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Sunday, February 6, 2011

काला घोड़ा......मैडम धूप.....कादर खान......और मैं.

      
       आज दुपहरिया में जब फोर्ट इलाके में स्थित पेटिट लायब्रेरी में बैठा कुछ लिख रहा था तो अचानक ख्याल आया कि अरे यहाँ से चंद कदमों की दूरी पर ही तो काला घोड़ा फेस्टिवल चल रहा है जिसमें कि देश भर से आये ढेरों कलाप्रेमी शिरकत कर रहे हैं। बस फिर क्या था, कलम - किताबें बंद किया और चल पड़ा काला घोड़ा की ओर। यह काला घोड़ा वाला स्थान मुंबई में ताज होटल से कुछ ही दूरी पर स्थित है। अभी कुछ कदम चला होउंगा कि ढेर सारे लोग हाथों में कैमरा लिये दिख गये। लगा कि आ गया है काला घोड़ा इलाका। 


        पहुँचते ही जहाँगीर आर्ट गैलरी से कुछ दूरी पर ढेर सारे स्टॉल्स से सामना हुआ। किसी में तस्वीरें बिक रही थी तो किसी में मूर्तियां। फ्रेम की हुई तस्वीरों की कीमत ढाई हजार से पंद्रह हजार के करीब थी तो काले पत्थर को तराश कर बनी तीन फुट की एक मूर्ति की कीमत पैंतीस हजार थी।

    मैं उन सुन्दर तस्वीरों को निहारते हुए आगे बढ़ रहा था कि तभी मुझे लुगदी पेपर का इस्तेमाल कर बनाई गई चीजों वाली दुकान दिखाई दी। वहां पर मुझे ठीक वैसा ही एक लुगदी पेपर से बना बाउल दिखा जो कि मेरे घर में भी था और जिसे मैं अपने गाँव से लाया था। पूछने पर पता चला कीमत है छह सौ रूपये। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि जिस चीज को मैं घरेलू समझ कर तीस पैंतीस से ज्यादा नहीं समझ रहा था उसकी कीमत है छह सौ रूपये।

             आगे बढ़ा तो एक जगह पर प्लेट औऱ चम्मचों को सजा कर रखा गया था जिनपर कि संदेश लिखने थे। ढेरों संदेश लिखे गये थे। जिस संस्था ने उसे आयोजित किया था उसका कहना था कि जो सबसे अच्छे दस संदेश चुने जायेंगे उन्हें संस्था की फोटो कार्ड पर प्रकाशित किया जायगा। मैंने देखा कुछ अच्छे संदेश लिखे थे, कुछ वाहियात भी। 

     आगे बढ़ा तो एक जगह पर क्ले पॉटरी वाला स्टॉल था। लोग पैसे देकर कुछ देर के लिये गोल चलती चाक पर मिट्टी से विभिन्न आकार की चीजें बना रहे थे। उन्हें बीच बीच में कुम्हार मदद भी कर देता था ताकि चाक पर गोल घूमती गीली मिट्टी का आकार बेढब न हो जाय। एक और स्टॉल पर लोग अपना पोर्ट्रेट बनवा रहे थे। एक जगह फोटोग्राफी वाली गैलरी दिखी तो अपनी रूचि के कारण उस ओर बढ लिया। एक से एक नायाब तस्वीरें थीं। 

  पूरा मेला घूमने के बाद ऑडिटोरियम की ओर बढ़ा तो पता चला कि क्लियोपेट्रा फिल्म चल रही है। उसके पहले बगल वाले ऑडिटोरिम में जाने पर पता चला कि अभी अभी बासु चटर्जी की अमोल पालेकर, अशोक कुमार वाली  'छोटी सी बात' फिल्म खत्म हुई है। मन में एक टीस उठी की यार थोड़ा पहले आना चाहिये था। वैसे भी इस तरह की फिल्में थियेटर में कम मिलती हैं अब।  फिलहाल तो अब तक रजनीगंधा, छोटी सी बात दिखाई जा चुकी है। अभी और जो फिल्में दिखाई जाने वाली हैं उनमें हैं - पिया का घर, शौकीन, चितचोर, सारा आकाश ....... देखो कब बदा है मेरे लिये इन फिल्मों का बड़े पर्दे पर देखना :)


