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Friday, February 18, 2011

एक क्लासिक फिल्म देखते हुए.....नॉस्टॉल्जिया रॉक्स

       अभी हाल ही में मित्रों के साथ देवानंद की फिल्म 'हम दोनो' देखने का मौका मिला जिसे कि ब्लैक एण्ड वाइट से रंगीन किया गया है। जब सिनेमा हॉल के बाहर पहुंचे तो ज्यादातर उम्रदराज लोग ही नज़र आए और वह भी जोड़े में। दादी - दादा लोगों को देखकर एक बार लगा कि शायद हम लोग गलत च्वाईस पर चल रहे हैं। कोई यंग नहीं दिख रहा, कहीं हम लोगों की सोच तो बूढ़ी नहीं हो चली है :) 

       सिनेमा  थोड़ी देर में चालू होने वाला था सो बाहर ही मूंगफली ली गई, अंदर पॉपकॉर्न का प्लान था लेकिन सत्तर रूपये का मकई पैक देखकर मन वैसे ही बिदक जाता है।  बिदकने का कारण भी है। मैं भले ही इस महानगरीय संस्कृति के भीतर बचपन से रहते रहते रच बस गया हूं....लेकिन ये मेरे किसानी संस्कार हैं जो मुझे कहते हैं कि ये मकई के दाने जरूरत से ज्यादा महंगे हैं। मत लो। और मैं दो कदम पीछे हट जाता हूं।  ये वही किसानी संस्कार हैं जिन्हें अक्सर मैं गर्मी की छुट्टियों में गाँव जाने पर खेती बाड़ी के छुटपुट काम करते हुए ग्रहण करता हूं.....उन्हें करते हुए आनंदित होता हूं। ये अलग बात है कि कभी कभी मरकही भैंस के द्वारा दौड़ा भी लिया जाता हूं और उस पर पोस्ट लिख मारता हूँ  :)

  तो समय पर हम दोनों फिल्म देखने के लिये भीतर गया। मन में एक किस्म का नॉस्टाल्जिया ठांठे मार रहा था....देखें तो देवानंद को बड़े परदे पर। अंदर जाते ही जो सीट मिली वो थोड़ा किनारे वाली थी। जो लोग आते वो घुटनों को रगड़ते फगड़ते जा रहे थे...मुसीबत ये कि ज्यादातर लोग बूढ़े थे....टॉर्च जलाकर सीट दिखाने वाला बंदा उनमें से हर एक को सीट के पास लाकर छोड़ता था.....शायद उसे डर था कि ये उम्रदराज लोग अपनी सही सीट न पकड़ पाएंगे या गलत बैठ जाएंगे। जो लोग रो में एंटर करते वो सीटों को पकड़ पकड़ कर एक तरह से बेबी स्टेप लेते हुए चल रहे थे।

  फिल्म शुरू होते ही VICCO वज्रदंती के ऐड आने लगे....तो लगा कि यार ये तो सही में नॉस्टॉल्जिया है। बड़े दिनों बाद विको के ऐड देखा था। फिल्म शुरू हो चुकी तो बूढ़ों का खांसना छींकना शुरू हो गया। समझ गया कि अब पूरी फिल्म ऐसे ही खांसते खंखारते बूढ़ों के बीच देखनी पड़ेगी। शायद एसी का भी असर रहा हो जो बूढ़ों को ज्यादा खांसी और छींक आदि आ रहा था। तभी वो गाना शुरू  हो गया - अभी ना जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं......। और ये क्या....पीछे बैठे  एक बूढ़ऊ तो सीटी मारने लगे। उनको देखने के लिये सभी लोग पीछे को मुंडी घुमाए तो एक ने मराठी में कहा -  काय आजोबा....आली का आठवण ?  (क्यों दादाजी, कुछ याद आ गया लगता है ) और सभी लोग ठठाकर हंस पड़े। 
   
   फिल्म देखते हुए मैं भी मुग्ध हो रहा था...बहुत अच्छा लग रहा था। पहली बार देवानंद की फिल्म बड़े परदे पर देख रहा था, वरना तो वीसीआर पर ही ज्यादातर देखा है और वो भी ब्लैक एण्ड वाइट में। गाईड अपवाद है, उसे कई बार देखा है। 

