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Saturday, February 12, 2011

प्रेम इकोफ्रेण्डली होता है .......... श्री बनानादास 'बम्बुल' :)

Its Business  plantation ?  ...No.....The love plantation
           आज अख़बार देख रहा था तो आगामी चौदह फरवरी को मनाये जाने वाले वैलेंटाइंस डे को लेकर एक रोचक ख़बर दिखी।  खबर के अनुसार  अमेरिका की वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी ने वैलंटाइंस डे के मौके पर प्रेमीजनों से ऐसे उपहारों से परहेज करने को कहा है, जिनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता हो। इनके अनुसार प्रेमियों को चाहिये के वे इकोफ्रेण्डली कार्ड का इस्तेमाल करें ताकि पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचे। ग्रीन वैलेंटाइंस मनाने के लिये प्रेमी और प्रेमिकाएं एक-दूसरे को फूलों के गुच्छे की जगह छोटे गमले में लगा पौधा भेंट कर सकते हैं। वे अपने प्यार की पहचान के रूप में अपने आसपास की खाली जगहों पर पौधे लगा सकते हैं। वे पर्यावरण के लिए काम करने वाले संगठन को डोनेशन दे सकते हैं। वाइल्ड लाइफ रिजर्व एरिया, पार्क या जू में घूमने का प्लान बना सकते हैं.....वगैरह वगैरह। 
  पूरी खबर पढ़ते पढ़ते सोचने लगा कि देखो कित्ता कूट कूट कर ग्रीनरी भरी है इन लोगों के भीतर.......हर चीज में पर्यावरण का ध्यान रखते हैं। कंडोम से लेकर कोपेनहेगेन तक इनके पर्यावरण प्रेम के गमनचिन्ह हैं। फिलहाल इस ग्रीन वैलेंटाइन डे का जहां तक सवाल है मैं समझता हूँ प्रेमी जोड़े अक्सर पर्यावरण प्रेमी होते हैं.....वे हमेशा ऐसी जगह पाये जाते हैं जहां पर कि चारों ओर पेड़ हों....पौधे हों......चिड़ियों की चह चह हो.....जहां कोई आता जाता न हो....बस हरियाली ही हरियाली। वैसे विवाहोपरांत ये पर्यावरण प्रेम और घनिष्ठ होकर दिखाई देता है....उस वक्त और जब ऑफिस जाते वक्त आवाज सुनाई देती है - शाम को आते बखत बाजार से कोई हरी सब्जी लेते आना :) 
The Weaving of business Fibres
    खैर, विदेशियों का नज़रिया है.....ससुरे तमाम किस्म के रोग भी वही देते हैं दवा भी वही बताते हैं......कभी पर्यावरण को लेकर हलकान रहेंगे तो कभी किसी बीमारी को लेकर......कभी कुछ तो कभी कुछ। और इनकी देखा देखी हमारे बुद्धिजीवी भारतीय विद्वान भी चिंता जताने लगते हैं। अखबारों में फुल पेज का पर्यावरण प्रेम दर्शाते विज्ञापन निकलने लगते हैं....पर्यावरण प्रेमी संस्थाओं की ओर से बैनर, पोस्टर छपने लगते हैं, टीवी पर, थियेटर में तमाम जगह पर्यावरण ही पर्यावरण टिल्लो मारता नज़र आता है। 


 फिलहाल, आप ये 'बाँस कथा' बांचिये जिसे कि पढ़ने के बाद श्री बनानादास 'बम्बुल' ने कभी पिंक चड्डी से लेकर बनाना चड्ढी तक का अभियान चलाया था.........   :)
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       सामुज यादव ने जब से सुना है कि बाँस के बने अंडरवियर बाजार में आ गये हैं तब से सोच रहे हैं कि लोग उसे पहनते कैसे होंगे.....चुभता तो होगा ही....बाँस जो ठहरा। आम के पेड के नीचे बैठे रहर की सीखचों से खाँची (टोकरी) बनाते सामुज के मन में रह-रह कर यह सवाल आ रहा था....कहें तो कहें किससे.....सभी अपने काम में व्यस्त....कडेदीन अपने खेतों में रहर बो रहे हैं......फिरतू चमार आज रामलखन केवट के यहाँ जुताई कर रहे हैं......मन की बात कहूँ तो कहूँ किससे। तभी साईकिल से आते मास्टर लालराम प्रजापति दिखाई पडे। 
    
