सफेद घर में आपका स्वागत है।

Tuesday, February 8, 2011

ए जी......सुना कल आप मुखमंत्री की जूती पोंछ रहे थे......सच है का ?

-  एजी....सुना कल आप अपने रूमाल से मुखमंत्री की जूती साफ कर रहे थे .......ई बात सच है क्या  ?

-   अरे कुच्छो नहीं.......सब अफवाह है.......हम किसी मुखमंत्री का जूता उता नहीं साफ किये हैं.....लाओ  भोजन परोसो।

-    भोजन ओजन बाद में.....पहले ये बताओ कि वो टीवी वाला क्या गलत दिखा रहा था जिसमें आप मुखमंत्री के हेलीकाप्टर से उतरते ही उनके जूती को रूमाल से साफ कर रहे थे। सब देखे हैं हम.....अपनी एही आँख से। अभी बीमार हो जाउं तो तुमसे ये नहीं होगा कि तनिक मदद ही कर दो......कि घर में एकाध झाड़ू ओड़ू लगा दो......वो सब नहीं.....उसमें हेठी है........ और वहां मुखमंत्री का जूती पोंछ रहे थे तब आपकी सारी हेठी सुलग बुझ गई।

-    अरे वो.....वो तो सब अफवा है......तुम भी किस मीडिया की बात पर चिल्लम चिल्ल करे जा रही हो। ई मीडिया वाले ससुरे होते ही हैं अफवाह सिंह की औलाद। सब गलत दिखाते बताते रहते हैं। उनको क्या मालूम कि मैं क्या कर रहा था।

-     ऐसे कैसे नहीं मालूम.......साफ दिख रहा था कि अपने रूमाल से मुखमंत्री का जूता चमका रहे थे....आए हो बड़े डीयसपी उ-असपी बन कर। यही जानकर हमरे बाउजी ने हमको आपसे बियाहे थे कि जा बिट्टी अइसा सुघ्घड़ और सरकारी नौकरी वाला दुल्हा चुना हूं कि तेरी जिनगी संवर जाएगी.....जा। ये नहीं जानते थे कि एही सरकारी नौकरी वाला दूल्हा  किसी का जूत्ता साफ करने का काम भी करता है.....अरे जाओ.....थुकउनूं...... अपने साथ साथ मेरी भी जिनगी ब्यर्थ कर दिये हो।

-   अरे क्या बकवास करती हो जी......आते साथ टांय टांय लगा रखी है.......।लाओ खाना परोसो....... और मान लो पोंछ ही रहा था जूता तो कौन आफत आय गई......  और असल बात तो ये है कि पोंछते तो सब हैं,  लेकिन पोंछते हुए कोई दिखना नहीं चाहता.....मेरी न मानो तो बगल के मिसराईन से पूछ लो.....कि मिसरा जी कितने कितनों के जूता चप्पल ढोते ढाते हैं.....और अगर मिसराइन की न मानो तो यदुआईन से पूछ लो कि यादौ जी को एरिया कमान होते हुए भी किस किस को ढोना पड़ता है।

-     वो हम नहीं जानते कि और लोग क्या करते हैं.....क्या नहीं.............ये बताओ कि आप कैसे तैयार हो गये......उ दीवार पर अपनी मूँछों सहित डीयसपी वाली पुलिसिया वर्दी वाली तस्वीर जो टांगे हो तो क्या मान लूं कि तुम्हारी मूछें भी नकली हैं.....अरे अपना न सही उस मूँछ का तो खियाल किया होता.......अब किस मुँह से बात करते करते अपनी मूँछों को मरोड़ोगे......कैसे अपनी मूछों में चाभी भरोगे.....क्या यही सब दिखाने के लिये मुझे बाकी रखे हो.......मार क्यों नहीं देते कि ले जाओ बेच आओ जहां दो पैसा ज्यादा मिले । कल को बच्चों के स्कूल में जब बाकी बच्चे चिढ़ाएंगे कि इसका पापा तो औरतिया का जूता साफ करता था तो बच्चों पर क्या बीतेगी कुछ सोचा है......अरे जा थुकउनूं।

-    अच्छा अब चुप रहती है कि लगाउं एक लप्पड़........

