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Wednesday, February 16, 2011

सुन्नर पाण्डे की पतोह

       ऐसा माना जाता हैं कि लेखक जिस परिवेश में रहता है, उसके लेखन पर भी उस इलाके की बोल चाल, लोगों की सामाजिक - सांस्कृतिक अभिरूचियों आदि का असर पड़ता है, और यह बात मैंने कई बार नोटिस की है। मसलन, धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए एक तरह का इलाहाबादी परिवेश आपकी आँखों के सामने आ जायगा.....भले ही आप कभी इलाहाबाद न गये हों....लेकिन महसूस करेंगे कि हां सब कुछ सामने ही है.....वो अतरसुइया वाला इलाका......वो रिक्शेवालों की ट्रिन ट्रिन....वो पीपल का पेड़..... सब कुछ सामने घटित होता लगता है। ऐसे ही शरद जोशी को पढ़ते हुए लगता है कि मुंबई के किसी इलाके की बात कही जा रही है, मोहन राकेश को पढ़ते हुए किसी पहाड़ी इलाके को निहारते हुए संतूर के बजने का आभास होता है। इसी तरह काशीनाथ सिंह के लेखन पर बनारस की छाप दिखाई देती है तो पुन्नी सिंह के लेखन पर छत्तीसगढ़ी माहौल का असर।

    फिर ग्राम्य परिवेश वाले लेखकों का तो कहना ही क्या.....प्रेमचंद, रेणू, विवेकी राय....इन सभी के लेखन पर ग्रामीण संस्कृति, ग्रामीण अभिरूचियों आदि का अच्छा असर दिखता है। इन सभी के लेखन में जहां तहां देहात की बोली-ठिठोली, हंसुआ-कुदाल, गाय- भैंसों आदि का अच्छा खासा चित्रण देखा जाता है, इतना कि इन लेखकों का  केवल नाम लेते ही जेहन में किसी सूदूर देहात का परिदृश्य कौंध जाता है।

       कुछ इसी तरह के लेखक हैं अमरकान्त, जिनको पढ़ते हुए जेहन में धर्मवीर भारती जी की तरह ही इलाहाबादी परिदृश्य उपस्थित होता है। मैंने अमरकान्त जी की कई रचनायें पढ़ी हैं, कुछ अच्छी थीं, कुछ बेहद अच्छी तो कुछ के बारे में शब्द नहीं मिलते कि उनके लिये क्या कहा जाय। कुछ इसी तरह की कृति है 'सुन्नर पाण्डे की पतोह' जिसे पढ़ते हुए मन एकदम से शहर से एक कस्बे की ओर कूच कर जाता है।

    बता दूं कि अभी हाल ही में ज्ञानदत्त जी ने जब धूप सेंकती एक बुढ़िया का चित्र अपने ब्लॉग पर प्रस्तुत किया था तो मुझे तुरंत ही अमरकान्त की लिखी 'सुन्नर पाण्डे की पतोहू'  की याद हो आई। यह बुढ़िया चपरासी भी अमरकान्त के  लिखे उपन्यास की तरह ही धूप सेंक रही है....संभवत: घर में होने पर यह भी धूप सेंकते हुए अमरकान्त के पात्र की तरह ही गतर गतर हाथों में तेल लगाती होंगी......आते जाते लोगों को देखती होंगी.....अपने अतीत को याद करती होंगी।
    
   अब तनिक अमरकान्त के लिखे उपन्यास 'सुन्नर पाण्डे पतोहू'  कहानी का कुछ अंश भी बताते चलूं जिसमें कि राजलक्ष्मी नाम की एक स्त्री के विवाह के बाद उसे एक नया नाम मिलता है-'सुन्नर पांडे की पतोह' ।  सुन्नर पांडे की पतोह का पति झुल्लन पांडे एक दिन उसे छोड़कर कहीं चला जाता है और फिर लौटकर नहीं आता। अन्तहीन प्रतीक्षा के धुंधलके में जीती राजलक्ष्मी के पास पति की निशानी सिन्दूर बचा रहता है। 
   