        अभी फिल्म चल रही थी कि एक बेहद फिलॉसफिकल सीन आया। सीन कुछ यूं था कि गरीब देवानंद साधना के अमीर पिताजी से उसका हाथ मांगने जाते हैं। दोनों के बीच बहस हो जाती है। अपना इंटरव्यू बीच में ही छोड़कर आये देवानंद से साधना के पिताजी कहते हैं कि-  उन्होंने अपनी बेटी को काफी अमीरी में रखा है......वह तुम जैसे बेरोजगार के साथ कैसे रह पाएगी। तब देवानंद कहते हैं कि -  मैं जानता हूं वह मेरे साथ सूखी रोटी खाकर भी खुशी खुशी रह लेगी। इतना सुनना था कि साधना के पिताजी भड़क जाते हैं। वो कहते हैं कि - तुम अब भी सूखी रोटी की बात करते हो। इतना जान लो कि गरीबी और सूखी रोटी अमीर लोगों की कवितायें हैं। वो इनकी बातें कर करके अपनी जी बहलाते हैं, ये उनका फैशन है। रही बात गरीबी की तो वह एक श्राप है और उसमें पड़ा रहना एक तरह की हिमाकत।

       उन दोनों के बीच कुछ और बातें हुई लेकिन साधना के पिता के द्वारा कही बातों में वाकई दम है। गरीबी आज एक अभिशाप ही तो है, और उसमें पड़े रहना वाकई हिमाकत है। वे दिन हवा हुए जब रूखा सूखा खाकर ठंडा पानी पीने की बातें की जाती थीं। अब उस तरह का सुकून की बातें करने वाला एक तरह का आलसी माना जायगा......निकम्मों में गिना जायगा। आज के इस दौड़ते भागते दौर में बहुत सी बातें हैं जो पहले के मुकाबले बदल सी उठी हैं। अब इसे ही देखिये कि एक और फिल्म थी 'मेरा गाँव मेरा देश' जिसकी बातें मुझे कुछ कुछ धुंधली सी याद है जिसमें कि धर्मैन्द्र एक बच्चे को पैसे देते हैं तो उसकी माँ कहती है कि उसे पैसे मत दिया करो.....वो खर्च करना सीख जायगा। तब धर्मेन्द्र कहते हैं कि-  खर्च करना सीखेगा तभी तो कमाना सीखेगा। 

      और अब देखिये... लोग कर्ज पर कर्ज लेकर खर्च कर रहे हों.....उन तमाम चीजों पर खर्च कर रहे हैं जिन्हें पहले हासिल करने में पूरी जिंदगी लग जाती थी क्योंकि वो जानते हैं कि इन खर्चों को आगे कैसे पूरा करना है.... कैसे ज्यादा से ज्यादा कहां से कमाना है.....। ये अलग बात है कि इस चक्कर में सूकून - आराम, जितनी चादर उतना पैर वगैरह वाली बातें कहीं पीछे छूट गई हैं। 

    खैर, बात हो रही थी फिल्म हम दोनों देखने के अनुभव की और मैं खर्च -बचत आदि के पचड़ों में उलझ गया। क्या किया जाय। पहले फिल्मों से कुछ न कुछ सीखने को भी मिल जाता था, अब तो शायद पटियाला पैग लगाने आदि की सीख मिलती है :) 

    Anyway, फिल्म अच्छी लगी। पूरी फिल्म में देवानंद हिलते डुलते ही रहे। कभी एक जगह सीधे नहीं खड़े दिखे।  लोग उनका लगातार हिलना डुलना देखकर हंस भी रहे थे। फिल्म के गाने बेहद अच्छे हैं। खासकर वो गाना जिसके बोल हैं - मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया....हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।  

   आप भी जरूर देख आयें....देवानंद की एकदम मस्त क्लासिक फिल्म है 'हम दोनों'. और हां, सिनेमा हॉल में जाकर सबसे कोने वाली सीट पकड़ें क्योंकि बीच वाली या किनारे वाली सीट पकड़ने पर आप को शायद पूरी पिक्चर देखने नहीं मिले..... क्योंकि ज्यादातर समय साठ-सत्तर के डायबिटीज वाले दर्शकों को टटोल टटोल कर रास्ता देने में,  उन्हें छींकते खांसते हुए आगे बाथरूम की ओर सरकाने में ही निकल जाने की संभावना है :)

  - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर कि देवानंद रहते हैं। 

समय - वही, जब सिनेमा हाल में टार्च जलाकर टिकट देखते बंदा कहे - अंकल...उधर D-15 ,16 है....उधर जाओ कोने में और तभी अंकल कहें.....उधर नहीं..... मेरे को उधर नहीं बैठना....बाथरूम जिधर से नजदीक हो वो सीट बताओ :) 

26 comments:

Abhishek Ojha said...

सत्तर रुपये का मकई का भुजा और वो भी सीलन वाला :) बहुते बढ़िया किये नहीं लिए.

Abhishek Ojha said...

और ये सीलन वाला कांसेप्ट मेरा नहीं है चोरी का है, शिव भैया की एक पोस्ट में था. सोचा रेफेरेंस भी दे दिया जाय. :)

rashmi ravija said...

मैं जल-भुन कर खाक हो गयी....कब से प्लान कर रही हूँ....पर जा नहीं पा रही....हमें तो खासकर वो लाइटर वाला गाना ही देखना है...और साधना तो मेरी फेवरेट है.

kshama said...

Boodhe logon ka itna mazaaq na udao bhai!Ham sabhi ko usi q me khada hona hai kabhi na kabhi!
Haan!Ham Dono dekhne ka man zaroor ho raha hai!Waise TV pe aadhi adhoori dekhi zaroor hai!

सतीश पंचम said...

शमां जी,

थोड़ा सा फन स्टाईल में हल्के फुल्के मूड से यह पोस्ट लिखा हूं....मुझे भी पता है कि हम सभी को इस अवस्था से गुजरना है ...तब शायद कोई नवयुवक हमारे बारे में भी यही सब लिखेगा अपने ब्लॉग पर :)

hey dude...don't seat next to old bloggers....becos....they always fight....they always....

आगे आप लोग अपने अपने हिसाब से फिल अप कर दें :)

anshumala said...

फिल्म तो देखी है टीवी पर हा ये लगता है की कभी इन पुराने कलाकारों को बड़े पर्दे पर नहीं देखा है |

डॉ. मनोज मिश्र said...

खेती -किसानी वाला भला कैसे पापकार्न लेगा उसे तो पता है न इतने रूपये में तो पूरा गांव जोन्हरी क दाना खायेगा.
यह फिल्म तो वाकई अच्छी है.

संजय @ मो सम कौन ? said...

ये रिकमंडेशन कतई नहीं मानेंगे आपकी। इसी फ़िल्म के एक गाने से प्रेरणा लेकर मुंह से लगी थी एक काफ़िर, जो बहुत मुश्किल से छूटी है। कहीं फ़िर से फ़िक्र को धुंए में उडाने की सोच हावी हो गई तो?
फ़िल्म बहुत अच्छी थी और गाने और भी अच्छे।

कार्नर सीट ने बड़ा दुख दीन्हा:)

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

हो सके तो जरूर देखिये इस फिल्म को बड़े पर्दे पर। एक अलग ही तरह का अनुभव होता है। मैं तो पिछली बार नया दौर के रंगीन रिलीज को मिस कर गया और आज तक पछता रहा हूं कि इस फिल्म को बड़े पर्दे पर क्यों नहीं देख पाया। इसी डर से हम दोनो फिल्म को देख आय़ा कि कहीं ये भी बड़े पर्दे से जल्दी गायब न हो जाय।

वैसे भी दीपिका, रणबीर, प्रियंका- शाहीद जैसे फालतू प्रोपेगंडा बेस्ड पब्लिसिटी वालों के जमाने में इस तरह की फिल्मों को जल्दी ही बड़े परदे से आउट होना पड़ता है।

सतीश पंचम said...

