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Tuesday, February 22, 2011

वो जो कहते नहीं बनता.......अई... अईया.....करूं मैं क्या...... सूक्कू सूक्कू :)

     हम कभी कभी अनजाने में ही ऐसे हालात में फंस जाते हैं कि हमें खुद पर ही हंसी आती है कि यार....ऐसा कैसे हो गया। मैं अभी हाल ही में इसी तरह के सिचुएशन में फंस गया था .... न तो कुछ करते बन रहा था न धरते :)

         हुआ यूं कि मुझे अभी जल्दी ही एक कॉरपोरेट ऑफिस में विजिट के लिये जाना पड़ा। मिटिंग खत्म होने पर मुझे बाथरूम जाने की तलब हुई। मीटिंग रूम से बाहर आकर कलीग को कहा कि तुम तब तक दूसरे काम निपटा लो मैं अभी वाशरूम से आता हूं।  अब मुसीबत ये कि वाशरूम है कहां......उधर जिससे पूछो वो हाथ से  इशारा करता कि उधर सामने है। अब वह कह तो देता लेकिन मुसीबत ये कि सामने है मतलब कितना सामने है। एक तो बडे बड़े दरवाजे, तमाम केबिन, कॉरिडोर, लंबे चौड़े उस कॉरपोरेट ऑफिस वाले इलाके में जिधर भी नजर डालो सब एकदम चकाचक। कहीं बाथरूम जैसा कुछ नज़र ही नहीं आ रहा था (संभवत, उम्मीद कुछ मलिन क्षेत्र सी होती है )।  अब वहां यूं घूमते हुए बाथरूम ढूंढना कुछ मुझे अजीब भी लग रहा था।

     तभी मेरे सेल पर एक कॉल आई और मै उसी के बहाने बात करते करते बाथरूम भी ढूंढते जा रहा था कि बाथरूम के सामने आते ही उसमें घुस जाउंगा और किस्मत देखिये कि मुझे वह साइनबोर्ड दिख भी गया जहां पर कि  Restroom का साईन लगा होता है। मैं बात करते हुए सीधे अंदर जा घुसा। लेकिन ये क्या....पुरूषों वाला मूत्र विसर्जन क्षेत्र नदारद........ मूत्र विसर्जन क्षेत्र बोले तो जिसे पुरूषों वाला Standing Ovation क्षेत्र भी कहा जाता है ....वही Urinal यार  :)

   इधर  मुझे लगा कि भई कॉर्पोरेट ऑफिस है... कॉर्पोरेट स्टाइल के अपने Restroom Norms होंगे। इधर Urinal नहीं है,  हो सकता है उसके लिये अलग रूम हो..... मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया ....एक तो प्रेशर भी बन आया था। सो,  सेलफोन कट करके सीधे टॉयलेट के अंदर चला गया। अभी थोड़ी देर ही हुई थी कि टॉयलेट के बाहर  चप्पलों की आवाज हुई। मैं चौंक गया कि यार आज तो कोई फ्रायडे भी नहीं हैं, कि कॉर्पोरेट ऑफिस की तर्ज पर Informal wear पहन कर लोग चप्पल पहनें आयें......ना ही कोई Casual wear Occasion है।  थोड़ी शंका हुई कि कहीं ये लेडिज बाथरूम तो नहीं है। यह बात मन में आई ही थी कि फिर क्या था......मैं अपनी हालत बयां नहीं कर सकता....अंदर ही अंदर अजीब सी बातों का उमड़न घुमड़न चलने लगा। और जैसे इसी की कसर बाकी थी.....किसी की चूड़ियों की खनक सुनाई पड़ी....जी धक्क से हो गया....ये लेडिज बाथरूम ही है और मैं गलती से आ गया हूं।

  इसके बाद आप समझ सकते हैं कि मेरी हालत क्या हुई होगी.....। जल्दी से फ्लश किया और इस इंतजार में रहा कि बाहर थोडा सा सुनसान हो और जैसे ही लगा कि हां सब ठीकठाक है तुरंत बाहर को निकला और सीधे दरवाजा खोलकर अगले ही पल सामने के मर्दाना बाथरूम में जा घुसा। थैंक गॉड....इस बीच किसी लेडिज की नज़र नहीं पड़ी :)