     ऐसी फिल्मों के लिये यदि डबल पैसे देने पड़े तो भी दिया जा सकता है लेकिन यह  फेस्टिवल की महिमा है कि सभी फिल्में मुफ्त में दिखाई जा रही हैं।

      एक जगह एक अलग तरह की कलाकारी दिखी। एक  पुतला खड़ा था और उसके चारों ओर ढेर सारे भोंपू लगे थे जिनकी बातों से बचने के लिये उस पुतले ने अपने कान बंद कर लिये थे। पहली नजर में देखने पर अंदाजा हो जाता था कि हम भी आज उस पुतले के स्थान पर ही हैं.....ये तमाम  फेसबुक....ट्वीटर.....लिकडिन....वगैरह उन्हीं भोंपुओं के बदले हुए रूप हैं।  

     थोड़ा आगे जाने पर खान-पान की व्यवस्था दिखी।  साठ रूपये की एक प्लेट पानी पूरी .....एक सौ दस रूपये की पाव भाजी.....एस्स्ट्रा एक पाव का दाम था....पच्चीस रूपये। दाम देखकर थोड़ा अचरज हुआ फिर सोचा जो लोग पैंतीस हजार की मूर्ति लेने की हैसियत रखते होंगे वो जरूर साठ रूपये की पानी पूरी खाते होंगे। 

      थोडा सा फेस्टिवल से बाहर की तरफ आया तो एक चीकू बेचने वाला दिखा। उसके मुंह से रह रहकर स्लोगन निकल रहा था - चाकू से काटो चम्मच से खाओ.....चाकू से काटो चम्मच से खाओ। उसके इस कवित्त वाली चह चह को सुन अभी मगन था कि तभी सामने एक महिला अपने बेटे को छोटा ढोल दिलाती दिखी। ढोल देखते समय नाक सिकोड़ते बोली - ये गंदा है.....नहीं चाहिये। ढोल वाले ने तुरंत कहा - मैडम हम लोग धूप में रहते हैं....थोड़ा तो असर पड़ेगा.....ये गंदा नहीं साफ है.....खाली थोड़ा धूल है.....बजाते बजाते खुद ही साफ हो जाएगा....ये लो........।  कहते कहते ढोल वाले ने ढोल को साफ करना शुरू किया लेकिन महिला  रूकी नहीं....बच्चे का हाथ पकड़ आगे की ओर चल पड़ी...बच्चा ...उहूँ .....उहूँ.....करता ही रह गया।

 यही सब देखते ताकते मेरे काला घोड़ा फेस्टिवल में शिरकत करने का मंसूबा पूरा हुआ।

    वैसे इन सब टहला टहली के दौरान  मुझे जो बात सबसे ज्यादा अखर रही थी वह अपने कैमरे के साथ न होने की थी। वैसे भी प्लान करके तो आया नहीं था। उधर मोबाइल का मेरा कैमरा कभी भी बंद पड़ जाता है। उसे वैसे भी शाम छह बजे के बाद कुछ नहीं दिखता इसलिये उसे कादर खान कैमरा कहता हूं क्योंकि एक फिल्म में कादर खान को भी शाम छह बजे के बाद रतौंधी हो जाती थी....कुछ भी नहीं दिखता था। वही हाल मेरे कैमरे का भी है, बल्कि इसे तो दिन में भी कम दिखता है। फिर भी ले देकर कुछ तस्वीरें खींच खांच लाया और यहां टांग रहा हूँ.....आप लोग  नोश फरमाएं। 

 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर कि देशभर से ढेर सारे कलाप्रेमी आए हैं।

समय -  वही, जब फेस्टिवल में एक विदेशी महिला पीपल के पेड़ के नीचे खड़े होकर एक चित्रकार से अपनी तस्वीर बनवा रही हो और तभी एक शोहदा पास आकर उससे कहे......मैडम कपड़े पूरे पहनिए.........चित्रकार के पास स्किन कलर कम है :)




 ( Paper bowl का चित्र - गुगल दद्दा से साभार  )

22 comments:

संजय @ मो सम कौन ? said...