     दूर से ही सामुज बोले - अरे कहाँ जान दे रहे हैं ई भरी दुपहरीया में....क्या करेंगे इतना रूपया कमाकर। मास्टर ने सामुज की बात को अपने से बातचीत करने का न्योता समझ अपनी साईकिल सीधे आम के पेड के नीचे ले आये। साईकिल से उतरते हुए कहा......अरे तुम्हारी तरह आम के पेड के नीचे बैठ खाँची बनाने जैसा आरामदेह काम थोडे है कि बस....हाथ और मुँह चलाते रहो बाकी सब काम होते रहे। 
    
   अरे तो आप भी तो वही करते हैं - मुँह - हाथ चलाते हैं.....कोई लडका सैतानी किया तो बस हाथ की कौन कहे कभी-कभी पैर भी चलाने लगते हैं - सामुज ने हँसते हुए कहा।
      मास्टर सिर्फ सिर हिलाकर हँसते रहे और साथ ही साथ साईकिल को पेड के तने से सटा कर खडा भी कर दिया।
   

    सामुज ने धीरे-धीरे बात को मोडते आखिर पूछ ही लिया - अच्छा ये बताओ मास्टर - कि लोग बाँस की बनी अंडरवियर कैसे पहनते होंगे।


       बाँस की बनी अंडरवियर ? मास्टर के मन में जिज्ञासा जगी कि ये क्या कह रहे हैं सामुज यादव, भला बाँस का भी अंडरवियर होता है कभी...पूछ ही लिया.....ये किसने कह दिया तुमसे कि बाँस का अंडरवियर होता है। सामुज ने फट से वो अखबारी कागज निकालकर दिखाया जो हवा से उडते-खिसकते उसी पेड के नीचे आ पहुँचा था जहाँ वो खाँची बना रहे थे- लिखा था - लंदन में बाँस के रेशों से बनी इकोफ्रेंडली अंडरवियर बनी है जो कि लगभग तीस पाउंड की है.....।
Eco-freindly.....the business slogan


       मास्टर ने पहले तो उस धूल-धूसरित कागज को ध्यान से देखा.....फिर कुछ सोचने की मुद्रा बनाई और कहा - इकोफ्रेडली माने - पर्यावरण का मित्र.....तीस पाउंड माने केतना होता है कि......एक गुडे अस्सी माने अस्सी गुडे तीस....माने चौबीस सौ.....यानि अढाई हजार का अंडरवियर.........। हाँ तो सामुज वो अंडरवियर अढाई हजार का है और उससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचता......यही लिखा है इस कागज पर....। तो क्या हम लोग जो पहनते हैं उससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है क्या......ये नई बात सुन रहा हूँ......। मास्टर भी सोच में पड गये कि बात तो ठीक ही पूछी है.......वो जो सन्नी देओल आकर कहता है......चड्डी पहन कर चलो और न जाने क्या-क्या तो ईसका मतलब सब पर्यावरण के खिलाफ ही बोल रहा है क्या, कहीं ये अमीरों के चोंचले तो नहीं हैं। 


    सामुज बोले - अरे अढाई हजार की चड्डी कौन पहने......और फिर हम तो वो हैं कि पट्टेदार नीली चड्डी पहनते है..........शकील मिंया की दर्जियाने में दस रूपये में सिला ली......नाप ओप का झंझट नहीं........सालों से जानते है कि मेरा साईज क्या है.....पहनने में भी आसान, खुला और हवादार। 
  
    मास्टर बोले - अब खुला और हवादार का बखान मत करो मेरे सामने......उस दिन देख रहा था यहीं इसी पेड के नीचे तुम्हारी आंख लग गई थी......तुम्हारी धोती जरा सा बगल में क्या खसकी......गाँव के लडकों को मानों कोई खेलने का सामान मिल गया........सब तुम्हारी खुले मोहडे वाली चड्डी में देख-देख हँस रहे थे और तुम बेफिक्र सो रहे थे। लडके छोटे-छोटे पत्थर तुम्हारे उस खुले स्थान पर फेंक रहे थे। वो खदेरन का लडका दग्गू एक पतली लकडी से तुम्हारे चड्डी में कोंच न लगाता तो तुम उठते भी नहीं, सोये ही रहते। 


valentine tree
  सामुज ने हँसते हुए कहा - अरे तो लडके हैं अब शरारत नहीं करेंगे तो कब करेंगे। और जहाँ तक पर्यावरण प्रेमी की बात है तो मैं तो खुले और हवादार में होना पसंद करूँगा वही सबसे ज्यादा ठीक लग रहा है। 


   तो इस मायने में तो वो अंगरेज लोग ज्यादा ही पर्यावरण प्रेमी होंगे जो चाहे समुदर हो या नदी फट से ओपन हो जाते हैं - मास्टर ने हँसते हुए ही कहा।    तभी झिंगुरी सिर पर बोझा लिये आते दिखे.......


