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Sunday, February 27, 2011

जनगणनात्मक मौसम की चहचह.....देशज हिलोर :)


     
     कल मेरे यहां जनगणना वाले आये थे......उनके पूछ पछोर को देख मैं भी थोड़ा सा जनगणनात्मक मूड़ में आ गया ......और इसी का असर है कि आज वही दुपहरीया वाली पोस्ट लिख रहा हूं जिसे लिखते समय मन गदगदायमान  हो उठा था ......कुछ कुछ प्रगणकों जैसी पूछायन प्रवृत्ति को धारण करते हुए........अमरीका इन माय विलेज  : )

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      जब गर्मी के मौसम में तपिश के साथ पछिवहीं लूची वाली आँच चेहरे पर पड़ती है तो लगता है जैसे चेहरे पर किसी वेल्डिंग नोजल का मुंह खोल दिया गया है। एकदम आग। रस्ता चलना दूभर ....... बाहर निकलने में जैसे पतंग पड़ी  है.....और ऐसी ही खड़खड़िया दुपहरी के समय मैं अपने गाँव में जनगणना करने वालों के साथ घूम रहा था।

      इतनी गर्मी में बाहर घूमना........कारण....... मेरी ललक......एक आकांक्षा.... कि... अपने गाँव वालों को ठीक से जान लूं.... पहचान लूं ।  यूँ तो मैं गाँव हर साल जाता हूँ लेकिन केवल राम-रहारी-जैरमी के अलावा मेरा गाँव वालों से कम ही वास्ता पड़ता है। कभी कभार शादी ब्याह पड़ने पर किसी के यहाँ न्योता-हकारी के लिए जरूर चले जाता हूँ लेकिन वह भी बहुत कम.....एक तो जब मैं आता हूं तब विवाह का सीजन या तो बीत चुका होता है या अभी आया ही नहीं होता.....सो जनगणना सर्वे के दौरान गँवई विजिट का यह अच्छा मौका था....सो चल पड़ा , बगल में कैमरा दबाए-दबाए ।

   वैसे इस बार जब गाँव गया था तो परिवार को...बच्चों को वापस लाने गया था.....स्कूल खुलने वाले थे । इधर ट्रेन पकड़ने से ठीक एक दिन पहले मैं जनगणना वाले प्रगणकों के साथ घूम रहा था। मन में शंका थी कि कहीं इस दुपहरी में टहलने से बीमार न पड़ जाउं और कल की यात्रा त्रासद न हो जाय और सबसे बढ़ कर कहीं किसी नाड़ाधारी डॉक्टर और गोले वाले डॉक्टर के यहाँ न जाना पड़ जाय। सो लूचही आँच से बचने का पूरा इंतजाम करते हुए सिर पर सफेद गमछा आदि बाँध कर निकला।

    सर्वे के दौरान पता चला कि किसी- किसी को अपने दादा-दादी का नाम ही नहीं पता...... तो किसी को ससुर या सास में से ही किसी का सही सही नाम  नहीं मालूम,  कोई कोई अपने पूरे परिवार के बारे में जानता तो है पर कन्फर्म नहीं है कि यही उनका ऑफिशियल नाम है......ज्यादातर लोग जनाब को बिजई.....गोबिन्द आदि नाम से जानते हैं पर स्कूल के रजिस्टर और जमीन जायदाद के कागजों पर क्या नाम दर्ज है इसके बारे में कुच्छौ  नहीं पता........ किसी को यदि पता भी था तो वह अपने मुँह से उन लोगों का नाम लेना हेठी समझता था।

 यह सब देख कर मैं सोचता हूँ कि हम किस बिना पर अपने किसी परिजन की अप्रिय हरकत पर नाम डुबा देने की शिकायत करते हैं जबकि लोगों को अपने से पहले की दो-तीन पीढ़ीयों तक के नाम का ही पता नहीं है। खाप पंचायतें किसका नाम खराब होने का रोना रोती हैं......किसके लिए और क्यों......।

  मन तो कह रहा है प्रार्थना करने के लिए कि -  हे खाप देवता.....यदि आपको अपनी औकात जाननी हो तो कृपया गाँवों का दौरा करें......नाम में क्या रखा है यह शेक्सपियर ने जरूर कहा था....लेकिन उसको अमली जामा भारत के गाँव पहना रहे है......किसका नाम डुबो देने की डुगडुगी खाप देवता बजाए जा रहे हो.....अब बंद भी करो खाप की थाप।      

    अगले घर में सर्वे एक आम के पेड़ के नीचे खटिया बिछाकर हो रहा है।  एक शख्स के जन्म तारीख के बारे में तो गाँव वालों का हिसाब है कि -  जब इनका जन्म हुआ तब रजई के बाबू शहर गए थे और खूब पानी बरस रहा था छकछकाय के।