मनोज जी,

सच कहा, इतने में तो ढेर सारे मकई के दाने आ जायेंगे और जो सुनेगा कि इतने में मकई खाया हूं तो हंसेगा भी कि देखो तो शहरी बनते हैं...इतनी ही बुद्धि है इन लोगों के पास कि कोई भुजैना खिलाकर खुशी खुशी लूट ले और ये लुट भी जांय :)

सतीश पंचम said...

संजय जी,

इस फिल्म के गाने के वक्त अम्बूमणि रामदौस नहीं थे जिनके समय में ये रूल बना था कि परदे पर सिगरेट पीते दृश्य नहीं दिखाये जायेंगे......वैसे ये रूल कब आया कब गया खुद रामदौस को भी नहीं पता होगा :)

mridula pradhan said...

bahut achcha likhe hain.

shama said...

Ab to film dekhne kaa man ho raha hai!Lekin black & white me!

Satish Chandra Satyarthi said...

बड़े परदे पर तो नहीं देख सकता...
डाउनलोड का ही भरोसा है.. :)

राज भाटिय़ा said...

हमे तो ब्लेक एंड वाईट ही अच्छी लगी जी,क्योके हमारे पास डी वीडी मे जो हे, धन्यवाद समीक्षा के लिये, वेसे भी हाल मे फ़िल्म ३३ सालो मे सिर्फ़ दो ही देखी हे पहली *राजा हिंदुस्तानी, दुसरी सलमान खान ओर अनिल कपूर की नाम भी भुल गये,

सतीश पंचम said...

शमा जी,

इस फिल्म को देखने से पहले मैं भी यही सोच रहा था कि काश ओरिजनल ब्लैक एण्ड वाइट में होती तो और अच्छा लगता। लेकिन कलर्ड प्रिंट देखकर चकित रह गया, एक सुखद एहसास हुआ। पता ही नहीं चलता कि इसमें अलग से रंग भरा गया है, यूं लगता है जैसे कि कलर में ही इसे ओरिजनली पिक्चराइज किया गया हो और यही बात देवानंद भी इस कलर फिल्म के शुरूवात में अलग से कहते हैं।

वैसे जब नया दौर को रंगीन किया जा रहा था तब दिलीप कुमार ने ना कहा था कि उससे फिल्म का चार्म चला जायगा लेकिन जब रंग भर दिया गया तो बेहद खुश हुए थे, उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतना अच्छा प्रिंट बन सकता है।

Vivek Rastogi said...

अपनी तो फ़िल्म देखने की हिम्मत हॉल में होती ही नहीं है, आज भी अपनी सोच वही है, किसानी सोच आपके शब्दों में।

बहुत बार देखी है, यह ब्लैक एण्ड व्हाईट में, और गाने तो बस क्या कहें, एक से बड़कर एक हैं।

कितने ही बूढ़ों के दिल जवां हो गये होंगे...

मनोज कुमार said...

ये सब वे फ़िल्में हैं जो हमारे व्यक्तित्व पर काफ़ी प्रभाव डालती थी। उस ज़माने की अधिकांश फ़िल्में वैसी ही होती थीं।
बहुत सारे फ़िक्र हमने धुएं में उड़ाया! ... और ज़िन्दगी का साथ निभाया ....!

Rahul Singh said...

'वाह, क्‍या सीन है' की तरह 'वा‍ह, क्‍या बात है' निकाल लाए हैं आप. 'ये मकई के दाने' को भाई साहब ने नाम दिया हैं 'जोन्‍धरी के फटक्‍का.'(यानि भुट्टे की आतशिबाजी)

रंजना said...

अब का सिनेमा देखें,आपने इतने जबरदस्त अंदाज में सब दिखा ही दिया...

बहुत बहुत जानदार पोस्ट...वाह..

सतीश पंचम said...