-    हां....हां क्यों नहीं.....अब इतनी ही तो मर्दानगी बची रह गई है तुममें......बाहर सारी मरदानगी धरी रह जाती है......लगोगे जूता चप्पल चमकाने और यहां आये हो लम्बा वाला हाथ लेकर लप्पड़ मारने.......थू है तुम्हारी मरदानगी पर।

-    अच्छा तो अब बहुत हो गया कहता हूं.......मेरा ज्यादा दिमाग मत खराब कर न बहुत हो जायगा।

-    क्या बहुत हो जायगा.....जरा मैं भी तो देखूं कि क्या बहुत हो जायगा.......कल को आस पड़ोस की औरतें जब ताना मारेंगी तब सुनना तो मुझे ही पड़ेगा न.....तुम तो निकल लोगे प्रेस किया हुआ सुथन्ना पहन कर अपने आफिस... फिर से जूता चप्पल ढोने........।

-    चुप करती है या......

-    नहीं....चुप नहीं रहूंगी......आज हो जाने दो जो होना है.......।

-     औफ्फो.........तू चुप नहीं रहेगी ..........सोचा था कि घर आकर थोड़ा सांति मिलेगा लेकिन काहे की सांति........ औरत चाहे घर की हो या बाहर की ...... परेसान उतना ही करती हैं......तू अपनी टांय टांय करती रह....मैं जा रहा हूं....।

-    हाँ..... जाओ .....जहां जाना है.......जहां का जूता चप्पल उठाये हो वहीं खा भी लेना.........अच्छा अच्छा पूड़ी औ कचउड़ी.......यहां घर में क्या मिलेगा....वही पनैली दाल.......अलूअही सब्जी.....।

-    अरे तो ये पनैली दाल औ अलूअही सब्जी उसी जूता चप्पल उठाने की ही देन है वरना अब तक तू जो इतना पट पट कहे जा रही है वह भी नहीं मुंह से फूटता ......घर में बैठे बैठे मिल जा रहा है न इसिलिये इतना तबर्रा बोल रही है।

-    तो पहले ही बता देना था न .....नहीं करती बियाह.....मेरे मायके वालों को क्या मालूम था कि एक जूता चप्पल उठाने वाले के यहां बियाह हो रहा है.......

-  तो ठीक है....अब से कौन बिगड़ गया है......जा किसी अच्छे वाले को पकड़ ले जो जूता चप्पल उठाना न जानता हो......जब दुनिया जहांन देखेगी न....तब तुझे अकिल आयेगी।

-   तो यही अब बाकी रह गया है.......कि जाउं और किसी और को पकड़ लूं........अरे थोड़ा तो सोच कर बोला करो........

+++++++

-   पापा फोन.....मुखमंत्री  के पीए जी हैं.....

-   एक मिनट बेटा...... ला दे तो फोन.... .....जी सर.....जी.....जी हां.....जी जी.....जरूर सर।

-   ए जी...क्या हुआ ?

-  मुखमंत्री जी के पी.ए. साहब थे......... कह रहे हैं कि...... भोजन न किया हो तो  आवास पर आकर भोजन कर लें..... परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें अंदाजा है कि आप पर क्या बीत रही होगी  :) 

 
- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां की लोकल ट्रेन में जूतों पर जूते सवार रहते हैं।

समय - वही, जब नेता के जूते पोंछने के लिये अधिकारी अपना रूमाल निकाले और तभी उसकी नज़र रूमाल पर बने नक्काशी  पर जाय......... जिसे कि उसकी पत्नी ने सुबह घर से निकलते वक्त बड़े प्यार से जेब में हौले से थपकी देते रखा था।

20 comments:

सोमेश सक्सेना said...

महा महाराप्चिक :)

anshumala said...

सही कहा है की ये सब मीडिया वालो का उड़ाया है अभी सुना नहीं अजित पावर ने क्या कहा की "इन मीडिया वालो को तो डंडे से पिटना चाहिए फुहार पड़ती है बाढ़ दिखा देते है | " मीडिया और बड़के आफिसर को लेकर नेताओ की ये भावनाए है आम आदमी के प्रति क्या होगी हम समझ सकते है |

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

हमने तो ऐसे डीएस्पी देखे हैं जऊन मुख्मंत्री जी के पान थूके के समय आपन मूह बाए के कहत हैं कि हाकिम एहर हमार मूहवाँ माँ थूक देईं,हम बाहेर थूक आवत हईं.. आपै कहवाँ जाएके हलकान हुईबै मुदा पान थूकै का खातिर!!

rashmi ravija said...