राप्चिक!

डॉ. मनोज मिश्र said...

अनोखा फेस्टिवल,तस्वीरें तो सही आयीं है.

Kajal Kumar said...

बढ़िया रपट.
जहांगीर आर्ट गैलरी का ज़िक्र पढ़ कर वो दिन याद आ गए जब कभी वहीं पास ही की एक बिल्डिंग 'ऐम्का हाउस' से हम लोग अक्सर भाग कर वहीं आप—पास यूं ही घूमा करते थे...

अनूप शुक्ल said...

हम भी घूम लिये साथ-साथ !

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

धाँसू रिपोर्ट!! पूरा ईलाका नज़र के सामने से गुज़र गया!!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

रोचक रिपोर्टिंग - सटीक चित्र. लगे हाथ यह भी बता दीजिये की समारोह का नाम काला घोड़ा क्यों है (या लीली घोडी क्यों नहीं) और लेटर बोक्स वाले चित्र का परिचय क्या है?

सतीश पंचम said...

अनुराग जी,

इस जगह का नाम काला घोड़ा इसलिये पड़ा क्योंकि यहां पर पहले कांसे के बने एक घोड़े की मूर्ति थी जिस पर कि ब्रिटिश राजा एडवर्ड VII सवार थे। बाद में वह मूर्ति संग्रहालय में रख दी गई लेकिन इलाके का नाम अब भी काला घोड़ा ही कहा जाता है और इसी इलाके में कला को समर्पित समारोह हर साल फरवरी के महीने में आयोजित किया जाता है।

लेटर बॉक्स वाली कलाकृति को जहां तक मैं समझ पाया हूँ उसका मतलब यह है कि कम्यूनिकेशन के इस फेसबुकिया, ई-मेल, चैट वाले दौर में पुराने पड़ चुके ये लेटर बॉक्स अब केवल खूंटियों में टांगने के लायक रह गये हैं....वैसे ही जैसे कि पेंटिंग, मोमेटो आदि के दीवारों पर सजे होते हैं ठीक उसी तरह।

हांलांकि अब भी कुछ लेटर बॉक्स इस्तेमाल होते हैं इसलिये प्रतीक के तौर पर दो लेटर बॉक्स जमीन पर रखे गये हैं, शेष को हवा में टांग दिया गया है।

प्रवीण पाण्डेय said...

कादरखानी कैमरे को माना रतौंधी है पर संवाद तो बहुत अच्छे लिखते हैं जनाब।

Arvind Mishra said...

अच्छी रिपोर्ट -अभिजात्यता के कई चेहरे हैं -एक यह भी है -मनुष्य महान है !

anshumala said...

काला घोडा फेस्टिवल पूरी तरह से उच्च वर्ग के लिए और उनके बच्चो के लिए होता है जो मुंबई में गाय बकरी देख के भी उत्साहित हो जाये है | आम आदमी इससे बिल्कुल भी नहीं जुड़ता है रविवार को भी भीड़ की कमी आप को इस बात की पुष्टि कर देगा, सामानों की कीमत आपने बता ही दी है फेस्टिवल के आलावा वो चीजे दूसरी जगह आप को सस्ते में मिल जाएगी | हा फिल्मे और कई बड़े कलाकारों के कार्यक्रम आप को वहा मुफ्त में बिना किसी भीड़ भाड़ के आसानी से देखने को मिल जाएगी | हर साल कई बड़े बड़े भारतीय बैड ग्रुप, गायक आते है कल सुनिधि आई थी |

rashmi ravija said...

