
रोचक पोस्ट.

रंजना said...

यह सुखद सलोना ग्राम्य सीरीज चालू रहे .....पिलीज !!!

rashmi ravija said...

हमें तो पोस्ट पूरी की पूरी याद थी ...दुबारा पढ़कर भी उतना ही आनंद आया

अगर मुंबई के जनगणना वालों से मिलेंगे तो उनसे भी कई रोचक कहानियाँ मिलेंगी...मैने जैसे ही उनसे पानी के लिए पूछा...कई कहानियाँ सुनाने लगे कि लोग कितने रुडली पेश आते हैं...कुछ कह देते हैं..'ये कोई समय है आने का...मैं क्या कुछ बेचने आया हूँ..सरकार का काम कर रहा हूँ...दो घंटे लोकल में इतनी दूर से धक्के खा कर आ रहा हूँ'...आदि आदि....बेचारे भरे बैठे थे .

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बढिया रिठेल.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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