ये पति-पत्नी संवाद...विशुद्ध हिंदी में और अंग्रेजी में भी होते होंगे....
कॉन्वेंट में पढ़ी बालाएँ...साथ में लाखों का दहेज़ लाकर... इन मंत्रियों के जूते चमकाते अफसरों की बीवियों का धर्म निभाती होंगी.(निभाने को मजबूर होंगी)

shikha varshney said...

जबर्दस्त्त....

राज भाटिय़ा said...

ऎसे पु्लिस वाले ओर ऎसे अफ़सरो ने ही इन नेताओ को आसमन पर बिठाया हे, इन्हे कुता कहना गलत नही होगा.
बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

नीरज बसलियाल said...

आशावादी पोस्ट! :)
पत्नी को देखकर लगा कि आत्मसम्मान किसी के अन्दर तो बाकी है |

प्रवीण पाण्डेय said...

जिस शरीर में रीढ़ नहीं थी, उनसे आस लगाये थे,
सत्ता सम्मुख, शीश झुकाये, स्तुति गा, बौराये थे।

Sadhana Vaid said...

बहुत बढ़िया ! एकदम सटीक और चुटीला व्यंग ! चापलूसी की इंतहा है ! लोगों का स्वाभिमान ना जाने कहाँ तिरोहित हो गया है ! बधाई एवं शुभकामनायें !

Rahul Singh said...

यह महिमा 'दीवार' के 'विजय' से जोड़ी जा सकती है क्‍या.

ajit gupta said...

चलो बेचारे को कहीं तो राहत मिली और पीए का फोन आ गया भोजन के लिए। जूते साफ करने में ऐसा क्‍या बवेला है? ऐसा करने पर ही तो सबकुछ मिलता है जी। यह बात तो पत्‍नी भी अच्‍छी प्रकार से जानती है। यदि पत्‍नी में इतना ही स्‍वाभिमान आ जाए तो देश से भ्रष्‍टाचार ही समाप्‍त हो जाए।

ललित शर्मा said...

इतना तो डीएसपी ने भी नहीं सोचा था।
वरना काहे जुती साफ़ करके जूता खाता।
परमोसन तय मानो :)

सञ्जय झा said...

महा महाराप्चिक :)

NUKILA VYANGYA...

PRANAM.

Suresh Chiplunkar said...

अब क्या कहें गुरुदेव…
तारीफ़ के लिये शब्दों का टोटा लगा देते हैं आप तो…

(लालू जी की पीक थूकने वाले, पीकदान को उठाने वाले अपर-कलेक्टर भी आज खुश हो गये होंगे…)

रंजना said...

एकदम समेट सुमेट के धर दिए आप...

जबरदस्त उधेडा ....

परनाम आपका कलम को...

बी एस पाबला said...

बस एक ही बात

परमोसन तय मानो :)

aaj said...

बढ़िया व्यंग्य.भाषा अइसन की लगा गाँव में पहुँच गए.
जूता चमकाने और कुछ सुविधा- साधन जुटाने क़ी कोशिश तो सदियों से चल रही है. मीडिया के कारण अब ऐसी घटनाएँ छिपी नहीं रह पातीं.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

फांसी नहीं खा ली का उस अधिकारी ने पत्‍नी द्वारा इतना प्रताडि़त किए जाने के बाद :)


आखिरी लाइन में सबसे ज्‍यादा दम लगा...


जिसे कि उसकी पत्नी ने सुबह घर से निकलते वक्त बड़े प्यार से जेब में हौले से थपकी देते रखा था।

यही तो थी पत्‍नीजी की पीड़ा, मेरा सिरमौर और...

Shekhar Suman said...

व्यंग्य के रूप में लिखी गयी एक बेहद ही निजी और पारिवारिक पोस्ट है .. :D :P

संगीता पुरी said...

क्‍या क्‍या सोंच लेते हैं ??

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.