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Saturday, February 26, 2011

चार चक्काईजेशन ऑफ ग्रेट इंडियन मैरिजेस........

     यहाँ देखौआ, छेकौआ के लिये कमरा मिलता है। जी हाँ, ऐसा ही तो लिखा था शारदा मंदिर के पास वाले दुकानों के सामने। साथ चल रहे परिचित ने बताया कि यहाँ पर अब लडका लडकी को एक दूसरे को देखने दिखाने के लिये कमरे मिलते हैं, यानि देखौआ। पसंद आने पर विवाहोपयोगी लडका-लडकी के परिवार के बीच कुछ उपहार आदि का आदान-प्रदान होता हैं जिसका अर्थ होता है इस जोडे को हमने छेंक लिया है- यानि कि छेकौआ। परिवार के लोग भी साथ होते है। मित्र बता रहे थे कि विवाह आदि तय होने के लिये अब ऐसे स्थल ज्यादा उचित माने जाने लगे हैं।

     
    मैं सुनता जा रहा था और मंदिर के आस पास की दुकानों में नजर भी दौडाये जा रहा था। मैंने अनुमान लगाया कि इस प्रकार के मिलन स्थल का निर्माण बढने के पीछे आये सामाजिक बदलाव ही हैं। पहले केवल घर वालों की रजामंदी से विवाह संपन्न हो जाता था। लडका न लडकी को देख पाता था, और लडकी न लडके को। दोनों एक दूसरे को विवाह होने के बाद ही देख पाते थे। लेकिन धीर-धीरे यह कलुषित प्रथा बंद होती गई और लडका-लडकी को देख कर ही विवाह आदि संपन्न होने लगे। ये देखौआ-छेकौआ वाले नवनिर्मित कमरे, उसी बदलाव के मर्मस्थल हैं।

       आज भी सुदूर देहात में जब कभी तिलकहरू लोग आते हैं तो उनके आने और जाने तक स्वागत सत्कार आदि में पूरे कुनबे को ही बटुर कर एक जगह उपस्थित रहना पडता है। स्वागत आदि में कोई कमी न रह जाये। घर की महिलाओं को भी सहेजना पडता है कि देखो बच्चों को ज्यादा डिस्टर्बेंस न करने दो। तिलकहरू लोग आ रहे हैं। लडका देखने आ रहे हैं, ये न हो.....वो न हो। मेरी नजर दुकानों में रखी चीजों पर पडी। कहीं सिंदूरदान रखा है, कहीं माँग-टीका। एक ओर सस्ती किताबों की दुकान भी है जिसमें ज्यादातर व्रत-जप आदि के लिये उपयोगी किताबें ही ज्यादा नजर आ रही हैं। सँतोषी माता कथा, विवाहोपयोगी गाली गीत, गाली सागर, सत्यनारायण कथा, हरितालिका कथा और ऐसी ही अनेकों किताबें। मैं आगे बढा।

     एक सज्जन जो बहुत आतुर होकर हमारी ओर देख रहे थे उनसे मित्र ने पूछा - एक कमरा मिलेगा ? देखौआ के लिये।

कितने लोग होंगे ?

यही कोई आठ-दस लोग।

   आईये देख लिजिये। छोटा कमरा दो सौ एक रूपये। और बडा चाहिये तो तीन सौ एक रूपये।
मैं राउण्ड फिगर से एक रूपये ज्यादा लेने के पर कुछ सोचने लगा। ये क्या बात हुई दो सौ एक, तीन सौ एक.....यानि एक ज्यादा ही रहे। तभी बात कुर्सी गद्दे की होने लगी। एक कुर्सी पाँच रूपये, एक गद्दा छह रूपये। पाँच घण्टों का चार्ज।


     ठीक है। चलो दिखाओ। हम आगे बढे। इधर हॉल में कई लडकियाँ अपने परिवार के साथ बैठी थीं। हमारे पहुँचते ही उन सबकी नजर हमारे उपर पडी। शायद उन्हें लगा हम लडके वाले आ गये हैं, जिसका कि वे इंतजार कर रहे हैं। लडकियाँ सहम कर सिर से ढरके पल्ले को ठीक ठाक करने लगीं। अन्य साथी औरतें अपने आप को यथावत रखते हमारी ओर इस तरह देख रही थी मानों कुछ ढूँढ रही हों......उनकी आँखे शायद भावी दुल्हे को खोज रही थीं। लेकिन जैसे ही हमारे साथ उस शख्स को देखा जो कि कमरे किराये पर देता है......वह अपने आप पहले जैसे सहज हो गये। उन्हें पता चल गया कि यह भी हमारी तरह देखौआ-छेकौआ के लिये कमरा बुक करने आये हैं।


     तभी मेरी नजर दीवाल पर लगी एक तखती पर पडी जिसपर लिखा था - विवाह कोई कानूनी बंधन नहीं, जन्म जन्माँतर का अटूट बँधन है जिससे पिढियाँ बनती हैं। इसे बहुत कुछ सह कर निभाना पडता है। - प.पू श्री........