रंजना जी,

@ अब का सिनेमा देखें,आपने इतने जबरदस्त अंदाज में सब दिखा ही दिया...
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इस फिल्म को इसलिये भी देखिये क्योंकि मेरे हिसाब से भले ही हम नई नई पचासों फिल्में बड़े परदे पर देख आएं....उन्हें हम वक्त के साथ भूल जाते हैं.... लेकिन इस तरह की एकाध पुरानी फिल्म भी बड़े परदें पर देख लें तो हमेशा हमेशा के लिये एक तरह की सुखद स्मृति...एक सुखद अनुभूति हमारे साथ जुड़ जाती है और उन लम्हों को हमेशा याद करते हैं...हमारे जेहन से इस तरह की फिल्में कभी नहीं भूलने पाती।

अभी पिछले साल ही इसी फरवरी महीने में एक निजी FM चैनल की ओर से पुरानी जीन्स कार्यक्रम के अंतर्गत मुंबई के ही रीगल सिनेमा में अपनी श्रीमतीजी के साथ राजेश खन्ना - शर्मिला टैगोर वाली 'आराधना' फिल्म देखा था, इसे अब भी घर में याद किया जाता है.....टीवी पर जब भी आराधना के गीत दिखाई पड़ते हैं वह स्मृतियां जीवंत हो उठती हैं जिन्हें मैने इस पोस्ट पर कभी अभिव्यक्त किया था। ये रहा उस पोस्ट का लिंक -

http://safedghar.blogspot.com/2010/02/blog-post_20.html

सतीश पंचम said...

रंजना जी,

आप को मैं उस आराधना वाली पोस्ट का लिंक दे रहा था और अभी देखा कि उसी पोस्ट पर आपका कमेंट भी है :)

http://safedghar.blogspot.com/2010/02/blog-post_20.html

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

गरीबी डायलॉग में, सत्तर रुपये के भूंजा/मोमफली के साथ नोस्टाल्जिया है। वास्तविकता में अभिशाप।
यह स्पष्ट हो गया!

Ashish Shrivastava said...

काय आजोबा....आली का आठवण ?
के हिन्दी अनुवाद मे
(क्यों दादाजी, कुछ याद आ गया लगता है )

वो दम नही है!

’हम दोनो’ दूरदर्शन पर ही देखी है! रंगीन भी टीवी(वीसीडी प्लेयर) पर देख पायेंगे। बिदेश मे तो थियेटर मे आने से रही :-(

rashmi ravija said...

सतीश जी,
आज की टिप्पणी फिल्म देखने के बाद....आज हमने भी देख ली ये फिल्म :)
ज्यादातर उम्रदराज लोग ही नज़र आए और वह भी जोड़े में। दादी - दादा लोगों को देखकर एक बार लगा कि शायद हम लोग गलत च्वाईस पर चल रहे हैं। कोई यंग नहीं दिख रहा, कहीं हम लोगों की सोच तो बूढ़ी नहीं हो चली है :)

एग्जैक्टली यही शब्द मेरी एक फ्रेंड ने भी कहे...और वो ब्लोग्स नहीं पढ़ती .
मुझे सच, जोड़े में इतने उम्रदराज़ लोगों को देख बहुत ही अच्छा लग रहा था. मैं फिल्म से ज्यादा उनलोगों की भाव-भंगिमाएं देख रही थी. एक अंकल गाने की पंक्तियों पर हमेशा हाथ घुमाते हुए दाद दे रहे थे...एक सर हिला कर झूम रहे थे...इंटरवल में सबके चेहरे पर एक भूली सी प्यारी सी मुस्कराहट थी...{नौस्टेल्जिया का असर:)}

पर मुझे फिल्म में सबसे ज्यादा अच्छी लगी...नायक-नायिकाओं की नैचुरल खूबसूरती. लगता है भगवान ने इतने सुन्दर लोग बनाने ही बंद कर दिए. आज के सारे स्टार्स नज़रों के सामने घूम गए. पर किसी भी नायक/नायिका के चहरे पर वो स्निग्ध कोमलता नहीं. डायटिंग कर कर के सबकी त्वचा इतनी खींची हुई लगती है कि भले ही सिक्स पैक हों या साइज़ जीरो. सुन्दरता से कोई लेना-देना नहीं. साधना का हल्का सा मेकअप और संगमरमर सी तराशी खूबसूरती...बस आँखों में भर लेने लायक थी {आप सुबह पढियेगा ये कमेन्ट..वरना सपने में साधना ही ना आजायें :)}

प्रवीण पाण्डेय said...

बताईये, इतनी अच्छी फिल्म नहीं देखी हमने।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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