     राजलक्ष्मी नाम की वह स्त्री अपने लंबे परित्यक्त जीवन काल को जीते हुए न केवल नर-भेड़ियों से भरे समाज में अपनी अस्मत बचा के रखती बल्कि अपनी सहज और इमानदार जीवन शैली से कुछ लोगों के लिए  प्रेरणा का स्त्रोत भी बनती है। लोगों के हारे-गाढ़े वक्त पर अपनी छोटी सी उपस्थिति के जरिये ही कई सारे ऐसे कार्य करती चली जाती है जिसे देखकर लगता है मानों इसी के लिये वह बनी हो। 


     उदाहरण के तौर पर एक वकील के घर शादी पड़ती है और सत्तर वर्षीय सुन्नर पांडे की पतोहू को घर की महिलाओं की ओर से बुलावा जाता है कुछ ऐसे काम के लिये जिसे कि मर्दों की नजरों से चुराकर किया जाना है। दरअसल वकील के घर में महिलायें चोरी छिपे कुछ गहना बनवाना चाहती थीं, उनका मानना था कि मर्द गहनों का नाम सुनते ही गरजना तड़फना शुरू कर देते हैं। ऐसे में कोई जानकार महिला साथ होनी चाहिये जो कि मर्दों के कचहरी चले जाने के बाद दुपहर में सर्राफ की दुकान तक चले और गहने लेने में आसानी हो। इस उद्देश्य के लिये सत्तर वर्षीय सुन्नर पाण्डे की पतोहू से योग्य और कोई नहीं लगता। पहले भी वे लोग अपने कई ऐसे ही काम सुन्नर पाण्डे की पतोहू के जरिये करवा चुके थे। 
    
     एक बार तो खुद मर्दों ने ही सुन्नर पाण्डे की पतोहू को एक विवाह के सिलसिले में समधी के यहां बहाने से भेजा था ताकि घर बार का पता चल सके, लड़का लड़की के लायक है कि नहीं पता किया जा सके और इस सबमें सुन्नर पाण्डे की पतोहू पूरी तरह से खरी उतरी थी। जहां कहीं उसे लगा कि सामने के घर बार में खोट है उसने तुरंत ही अपनी असहमति जता दी और उसकी बात को घर के  लोगों ने ब्रम्ह वाक्य की तरह माना। 
   
     सुन्नर पाण्डे पतोहू के वर्तमान अवस्था के बारे में अमरकान्त लिखते हैं कि -    दशहरे तक तो वह अच्छी भली थी। बरसात के दिनों में कीट-पाँक हेल-लाँघकर बनाया था। मुरली मनोहर सिंह के बीमार पड़ने पर वह घर में भारी आर्थिक संकट पड़ गया था, उस सयम वकील साहब की स्त्री का एक गुप्त सन्देश लेकर उनके मायके चिटबड़ागाँव गई थी, जिसका परिणाम अच्छा निकला था। हरिहरप्रसाद पेशेकार की बूढ़ी माँ को रोज आठ बजे सवेरे पुराने रोहे और फुल्की की दवा कराने के लिए गुदड़ी बाजार के पास जंगली मियाँ के घर ले गईं थी। लेकिन दीवाली आते-आते उसने बिस्तर पकड़ लिया। वह दोमितलाल की रखैल सुनरी के साथ एक दिन सबेरे-सबेरे नदी नहाने गई थी। वहां से लौटकर आई तो बाएं पैर के पंजे में दर्द होने लगा। शाम तक वह पाँव सीज गया और चलना-फिरना बंद हो गया। इसके बाद उसे बुखार रहने लगा। उसका पाँव काला पड़ गया औ उसका हिलना-डुलना भी मुश्किल हो गया वह दिन-रात चिल्लाती रहती और रो रोकर यमराज से प्रार्थना-विनती करती। जाड़े भर उसकी ऐसी स्थिति रही कि कई बार उसके मुँह में गंगाजल और तुलसी दल डाला गया दवाँए खाकर वह उठ खड़ी हुई। । 
      