      अब बताईए....कैसे पता लगाया जाय कि रजई की क्या उम्र है। ज्यादा पूछताछ करने पर इतना ही हिसाब लग सका कि फलाने देखने में चालीस ओलीस के लग रहे हैं और चूँकि रजई के बाबू जब शहर गए थे तो छकछका कर पानी बरस रहा था यानि सावन का महीना पकड़ लिया जाय.....चालीस जोड़ दिया जाय... हो गया उम्र का खाना पूरा।

चलो, अब इनका हुआ।

हाँ जी, आप बताईए......और..... क्या लिए हो गठरीया में।

दाना है

अरे तो रख दोगे कि सिर पर लिए खड़े रहोगे। मार के भागना है क्या  ?

उमिर..... लिखिए पैंसठ बरीस।

अच्छा........औ महीना ?

लिख दो जो समझ में आए।

ठीक......अब ये बताईये कि आपके घर में कितने दपंत्ति हैं।

धमपत्ती तो कोई नहीं है मेरे यहां।

अरे दादा....दंपत्ति माने..... विवाहित जोड़ा पूछा जा रहा है.....कि केतना लोग के बियाह हो गया है..।

अच्छा..... लिखिए चार गो.......

घर........नाबदान.......फोन........मोबाईल...........कार......और क्या क्या है...........घर खपड़े वाला है कि पक्का।

अरे एतना पूछ ताछ काहे कर रहे हो.....मालूम पड़ रहा है बियाह खातिर देखौआ बन कर आए हो  ?

अरे दादा...पूछना पड़ता है। लिखा है सब......

हां तो लिखिए खपड़हा घर .......कौनो जोजना में फैदा मिली खपड़हा लिखाए से।

अब दादा कुल फायदा ही देखोगे कि कभी नुकसान भी देखोगे।

अरे तो ये सब लिख पढ़ के किसके लिए ले जा रहे हो......कौन पढ़ेगा ये सब।

       दादा...ये सब जाकर कंपूटर में चढ़ा दिया जाएगा.....उससे पता चलेगा कि हमारे गाँव में केतना मनई लोग हैं.....केतना के पास कच्चा घर है ...केतना के पास पक्का घर है.....औ वही देख के सरकार योजना बनाएगी कि किसको क्या कमी-बेसी है.......लोगों को देखेगी ताकेगी.....बस यही है इस लिखा पढ़ी का कारन।

      अरे त क्या बिना लिखा पढ़ी के सरकार को पता नहीं चल रहा है कि किसको क्या कमी है...क्या तकलीफ है। पचास बरीस से देख रहा हूँ....जब जब कौनो सरकारी फैल आता है तो गाँव में गदर मच जाता है......जमीन बंदोबस्ती के नाम चकबंदी होनी है....... तो चलिए लेखपाल के पीछे पीछे जमीन का नाप जोख करवाने कि मेरा हिस्सा उल्टा सीधा न कर दे....रकबा कम ज्यादा न दिखा दे......इंट इधर उधर न गड़ जाय......सीओ के यहां दरखास.....फलाने के यहां दरखास......औ अंत में ले देकर हाय हुप्पा करके चकबंदी खतम हुई त अब नरेगा औ सड़क के नाम पर लूट मच गई......मुखिया के घर वालों का सगरौं नाम रहेगा कि फलांने भी काम करते हैं.....और पता चला कि मेहरीया घर में रोटी बना रही है....औ नाम रजिसटरी पर अमर हो रहा है.........आंय.......अरे बचवा हमार उमिर ऐइसै नहीं बीती है......कभी जो रासन पर कोटा पर चीनी, मिट्टी क तेल आवा है तो पता ही नहीं चलेगा कि कब आया और कब गया......माटी का तेल माटी में मिल गया कि असमान में सुरूक उठा कौन जाने...........

     दादा का उखड़पन जारी रहा.....हम लोग आगे बढ़ गए। इसी दौरान कहीं कहीं जाने पर रस वगैरह घोर घार कर पिलाया गया। मिंयाना में पहुंचने पर पहले ही पूछ लिया उन लोगों ने कि - ..... हमारे यहां का अन्न-पानी यादौ जी आप को चलेगा । मेरे हंस कर कहने से कि अरे मुझे सब चलता है....लाईए क्या ला रहे हैं......तो अंदरखाने में खट-खूट  होने लगी।

       यहाँ एक  नीम के पेड़ के नीचे बैठ कर फार्म भरा जा रहा था कि तभी एक ट्रे में रूह-अफ्जा वाला शर्बत अंदर से आया। तपती दुपहरी में मनसायन.......जियो काजी चचा...।

  एक जगह जाने पर मेरी परिचित एक काकी की जब मैने पैलगी की...तो उन्होंने मुझे पहचानते हुए पूछा - तूं पंचम के बेटवा हउवा न।

हाँ काकी।

 बातचीत के दौरान काकी से बताने पर कि बच्चों के स्कूल खूलने वाले हैं और इसलिए परिवार लेने आया हूँ तो काकी कहती हैं -

त अबहीं दुलहिन को लेने खातिर आए हो ?