   मर्दाना बाथरूम में घुसते ही जहां Standing Ovation क्षेत्र को देख जान में जान आई...वहीं एक किस्म का सुकून भी रहा कि चलो बच गये ..... उस दौरान बाथरूम में कोई फूलवा रानी सामने पड़ जाती तो संभवत: शोर भी मचा देती....खैर,  उस वक्त बाहर आकर मैंने कितना रिलीफ महसूस किया इसे मैं ही जानता हूँ......उसे शब्दों में नहीं बता सकता  :) 

  लेकिन, इस वाकये से इतना तो तय है कि यह 'अनुभव' अब जिंदगी भर याद रहेगा  :)

 -सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां के 'कॉर्पोरेट कॉमनरूम',  कॉमनमैन के 'कॉमन लिविंग रूम' से भी बड़े और लजीले-सजीले से होते हैं :) 


समय - वही, जब अंदर बाथरूम में घोटाले के आरोपी  ए  राजा के नाड़े का बन्धन नहीं खुल रहा हो और उसी वक्त टीवी पर प्रधानमंत्री कहें - गठबन्धन हमारी मजबूरी है....... स्थिर सरकार के लिये इसे बनाये रखना होगा  :)

(सभी चित्र - गूगल दद्दा से साभार :)

24 comments:

Arvind Mishra said...

वो ऊपर का चित्र निषिद्ध क्षेत्र का है न ? धन्य हुए देखकर ,काफी देखा नहीं था न सो जिज्ञासा पूरी हुयी -क्या कहा वह नहीं है यह ? तो फिर वह कैसा होता है ? उसका भी चित्र लगाईये ...यह जेंडर एनइक्विलिटी नहीं चलेगी चलेगी ...
कोई ऐसा देश है जहाँ यह यह निषिद्ध क्षेत्र में न आता हो ? मतलब दोनों जने का एक ही रेस्ट रूम ...?
मुझे लगता है नारी समानता का आगाज यहीं से होना चाहिए !

संजय @ मो सम कौन ? said...

बच गये, पंचम बाबू, न तो छिड़ जाता सप्तम रग:) सुनना सुनाना पड़ता - this is meant for ladies..!!

अपना एक मित्र एक बार सरकारी काम से आमची मुंबई जा रहा था और पहली बार राजधानी ट्रेन से सफ़र कर रहा था। टायलेट में जाकर फ़ारिग होने के बाद उसे फ़्लश वाला बटन नहीं पहचान में आया। अंदर से ही फ़िर मोबाईल पर ’कॉल अ फ़्रेंड ऑप्शन’ इस्तेमाल किया उसने, उसके बाद ही बटनजी को लॉक किया। अब भी मिलता है तो आँख बचाता है ’फ़्रैंड’ से:)

Udan Tashtari said...

ऐसी हालात में मैं फंस चुका है..आपकी हालत समझ सकता हूँ अतः भीतर तक आपके प्रति संवेदित हूँ. :)

PADMSINGH said...

बड़ी जटिल परिस्थितियाँ होती हैं कभी कभी ....

रहा भी न जाये... कहा भी न जाये

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आए
क्या कहें किससे कि किस बात पे रोना आए

संजय बेंगाणी said...

:)

Mithilesh dubey said...

मिश्र जी के बातों पर गौर कीजियेगा सतीश भइया

Suresh Chiplunkar said...

कार्पोरेट दफ़्तर में एक नॉन-कार्पोरेट के घुसने पर ऐसा अक्सर होता होगा… :) :)

anshumala said...

सावधानी हटी दुर्घटना घटी ,ये गलती पुरुषो से ही होती है शायद ही कभी कोई महिला ऐसी गलती करी हो | इस मामले में वो काफी सावधान होती है पर ये भी सोचने की बात है की इस मामले में पुरुष लापवाह होते ही क्यों है :)))

अनूप शुक्ल said...

परसाद माने होंगे कुछ! चढ़ाइये!

सञ्जय झा said...

apka anubhav chahe jitna atankit karne wala ho lekin apki shaili ne
bhar-poor manoranjan kiya......

jo baten byavhar me lane par sikhi jati......o baten hamne apke anubhav
se sikha......:):)

pranam.

Rahul Singh said...

आपकी शंकाओं का निवारण होता रहे.

rashmi ravija said...