अपने परिचित रोचक तरीके से बयाँ की है फेस्टिवल की दास्तान.....

पहले नियमित जाया करती थी...बच्चों को कुम्हार की घूमती चाक और कठपुतली का प्रोग्राम देखना बहुत पसंद आता था...कोलाबा में ही एक रिश्तेदार रहते थे...सो उनसे मिलना और खाना-पीना उनके यहाँ हो जाता था..:) ...इन महँगी पावभाजी और पानीपूरी से अपना वास्ता नहीं पड़ा :) बच्चों को बस कैंडी फ्लौस चाहिए होती थी.(जिन्हें हम बचपन में बुढ़िया के बाल या हवा मिठाई कहते थे)

अब रूचि.....'मोनो एक्टिंग' और 'नुक्कड़ नाटकों' में सिमट आई है...ये फिल्मे तो मुझे भी ललचाती हैं..पर पति और बच्चो को इन फिल्मो का जिक्र भी गवारा नहीं :(:(

Rahul Singh said...

दर्शनीय और पठनीय भी.

सोमेश सक्सेना said...

सतीश जी बढ़िया रपट है, मजा आया पढ़कर. आखिर हम भी कलाप्रेमी ठहरे.
एक ऐतराज़: रंगकर्मी theatre artists को कहा जाता है जो नाट्य अभिनय और निर्देशन आदि करते हैं रंगमंच में. ये लोग तो कलाकार तो हैं पर रंगकर्मी नहीं.

डा० अमर कुमार said...


मैंने भी यह पोस्ट पढ़ ली,
बस यही बताना था !

सतीश पंचम said...

सोमेश जी,

ध्यान दिलाने के लिये शुक्रिया। रंगकर्मी से कलाप्रेमी लिख दिया हूं। पता नहीं ये भी सही है या नहीं, लेकिन बदल दिया है :)

सतीश पंचम said...

वैसे कलाप्रेमी शब्द लिखते हुए भाव राप्चिक अंदाज में डायनेमिक हो उठे हैं :)

सञ्जय झा said...

ghoom liye aapke saath

pranam.

ajit gupta said...

काला घोड़ा चाय का ब्रांड है लेकिन यहाँ तो बात कला की निकली। बड़ा अच्‍छा लगा पढ़कर। बड़े शहरों के कई फायदे भी दिखायी दे जाते हैं।

सोमेश सक्सेना said...

सही कहा आपने सतीश जी, भाव सच में राप्चिक अंदाज में डायनेमिक हो उठे हैं।

मेरी बात को भाव देने के लिए धन्यवाद :)

रंजना said...

वाह रोमांचक ...

बहुत कुछ नया जानने को मिला...

आभार ...

VICHAAR SHOONYA said...

ये पुरुष गणेश दर्शन क्या है साहब? मन में तरह तरह के शैतानी विचार आ रहे हैं. कृपया स्पष्ट करें.

सतीश पंचम said...

आर्ट फेस्टिवल में तीर के साथ पुरूष गणेश दर्शन लिखा पढ़कर मैं थोड़ा अचकचा गया था। लगा कि कलाकार लोग हैं.....कुछ इसका भी मतलब होता होगा, अपने को तो कम समझ आती है।

फिर थोड़ा ध्यान दिया तो समझ आया कि ये पार्टिशन बोर्ड है जिसका कि इस्तेमाल मुंबई में गणेशोत्सव के पंडाल में किया गया है ताकि पुरूषों के लिये गणेश दर्शन हेतु अलग लाइन लगे। गणेशोत्सव कभी का खत्म हो गया है और शायद उसी पार्टिशन बोर्ड को यहां आर्ट फेस्टिवल में स्टॉल बनाने के काम में लाया गया है....अब इसे optimum use of resources का Tag लगा दिजिए या Art of Reusing.....depends....कि हम इसे किस नजरिये से देखते हैं :)

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