      कमरा देख-ताक कर हम मंदिर के प्रांगण में ही एक ओर खडे हो गये और इंतजार करने लगे अपने सगे-संबंधियों का जो कि लडका-लडकी को लेकर अपने-अपने निवास स्थान से चल चुके थे और थोडी ही देर में पहुँचने वाले थे। तभी बगल में किसी के हो-हल्ला करने की आवाज आई। एक शख्स काफी तल्ख लहजे मे किसी से कह रहा था - अरे यार ऐसे थोडी होता है, इतना दो तो शादी होगी नहीं तो दूसरा तैयार है।

     बात शादी के लिये लेन-देन पर आकर बिगड गई थी। जोर-जोर से बोलने वाला शायद लडकी वालों की ओर से था। उसके आगे कहे गये कुछ शब्द भद्दे जरूर थे लेकिन अपने-आप में हकीकत तो उघाड कर रख रहे थे।

    वह कह रहा था - अरे यार झाँ* जल जाता है जब इतनी तैयारी करके ले फाँद कर, गाडी-घोडा करके लडकी लेकर देखने आओ और यहाँ साले गाँ* खोल देंगे कि इतना दो.....उतना दो।

   दूसरा उसे समझा रहा था - अरे, गजब करते हो यार । मंदिर है.....थोडा ख्याल करों।

   क्या-क्या ख्याल करूँ। ये मंदिर है इतना तो मैं भी जानता हूँ.....लेकिन वो लोग को समझ है। मुँह खोल रहे हैं दो लाख नकद, चार चक्का अलग......अरे हद है।

    तो क्या करोगे। कुछ न कुछ तो देना ही होगा। आगे जाकर कम - ज्यादे करवाया जा सकता है। ऐसा तो है नहीं कि कह दिया और देना ही पडेगा। लडके वाले शुरूवात में कहते ही इतना है कि आखिर में बात कहीं सम पर आकर टिके। मैं हूँ न, चिंता मत करो।

     इस दुसरे शख्स की बातों से लगता था कि यह अगुआ है और इसकी ही अगुआई से बात-चीत चल रही है शादी की। बात को कहाँ संभालना है और कहाँ उछालना ये शख्स बखुबी जानता लगा। तभी वह अगुआ आदमी कुछ धीमी आवाज में बात करने लगा। लेकिन तल्ख लहजे में बोलने वाले की आवाज पर कोई असर नहीं हो रहा था।

     अरे क्या - एक अस्सी और एक-पचासी कर रहे हो। सोनार के यहाँ बैठे हो क्या। सुनकर कपार से ससुर खून चूने लगता है एतना दो ओतना दो।



     
     तो क्या करोगे, फोकटे में निबाह ले जाना चाहते हो। देखो, जिस समाज में तुम हो, उसी में मैं भी हूँ। इतना जान लो। आज लडकी के बखत देते समय तो ना-नुकुर कर रहे हो। कल जब तुम्हारे लडके का होगा तो पैर जमीन पर न रखोगे। ये कहो, हम लोग हैं जो कह कर दबाये हुए हैं नहीं तो पाँच नगद गिनवाता और चार चक्का पहूँचाने को कहता।
    
      पहले वाले के चेहरे पर अब भी शिकन ढिली न हुई थी। धीरे-धीरे वह दोनों अंदर कमरे की ओर बढे जहाँ लडका-लडकी के परिजन बात-चीत में लगे थे। इधर मैं भी बाहर की ओर थोडी चहल-कदमी के लिये चला। मित्र ने आँख के इशारे से कुछ कहा - मानों कह रहे हों - देखा यही होता है यहाँ। मैं चला जा रहा था और नजर आ रही थी वह तखती जिस पर लिखा था - विवाह कानूनी बँधन नहीं है। यह जन्म-जन्माँतर का अटूट बंधन है जिससे पीढियाँ बनती हैं। इसे बहुत कुछ सहकर निभाया जाता है - प. पू. श्री........।

 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर देखौआ-छेकौआ हेतु 'हॉटेल हनुमान' का इस्तेमाल किया जाता है। 

समय - वही, जब देखौआ-छेकौआ के बाद लड़की अपने फेसबुक पर स्टेटस अपडेट करते हुए लिखे 

-  Thanks to Ratan TATA ,  

........ चार चक्का पर अटकी हुई बात, आखिरकार संभल गई.  

(दो साल पहले मेरी जौनपुर यात्रा के दौरान लिखी गई पोस्ट) 

15 comments:

Kajal Kumar said...

जब तक शादी के लिए बुढ़उओं के भरोसे बैठे रहेंगे, यही होता रहेगा.

anshumala said...