दुलहिन.....। शादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी गाँव में बहू को दुलहिन ही कहा जाता है जबकि मेरे मन मानस में तो यही बैठा है कि विवाह के चंद रोज पहले और चंद रोज बाद का समय ही दुल्हा और दुल्हन कहलाने लायक समय होता है।

 खैर, आगे की जनगणना चलती रही....सर्वे फर्वे होता रहा....लौटानी बेला पर बाकी साथियों के साथ मैं भी लौटने लगा ।    

     यहां मैंने देखा कि कई महिला प्रगणकों के बदले उनके पति इस काम में लगे हुए हैं जिनका मानना था कि कहां इस दुपहरीया तिपहरीया में इतनी गर्मी में पत्नी को सर्वे वगैरह के लिए भेजते....स्कूल में पढ़ाने की बात अलग है.....जहां गाँव में बड़े बुजुर्ग हों .....सामने पड़ते ही माथे पर पल्लू लाना पड़ता हो..... उनसे भला परिवार में कौन कौन है....क्या कैसे आदि के बारे में क्या पूछ पछोर करेंगी हमारी घरवालीयां......थोड़ा लाज-लिहाज बरतना पड़ता है.....हैं तो हम गाँव के ही.....अमेरिका थोड़ी न हो गए हैं......।

 वाकई .......जनगणना करना बड़े जीवट का काम है। बहुत कुछ सोच समझ कर लिखना पड़ता है.......और सबसे बढ़ के बुढ़उ दादा जैसों के अनुभवी व्यंगावलीयों को झेलना पड़ता है......- लिख कर तो ले जा रहे हो....लेकिन कौन पढ़ेगा यह सब ? 



-   सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ की सरजमीं पर जनगणना करते समय संख्या सौ थी.....अगले दरवाजे पर पहुंचते पहुंचते जनसंख्या एक सौ एक हो गई ।

समय - वही, जब प्रधानमंत्री के कार्यालय में लगी डिजिटल जनसंख्या घड़ी अचानक रूक जाय और प्रधानमंत्री जी कहें.....आज किसी ने इसमें चाभी क्यों नहीं भरी :)


( ग्राम्य सीरीज चालू आहे......)

9 comments:

Arvind Mishra said...

यह तो कहीं से भी बासी नहीं लग रही ..लगता है बिलकुल ताजी फ्रेश है .....
जनगणना का अब ऐसे ही कच्चा चिटठा खोल देगें तब तो जुलम नही हो जाएगा ..

VICHAAR SHOONYA said...

"मर्दमशुमारी" पर दूसरी पोस्ट पढ़ी है. आपके ब्लॉग पर लगी तस्वीरें एक दूसरी ही दुनिया की सैर कराती हैं.

Rahul Singh said...

''आपकी सरकार, आपके द्वार'' हो तो कई बार यही हालत होती है.

दीपक बाबा said...

कई बार रिठेल के साथ साथ रीटीप में भी मज़ा होता हैं.



@ऐसी पोस्ट बस सतीश पंचम ही लिख सकते हैं

:)

उधारी टीप है,

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

मेरे पिताजी अषाढ़ में जन्मे थे। तिथि नहीं पता थी आजी को। किस साल में पूछने पर बोली - अब अषाढइ अषाढ़ गिनि ल।
किस सन से गिनना शुरू करें, यह नहीं पता था आजी को!
स्कूल में नाम लिखाने के समय जिस तारीख को स्कूल ले जाये गये थे, वही तिथि जन्मदिन हो गई! :)

प्रवीण पाण्डेय said...

जनगण को समझ पाना बड़ा कठिन है।

Vivek Rastogi said...

जनगणना अपने जीवन में होश में दूसरी बार देखी है, पहली बार इतना तामझाम नहीं था, पर इस बार बहुत सारा तामझाम था अब देखते हैं कि सरकार इस रद्दी का करती क्या है।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

जन गण का मन बांचना कठिन है।

डॉ. मनोज मिश्र said...

@दुलहिन.....। शादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी गाँव में बहू को दुलहिन ही कहा जाता है जबकि मेरे मन मानस में तो यही बैठा है कि विवाह के चंद रोज पहले और चंद रोज बाद का समय ही दुल्हा और दुल्हन कहलाने लायक समय होता है।..
अब इस बत रस में जो मिठास है वह रूह आफजा में भला कहाँ है.

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