        उपन्यास में कई जगह अमरकान्त जी ने देशज हल्के फुल्के क्षणों को भी बखूबी उकेरा है। मसलन, जब सुन्नर पाण्डे की पतोहू वकील के घर लाठी टेकते टेकते पहुँचती है तब का प्रसंग लिखते हुए अमरकान्त कहते हैं -  वकीलाइन, उनकी लड़कियों, लड़कों और नाती-पोतों ने सुन्नर पाण्डे की पतोहू को घेर लिया।
  "गोड़ लागीं पँड़ाइन जी", सबके मुँह से अभिवादन के स्वर लगभग एक ही साथ निकले, जो आपस में टकराकर समाप्त हो गए।
"जीओ - जीओ, " सुन्नर पाण्डे की पतोह ने सबके अभिवादन का उत्तर दिया। इसके बाद बरामदे में ही एक बोरा बिछा दिया गया, जिस पर सुन्नर पाण्डे की पतोह बैठ गई और उसको घेरकर वकीलाइन, उनकी दो लड़कियाँ, बच्चे-कच्चे भी जमीन पर बैठ गए।
       
   हाल-चाल के बाद बच्चों ने जिद की कि सुन्नर पांडे की पतोहू वह नये किस्म का गीत सुनाये जिसे कभी वह अपनी चुटीली आवाज में सुनाती थी। लेकिन आवाज कहां रही अब। सत्तर की अवस्था में जब आवाजें केवल फंस-खंस जाती हैं तब भी सुन्नर पांडे की पतोहू चंद पंक्तियां सुनाती है जिसका तात्पर्य था कि 

इलाहाबाद की लड़कियां बड़ी सउखीन होती हैं
कभी जूता, कभी चप्पल, कभी सैंडिल पहनती हैं


      अभी यह सब हंसी मजाक चल ही रहा था कि बच्चों ने जिद की कि रंडी मुहल्ला वाला प्रसंग जरा बोल कर बतायें सुन्नर पांडे की पतोहू। दरअसल पुराने जमाने की सुन्नर पाण्डे की पतोहू रंडी को रोंड़ी कहती हैं  और उसी रंडी मुहल्ले में एक बार एक राजनीतिक जुलस निकला था जिसमें झण्डा उठाकर लोग चल रहे थे। उसी नजारे को पेश करते हुए सुन्नर पाण्डे की पतोहू अपनी पोपली आवाज में कहती हैं कि - ए बच्चा....... आज रोंड़ी महल्ला में झाँड़ा उठेगा ......औऱ उनके इस रोंड़ी और झाँड़ा बोलने का ही असर था कि आसपास के लोग ठठाकर हंस पड़ते हैं......कुछ बोलने की शैली से..... तो कुछ मुक्त हृदया सुन्नर पाण्डे की पतोहू के ब्योहार से।

  लगभग सौ पृष्ठों की इस पतली रूचिकर किताब को एक बैठक में ही और अधिक से अधिक दो बैठकों में खत्म किया जा सकता है। राजकमल  द्वारा प्रकाशित इस किताब का मूल्य है - 60/-


  - सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां के सड़क किनारों को पटरी न कहते हुए फुटपाथ कहा जाता है। 


समय - वही, जब सुन्नर पाण्डे की पतोहू लाठी टेकते टेकते सड़क की पटरी पर चली जा रही हों और एक तेज हवा का झोंका आते ही कुनमुना कर कहें - अरे तनिक धीरे चलो न....बड़ी जवानी छाई है। 
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 Update - फीड सब्सक्राईबर पाठकों की कुछ क्वेरिस आई हैं कि इस किताब को कहां से प्राप्त किया जा सकता है - तो उनकी सुविधा हेतु कुछ फोन नंबर दे रहा हूं - आशा है अन्य पाठक भी इसका लाभ उठायेंगे।



मुंबई के पाठक इस किताब को संभवत: मुंबई के कस्तूरबा चौक के पास स्थित हिंदी ग्रंथ कार्यालय से प्राप्त कर सकते है। उनके पास उपलब्ध न होने पर वे किताबें राजकमल और अन्य प्रकाशकों के जरिये मंगवा कर भी देते हैं। हिंदी ग्रंथ कार्यालय में और भी ऐसे देशज उपन्यासों का स्टॉक है मुंबई के साहित्यनुरागी यहां संपर्क कर सकते हैं।


मुंबई में उनका फोन नंबर है - 022-23826739

वैसे राजकमल वालों से सीधे बात करके यह किताब आप अपने पते पर भी मंगवा सकते हैं - उनका दिल्ली का फोन नंबर है - 011-23240464

मेल के जरिये online@rajkamalprakashan.com से पुस्तक प्राप्त की जा सकती है।

- सतीश पंचम

14 comments:

सञ्जय झा said...

bahut achha laga....

pranam.

pragya said...