लकी रहे आप कि किसी 'फुलवा रानी' की नज़र नहीं पड़ी...वरना उनकी सेना जुटते देर नहीं लगती...और हम आपके चेहरे के भाव की कल्पना भी नहीं कर पा रहे हैं :):)

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

ये जेंडर वाला मामला थोड़ा रोचक लग रहा है मुझे। जहां तक जेंडर बराबरी की बात है इस मामले में भारतीय रेल ने वह काम पहले ही कर दिया है....जेन्टस, लेडिज...दोनों एक ही टॉयलेट रूम का बारी बारी इस्तेमाल करते हैं वहां कही पुरूष या महिला के लिये टैग लगे नहीं देखा (at least in second class :)

सतीश पंचम said...

@ समीर जी, ऐसे थोड़ी चलेगा आप भी अपना अनुभव हमसे शेयर करें :)

@ संजय जी,

इस तरह के मुसीबत में फंसने पर बुद्धि गुल्ल हो जाती है और तब कितना भी बड़ा बुद्धिजीवी हो.....ईश्वर का अस्तित्व अंतत: स्वीकार कर लेगा :)

स्टीफन हॉकिंग अपवाद हैं....उनके लिये संभवत: उनकी कुर्सी में ही सुविधा है अत: वह ईश्वर का अस्तित्व क्यों मानेंगे भला :)

सतीश पंचम said...

सुरेश जी,

आपने सही पहचाना....जड़ तक पहुंच गये :)

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

दरअसल पुरूष इस मामले में लापरवाह इसलिये होते हैं क्योंकि वह स्वभावत: ओपन थियेटर वाले होते हैं....वो किसी ऐड में देखा था जिसका स्लोगन था - कहीं भी कभी भी :)

शायद यही उन्मुक्तता लापरवाही का कारण हो कि ऐसी गलतियां पुरूषों से हो जाती हैं....वैसे भी पुरूष बदनाम हैं कि जहां प्रेशर बना फुटपाथ के किनारे, दीवाल के सहारे 'धारापुरी के वासी' हो जाते हैं :)

सतीश पंचम said...

पदम जी,

@ रहा भी न जाये... कहा भी न जाये

सही कहा।

इस परिस्थिति का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि जिस चूडी के खनकने पर कवियों ने ढेर सारी कविताएं लिख मारी हैं...उसी चूड़ी के टॉयलेट में खनकने पर मेरा कलेजा धक् से हो गया था :)

स्थान और समय का भेद है सारा :)

सतीश पंचम said...

अनूप जी,

उस वक्त परसाद तो नहीं माना था लेकिन अब समझ रहा हूं कि मान लेना चाहिये था वरना कल को भगवान उस का बदला न लें मुझसे....किसी फुलवा रानी से चिल्लम चिल्ली वाली भेंट करवा कर :)

डॉ. मनोज मिश्र said...

इस पोस्ट से धन्य हुए,बहुत धन्यवाद.

सोमेश सक्सेना said...

होता है जी कभी कभी ऐसा भी होता है.
अब मजे के बात ये है कि तब तो लगता है कि कैसे भी कर के बच निकलें पर बाद में खुद पर ही हँसी आती है.
उस समय कोई हँसे खुद पर तो माने :)

दीपक बाबा said...

कई लोग ऐसी स्थिति में फंस जाते हैं, पर कम लोग ही बया कर पाते है........ सतीश पंचम उनमे से एक हैं......

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रसन्न रहिये कि बच गये।

बी एस पाबला said...

उस दौरान बाथरूम में कोई फूलवा रानी सामने पड़ जाती तो संभवत: शोर भी मचा देती.

संभवत: !?
अजी यह तो तयशुदा है सर जी

कभी कभी तो ऐसा मौक़ा मिलता होगा :-)

सतीश पंचम said...

पाबला जी,

आप लोगों को छुपा जाने वाली अंदर की बात क्या बता दिया आप लोगों की तो मौज हो गई :)

खिंचिए...और खिंचिए....आप लोग खिचाई से बाज नहीं आएंगे.... पाबला जी, किसी दिन आप को ठीक ऐसे ही वक्त पर फोन करूंगा और ....

जाण दो....पूरी गल्ल हुणे नईं दस्सणां :)

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