मास्टर ने कहा -  वो देखो कितना बडा पर्यावरण प्रेमी आ रहा है.......आज तक कभी इसने धोती के अंदर चड्डी नहीं पहनी.......अढाई हजार की कौन कहे अढाई रूपये का भी खर्चा नहीं है इस पर्यावरण प्रेम में......न रहे बाँस और न बजे बाँसुरी :)

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर पर्यावरण प्रेम को दर्शाते Valentine day Tree मिलने शुरू हो गये हैं।
समय - वही, जब प्रेमी जोड़े मुंबई के बोरीवली स्थित नेशनल पार्क में एकांत बैठे हों और तभी वहां  बाघ प्रकट हो कहे - तुम लोगों का वैलेंटाइन डे मन चुका हो तो खिसको यहां से......तुम्हारे वैलेंटाइन डे के चक्कर में मेरे वैलेंटाइन की वाट लग रही है.......कम्बख्त बाघिन को भी आज ही शरमाना था :)

11 comments:

Rahul Singh said...

लंगोटिया किस्‍म की यारी बिठा दी आपने न जाने कितनों के बीच.

padmsingh said...

क्या कहें ...आपकी पोस्ट पढ़ के मन ऐसा पुलकित हो जाता है ... जैसे कहीं घी गुड़ का अगियार महक रहा हो... जैसे पुर की मोट से निकला हुआ ठंडा ठंडा पानी पैरों के तलवों तले खल खल करता बह रहा हो... जैसे बगिया मे आँधी और झौवा भर सींकर... अद्भुद लिखते हैं सरकार ...!!!

प्रवीण पाण्डेय said...

वैलेन्टाइन से चालू किये और चढ्डी पर उतार दिये। अभी भी कपड़ा तो पर्यावरण से बन रहा है, मैगनेटिक वेव से न जाने कब बनेगा।

सोमेश सक्सेना said...

ये कहानी भी खूब रही। भैया आप खींच ले जाते हैं अपने साथ गाँव की ओर।

रंजना said...

यहाँ बैठे ठहाका लगा रहे हैं और इधर से गुजरने वाले कनखियों में देख मुस्कान बिखेर रहे हैं ....

अब क्या कहें इसपर ....

बस आनंद आ गया...

टनों आभार आपको...

संजय @ मो सम कौन ? said...

तेल बचाने के लिये रैली निकालते हैं न, स्कूटर मोटरसाईकिल पर, वैसे ही इको सिस्टम की दबा कर ऐसी-तैसी फ़ेरने के बाद ये खाये अघाये देश भीतर तक ग्रीन हो रहे है। और इनकी रिसर्चें, उस से भी माशाल्लाह। स्कैनर है नही मेरे पास, नहीं तो दिखाता मैं एक शोध पत्र जिसमें चंगेज़ खान को अब तक का सबसे बड़ा पर्यावरण प्रेमी बताया गया है। कारण बहुत शानदार, कि उसने जो नरसंहार किये थे उनसे ईको सिस्टम में कार्बन का संतुलन कायम हुआ था।
सामुज यादव वाला फ़ार्मूला एवरग्रीन है:))

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

:-)

Arvind Mishra said...

इस बार बांस की बनियान और सिपोली की चड्ढी के साथ हरित वैलेंटाईन हो ही जाय ...

VICHAAR SHOONYA said...

शानदार पोस्ट! मेरे हिसाब से प्रेम eco-friendly हो चाहे ना हो socio-friendly जरुर होना चाहिए

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

गाँव में अखबार
बहाये नयी बहार
जांघिया दे उतार
चढ्ढी में तैयार

झिंगुरी रामसिंगार
जुल्फ़ी लिए झार
चल पड़े बजार
वैलेन्टाइन तिहवार

पंचम की झंकार
बड़ी मजेदार
झनकाते रहो यार
बधाई बेशुमार

डॉ. मनोज मिश्र said...

आप तो गजबे लिख रहे हैं,बधाई स्वीकारें.

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