पढ़ने की इच्छा जागृत हो गई...अवश्य पढ़ी जाएगी पुस्तक....रिव्यू के लिए धन्यवाद....

रंजना said...

अब पढ़े बिना कैसे रहा जाएगा...
आभार आपका इस सुन्दर विवेचना के लिए...

रंजना said...

बहुत सही कहा आपने,लेखन बोली और इलाके के प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता...

Arvind Mishra said...

साहित्य आप निरंतर पढ़ते रहते है यह बहुत अच्छी बात है -आज सुन्नर पांडे की बहू से भी मिलवाय दियो !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

आभार आपका।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

सुन्नर पांड़े की पतोह तो देर सबेर पढ़ूंगा ही। आपके माध्यम से इस धूप सेंकती महिला के बारे में जानने के बारे में रुचि बन गयी है।
और जितना पता किया है लोगों से उसमें यह एक सशक्त चरित्र बन कर उभरती है किसी उपन्यासिका के लिये - केवल यही समस्या है कि लेखन में मैं किसी चरित्र के साथ न्याय कर पाऊंगा या नहीं, बहुत झिझक है मुझे।
कुछ पोस्टें तो भविष्य में ठेल ही सकता हूं! :)

डॉ. मनोज मिश्र said...

इहौ गजब रहा.

संजय @ मो सम कौन ? said...

फ़िलहाल तो आपकी रिकमेंडेशंस नोट कर रहे हैं, बोले तो बुक्स को मार्क कर रहे हैं, बुक्समार्क:)

प्रवीण पाण्डेय said...

पढ़ने योग्य पुस्तक, घटनाओं के सामने से गुजरते देखना और आँखों में जड़ता।

Rahul Singh said...

पुस्‍तक का मूड बढि़या पकड़ में आ रहा है.

सतीश पंचम said...

फीड सब्सक्राईबर पाठकों की कुछ क्वेरिस आई हैं कि इस किताब को कहां से प्राप्त किया जा सकता है - तो उनकी सुविधा हेतु कुछ फोन नंबर दे रहा हूं - आशा है अन्य पाठक भी इसका लाभ उठायेंगे।

मुंबई के पाठक इस किताब को संभवत: मुंबई के कस्तूरबा चौक के पास स्थित हिंदी ग्रंथ कार्यालय से प्राप्त कर सकते है। उनके पास उपलब्ध न होने पर वे किताबें राजकमल और अन्य प्रकाशकों के जरिये मंगवा कर भी देते हैं। हिंदी ग्रंथ कार्यालय में और भी ऐसे देशज उपन्यासों का स्टॉक है मुंबई के साहित्यनुरागी यहां संपर्क कर सकते हैं।

मुंबई में उनका फोन नंबर है - 022-23826739

वैसे राजकमल वालों से सीधे बात करके यह किताब आप अपने पते पर भी मंगवा सकते हैं - उनका दिल्ली का फोन नंबर है - 011-23240464

मेल के जरिये online@rajkamalprakashan.com से पुस्तक प्राप्त की जा सकती है।


- सतीश पंचम

ajit gupta said...

पुस्‍तक के बारे में बताने का अंदाज अच्‍छा लगा।

rashmi ravija said...

इस किताब को पढ़ने की उत्सुकता जाग गयी...इसलिए भी कि कुछ और दृश्यों का वर्णन अपेक्षित था....उनकी बोली में कुछ और बातें सुनने की इच्छा थी...

ये पोस्ट की सफलता तो है ही....एकदम राप्चिक पोस्ट :)

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