लोगो के घर लड़का होते ही लोग एक ब्लैंक चेक निकाल लेते है और लडके के बड़े होते होते उसमे जीरो बढ़ाते जाते है और विवाह के समय लड़की वाले को थमा देते है | मुझे तो लगता है की एक समय मारुती ८०० ने दहेज़ में चार चक्के का प्रचलन बढ़ा दिया था दाम कइयो के बजट में खीचतान के आ जाता था इसलिए ,अब वही काम नैनो करने वाली है एक बार फिर | भारतीय विवाह का खास कर उत्तर भारत के विवाह का ये बहुत ही घिनौना रूप है लोग कई बार तो लड़की या किसी और चीज की बात बाद में करते है पहले पूछते है की कितना खर्च कीजियेगा या दलाल से पूछते है की आसामी कितने का है |

आज भी विवाह दो व्यक्ति या परिवार का मिलन कम हर तरह की सौदेबजी ज्यादा होती है - अं, मा , श्री .....|

सोमेश सक्सेना said...

आपके प्रोडक्ट्स (पोस्ट्स) की रीठेल वैल्यु भी बहुत ज्यादा होती है। सबके बस का नहीं है जी अफोर्ड कर पाना। बहुतोँ की तो पढ़के ही झां* जल जाती होगी। :)

anjule shyam said...

विवाह कानूनी बँधन नहीं है। यह जन्म-जन्माँतर का अटूट बंधन है जिससे पीढियाँ बनती हैं। इसे बहुत कुछ सहकर निभाया जाता है - प. पू. श्री........।
लेकिन सहना लड़की और उसके घर वालों को ही पड़ता है...

Arvind Mishra said...

ई जगह कहाँ खोज निकाले भाई !

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

ये जगह जौनपुर शहर में ही है, नाम तो ठीक से याद नहीं लेकिन लोग शायद चौंकीया या शीतला मंदिर कहते हैं।

सतीश पंचम said...

@ आज भी विवाह दो व्यक्ति या परिवार का मिलन कम हर तरह की सौदेबजी ज्यादा होती है

अंशुमाला जी, आपकी इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं।

एक बात ये भी नोटिस की है मैंने कि जो पिता अपनी बेटी के विवाह के समय दयनीय बना दिखता है, वही पिता अपने पुत्र के विवाह के समय शान से सीना चौड़ा किया हुआ नज़र आता है। हंसी पड़क्का करते और इठलाते दिखाई देता है। यह भी एक किस्म की विडंबना ही है।

सुशील बाकलीवाल said...

रोचक जानकारी, ज्ञानवर्द्धक पोस्ट...

प्रवीण पाण्डेय said...

इतनी शादियाँ हो जाने के बाद भी हर शादी नयी जैसी लगती है, तैयारी से समाप्ति तक।

rashmi ravija said...

आँखों देखी तो नहीं है यह सब पर, कानो सुनी खूब है.....कितनी बार तो जरूरत हो या ना हो...पर रिश्तेदारी में किसी लड़के को मिला है..तो हमें भी चाहिए...आज तक कुछ नहीं बदला.

रचना said...

कुछ बदले इसके लिये कुछ छोड़ना पड़ता हैं . कौन छोड़ना चाहता हैं . अपने अपने समय मे सब आँख मूंद कर शादी करते हैं . किसी को भी नहीं पता होता कि माता पिता मे लेनदेन को लेकर क्या व्यवस्था कि जा रही हैं . कोई बोलता या पूछता हैं तो आधुनिक , नारीवादी , समाज से अलग इत्यादि के तमगो से नवाजा जाता हैं . हर कोई समाज को बदल कर नयी व्यवस्था चाहता हैं पर अपने लिये नहीं दूसरो के लिये . व्यक्तिगत बात करे तो सब बच कर निकलना चाहते हैं . यहाँ भी जितने लोगो ने कमेन्ट किया हैं उनमे से किसी ने भी ये नहीं कहा हैं कि हमने इस व्यवस्था के विपरीत लड़ाई लड़ी हैं . अगर आप ने अपने समय मे दहेज़ लिया या दिया हैं तो आप अपने बच्चो के समय कैसे इस व्यवस्था को सुधार सकते हैं

http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2010/03/blog-post.html

http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2010/03/blog-post_30.html

राज भाटिय़ा said...

@ हम ने दहेज की बात छोडो कभी एक कपडा या अंगुठी भी नही ली, ओर हम तो लडकी के कपडे जो शादी के वक्त पहने थे खुद देने को तेयार थे, ओर बच्चो की शादी भी ऎसे ही करेगे,मैने कोई किसी पर एहसान नही किया, आज भी ससुराल जाता हुं तो कोई आव भगत नही करवाता, जेसा घर मे पकता हे वेसा खाता हुं, कोई अलग से मेरे लिये बनाये तो मै देखता भी नही....

VICHAAR SHOONYA said...

पंचम साहब आपने हमारे बिहार और पूर्वांचल में विवाह के नाम पर होने वाली सौदेबाजी का एकदम सटीक चित्रण किया हैं.

Rahul Singh said...

वर-वधू मैंचिंग स्‍टोर उर्फ रेडीमेड शाप.

डॉ. मनोज मिश्र said...

देखौआ-छेकौआ और शादी तीनों उसी मन्दिर में हो रही है,मैं तो रोज ही देख रहा हूँ.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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